Showing posts with label गणित. Show all posts
Showing posts with label गणित. Show all posts

गणित के मुख्य चिन्ह

खास कुछ आप के लिए यह चिन्ह



1)  +   =  जोड़

2)  --  =  घटाव

3)  ×  =  गुणा

4)  ÷   =  भाग

5)  %  =  प्रतिशत

6)  ∵   =    चूंकि

7)  ∴  =  इसलिए

8)  ∆   =  त्रिभुज

9)  Ω  =  ओम

10)  ∞  =  अनंत

11)  π  =  पाई

12)  ω  =  ओमेगा

13)   °  =  अंश

14)  ⊥  =  लंब

15)  θ  =  थीटा

16)  Φ  =  फाई

17)  β  =  बीटा

18)  =  =  बराबर

19)  ≠  =  बराबर नहीं है

20)  √  =  वर्गमूल

21)  ?  =  प्रश्न वाचक

22)  α  =  अल्फा

23)  ∥  =  समांतर

24)  ~  =  समरुप है

25)  :   =  अनुपात

26)  : :  =  समानुपात

27)  ^  =  और

28)  !  =  फैक्टोरियल

29)  f  =  फलन

30)  @  =  की दर से

31)  ;  =  जैसा कि

32)  /  =  प्रति

33)  (    )  =  छोटा कोष्टक

34)  {    }  =  मझला कोष्टक

35)  [     ]  =  बड़ा कोष्टक

36)  >  =  से बड़ा

37)  <  =  से छोटा

38)  ≈  =   लगभग



39)  ³√  =  घनमूल

40)  τ  =  ताऊ

41)  ≌  =  सर्वागसम

42)  ∀  =  सभी के लिए

43)  ∃  =  अस्तित्व मे है

44)  ∄  =  अस्तित्व मे नहीं है

45)  ∠  =  कोण

46)  ∑   =  सिग्मा

47)  Ψ  =  साई

48)  δ  =  डेल्टा

49)  λ  =  लैम्डा

50)  ∦  =  समांतर नहीं है

51)  ≁  =  समरूप नहीं हैं

52)  d/dx   =  अवकलन

53)  ∩  =  समुच्चयों का सर्वनिष्ठ

54)  ∪  =  समुच्चयो का सम्मिलन

55)  iff  =  केवल और केवल यदि

56)  ∈   =  सदस्य है!

57)  ∉  =  सदस्य नहीं हैं

58)  def  =  परिभाषा

59)  μ  =  म्यूं

60)  ∫  =  समाकल

61)  ⊂  =   उपसमुच्चय है

62)  ⇒  =  संकेत करता है

63)  I    l  =  मापांक

64)  '  =  मिनट

65)  "  =  सेकंड

Join करे :- 

        

दोस्तो-  YashRaj Online Education आप के लिए कुछ न कुछ हर रोज नई पोस्ट लेकर आता है, अपने मोबाइल पर सबसे पहले जानकारी पाने के लिए Whatsapp Group से जुड़े, Whatsapp Group से जुड़ने के लिए Click करे !
 दोस्तो अगर हमारी Post आप को अच्छी लगी तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करे ।            धन्यवाद



इन्हे भी देखे -

कैलेण्डर विविध। (गणित) by आलोक वर्मा

1 . कैलेण्डर


  • सामान्य वर्ष - सामान्य वर्ष में वर्ष का पहला एवं अंतिम दोनों ही दिन समान होता है ।
[ जैसे - 1 जनवरी = सोमवार , तब 31 दिसम्बर 1 सोमवार ]
  • लीप वर्ष - लीप वर्ष में वर्ष का पहला दिन एवं अंतिम दिन दोनों ही असमान है तथा पहले दिन की तुलना में अंतिम दिन एक दिन बढ़ जाता है ।
जैसे - 1 जनवरी सोमवार , तब 31 दिसम्बर = मंगलवार
  • सप्ताह - प्रत्येक सप्ताह में कुल 7 दिन होते हैं ।

  • दिन किसी भी दिन में 7 जोड़ने पर या 7 दिन घटाने पर पुनः वही दिन प्राप्त होता है ।
तिथियों की संख्या - 




