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सल्तनतकालीन संस्कृति 6

सल्तनतकालीन संस्कृति

"तेरहवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में दिल्ली सल्तनत की स्थापना को भारत के सांस्कृतिक जा सकता है । शासन प्रबन्ना , विज्ञान , साहित्य और स्थापत्य कला दृष्टिकोण था । दूसरी ओर भारतीयों के भी अपने धर्म , शासन प्रवंध साहित्य विज्ञान तथा स्थापित्य को लेकर अपने निश्चित विचार थे।इन दोनों के मिलान ने एक मिलीजुली संस्कृति का विकास किया । "





सल्तनतकालीन प्रशासन

दिल्ली सल्तनत का प्रारम्भ 1206 ई0 में तथा अन्त 1526 ३० न म1206 ई0 में तथा अन्त 1526 ई0 में हुआ । इस प्रकार भारत में सुल्तानों किया । सल्तनत काल में राल्तान का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण था । सारी राजनैतिक , कानूनी और सैनिक सत्ता उसी में निहित थी । वह राज्य की सुरक्षा आर व्यवस्था काला था । इस तरह वह प्रशासन के लिए भी जिम्मेदार था । सल्तान ही सेना का प्रधान होता था । कानून आर याच की व्यवस्था करना भी उसी का दायित्व था । इस कार्य के लिए वह न्यायाधीशों की नियुक्ति करता था । उसका किसी भी पदाधिकारी के अन्याय के खिलाफ उससे सीधे अपील की जा सकती थी । न्याय करना शासक का महत्त्वपूर्ण दायित्व था ।


केन्द्रीय शासन

केन्द्रीय शासन में सुल्तान का पद महत्वपूर्ण होता था । सुल्तान ही सेना का सबसे बड़ा अधिकारी होता । था । युद्ध और सन्धि के सम्बन्ध में वही निर्णय लेता था । न्याय में भी उसी का निर्णय अन्तिम होता था । सुल्तान अपनी मदद के लिये मंत्रियों की नियुक्ति करते थे । मंत्रियों का पदासीन रहना या न रहना सुल्तान की इच्छा पर निर्भर करता था । मंत्रियों की संख्या , उनके अधिकार और कर्तव्य समय - समय पर जुल्तान परिवर्तित करते रहते थे ।


प्रान्तीय शासन

समस्त देश अनेक प्रान्तों में विभक्त था । पहले इन्हें ' इक्ता और बाद में ' विलायत ' कहा गया । प्रत्येक उन्त का अधिकारी गवर्नर होता था , जो ' इक्तादार और बाद में मुक्ति या ' वली कहलाता था । उसे सुल्तान युक्त करता था । वह सुल्तान के प्रति उत्तरदायी होता था । वह प्रान्त में कानून व्यवस्था बनाए रखता था । से सैन्य एवं प्रशासनिक योग्यता के आधार पर नियुक्त किया जाता था । उसके अधीन घुडसवार , फौजी दस्ते । या पैदल सैनिक रहते थे । वह आपराधिक मामलों के विवादों में न्यायाधीश का कार्य करता था । वह कर यह में सहायता प्रदान करता था ।


प्रान्तों में काजी एवं सद्र भी नियुक्त किए जाते थे । प्रायः एक ही व्यक्ति को दोनों पद दिए जाते थे । जी के रूप में वे दीवानी मामलों में न्याय करते थे तथा सद्र के रूप में धार्मिक अनुदानों के मक का कार्य करते थे । प्रान्तों के नीचे जिले ( जिन्हें " सरकार कहते थे तथा इसके नीचे उपसम्भागीय क्षेत्र होते थे जिन्हें ' शिक कहते थे । जिले के अधिकारी को प्रमुख शिकदार तथा शिक के अधिकारी को शिकदार कहते थे । ये दोनों अधिकारी अपनी - अपनी इकाइयों में मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भमिका निभाते थे तथा राजस्व वसूली में सैन्य सहायता प्रदान करते । थे । प्रत्येक शिक में एक भू - राजस्व अधिकारी होता था जिसे आमिल कहते थे । शिक में फोतदार , कोषाध्यक्ष का कार्य करता था ।


स्थानीय शासन

प्रत्येक शिक को परगनों में बाँटा जाता था । गाँवों के समूह को परगना कहते थे । प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी । गाँव । का मुखिया मुकद्दम या चौधरी कहलाता था । वह समस्त ग्रामीण प्रशासन के लिए उत्तरदायी था । भू - राजस्व निर्धारण एवं वसूली के साथ राजस्व सम्बन्धी सभी कागजात वह रखता था । गाँव की सुरक्षा का कार्य गाँव के चौकीदार का होता था । गाँव के ये तीनों अधिकारी वंशानुगत होते थे । इन्हें वसूले गए भू - राजस्व का एक भाग प्राप्त होता था । गाँव का प्रशासन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होता था । इसीलिए मध्यकालीन भारत में ग्रामीण स्तर पर प्राचीन परम्पराएँ यथावत रहीं ।

        दिल्ली के सुल्तानों ने दिल्ली सल्तनत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया परन्तु इनके अधिकतर उत्तराधिकारियों के अयोग्य होने के कारण सल्तनत की शक्ति कम होती गई । सल्तनत के विभिन्न भागों में बहुत से इक्तादारों ने नए राज्य बना लिए । उत्तर भारत में सल्तनत के कुछ प्रान्त थे जो बाद में स्वतंत्र राज्य बन गए , जैसे - जौनपुर , बंगाल , मालवा , गुजरात , कश्मीर तथा मेवाड़ ।


सल्तनत कालीन समाज

सल्तनत काल के शुरुआती दौर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विचारों , रिवाजों एवं विश्वासों में भिन्नता होने से समाज में संघर्ष एवं टकराव की स्थिति पैदा होने लगी । तुर्को के आगमन ने उत्तर भारत में पर्दा - प्रथा को मजबूत किया । यह प्रथा समाज के ऊँचे तबकों की प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई । इसका स्त्रियों की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और वे घर में सिमटने लगीं ।
बाह्य आडम्बर एवं धन - सम्पत्ति का प्रदर्शन समाज की विशेषता बन गई । इन सबसे समाज में तनाव । बढ़ने लगा , जिससे जीवन के नैतिक मूल्यों का हास होने लगा । लोग जीवन के यथार्थ से आँख चुराने लगे । किन्तु लोग बनावटी जीवन से थकने लगे । उन्हें एक ऐसे वातावरण की आवश्यकता हुई जिसमें सामाजिक जीवन के नैतिक मूल्यों को बचाया जा सके । इसी समय भक्तों और सूफी सन्तों का पदार्पण हुआ । इन्होंन लोगों में आपसी समझ पैदा करने की कोशिश की और सादा जीवन उच्च विचार ' पर बल दिया ।


भक्ति  आन्दोलन राथा सूफी सन्त

तुर्क और अफगान जो अपने साथ धार्मिक विचार और संस्कृति लाए , उसका भा घास पर प्रभाव पड़ा । जालि प्रथा की कठोरता , ऊँच - नीच का भेद - भाव तथा बाहरी आज समाज में कुछ दोष आ गए । अत : सामाजिक कुरीतियों को दूर करने आर समाज लिए कुछ समाज सुधारकों ने जनता में परस्पर प्रेम तथा सद्भाव को यकान का रस्पर प्रेम तथा सदभाव को बढ़ाने का प्रयास किया । इन्होंने धाभिक कर्मकाण्डों की अपेक्षा भक्ति - भाव से ईश्वर की उपासना करने को श्रेष्ठ बताया । इस प्रकार की भावना को बल मिला सन्तों एवं समाज सुधारकों द्वारा चलाया गया इस प्रकार का ना आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
इन भक्त संतों में कबीर चैतन्य महाप्रभ गरुनानक , दाद , रवास , तुकाराम , रामानंद , बल्लगाना मीराबाई आदि प्रसिद्ध हैं ।
लोगों की साधारण भाषा में लिखे और गाए गए उनके गीत व दोहे ईश्वर के प्रति भक्ति - भाव से हैं । इनमें बहुत से ऐसे विचार हैं जिनको तब से लेकर अब तक लोग मानते आए हैं ।



