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उच्च शिक्षा प्रणाली (Higher Education System),महत्वपूर्ण शैक्षिक संगठन / परियोजनायें NET

 

उच्च शिक्षा प्रणाली (Higher Education System)


1.     प्राचीन भारत में शिक्षा

2.   उच्च अधिगम की संस्थाएं

3.    स्वतंत्रता के बाद भारत में उच्च अधिगम और शोध का उद्भव

4.   भारत में प्राच्य , पारंपरिक शिक्षा

5.    गैर - पारंपरिक अधिगम कार्यक्रम

6.   गैर - पारंपरिक अधिगम के प्रमुख कार्यक्रम

7.    व्यावसायिक / तकनीकी और कौशल आधारित शिक्षा

8.   मूल्य आधारित शिक्षा

9.   नीतियाँ

1.     पर्यावरणपरक शिक्षा

2.   सुशासन

3.    राजनीति और प्रशासन

प्राचीन भारत में शिक्षा ( EDUCATION IN ANCIENT INDIA )

 प्राचीन काल की शिक्षा पद्धति के संदर्भ में प्राप्त आंकड़ों / तथ्यों इत्यादि के आधार पर कहा जा सकता है कि उस समय की शिक्षा प्रणाली व्यावहारिक थी । प्राचीन भारत में जब लिपि / भाषा का ज्ञान नहीं था तब मौखिक शिक्षा थी । समय के विकास के बाद जब लिपि और भाषा का विकास हुआ तब यह शिक्षा आश्रम पद्धति पर आधारित थी जिसमें विद्यार्थी को अपने घर से निकलकर शिक्षा अध्ययन के लिए आश्रम में रहता था

यहाँ पर उसको निर्धारित समयावधि में विभिन्न प्रकार की शिक्षा दी जाती थी । यह शिक्षा उस समय के काल खण्ड के अनुसार काफी व्यवहारिक थी । जहाँ पर विद्यार्थी अपने गुरू के साथ रहकर शिक्षा अर्जित करता था । इसमें वेद , पुराण उपनिषद के साथ - साथ अस्त्र - शस्त्र सहित विभिन्न शारीरिक क्रिया कलाप के साथ शिक्षा दी जाती थी ।

राज्य सरकार तथा विश्वविद्यालय ( State government and the University )

 वास्तव में देखा जाये तो विश्वविद्यायल स्वायत्तता प्राप्त निकाय होते हैं तथा सरकार का इन पर नियंत्रण अप्रत्यक्ष रूप से होता है । सरकार इन पर जो अपना नियंत्रण स्थापित करती है , वह अप्रत्यक्ष रूप से निम्नलिखित प्रकार से होता है :

1.    राज्य का राज्यपाल , राज्य के समस्त विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होता है तथा प्रतिवर्ष वह राज्य के समस्य विश्वविद्यालयों के संचालन एवं प्रबंधन संबंधी प्रतिवेदन को प्राप्त करता है ।

2.    राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति की नियुक्ति , राज्यपाल के द्वारा की जाती है ।

3.    सीनेट द्वारा पारित नियम , तब तक अधिनियम का रूप धारण नहीं करते , जब तक उन्हें राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त नहीं हो जाती है ।

4.    चूंकि विश्वविद्यालय के लिये आर्थिक कोष का आवंटन सरकार द्वारा किया जाता है , अत : वह उनके आय - व्यय का आकलन करती है । .

5.    कार्यकारिणी या सीनेट में राज्य सरकार द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि होते हैं , जो विश्वविद्यालयों के निर्णयों को प्रभावित करते हैं ।

6.    राज्य सरकारें , विश्वविद्यालय अनुदान समिति के माध्यम से राज्य के विश्वविद्यालयों को अनुदान प्रदान करती हैं ।

 

विश्वविद्यालयी शिक्षा की वित्तीय व्यवस्था ( Financial allocation of the University )

किसी भी विश्वविद्यालय एवं उससे संबद्ध महाविद्यालयों की आय के साधन निम्नानुसार होते हैं :