मट्टी - मुट्ठी पर अंगुलियों के उभरे एवं गर्त भागों पर क्रमश : जनवरी से दिसम्बर तक को व्यवस्थित करते हुए तिथियों का आकलन किया जाए तो उभरे भाग में व्यवस्थित होने वाले प्रत्येक माह में तिथियों की संख्या 31 तथा गर्त भाग में व्यवस्थित होने वाले प्रत्येक माह में तिथियों की संख्या 30 ' होती है , लेकिन सामान्य वर्ष में फरवरी की संख्या 28 ' जबकि लीप वर्ष में तिथियों की संख्या 29 " होती है ।

महत्त्वपूर्ण स्मरणीय तथ्य


  • एक साधारण वर्ष = 365 दिन = 52 सप्ताह + 1 विषम दिन
  • एक लीप वर्ष = 366 दिन = 52 सप्ताह + 2 विषम दिन ।
  • 100 वर्ष = 76 साधारण वर्ष + 24 लीप वर्ष । = 76 विषम दिन + 2x24 लीप दिन । = 76 + 48 = 124 विषम दिन = 17 सप्ताह + 5 दिन = 5 विषम दिन ।
  • 200 वर्षों में विषम दिनों की संख्या = 2x5 / 7 = 1 सप्ताह + 3 दिन = 3 विषम दिन ।
  • 300 वर्षों में विषम दिनों की संख्या = 3x5 = 2 सप्ताह + 1 दिन 1 विषम दिन ।
  • 400 वर्षों में विषम दिनों की संख्या 4x5 = 20 दिन अब चूँकि 400वाँ वर्ष लीप वर्ष होता है , अतः विषम दिनों की संख्या = 20 + 1 = 21 , जो 7 से पूर्णतया विभाज्य है । ( शेष 0 ; भागफल 3 ) । अथात् 0 विषम दिन : 400 वर्षों में कोई विषम दिन नहीं होता ।
  • 30 दिन वाले महीनों में विषम की संख्या = 30 / 7 = 4 सप्ताह = 2 दिन = 2 विषम दिन । 31 दिन वाले महीनों में विषम दिनों की संख्या - 31 / 724 सप्ताह + 3 दिन = 3 विषम दिन ।
  • फरवरी माह एक सामान्य / साधारण वर्ष में विषम दिनों की संख्या = 28/ 7 - 4 सप्ताह + 0 दिन कोई विषम दिन नहीं ।
  • एक लीप वर्ष में विषम दिनों की संख्या - 29 / 7 34 सप्ताह । 1 दिन = 1 विषम दिन ।
  • लीप अथवा अधिवर्ष ( Leap Year ) 366 दिनों का होता है तथा लीप वर्ष की गणना हेतु उस ( दिए गए ) वर्ष को 4 से भाग देते हैं । यदि भागफल पूर्णांक में आता है तो वह वर्ष लीप वर्ष होगा ।
  • सभी शताब्दी वर्ष अधिवर्ष नहीं होते । तीन शताब्दी वर्षों को छोड़कर , चौथा शताब्दी वर्ष ( 400 ) लीप वर्ष होता है । अर्थात् शताब्दी वर्ष 400 वर्षों पर आता है ।
  • शताब्दी लीप वर्ष में 366 दिन होते है और इसे ज्ञात करने के सम्बन्धित शताब्दी वर्ष को 400 से विभाजित करते हैं । यदि भागफल पूर्णांक में आता है तो वह वर्ष शताब्दी लीप वर्ष होगा ।
  • एक सौर वर्ष = 365 दिन , 5 घण्टा , 48 मिनट , 47 - सेकण्ड । कैलेण्डर का प्रारम्भ : सोमवार , 1 जनवरी 1A . D . एक वृत्तीय चार्ट के अनुसार दिनों के संगत विषम दिन निम्न प्रकार से होते हैं । रविवार = 0 सोमवार = 1 , मंगलवार = 2 , बुधवार = 3 ,
      बृहस्पतिवार - 4 , शुक्रवार = 5 , शनिवार = 6 .