कबीर -

काशी ( वाराणसी ) में एक जुलाहे . बनकर परिवार में कबीर का पालन - पोषण हुआ । कबीर निरंकार परमेश्वर में विश्वास रखते थे । कबीर की प्रमुख रचनाएँ थी - साखी , सबद , रमैनी ।




मीराबाई -

ये मेड़ता के राठौर राणा रतन सिंह की पुत्री थी
। मीराबाई कृष्ण की उपासना में भजन गाया करती थी ।







गुरुनानक -

1469 ई0 में पंजाब के तलवंडी नामक स्थान में गुरुनानक का जन्म हुआ था । इन्होंने सिख धर्म धर्म चलाया तथा एकेश्वरवाद का उपदेश दिया ।






चैतन्य महाप्रभु ने बाह्य आडम्बर तथा कर्मकाण्ड का
विरोध किया । रविदास ने लोगों को शिक्षा दी कि भक्ति से ही मनुष्य मोक्ष पा सकता है । रामानन्द ने शुद्ध आचरण एवं भक्ति पर विशेष बल दिया । दादू , तुकाराम जैसे सन्तों ने भी अपने विचार द्वारा भक्ति आंदोलन को
गति प्रदान की ।
भक्ति सन्तों ने लोगों के बीच यह भावना फैलाई थी कि ईश्वर को पाने के लिए सच्चे दिल से प्रेम करना ही एक मात्र तरीका है । उन्होंने आम लोगों की बोली में कई


सुन्दर गीतों की रचना की जिसे भक्त लोग मगन  होकर गाते थे । वे ऊँच - नीच , जाति - पाति के खिलाफ थे । उनका मानना था कि सभी मनुष्य ईश्वर की नजर में समान है और हिन्दू तथा मुसलमान दोनों का एक ही ईश्वर है । ईश्वर को पाने का रास्ता भी एकसमान है । भक्ति संतों की तरह कई मुसलमान संत भी थे जो सही सन्त कहलाए । इन सूफी सन्तों में अजमरक ख्वाजा मर्डन की दिल्ली के हज़रत निजामुददीन औलिया , पंजाब के बाबा फरीद बहुत जाने माने सूफी संत थे ।

 
भक्त संतों और सूफी संतों के विचार आपस में बहत मिलते - जुलते थे सूफियों ने इस बात पर जोर दिया कि सच्चे दिल से अल्लाह को प्रेम करना और अपने बुरे कामों पर पश्चा करना अल्लाह को पाने का सही तरीका है । सूफी मत अनुयायी एक ईश्वर में विश्वास करते थे । शांति , अहिंसा सहिष्णुता एवं मानवता के प्रति प्रेम की भावना में भी उन अटूट विश्वास था । सूफी सन्तों से हिन्दू एवं मुसलमान दो ही अत्यधिक प्रभावित हुए ।



" लल्ला देव कश्मीर की विधवा ब्राह्मण औरत थीं । कई सूफी संत उसे अपना पीर या गुरु मानते थे । वह कहती थीं ' शिव सब जगह मौजूद हैं , सब में मौजूद हैं फिर हिन्दू और मुसलमान में फर्क मत करो । अगर तम समझदार हो तो अपने आप को समझो । यही ईश्वर की सही समझ है । "


साहित्य

सल्तनत काल में देश के बहुत से भागों में फारसी राजभाषा रही । अत : बहुत सी भारतीय भाषाओं पर फारसी का प्रभाव पड़ा और फारसी के बहुत से शब्द भारतीय भाषाओं में आ गए । सल्तनत काल में दिल्ली , अरबी व फारसी साहित्य के विद्वानों का केन्द्र बन गई थी । महमूद गजनवी के समय अलबरूनी और फिरदौसी नामक प्रसिद्ध विद्वान तथा कवि थे । मंगोलों के डर से मध्य एशिया के अनेक विद्वानों आर साहित्यकारों ने भागकर दिल्ली के सुल्तानों के दरबार में शरण ली थी । भारत में फारसी साहित्य का महान विद्वान अमार खुसरो था । उसने भारत के बारे में बहुत कुछ लिखा जिसर उसका भारत के प्रति प्रेम झलकता है ।


मैंने भारत की प्रशंसा दो कारणों से की है । एक तो यह कि हिन्दुस्तान मेरी जन्मभूमि और हम सबका वतन है । वतन से प्यार करना एक अहम फर्ज है । . . . . . . हिन्दुस्तान स्वर्ग के समान है । इसकी आबोहवा खुरासान से बेहतर है । . . . . यह हरा - भरा है और साल भर फूलों से लदा रहता है । . . . . . . यहाँ के ब्राह्मण अरस्तू जैसे ज्ञानी हैं और विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सारे विद्वान हैं । 
                                              अमीर खुसरो


इस समय साहित्य के नाम पर यशोगान और धार्मिक पुस्तकों की ही रचना हुई । इस श्रेणी म नाह का बीसल देव रासो तथा खमानरासो उल्लेखनीय है । अगीर खुसरो ने हिन्दी में भी पद रचना की थी ।
भक्ति आन्दोलन के सन्तों जैसे कबीर गोरखनाथ आदि ने ईश्वर स्तुति में गीतों की रचना की थी । इस काल में सुप्रसिद्ध प्रमाख्यान तथा ऐतिहासिक महाकाव्य पदमावत की रचना महाकवि मलिक मुहम्मद जायसा ने की ।


स्थापत्य कला

ईरानी व तुर्क कारीगर जब भारत आए तो अपने साथ इमारत बनाने की एक नई विधि भी लाए । सल्तनतकालीन इमारतों की तीन खास बातें थीं - मेहराब , गुम्बद और मीनारें जो उनकी सभी इमारतों में देखी जा सकती । कुछ इमारतों में कुरान की आयतें भी लिखी गयीं हैं ।


मिली - जुली शैलियाँ

ईरानी व तुर्क कारीगरों से ये बातें भारत के कारीगरों ने सीखीं । भारत के कारीगरों के हुनर ईरानी व तुर्क कारीगरों ने सीखे । मंदिरों में मेहराब व गुम्बद बनने लगे और कई मस्जिदों में पत्थर पर पत्थर रखकर तराशे हुए खम्भे बनने लगे ।


आपके आस - पास भी कुछ मंदिर व मस्जिद होगें क्या उनमें ऐसी कुछ विशेषताएँ आपको देखने को मिलती हैं ? इनकी सूची बनाइए ।


चित्रकला और संगीत

सल्तनत काल में बारीक और छोटे - छोटे चित्र बनाए जाते थे । कलाकारों को दरबार में आश्रय मिला था । कभी - कभी वे पुस्तक में वर्णित घटनाओं के चित्र बनाते थे ।
भारतीय संगीत पर फारस और अरब की संगीत शैली का प्रभाव पड़ा । सितार , सारंगी और तबला जैसे वाद्य यंत्रों की लोकप्रियता बढ़ गई । कुछ सूफी सन्तो ने संगीत में विशेष रुचि दिखाई । उनका पिता था कि भक्ति संगीत भी ईश्वर के निकट पहुँचने का एक रास्ता हा इससे संगीत के नए रूपों जैसे कव्वाली को लोकप्रिय होने में बड़ी सहायता मिली ।
मध्यकालीन समय में सर्वोत्तम तलवारें वाराणसी ( बनारस ) और सौराष्ट्र में बनती थीं । उसके बाद लाहौर , सियालकोट , मुल्तान गुजरात तथा गोलकुण्डा के प्रान्त
भी इसके लिए मशहूर हुए । राजस्थान एवं गुजरात में निर्मित जमधार , छूरे , धनुष तथा तीरों की बड़ी माँग थी ।
सियालकोट तथा मेवाड़ की तोड़ेदार बन्दुक सर्वोत्तम होती थी । तोड़ेदार बन्दूकों के अलावा लोहे का उपयोग सब प्रकार के कवच , ढाल , हथियार , बन्दूक तथा तोप के गोले आदि में होता था ।