1.    केंद्र सरकार के अनुदान ,

2.    राज्य सरकार के अनुदान

3.    शिक्षण शुल्क

4.    वृत्तिदान इत्यादि ।

संस्थायें एवं उनकी अंतःक्रिया ( INSTITUTIONS AND THEIR INTERACTIONS )

विश्वविद्यालय शिक्षा में विभिन्न संस्थाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है । ये संस्थायें न केवल विश्वविद्यालयीन शिक्षा को प्रोत्साहित करती हैं , अपितु शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों को क्षेत्र या विषय विशेष में शोधकार्य करने एवं नयी जानकारियों से अवगत होने का सुअवसर भी उपलब्ध कराती हैं । भारत की वे संस्थायें , जो उच्चतर शैक्षिक अनुसंधान क्षेत्र में कार्यरत हैं , उनका विवरण निम्नानुसार है :

 

1.    भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् , नयी दिल्ली ( Indian Council of Social Science Re- search , New Delhi ) : भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् की स्थापना वर्ष 1969 में एक स्वायत्तशासी संस्थान के रूप में की गयी थी । इसका उद्देश्य देश में सामाजिक विज्ञान शोध को प्रोन्नत व समन्वित करना था । यह परिषद् सामाजिक विज्ञान के ज्ञान को बढ़ाने के लिये अनुसंधान संस्थानों को अनुरक्षण एवं विकास अनुदान प्रदान करती है । इसके अलावा यह अंतर - विषयक परिप्रेक्ष्य को प्रोन्नत करके अनुसंधान की कोटि में सुधार भी करती है । अध्यक्षा : व्रजबिहारी कुमार       website - (https://www.icssr.org)

 

 

2.  भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद् , नई दिल्ली ( Indian Council of Historical Research , New Delhi ) : इसकी स्थापना वर्ष 1972 में एक स्वायत्तशासी संस्थान के रूप में की गयी थी । इसका उद्देश्य देश में इतिहास के क्षेत्र में तथ्यपरक अनुसंधान एवं लेखन को बढ़ावा देना है । इसके अतिरिक्त यह अनुसंधान परियोजना को प्रायोजित करती है तथा देश के लोगों में देश की राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करने की भावना को जागृत करती है ।  http://ichr.ac.in/

 

3.    भारतीय उच्चतर अनुसंधान परिषद् ( आई.आई.ए. एस . ) , शिमला ( Indian Institute of Advanced Studies , Shimla ) : इसकी स्थापना वर्ष 1965 में एक स्वायत्तशासी संस्थान के रूप में की गयी थी । इसका उद्देश्य सामाजिक विज्ञान , मानविकी एवं संबंधित क्षेत्रों में उच्च अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिये वरिष्ठ विद्वानों की सहायता करना है । इसके अतिरिक्त यह नये क्षेत्रों में अनुसंधान , नये महत्वपूर्ण विचारों के सृजन तथा संकलपनात्मक विकास के प्रोत्साहन की दिशा में कार्य करती है ।

 

4.    भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् , नई दिल्ली ( Indian Council of Philosophical Research , New Delhi ) : यह परिषद् देश के दार्शनिक अनुसंधान के क्षेत्र में शोध एवं अध्ययन को प्रोत्साहित करती है । इसके अतिरिक्त यह दर्शनशास्त्र एवं संबंद्ध विषयों में शोध करने वाले विद्यार्थियों एवं अनुसंधानकर्ताओं को वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है ।

 

महत्वपूर्ण शैक्षिक संगठन / परियोजनायें

1.    राष्ट्रीय बाल भवन ( 1956 )

2.    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( 1956 )

3.     नेशनल बुक ट्रस्ट ( 1957 )

4.    राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और विकास परिषद् ( 1961

5.    केंद्रीय विद्यालय संगठन ( 1966 )

6.    राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा परियोजना ( 1980 )

7.    इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ( 1985 )

8.    महिला समाख्या कार्यक्रम ( 1989 )

9.    जिला प्राथमिक शिक्षा परिषद् ( 1994 )

10. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् ( 1995 )

11. राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद ( 1996 )

 

 


उत्तर प्रदेश के राजकीय प्रतीक



उत्तर प्रदेश के राजकीय प्रतीक – भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों की तरह ही प्रत्येक राज्य के अपने राजकीय चिह्न एवं प्रतीक हैं। उसी क्रम में यहाँ आपको उत्तर प्रदेश के राजकीय प्रतीकों के बारे में जानकारी दी जा रही है। उत्तर प्रदेश के राज्य प्रतीकों की जानकारी नीचे दी गयी है –




 राजकीय चिन्ह


मछली एवं तीर कमान –  उत्तर प्रदेश का राजकीय चिन्ह या सरकारी मोहर के प्रारूप में एक वृत्त में ऊपर धनुष, बीच में बहती गंगा-यमुना नदियां और नीचे दायें-बायें दो मछलियाँ हैं। इसे 1938 ईo में स्वीकृत किया गया।







राज्य पशु ( State Animal )
अंग्रेजी नाम : स्वैम्प डियर
हिन्दी नाम : बारहसिंघा
वैज्ञानिक नाम : रूसरवस डुवाओसेली
इसके सींग बहुत बड़े तथा बहुशाखित होती है। जिनकी संख्या सामान्यतः 12 तक पहुँच जाती है इसलिए इसे बारहसिंघा कहा जाता है। दलदली जगहों में इनका प्राकृतवास होने के कारण इन्हें अंग्रेजी में “स्वैम्प डियर” कहा गया है। यह भारत वर्ष के मात्र तीन स्थानों उत्तर प्रदेश के तराई वन क्षेत्र, उत्तर पूर्व स्थित असम राज्य एवं मध्य प्रदेश के आरक्षित वन क्षेत्रों में पाया जाता है। मूलतः शाकाहारी प्रवृत्ति के इस जीव की ऊँचाई 130-135 सेमी., वजन लगभग 180 किग्रा. तथा सींगों की औसत लम्बाई 75 सेमी. होती है। इसका प्राकृतवास मुख्यतः दलदली व कीचड़ वाले ऊँची घास से आच्छादित क्षेत्र हैं। उत्तर प्रदेश में यह दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, किशनपुर वन्य जीव विहार आदि में भी पाया जाता है। यह विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में सम्मिलित है।


 


राज्य मछली ( State Fish )

अंग्रेजी नाम : चीतल
हिन्दी नाम : मोय, चीतल
वैज्ञानिक नाम : चिताला

इस मछली की पीठ पर सुन्दर चित्ती पाए जाने के कारण इसको चीतल कहा गया है। चिताला संकटग्रस्त मत्स्य प्रजाति है जिसे साधारणतः फैदरबैक के नाम से जाना जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इसे चीतल, मोय, पारी सीतुल वाला, काण्डल्ला आदि नामों से भी जाना जाता है। मीठे जल में मत्स्य पालन के लिए चीतल एक अच्छी एवं पौष्टिक प्रजाति की मछली है। यह भारत में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कोसी, गोमती, गेरुआ, सतलुज, केन, बेतवा एवं महानदी नदियों में पायी जाती है। इस प्रजाति का निवास बड़ी नदियों, झीलों, जलाशयों तथा रुके हुए पानी में है। शल्क छोटे होते हैं। इस प्रजाति मात्र में ही छोटी या वयस्क मछली के शरीर पर प्रायः सुनहरी या रूपहली लगभग 15 खड़ी धारियाँ होती है। इसकी अधिकतम लम्बाई 150 सेमी. एवं अधिकतम वजन 14 किग्रा. होता है। यह मछली द्विजननांगी होती है, जिसमें नर दो वर्षों के बाद तथा मादा 3 वर्षों के बाद परिपक्व होती है। यह प्रजाति संकटापन्न हो गयी है।




 


राज्य पक्षी ( State Bird )