  • किसी दिन या वार की पुनरावृत्ति प्रत्येक 7 , 14 , 2128 , . . . . . . . . 364 दिनों के बाद होती है ।
  • किसी शताब्दी का अन्तिम दिन मंगलवार , बृहस्पतिवार तथा शनिवार नहीं हो सकता , लेकिन बुधवार , शुक्रवार तथा रविवार हो सकता है ।
  • किसी शताब्दी का पहला दिन सोमवार , मंगलवार , बृहस्पतिवार , शुक्रवार या शनिवार हो सकता है ।
  • अगर किसी साधारण वर्ष के किसी महीने की किसी तारीख को सोमवार या कोई भी वार है , तो अगले साधारण वर्ष में उसी महीने की उसी तारीख को वह वार । से बढ़ जायेगा । यथा , अगर यदि 2006 में 1 जनवरी को रविवार है तो 2007 में । जनवरी को सोमवार होगा ।
  • प्रत्येक लीप वर्ष में किसी विशिष्ट दिन या तारीख का वार अगले वर्ष दो से बढ़ जायेगा । यथा , अगर । जनवरी , 2007 को सोमवार है तो 1 जनवरी , 2008 को बुधवार होगा ।
  • वर्ष में जनवरी , मार्च , मई , जुलाई अगस्त , अक्टूबर और दिसम्बर , कुल सात महीने , प्रत्येक 31 दिनों के होते हैं ।
  • अप्रैल , जून , सितम्बर और नवम्बर , कुल चार महीने , प्रत्येक 30 दिन के होते हैं । वर्ष के चार भागों में दिनों की संख्या निम्न प्रकार से है : प्रथम तिमाही : 1 जनवरी से 31 मार्च : 90 ( 91 , लीप वर्ष में दिन )
दूसरी तिमाही : 1 अप्रैल से 30 जून : 91 तीसरी
तिमाही : 1 जुलाई से 30 सितम्बर : 92 चौथी
तिमाही : 1 अक्टूबर से 31 दिसम्बर : 92
- बुधवार + 2 दिन = शुक्रवार
शुक्रवार + 3 दिन = सोमवार
अतः तीन दिन विलम्ब हो जाता ।

2 . भारतीय मुद्रा ( रुपया - पैसा )

जैसा कि हम जानते हैं धन का मुख्य प्रयोग वस्तुओं को खरीदने के लिए होता है । यह मुद्रा नोट और धातु के सिक्कों के रूप में प्रचलित है । भारत में मुद्रा नोट को ₹ के रूप में तथा धातु के सिक्कों को रुपये और पैसे के रूप में अंकित है । यह मुद्रा ₹ 5 , ₹10 , ₹20 , ₹50 , ₹ 100 , ₹ 500 , ₹ 2000 के नोट के रूप में प्रचलित है । ₹1 = 100 पैसे ।

3 . मिश्रण


  • मिश्रण ( Misture ) - जब किन्ही दो या दो से अधिक पदार्थों किसी विशेष अनुपात में मिलाकर नया पदार्थ बनाया जाता है तो नये र पदार्थ को मिश्रण कहते है ।

  • मिश्रानुपात ( Alligation ) - जब दो या दो से अधिक विभिन्न बीमतो पर के पदार्थों को एक विशेष अनुपात में इस प्रकार मिलाया जाये कि प्राप्त मिश्रण की कीमत उन दोनों पदार्थों की कीमत के योग के समान हो जाये तो उन वस्तुओं का वह विशेष अनुपात मिश्रनुपात ( Alligation ) कहलाता है ।

-------------------------------------------------------------------

हमारी वेबसाइट :-www.yashrajeducation.com पर आप UPTET/CTET,  Exam से संबंधित प्रश्न को पढ़ सकते है UPTET से संबंधित मैंने बहुत कुछ दे रखा है आप पढ़े
और दूसरों को भी शेयर करे, ताकि दूसरो को भी सहायता हो सके ।
हमारे टेलीग्राम चैनल से भी जुड़ सकते है
 @yashrajeducation

"हमारी वेबसाइट अभी नई है अगर कोई भूल चूक हो जाती है तो मैं क्षमा चाहता हूं , लेकिन हमारी उस भूल को हमे Email करे , Email करने के लिए नीचे Option दिया गया है "                      धन्यवाद 
    By आलोक वर्मा

गणित शिक्षा-शास्त्र by आलोक वर्मा

इकाईः1 गणित शिक्षण के आधार
1. गणित का अर्थ

  • गणित का अर्थ एवं परिभाषा
  • गणित की प्रकृति
  • गणित की संरचना
  • गणित शिक्षण के मूल्य