चिकित्सा एवं खगोल शास्त्र
सल्तनत काल में आयुर्विज्ञान तथा खगोल विद्या जैसे कुछ विषयों में अनुसंधान हेतु सुल्तानों अमीरों का संरक्षण प्राप्त था । वे इन कार्यों के लिए प्रोत्साहन देते थे ।
बरनी ने अपनी तारीख - ए - फिरोजशाही में चिकित्सकों और खगोल शास्त्रियों की एक लम् तालिका प्रस्तुत की है । मौलाना बदरुददीन , मौलाना सदरुद्दीन तथा अजीमुददीन मध्यकालीन युग के प्रसि चिकित्सक थे । गच्छेन्द्र प्रसिद्ध वैद्य थे और जोग मशहूर शल्य चिकित्सक थे । मध्यकाल में ऐसे प्रमाण मिल हैं , जिनसे पता चलता है कि देश में अनेक जर्राह या शल्य चिकित्सक थे । वे केवल शल्य चिकित ( ऑपरेशन ) ही नहीं करते थे , बल्कि कृत्रिम अंग भी बनाकर लगा सकते थे । वे काटकर पथरी निकाल दा थे । मोतियाबिन्द को समाप्त कर डालते थे ।


कृषि
देश की आबादी में ज्यादातर लोग किसान थे । वे कड़ी मेहनत करते थे । देश के विभिन्न भागों में आए दिन अकाल पड़ने और युद्ध होने से किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था । उस समा । किसानों का जीवन स्तर ऊँचा नहीं था । गाँव के अधिकारी कभी - कभी अपने पद का दुरुपयोग करते थे और साधारण किसानों को अपने हिस्से की भी मालगुजारी ( राजस्व ) अदा करने के लिए मजबूर करते थे ।


व्यापार व उद्योग

मुस्लिम विजय ने देश के उद्योग तथा वाणिज्य व्यापार में बाधा नहीं डाली । गाँव तथा शहरों में कारीगर । एवं शिल्पियों ने अपने पुराने पेशे को बरकरार रखा था । उनके औजार भी वही थे । कछ विशेष प्रकार के नए । काम करने वाले कारीगर वर्ग भी उत्पन्न हुए , जैसे बर्तन पर कलई करने वाले घोड़े की नाल व रकाब बनान वाले , कागज़ बनाने वाले आदि । इसके अतिरिक्त कई शाही कारखाने भी थे , जो फारस देश की तकनीक के अनुसार दिल्ली के सुल्ताना द्वारा स्थापित किए गए थे । इन कारखानों में राज्य , राजपरिवार तथा दरबारी लोगों की जरूरत की चीजें बनाई जाती थीं ।
मुद्रा के क्षेत्र में भी सुधार हुए । सुल्तानों ने चाँदी के टके और ताँबे के जीतल नामक मुद्राएँ चलाई । इसी के साथ व्यापार का विकास शुरू हुआ जिससे शहर और शहरी जीवन का और विकास हआ । बंगाल । और गुजरात के शहर अपने उत्तम कपड़ों और सोने तथा चाँदी के काम के लिए प्रसिद्ध थे । बंगाल का सोनार । गाँव और ढाका कच्चे रेशम और मलमल के लिए विख्यात थे ।

वस्त्र निर्माण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन 13वीं - 14वीं शताब्दी में मसलमानों टा में लाए चरखे द्वारा हआ । चरखे का चलन आरम्भ होने से कपड़ के उत्पादन में बहत सधार या सागर और फारस की खाड़ी के आस - पास के देशों के साथ होने वाले व्यापार में भारतीय कपडे की धाका पहले ही जम चुकी थी । पेड़ - पौधों और खनिज स्रोतों से प्राप्त विभिन्न रंगों से रंगाई का कार्य किया जाता था । उस काल में भारतीय कपड़े चीन को भी निर्यात किए जाते थे ।
इस काल में अन्तरराष्ट्रीय व्यापार जल और थल दोनों मार्गो से किया जाता था । भारत कुछ वस्तुओं का निर्यात करता था । इसमें चर्म व धातु से बनी वस्तुएँ तथा फारसी डिजाइन आधारित गलीचे प्रमुख थे । भारत पश्चिमी एशिया से उच्च कोटि के कुछ कपड़े ( साटन आदि ) , काँच के बर्तन , बहुमूल्य धातुएँ , घोड़े तथा चीन से कच्चा रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन आयात करता था ।

यातायात

दिल्ली सल्तनत के सुदृढ़ होने से यातायात एवं संचार का विकास हुआ । उस समय आधुनिक वैज्ञानिक देते उपकरणों का ज्ञान नहीं था । लोग परिवहन के साधनों के रूप में कुलियों , जानवरों तथा चक्के वाली गाड़ियों का प्रयोग करते थे । परम्परागत बैलगाड़ी का इस्तेमाल उन दिनों खूब होता था । बैलों पर काठी के स्थान पर गदे रखकर माल ढोया जाता था । सवारी के लिए घोडे , टटू , खच्चर और कभी कभी गधों , ऊँटों का इस्तेमाल भी किया जाता था । नदियों में नावों तथा सागर में पाल वाले जलयानों का उपयोग किया जाता था ।


शब्दावली

  सूफी     - ईश्वर की भक्ति उपासना में व्यक्तिगत प्रेम - भावना पर अधिक बल देने वाले मुसलमान संत ।

पीर         - सूफी सम्प्रदाय के धर्म उपदेश ।

जर्राह      - शल्य चिकित्सक ( चीर - फाड़ करने वाला डॉक्टर या सर्जन ) ।

जीतल     - सल्तनत काल में प्रचलित ताँबे का सिक्का ।

आयात    - बाहर के देशों में बनी वस्तुओं को अपने देश में मँगाना ।

निर्यात     - अपने देश में बनी वस्तुओं को दूसरे देशों में भेजना । 
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सल्तनत का विघटन इतिहास 5

सल्तनत का विघटन


"फिरोज तुगलक के उत्तराधिकारी अत्यधिक अयोग्य और शक्तिहीन थे । उन्होंने अपना अधिकांश समय मनोविनोद तथा पारस्परिक संघर्ष में ही लगाया । परिणामस्वरूप प्रान्तीय गवर्नरों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया । सल्तनत का बचा - खचा वैभव दिल्ली में 1398 ई0 में हुए तैमूर के आक्रमण से समाप्त हो गया ।"


तैमूर का आक्रमण

          सन् 1398 में उत्तर भारत पर फिर मध्य एशिया की सेनाओं का आक्रमण हुआ । तुर्क सरदार तैमूर ने जिसे तैमूरलंग भी कहा जाता है , अपनी विशाल सेना लेकर भारत पर आक्रमण कर दिया । आक्रमण का उद्देश्य केवल उत्तर भारत पर आक्रमण करना और लूट का माल लेकर मध्य एशिया लौट जाना था । तैमूर के सैनिकों ने दिल्ली में प्रवेश किया । उन्होंने नगर को लूटा और नगर निवासियों की हत्या की । जब उन्होंने पर्याप्त मात्रा में धन लूट लिया तब वे समरकंद लौट गए । अपनी राजधानी समरकंद जाते समय तैमूर ने खिज खौँ को पंजाब का गवर्नर ( शासक ) नियुक्त किया ।


  सैय्यद वंश ( 1414 ई० से 1451 ई० )

          तैमूर लग अन्तिम तुगलक शासक नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद खिज खाँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और सैय्यद वंश की नींव डाली । खिज खाँ ने सुल्तान की उपाधि धारण न कर , रैयत - ए - आला उपाधि धारण की । वह जीवन भर तैमूर के वंशजों  का वफादार बना रहा और उन्हें राजस्व तथा उपहार भेजता रहा ।



लोदी वंश ( 1451 ई0 - 1526 ई0 )

         दिल्ली सलतनत का अन्तिम राजवंश लोदी वंश था । 1451 ई0 दिल्ली के अमीरों ने सरहिन्द के सूबेदार बहलोल लोदी को आमंत्रित कर दिल्ली के सिंहासन पर बैठा दिया । लोदी शासक तुर्क न होकर ' अफगान थे ।


बहलोल लोदी ( 1461 ई0 - 1489 ई० )

          बहलोल लोदी ने सल्तनत को संगठित करने का प्रयत्न किया । उसने जौनपर पर आक्रमण कर शर्की शासको को पराजित कर अपने अधीन कर लिया ।



सिकंदर लोदी ( सन् 1489 ई0 से 1517 ई0 )