अंग्रेजी नाम : सारस, क्रेन
हिन्दी नाम : सारस
वैज्ञानिक नाम : ग्रूस एंटीगोन

सर अर्थात् सरोवर के पास इसका प्राकृतवास होने के कारण इसे सारस कहा जाता है। इसके नर और मादा एक साथ जोड़े में रहते हैं तथा लोकमान्यता में आदर्श दम्पत्ति के प्रतीक रूप में देखे जाते हैं। यह शुद्ध एवं स्वस्थ पारिस्थितिकीय तन्त्र वाले जलाशयों के पास ही मिलता है। यह लगभग 6 फीट ऊँचाई तथा 8 फीट तक पंखों के विस्तार के साथ कद में उड़ने वाले पक्षियों में सबसे ऊँचा पक्षी है। सारस उत्तरी एवं केन्द्रीय भारत, पाकिस्तान तथा नेपाल देश में पाए जाते है। इसके परों का रंग हल्का स्लेटी राख जैसा होता है तथा शिखर हल्के चिकने हरे पंखों से आच्छादित रहता है। ये कठोर परिस्थितियों, जैसे अत्यधिक ठंडक में भी सुगमता से जीवित रहते हैं। दलदली भूमि क्षेत्रों में ह्रास तथा प्राकृतवास संकुचित होने के कारण सारस संकटग्रस्त प्राणी हो गया है।





राज्य वृक्ष ( State Tree )

अंग्रेजी नाम : अशोक
हिन्दी नाम : अशोक
स्थानीय नाम : सीता अशोक
वैज्ञानिक नाम : सराका असोका

लोकमान्यता में शोक नाशक होने के कारण इसे अशोक कहा गया है। इसकी छाल से अशोकारिष्ट दवा बनती है। पौराणिक पंचवटी का यह सदस्य वृक्ष है। यह आर्द्र क्षेत्र का वृक्ष है। हिन्दू नववर्ष के प्रथम दिन इसके फूल की कली वर्ष भर शोक रहित रहने के लिए खायी जाती है। औसत ऊँचाई के इस सदाबहार पवित्र वृक्ष का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसकी पत्तियाँ संयुक्त होती हैं तथा फूल और फल बड़े गुच्छों में फरवरी से अप्रैल के मध्य आते हैं। पौध रोपण हेतु इसकी नर्सरी पौध बीजों द्वारा उत्पादित की जाती है। सामान्यतः यह वृक्ष सघन छत्र होने के कारण उद्यानों, मार्गों के किनारे, आवास परिसरों व मंदिरों में लगाये जाते हैं। औषधीय गुणों के कारण यह आयुर्वेदिक औषधि बनाने में प्रयुक्त होता है। वर्तमान में यह प्रजाति संकटग्रस्त हो गयी है।



 




राज्य पुष्प ( State Flower )

अंग्रेजी नाम : फ्लेम ऑफ़ द फॉरेस्ट
हिन्दी नाम : पलाश, ढाक, टेसू
वैज्ञानिक नाम : ब्यूटिया मोनोस्पर्मा

श्रेष्ठ गुण वाली पत्तियाँ धारण करने के कारण इसे पलाश कहा गया है। इसकी पत्तियों में भोजन या प्रसाद लेना बहुत लाभदायक माना जाता है। इसके बीज पेट के कीड़े दूर करने की श्रेष्ठ औषधि हैं। यह वातरोग नाशक है। होली पर इसके फूल के रंग से होली खेली जाती है। आयुर्वेदिक क्षार प्राप्त करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ वृक्ष है। यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला टेढ़ा-मेढ़ा मध्यम ऊँचाई का पर्णपाती वृक्ष है। सामान्यतः इसे ढाक, पलाश एवं जंगल की आग के नाम से जाना जाता है। इसके तीन पर्णफलक होते हैं। इसके डेढ़ से दो इंच आकार के सुर्ख नारंगी लाल रंग के पुष्प फरवरी से मार्च के मध्य निकलते हैं। यह एक बहुपयोगी वृक्ष है। इसके पत्तों से दोने और पत्तल बनाये जाते हैं तथा यह चारा पत्ती, रेजिन, रंग, औषधि एवं चारकोल बनाने के काम भी आता है