     बहलोल लोदी के बाद उसका पुत्र निजाम खाँ सुल्तान सि 1504 ई० में अपनी राजधानी दिल्ली से हटा कर नये नगर में स प्रसिद्ध हुआ । सिकन्दर लोदी की साहित्य के प्रति विशेष रुचि थी फारसी में अनुवाद हुआ । जिनमें एक आयुर्वेदिक ग्रन्थ का नाम फरहम गुलरुखि उपनाम से कविता लिखता था । उसने राज्य की आर्थिक नियंत्रित किया एवं राजस्व बढाने के लिए भमि नाप के आधार पर भू - राजस लिए पैमाना गज - ए - सिकन्दरी चलाया जो 30 इंच का होता था ।



इब्राहिम लोदी ( सन् 1517 ई० से 1526 ई० )

सिकन्दर लोदी के बाद उसका पुत्र इब्राहिम लोदी सिंहासन । अफगान सरदारों के मध्य संघर्ष प्रारम्भ हो गया । अफगान सरदार सुल्तान नहीं थे । उन्होंने इब्राहिम लोदी के खिलाफ षडयन्त्र प्रारम्भ कर दिया । इसा प्र सरदारा का मदद से काबुल के शासक बाबर ने इब्राहिम लोदी को पानीपत क मदान जाम खा सुल्तान सिकन्दर शाह नाम से सिंहासन पर बठा । कर नये नगर में स्थापित किया । जो बाद में आगरा नामात त विशेष रुचि थी । उसके शासन काल में कई ग्रन्थों का थ का नाम फरहंगे सिकन्दरी रखा । वह स्वयं भी । उसने राज्य की आर्थिक दशा सुधारने के लिए वस्तुओं का मूल्य नकालिए भमि नाप के आधार पर भ - राजस्व निर्धारित किया । उसन उसका पुत्र इब्राहिम लोदी सिंहासन पर बैठा इनके समय में सुल्तान तथा प्रारम्भ हो गया । अफगान सरदार सुल्तान की शक्तिशाली स्थिति से प्रसन्न खिलाफ षड़यन्त्र प्रारम्भ कर दिया । इसी प्रकार षडयन्त्रकारी अफगान क शासक बाबर ने इब्राहिम लोदी को पानीपत के मैदान में 1526 ई0 में पराजित किया । इस युद्ध में इब्राहिम लोदी मारा गया और भारत में लोदी वंश के साथ हादल्लास अन्त हो गया ।



दिल्ली सल्तनत के पतन के कारण

  • दिल्ली सल्तनत में उत्तराधिकार के नियम का अभाव था । शासक की मृत्यु हो जाने के बाद राजपरिवार में सत्ता के लिए संघर्ष प्रारम्भ हो जाता । इस प्रकार के आपसी संघर्ष ने आपसी विश्वास की भावना को कम कर दिया , जो आगे चलकर सल्तनत के पतन का कारण बना ।
  • अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली सल्तनत को सुदूर दक्षिण तक पहुँचाया दिल्ली से अत्यधिक दूरी होने के कारण इन पर नियंत्रण रखना सम्भव नहीं था ।
  • तैमूर के आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत की शक्ति को कमजोर कर दिया जिससे अधीनस्थ राज्य स्वतन्त्र होने लगे ।


वंश

सैय्यद वंश         1414ई० से 1451ई०
लोदी वंश           1451ई0 से 1526ई०
बहलोल लोदी     1451ई0 से 1489ई०
सिकन्दर लोदी    1489ई0 से 1517ईo
इब्राहिम लोदी    1517ई0 से 1526ई०



समय रेखा :-

सल्तनत काल

गुलाम वंश       1200 ईo से 1290 ईo
खिलजी वंश    1290 ईo से 1320 ईo
तुगलक वंश     1320 ईo से 1412 ईo
सैय्यद वंश       1414 ईo से 1451 ईo
लोधी वंश       1451 ईo से 1526 ईo
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तुगलक काल (1320 ई0 से 1412 ई0 तक ) तुगलक वंश 4

तुगलक वंश का शासका


तुगलक काल ( 1320 ई0 - 1412 ई० )

" खिलजी वंश के बाद दिल्ली में तुगलक वंश का शासन स्थापित हुआ । तुगलक वंश के शासका ने दिल्ली सल्तनत का विस्तार सुदर दक्षिण तक कर दिया । इस वंश के शासकों ने राज्य के विस्तार के । साथ - साथ प्रजा हित के कार्यों जैसे - सडक पल नहर , चिकित्सालय आदि के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया । "


गयासुद्दीन तुगलक ( 1320 ई0 - 1325 ई० )

तुगलक वंश का प्रथम शासक गयासुद्दीन तुगलक था । इसने अलाउद्दीन खिलजी की कठोर नीति को त्याग कर उदारता की नीति अपनाई । इन्होंने प्रजा के असंतोष को कम करने के लिए कर को कम कर दिया , साथ ही साथ कृषि को प्रोत्साहन दिया ।


मुहम्मद बिन तुगलक ( 1325 ई0 - 1351 ई० )

गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जौना
खाँ मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से 1325 ई० में सुल्तान बना । इन्हें दिल्ली सल्तनत का सबसे विद्वान सुल्तान माना जाता है । इन्हीं के शासन काल में मोरक्को के यात्री इनबतूता भारत आया । इब्नबतूता ने अपनी पुस्तक ' रेहला ' में भारत यात्रा का वर्णन किया है ।



मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ


सुल्तान ने साम्राज्य की प्रगति और सुव्यवस्था के लिए कई नवीन योजनाएं चलाई जिससे आर्थिक सुधार हो सके । सुल्तान के द्वारा चलाई गई ये योजनाएँ प्रायः असफल रहीं क्योंकि उसने उनको सही मुहम्मद बिन तुगलक तरीके से लागू नहीं किया । ये योजनाएँ निम्नवत थीं -


दोआब में कर वृद्धि

राज्य की आय बढ़ाने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने गंगा एवं यमुना के बीच समृद्ध एवं उर्वरक भूमि ' दोआब ' में कर बढ़ाने का एक प्रयोग किया । उसने वहाँ भूमिकर में वृद्धि की तथा कुछ अन्य करों की भी वसूली शुरू कर दी । जिस समय यह कर लगाया गया , उस समय यहाँ भयानक अकाल पड़ा था , किन्तु निरंकुश शासक के भय से अधिकारियों ने सुल्तान को इसकी जानकारी नहीं दी एवं बढ़े कर की वसूली जारी रखी । अतः खेती बर्बाद हो गई तथा किसान अपने घर छोड़कर जंगलों में छिप गए । इन कारणों से लोगों ने कर देने । से इनकार कर दिया और विद्रोह कर दिया । बाद में सुल्तान ने राहत के लिए बीज व ऋण की व्यवस्था भी की , किन्त तब तक विलम्ब हो चुका था । अतः सुल्तान का कर बढ़ाने की योजना असफल हो गई ।


राजधानी परिवर्तन

राजधानी परिवर्तन वस्तुतः एक द्वितीय राजधानी की योजना थी । मुहम्मद तुगलक के शासन काल दिल्ली सल्तनत का राज्य एक बड़े साम्राज्य का रूप धारण कर चुका था । इसमें मालाबार को छोड़कर के सभी राज्य जुड़ चुके थे । अतः दक्षिण के इन राज्यों को कुशल प्रशासक देने के लिए द्वितीय राजधानी की योजना बनाई गई ।


दिल्ली से दौलताबाद

सुल्तान ने दिल्ली के स्थान पर देवगिरि को द्वितीय राजधानी बनाने का विचार बनाया । वह दक्षिण भारत को जोडकर एक - सी - प्रशासनिक व्यवस्था करना चाहता था । देवगिरि का नाम दौलताबाद रखा गया । दिल्ली से दालताबाद जाते समय लोगों को रास्ते में कष्ट न हो , इसलिए राज्य द्वारा सुविधाएं भी दी गई थी । रास्त का कष्ट तथा दौलताबाद की जलवायु दिल्लीवासियों को रास नहीं आई । ये वहाँ से दिल्ली वापस आना । चाहत था दक्षिण का रहन सहन , खान - पान , वेशभूषा तथा मौसम आदि दिल्ली से भिन्न था करीब दो वर्ष । बाद सुल्तान ने दौलताबाद छोड़ने का निर्णय लिया । उसे महसूस हुआ कि जैसे दिल्ली से दक्षिण पर नियंत्रण कठिन है , उसी प्रकार दक्षिण से दिल्ली पर नियंत्रण रखना कठिन है । इस प्रकार सुल्तान की द्वितीय राजधानी की योजना भी असफल हो गई ।


इसी प्रकार अंग्रेजों ने भी दिल्ली के साथ शिमला को अपनी द्वितीय राजधानी के रूप में विकसित किया था । होली के बाद दिल्ली की भीषण गर्मी से बचने के लिए वह शिमला चले जाते थे और वहीं से प्रशासन की देख - रेख करते थे ।



सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन

जिस समय सुल्तान ने सांकेतिक मुद्रा के प्रचलन की योजना बनाई उस समय विश्व में चाँदी उत्पादन में काफी कमी आ गई थी । उस समय चाँदी के सिक्कों का प्रचलन था । सुल्तान ने चाँदी के सिक्कों के स्थान पर मिश्रित धातु के सिक्के चलाने का आदेश दिया । इन सिक्कों का मूल्य चाँदी के सिक्कों के बराबर ही माना गया ।


वर्तमान में चलने वाले सिक्कों के चित्र अपनी अभ्यास पुस्तिका में बनाइए तथा बताइए कि यह सिक्के किस धातु के बने हैं ?


सांकेतिक सिक्कों के प्रचलित होते ही लोगों ने जाली सिक्के बनाना शुरू कर दिया । थोड़े ही दिनों में इन सिक्कों की भरमार हो गई । विदेशी व्यापारियों ने सिक्कों को लेना बन्द कर दिया । अतः भारत की चाँदी यहाँ से बड़ी मात्रा में बाहर जाने लगी । सुल्तान ने सांकेतिक सिक्के बन्द कर दिए । इन सिक्कों के बदले राजकोष से चाँदी के सिक्के दिए गए ।
सांकेतिक मुद्रा ( ताँबे एवं पीतल के मिश्रित सिक्कों ) पर यदि कोई राजचिह्न अंकित होता और सरकारी टकसाल पर उचित नियंत्रण होता तो शायद यह स्थिति न आती । इस योजना से राजकोष पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा ।



चर्चा करें - देश में नकली मुद्रा के प्रचलन से हमें क्या हानि होती है ।


सल्तान अपने शासन के अन्तिम काल में राज्य की आन्तरिक अशान्ति से परेशान रहा । उत्तर एवं । दक्षिण दोनों भागों में विद्रोह शुरू हो गए । केन्द्रीय शासन प्रणाली होने के कारण सुल्तान स्वयं दोनों स्थानों । पर पूर्ण नियन्त्रण न रख सका । दक्षिण में दो नए राज्यों विजयनगर राज्य तथा बहमनी राज्य का उदय हुआ । पूरब में बंगाल स्वतंत्र हो गया । सुल्तान अपने शासन के अन्तिम सोलह वर्षों तक विद्रोहों को शान्त करने में एक तरफ से दूसरी तरफ भागता रहा । सिन्ध में विद्रोह के समय मुहम्मद बिन तुगलक बीमार पड़ा । और 1351 ई० में उसकी मृत्यु हो गई ।


फिरोजशाह तुगलक ( 1951 ई0 - 1388 ई० )

1351 ई० में मुहम्मद तुगलक की मृत्यु के बाद उसका चचेरा भाई फिरोज तगलक दिल्ली का सुल्तान बना बन तुगलक के शासन के अन्तिम काल में साम्राज्य के विभिन्न भागों में बार - बार विद्रोह हो रहे थे । अतः गद्दी पर बठत हा सुल्तान के लिए पहली समस्या यह थी कि विद्रोहों को शान्त कर साम्राज्य के विघटन को कैसे रोका जाए । इसके लिए उसने अमीरों , सेना तथा उलेमा वर्ग को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया और इस्लाम के नियमों के अनुसार राज्य प्रशासन चलाया । सुल्तान ने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए कोई सैनिक अभियान नहीं  किया । जो भी आक्रमण किए गए वह साम्राज्य की रक्षा के लिए किए गए । उसने उन्हीं प्रदेशों को अपने पास रखने की कोशिश की जिनका शासन केन्द्र से आसानी से सकता था । उसका शासनकाल जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रसिद्ध था ।


लोकहित के कार्य

कृषि की सिंचाई हेतु उसने कई नहरों का निर्माण कराया जैसे - यमुना नहर , सतलज नहर आदि । जिनसे आज भी सिंचाई होती है । इससे कृषि की उन्नति हुई । बंजर भूमि से प्राप्त आमदनी को धार्मिक एवं शैक्षिक कार्यों में खर्च किया । सुल्तान ने जौनपुर , फिरोजपुर तथा फिरोजाबाद आदि नए नगरों की स्थापना की । उसने प्रजा के लिए सरायों , जलाशयों , अस्पतालों , बगीचों तथा पुलों का निर्माण एवं मरम्मत करवाई । दीवाने - खैरात विभाग की स्थापना की , जिससे विधवाओं , अनाथों एवं लड़कियों के विवाह के लिए आर्थिक सहायता दी जाती थी । सरकारी खर्च पर योग्य वैद्यों द्वारा औषधियाँ एवं भोजन दिए जाने की 2 व्यवस्था की थी । बेरोजगार लोगों को नौकरी देने हेतु उसने सर्वप्रथम एक रोजगार कार्यालय स्थापित किया ।
   पूर्ववर्ती शासकों द्वारा दी जाने वाली कठोर यातनाओं को बन्द किया । लोकहित के कार्यों के कारण फिरोज तुगलक को याद किया जाता है ।


पता कीजिए आज भी आपके जनपद में लोकहित की कौन - कौन सी योजनाएँ चल रही । हैं और उन्हें कौन लागू करता है ?



इन्हें भी जानिए

  • फिरोज तुगलक ने अशोक के दो स्तम्भों को दिल्ली मँगवाया और उसमें से एक को अपने राजमहल के परिसर में लगवाया । फिरोजशाह कोटला में स्थित अशोक स्तम्भ की ब्राह्मी लिपि को सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था ।
  • स्वच्छता के सात आयाम - मानव मल का सुरक्षित निपटान , व्यक्तिगत स्वच्छता , पीने के पानी का रख - रखाव , घर एवं भोजन की स्वच्छता , कूड़ा - करकट का सुरक्षित निपटान , बेकार पानी की निकासी ।


शब्दावली

दोआब  - दो नदियों के बीच का क्षेत्र जैसे गंगा , यमुना का दोआब ।
टकसाल   - वह स्थान जहाँ मुद्रा ढाली जाती थी ।
सांकेतिक मुद्रा  - ताँबे व पीतल की मिश्रित धात से बनी मुद्रा जिसका मूल्य चाँदी के सिक्का के बराबर होता था ।
दीवाने खैरात - जरूरतमंदों को आर्थिक सहायता प्रदान करने वाला विभाग ।





तुगलक वंश के शासक

तुगलक वंश                 1320ई0 से 1412 ई0
गयासुद्दीन तुगलक       1820ई0 से 1325 ई0
मुहम्मद बिन तुगलक     1325ई0 से 1351 ई0
फिरोजशाह तुगलक      1351ई0 से 1388 ई0
मासिरुद्दीन महमूद        ( अन्तिम शासक )
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सल्तनत का विस्तार - खिलजी वंश ( 1290 ई0 - 1320 ई0 ) इतिहास 3

सल्तनत का विस्तार - खिलजी वंश ( 1290 ई0 - 1320 ई0 )

" बलवन की मृत्यु के बाद दिल्ली की सत्ता पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए तुर्क तथा  खिलजी  (खिलजी ) सरदारों के मध्य संघर्ष प्रारम्भ हो गया । इस संघर्ष में - खिलजी सरदार जलालुददीन फिरोज बने में सफल रहा । जलाललहटीन फिरोज खिलजी के पूर्वज अफ़गानिस्तान के खल्ज नामक स्थान आय थे । अफगानों की भाषा में गर्म प्रदेश को खल्ज कहते हैं ।अतः ये खिलजी ( खलजी ) कहलाये । "



जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ( 1290ई0 - 1296ईo )

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने दिल्ली में खिलजी वंश की स्थापना की । वह एक उदार एवं साहिष्ण शासक था । उसने दंड के नियमों को मानवीय बनाने पर ध्यान दिया तथा विद्रोही तुर्क सरदारों को संतुष्ट करने की नीति अपनाई ।
सल्तान का भतीजा अलाउददीन जो कड़ा ( इलाहाबाद ) एवं अवध का इक्तादार तथा रक्षामंडी देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए स्वयं निकला । वहाँ उसे विजय के साथ - साथ अपार धन मिला । सल्ला अपने भतीजे अलाउददीन के इस अभियान की सफलता के कारण उससे मिलने कड़ा ( इलाहाबाद की - चल पड़ा पर कड़ा में सुल्तान की हत्या उसके भतीजे अलाउद्दीन द्वारा कर दी गई । जलालुददीन की म्रत्यु के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने सिंहासन प्राप्त किया ।

अलाउद्दीन खिलजी ( 1296 ई0 - 1316 ई० )

अलाउद्दीन खिलजी 1296 ई0 में दिल्ली के तख्त पर बैठा । वह महान विजेता , कुशल शासक और चतुर राजनीतिज्ञ था । उसके सुल्तान बनते समय दिल्ली सल्तनत में अव्यवस्था का बोल - बाला था । उलेमाओं का दखल शासन में बहुत बढ़ गया था । अमीर थे, तथा सरदार विद्रोह कर रहे थे । मंगोल आक्रमणकारी लगातार हमले कर रहे थे । इन परिस्थितियों का सामना उसने बढे धैर्य तथा सुनियोजित योजना बनाकर किया । सबसे पहले उसने जलालददीन खिलजी की उदार एवं सहिष्णु नीति का त्याग कर कठोर नियमों को लाग किया । इन कठोर नियमों तथा सुनियाजा योजनाओं के बल पर वह विशाल साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहा ।
प्रशासन में राज्य और धर्म का अलगाव - अलाउददीन को शासन मामले में धर्मगुरुओं ( उलेमा ) का दखल पसन्द नहीं था । इसलिए वह शासन सम्बन्धी नियम बनाने आर ' लागू करने में उनकी बातों को नहीं मानता था ।


सैनिक सुधार - अलाउद्दीन खिलजी की विजयों का श्रेय उसकी ससंगठित सेना को था । अलाउद्दीन एक विशाल स्थायी सना का सगठन किया । उसकी सेना में 4 . 75 , 000 सैनिक थे । सैनिकों की नियुक्ति उनकी घडसवारी , शस्त्र चलाने का योग्यताओं के आधार पर की जाती थी । सैनिको के हुलिया का पूरा विवरण रखा जाता था । सैनिकों को नगद वेतन देने की प्रणाली अपनाई गई और घोड़ों पर दाग लगाने की व्यवस्था प्रारम्भ की । अपने विस्तृत साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उसने अनेक नये किलों का निर्माण कराया तथा पुराने किलों की मरम्मत करवाई । इन किलों को रसद आपूर्ति की भी पूरी व्यवस्था की गई ।

राज्य विस्तार

सुल्तान बनने के बाद अलाउद्दीन ने अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहा । इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उसने गुजरात , रणथम्भौर , चित्तौड़ , उज्जैन , माण्डू , धार तथा चन्देरी के राजपूत राजाओं को हराकर उनके राज्यों पर अधिकार कर लिया ।
अलाउददीन के सेनापति मलिक काफूर ने दादा माकर ने दक्षिण भारत के देवगिरि , सेलंगाना ( वारंगल ) और राज्यों पर विजय प्राप्त की और उन्हें सुरु नान की आधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया । उन का इस शर्त पर अपने राज्य में शासन शासन करने दिया गया कि वे सुल्तान को कर देते रहेंगे एवं अधीनता स्वीकार करेंगे ।
" अलाउद्दीन ने दक्षिण के राज्यों को अपने राज्य में क्यों नहीं मिलाया ? इस तरह की नीति गप्त सामाज्य के किस शासक ने अपनायी थी ? तुलनात्मक चर्चा कीजिये "

अमीरों तथा सरदारों पर नियंत्रण-

अलाउददीन का मानना था कि दायतों तथा उत्सवों में मिलने से अमीरों तथा सरदारों में आत्मीयता बढ़ती है जिससे सल्तान के प्रति षड्यन्त्र एव विदाह करन का अवसर मिलता है । अतः रोकने के लिए अलाउददीन खिलजी ने दरबार के अमीरा तथा सरदारा पर कठोर प्रतिबन्ध लगा । पर राज्य द्वारा अधिकार कर लिया गया । अमीरों की दावता , मदिरापान एवं गोष्ठियों पर भी नियंजन गया । सुल्तान की पूर्व आज्ञा के बिना अमीर सामाजिक समारोहों का आयोजन नहीं कर सारा उन पर नजर भी रखते थे । इन प्रतिबन्धों से सरदार और अमीर भयभीत रहते थे । सुल्तान के विरुट सिर उठाने का साहस नहीं था । इस प्रकार उसका अमीरों पर पूर्ण नियंत्रण था ।

मंगोल आक्रमणों का प्रतिरोध-

भारत की उत्तरी - पश्चिमी सीमा पर मंगोलों के आक्रमण हाते रहते थे । अलाउददीन के समय आणकिए । मंगोलों के आक्रमणों से सुरक्षा के लिए अलाउद्दीन ने बलबन की पुराने किलों की मरम्मत करवाई और नये किलों का निर्माण करवाया । इन किलों में उसने योग्य और सेना रखी । यह सेना मंगोलों के आक्रमणों को रोकती थी ।

कृषि नीति-

अलाउददीन पहला मध्यकालीन शासक था जिसने लगान का सही अनुमान लगाने के लिए भूमि विस्वा से नापने की प्रथा शुरू की । खराज ( लगान ) पैसों में नहीं बल्कि अनाज ( खाद्यान्न ) के रूप में किया जाने लगा , ताकि नगरों को पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न पहुँचाया जा सके ।

बाजार नियंत्रण-

अलाउददीन को मंगोल आक्रमणों से राज्य की सुरक्षा तथा सल्तनत विस्तार के लिए एक बड़ी रखना जरूरी था । इन सैनिकों को उनकी जरूरतों के अनसार वेतन देने में खजाना खाली हो जाता अतः उसने कम वेतन में सैनिकों का खर्च चलाने के लिए बाजार नियंत्रण लागू किया । उसने दान आवश्यकताओं की वस्तुओं के मूल्य निश्चित कर दिए जिससे निश्चित वेतन पाने वाले सैनिक भी निर्वाह कर सकें ।
बाजार व्यवस्था की सफलता के लिए कुशल एवं ईमानदार कर्मचारी नियुक्त किए जिनका पदना ( अधीक्षक ) कहलाता था , जो व्यापारियों पर नियत्रंण रखता था । दकानदारों को बाजार का पालन करना पड़ता था । यदि कोई दुकानदार वस्तुओं की कीमत अधिक लेता या माप तौल में कम देता था तो उस कार दण्ड दिया जाता था । बाजार के भावों और सामानों पलायन अवस्था का दुरुस्त किया गया । सल्तान को प्रतिदिन बाजार की पूर्ण सूचना प्राप्त मााबाजार के भावों और सामानों पर सिरानी रखने के लिए गुप्तचर । सल्तान स्वय भी वस्तुओं और उनके मूल्यों की जाँच करता था । इस व्यवस्था का पारणा ललान का प्रतिदिन बाजार की पूर्ण सूचना प्राप्त होती थी । कभी - कभी कानदार वस्तुओं का अधिक मूल्य लेने का साहस नहीं कर पाते थे । कुशल बाज गोदाम भी स्थापित किये गए । अकाल पड़ने के समय गोदामों से खाद्यान्न का जा लन का साहस नहीं कर पाते थे । कुशल बाजार नियंत्रण के लिए सरकारी दला शासक था , जिसने सार्वजनिक वितरण प्रणाली ' की शुरुआत की
वतमान समय में मूल्य नियंत्रण एवं बाजार प्रबन्ध के लिए क्या व्यवस्था हा यह उस समय की व्यवस्था से कितनी भिन्न व कितनी समान है ?

साहित्य व कला का विकास-

प्रसिद्ध विद्वान अमीर खुसरो व बरनी उसके दरबार में रहते थे । अमीर खुसरों अपनी पहेलियों , दोही कव्वालियों के लिए प्रसिद्ध हैं ।

पहेली-

एक गुणी ने यह गुण कीना , 
हरियल पिंजरे में दे दीना . 
देखा जादूगर का कमाल , 
डाला हरा निकला लाल ।

उसने दिल्ली में एक विशाल टैंक का निर्माण कराया जिसे हौज खास के नाम से जाना जाता है । उसने दिल्ली में हजार खम्मा महल का भी निर्माण कराया ।

अलाउददीन ने दिल्ली में कुतुबमीनार के निकट कुबत्तुल इस्लाम मस्जिद के एक द्वार के रूप में अलाई दरवाजा बनवाया ।

शब्दावली-

उलेमा                 - धर्मगरू या धर्माधिकारी ( आलिम अथवा शिक्षित का बहुवचन )
खराज ( लगान )  -  भूमि पर खेती करने वालों से लिया जाने वाला कर ( टैक्स )
घोड़ों पर दाग      -  घोड़े की संख्या एवं इनकी पहचान के लिए उनकी पीठ पर टार की परम्परा थी ।
हुलिया                - किसी व्यक्ति के रंगरूप आदि का ब्यौरा ।
रसद                   -भोजन - सामग्री ।

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सल्तनत काल की शुरुआत इतिहास 2

सल्तनत काल की शुरुआत

तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के पश्चात दिल्ली में तुर्क शासकों का राज्य स्थापित हो गया । इन तुर्क शासकों का रहन - सहन , भाषा , धर्म तथा शासन करने का तरीका भारतीय शासकों से अलग था । तुर्क शासक सुल्तान की उपाधि धारण करते थे । इन्होंने दिल्ली को शासन का केन्द्र बनाया और लगभग 320 साल तक शासन किया ।

मोहम्मद गोरी की मृत्यु 1206 ई0 में हो गई । उसके मृत्यु के समय तक लगभग पूरा उत्तर भारत उसके अधीन हो चुका था । उसने भारत में शासन चलाने के लिए गुलाम अधिकारी नियुक्त कर रखे थे । इन्हीं में एक योग्य गुलाम अधिकारी कुतुबुद्दीन ऐबक था । गोरी की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वयं को भारत में तुर्क राज्य का शासक घोषित कर दिया । यह तुर्क राज्य अब ' तूर्क सल्तनत ' कहलाया । अगले शासक इल्तुतमिश ने 1210 ई0 में सत्ता संभालने के साथ दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया । तब यह दिल्ली सल्तनत के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।



आपको इस बात से हैरानी हो सकती है पर उन दिनों गुलाम रखने की प्रथा थी । तुर्किस्तान के । युवकों को खरीद कर उन्हें युद्ध और प्रशासन के काम में प्रशिक्षण देकर सुल्तानों को बेचा जाता था । इसलिए वे गुलाम कहलाते थे । सुल्तान की सेवा में आने पर , योग्य और होनहार गुलामों को ऊँचे और ज़िम्मेदारी के पद भी सौंपे जाते थे । सुल्तान मोहम्मद गोरी की सेवा में भी ऐसे कई गुलाम थे और भारत में उसके राज्य का शासन चलाते थे ।

सल्तनत ( सुल्तनत ) के सामने चुनौतियाँ-

        सरदार जिन्हें ' अमीर ' कहा जाता था , तुर्क और अफगान कबीलों के होते थे । इनमें जातीय श्रेष्ठता तथा सल्तनत में ऊँचा स्थान पाने की भी होड़ रहती थी । इन्हीं आमीर सारद्वारों में से ही सुल्तान होता था । सुल्तान होने के लिए सैनिक योग्यता एवं शासकीय क्षमता का होना आवश्यक था । इन क्षमताओं के प्रभाव से वह सुल्तान बन सकता था और तभी तुर्क अमीरों का समर्थन प्राप्त करना भी सम्भव था । सुल्तान के लिए अमीर सरदारों का समर्थन और विश्वास जरूरी था । उसे हमेशा भय रहता था कि कहीं ये अमीर सरदार आपस में मिलकर कोई षड्यंत्र न करें । अतः सुल्तान का अधिकांश समय इन गुप्त षड्यंत्रों से बचने के उपायों में बीतता था । सुल्तानों को इन अमीर सरदारों में संतुलन भी बनाए रखना पड़ता था ।

      सुल्तान इस्लाम धर्मावलम्बी थे तथा बाहरी देशों से आए थे इसलिए भारतीय जनता पर शासन करने के । लिए तुर्क अमीरों , उलेमा ( धार्मिक वर्ग ) आदि को खुश करने के साथ ही हिन्दुस्तानी जनता से भी सतर्क रहते । थे क्योंकि सल्तनत में विद्रोहों का भय हमेशा बना रहता था । सल्तनत कालीन शासकों ने आन्तरिक शान्ति बनाए रखने के लिए शासकीय प्रबन्ध तंत्र तथा राज्य । विस्तार एवं बाह्य आक्रमणों से रक्षा के लिए मजबूत सैन्य संगठन भी बनाए । इनमें प्रारम्भिक खिलजी वंश , तुगलक वश , सैय्यद वंश एवं लोदी वंश प्रमुख थे ।

' प्रारम्भिक तर्कशासक - गुलाम वंश ( 1206 ई0 - 1290 ई० )  
कुतुबुद्दीन ऐबक-

           
          1206 ई . में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के पश्चात उसका तुर्क गुलाम कुतुबुददीन ऐबक उत्तर भारत का पहला तुर्की शासक बना । कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया । उसकी उदारता के कारण ही उसे लाखबख्श कहा जाता था , अर्थात वह लाखों का दान करने वाला दानप्रिय व्यक्ति था । भारतवर्ष में उसके जीवन का अधिकांश कुतुबमीनार समय सैनिक चित्र देखकर बताइए कि कुतुबमीनार गतिविधियों में ही बीता । कितने मंजिल की है ?
कुतुबुद्दीन ऐबक को भवन निर्माण में भी रुचि थी । उसने
दिल्ली में कुतुबमीनार , कुन्चत - उल - इस्लाम मस्जिद
और अजमेर में ' अढाई दिन का झोपडा का निर्माण कराया
। कुतुबमीनार की शुरुआत ऐबक ने की थी परन्तु इसको
पूर्ण इल्तुतमिश ने कराया ।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में एक नये राज्य की नींव अवश्य
डाली , पर उस राज्य को सुदृढ बनाने का अवसर उसे नहीं
मिल पाया । कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु 1210 ई0 में चौगान
खेलते हुए घोड़े से गिर कर हो गई ।

इल्तुतमिश ( 1210 ई0 - 1236 ई० )


  1210 ई0 में कुतुबुददीन ऐबक की मृत्यु पश्चात दिल्ली के अमीरों ने इल्तुतमिश को गद्दी पर बैठाया । उसे ही उत्तरी भारत में तुर्को के राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है । गददी पर बैठने के बाद उसे आन्तरिक और बाहरी समस्याओं से जूझना पड़ा । इल्तुतमिश ने चालीस गुलाम सरदारों का संगठन अर्थात तुर्कान - ए - चेहलगानी का निर्माण किया ।


           इल्तुतमिश का साम्राज्य-



शासन व्यवस्था
इल्तुतमिश ने देश में एक राजधानी , एक स्वतंत्र राज्य , राजतंत्रीय प्रशासनिक व्यवस्था और । अफसरशाही व्यवस्था की स्थापना की । उसने दिल्ली को भारत वर्ष में तुर्क साम्राज्य का राजनैतिक , प्रशासनिक और सांस्कृतिक केन्द्र बनाया । उसने ' इक्ता ( अक्ता ) व्यवस्था के द्वारा केन्द्र को प्रान्तीय और स्थानीय शासन से जोड़ने की नींव डाली ।

सुल्तान ने अपनी सल्तनत ( राज्य ) को कछ प्रांतों में बॉटा । प्रांतों को इक्ता कहते था हर इक्ते सुल्तान अपने एक जिम्मेदार सेनापति को नियक्त करता था , जिसे इक्तादार या अवतादार कहा जाता था
क्या पिछली कक्षा में आपने स्थानीय शासन की ऐसी किसी सुनियोजित व्यवस्था के बारे में पढ़ा है ? सोचिए और बताइए । -

    इक्तादार के पास अपनी सेना होती थी और प्रशासन चलाने के लिए अधिकारी होते थे । इक्तादार इनकी सहायता से राज्य की रक्षा करते थे और अपने नियंत्रण क्षेत्रों से कर वसूल करते थे । अपने इक्ते से इकट्ठे किए गए कर से ही वे अपना , अपने अधिकारियों का और अपने सैनिकों का खर्चा चलाते थे । इस खर्च के उपरान्त जो कर बचता था उसे इक्तादार सुल्तान को भेज देते थे ।
 
    इल्तुतमिश ने मुद्रा व्यवस्था में सुधार करते हुए चाँदी का टंका और ताँबे जीतल चलाया । 1236 ई० में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई उसने अपने जीवन काल में अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था ।

रजिया सुल्तान - प्रथम मुस्लिम महिला शासिका ( 1236ई0 - 1240ई0 )                                                         

इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था परन्तु सरदारों तथा उलेमा के विरोध के चलते इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद । उसका पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठ गया लेकिन दुर्बल शासक होने के कारण 1236 ई० में रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठी और सुल्तान कहीं जाने लगी ।

रजिया से पूर्व प्राचीन मिस्र और ईरान में महिलाओं ने रानियों के रूप में | शासन किया था परन्तु मध्यकालीन विश्व में पहली मुस्लिम महिला शासक थी ।
 
    रजिया ने लगभग तीन वर्ष आठ माह शासन किया । रज़िया ने स्त्रियों का पहनावा छोड़ दिया और बिना पर्दे के दरबार में बैठने लगी । वह युद्ध में सेना का नेतृत्य करती । अमीरों को शीघ्र ही पता लग गया कि स्त्री होने पर भी रजिया उनके हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं थी । तुर्क सरदार भी किसी महिला के आधीन कार्य करने को तैयार नहीं थे । उन्होंने एक षड्यंत्र के द्वारा उसे गद्दी से हटा दिया । रजिया के बाद उसका एक भाई एवं दो भतीजे बारी - बारी से सुल्तान बने , जो अयोग्य थे । अतः इल्तुतमिश के छोटे पौत्र नासिरुद्दीन महमूद को दिल्ली का सुल्तान बनाया गया ।

सोचिए और बताइए कि उस समय लोगों व दरबारी अमीरों ने रजिया का विरोध क्यों किया होगा ? यदि रजिया आज शासक होती तो क्या उसका विरोध होता ?

 नासिरुद्दीन महमूद ( 1246ई0 - 1265ई0 )

" चालीस तुर्की सरदारों का दल " इस समय अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था । वे जिसे चाहते गद्दी से उतार देते थे और जिसे चाहते गद्दी पर बैठा देते थे । 1246 ई0 में इस दल ने इल्तुतमिश के पौत्र नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बना दिया ।

    महमद ने एक अमीर जिसका नाम बलबन था को अपना नायक बनाया । बलबन धीरे - धीरे अपनी स्थिति सदृढ़ कर ली और वह एक शक्तिशाली सरदार बन गया । 1266 ई0 में नासिसददी । महमूद के बाद बलबन गद्दी पर बैठा ।

बलबन ( 1286ई0 - 1287ई0 )
बलबन एक योग्य और अनुभवी शासक था । उसने अपने शासन काल में कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए । उसने दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए लिया आस - पास के जंगलों को कटवाया तथा साफ़ करवाकर वहाँ पुलिस चौकियों का निर्माण कराया । इस प्रकार वह दिल्ली के आसपास रहने वाले मेवातियों के विद्रोह को रोकने में सफल रहा । मेवातियों के अलावा उसने अन्य विद्रोहों का भी दमन किया ।

       बलबन ने कानून को लागू करने में कठोरता बरती । उसने राजा के पद को प्रतिष्ठित बनाया । वह राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानता था । बलबन का मानना था कि राजा को ईश्वर से शक्ति प्राप्त होती है । इसलिए उसके कार्यों की सार्वजनिक जाँच नहीं की जा सकती । इससे उसकी निरंकुशता सुरक्षित होती थी । इसलिए वह दरबार में अत्यंत गम्भीर मुद्रा में बैठला था । वह न तो कभी मज़ाक करता था और न ही हँसता था । उसने दरबार में निर्धारित ढंग से वस्त्र पहनकर आने , बैठने आदि के बारे में नियम बनाए जिनका कठोरता से पालन किया जाता था । बलबन ने दरबार में सिजदा एवं पासबोस परम्परा प्रारम्भ कराई । उसने सुदृढ़ गुप्तचर व्यवस्था बनाई जिससे राज्य की पूरी खबरें गुप्तचर सुल्तान को देते थे । बलबन की प्रमुख विशेषता थी कि उसने सदैव न्याय को सुल्तान का प्रमुख कार्य समझा । उसने शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना पर भी ध्यान दिया । सैनिकों को संतुष्ट रखने के लिये उसने उनका वेतन सदैव समय पर दिया । उन्हें सक्रिय रखने के लिए निरन्तर अभ्यास पर बल दिया ।

मंगोल आक्रमण


   बलबन ने राज्य को बाहरी आक्रमणों से बचाने एवं मंगोलों की शक्ति को रोकने का प्रयास किया । तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में एशिया और यूरोप में आक्रान्ताओं की नई लहर आई ।
    यह नए आक्रमणकारी मंगोल थे , जिन्हें उस महान साम्राज्य के लिए सबसे अधिक जाना जाता है , जिसका गठन उन्होंने चंगेज खों के नेतृत्व में किया । तेरहवीं सदी का अंत होते - होते मंगोल साम्राज्य ज्ञात दुनिया के बड़े भाग तक फैल चुका था । चंगेज खाँ के नेतृत्व में उनकी शक्ति बहुत बढ़ गई थी ।

       चंगेज खाँ मंगोल आक्रमण की भयंकरता को बलबन भलीभाँति अनुभव करता था । इसलिए उन्हें रोकने के लिए उसने मंगोलों के मार्ग में पड़ने वाले पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा नये दुर्गा का निर्माण करवाया । वहाँ पर हृष्टपुष्ट सैनिकों एवं विश्वसनीय और अनुभवी अधिकारियों को नियुक्त किया । शस्त्र तथा भोजन आपूर्ति की पूर्ण व्यवस्था भी वहाँ पर की गई ।

          फारसी शब्द ' मुगल ' का उद्भव मंगोल शब्द से हुआ है ।
उसकी मृत्यु के बाद दिल्ली की गद्दी पर उसके वंश का शासन अधिक दिन तक न रह पाया , परन्तु दिल्ली को जो शक्ति बलबन ने प्रदान की , उसी के परिणामस्वरूप खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सफल रहा ।

शब्दावली-

मलिक    - सरहद और पंजाब के मुसलमानों की एक सम्मानजनक उपाधि ।
इक्ता     - प्रान्तों को इक्ता कहते थे ।
मंगोल    - मध्य एशिया , तिब्बत एवं चीन के क्षेत्रों में रहने वाली जाति । ।
सिजदा   - घुटने पर बैठकर सुल्तान के सामने सिर झुकाना
पायबोस  - सुल्तान के चरणों को चूमना ।


नोट :-
प्रारम्भिक तुर्क वंश (गुलाम वंश ) 1206-1290


                                        ⇓
कुतुबुद्दीन ऐबक 1206-1210
                                                                             ⇓
इल्तुतमिश 1210-1236
⇓
रज़िया सुल्तान 1236-1240
  ⇓
नासिरुद्दीन महमूद 1246-1265
  ⇓
गयासुद्दीन बलबन 1265-1287


                                                                                                                                                                  
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