2. गणित का इतिहास एवं गणितज्ञ

  • प्रस्तावना, गणित का इतिहास
  • आदिकाल(500ई. पूर्व तक)
  • पूर्व मध्यकाल(500ई. से 400ई. पूर्व तक)
  • मध्यकाल या स्वर्णयुग(400ई. से 1200ई तक)
  • उत्तर मध्यकाल(1200ई. से 1800ई. तक)
  • वर्तमान आधुनिक काल(1800ई. के पश्चात)
  • प्रमुख गणितज्ञों का परिचय एवं उनका गणित में योगदान
  • आर्यभट्ट प्रथम
  • श्रीनिवास रामानुजम
  • भास्कराचार्य द्वितीय
  • ब्रह्मगुप्त
  • यूक्लिड
  • पाइथागोरस

इकाईः2
3. गणित शिक्षण के उद्देश्य एवं प्राप्य उद्देश्य

  • प्रस्तावना
  • शैक्षिक उद्देश्यों का अर्थ एवं परिभाषाएँ
  • उद्देश्यों की आवश्यकता
  • उद्देश्यों के निर्धारण के लाभ
  • उद्देश्यों के चुनाव के नियम
  • गणित शिक्षण के उद्देश्य
  • उद्देश्यों की प्राप्ति में गणित अध्यापक की भूमिका
  • गणित शिक्षण के सामान्य उद्देश्य
  • प्राप्य उद्देश्य का अर्थ
  • उद्देश्यों के प्रकार
  • शैक्षिक एवं शिक्षण उद्देश्यों में अन्तर
  • उद्देश्य एवं प्राप्य उद्देश्य में अन्तर
  • लक्ष्य, ध्येय, उद्दश्यों तथा विशिष्ट उद्देश्यों में सम्बन्ध
  • शिक्षण उद्देश्यों का वर्गीकरण
  • उद्देश्यों की व्यावहारिक रूप में लिखने की आवश्यकता एवं महत्व
  • शिक्षण के ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक पक्ष
  • शिक्षण के व्यावहारिक उद्देश्य लिखने की विधियाँ
  • रोबर्ट मेगर विधि
  • रोबर्ट मेगर विधि की सीमाएँ
  • क्षेत्रीय महाविद्यालय के अनुसार उद्देश्यों का वर्गीकरण
  • आर.सी.ई.एम. विधि की विशेषताएं एवं सीमाएँ
  • मिलर विधि
  • ब्लूम के वर्गीकरण की आलोचना

4. गणित में सहसम्बन्ध

  • सह-सम्बन्ध का अर्थ
  • परिभाषाएं
  • सह-सम्बन्ध के प्रकार
  • गणित की विभिन्न शाखाओं में सह-सम्बन्ध
  • गणित का अन्य विषयों से सह-सम्बन्ध
  • गणित शिक्षण में सह-सम्बन्ध की आवश्यकता

5. गणित का पाठ्यक्रम

  • प्रस्तावना
  • पाठ्यक्रम का अर्थ
  • परिभाषाएं
  • पाठ्यक्रम की विशेषताएं
  • पाठ्यक्रम के दोष
  • पाठ्यक्रम में दोषों को दूर करने के लिए सुझाव
  • पाठ्यक्रम की प्रक्रिया
  • पाठ्यक्रम के उद्देश्य
  • पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्त
  • पाठ्यक्रम संगठन को प्रभावित करने वाले कारक
  • पाठ्यक्रम के विकास की अवस्थाएं

इकाईः3
6. गणित शिक्षण की विधियाँ

  • प्रस्तावना
  • शिक्षण विधि का अर्थ एवं परिभाषाएँ
  • प्रविधियाँ
  • शिक्षण विधि व प्रविधि में अन्तर
  • शिक्षण विधियों का महत्व
  • गणित शिक्षण विधि की आवश्यकता
  • शिक्षण विधियों को प्रभावित करने वाले कारक
  • गणित शिक्षण की विधियाँ(शिक्षक व बाल केन्द्रित विधियाँ)
  • व्याख्यान-प्रदर्शन विधि
  • परियोजना विधि
  • आगमन विधि
  • निगमन विधि
  • आगमन एवं निगमन विधि में सम्बन्ध
  • आगमन व निगमन विधि में अन्तर

7. गणित का अध्यापक एवं व्यावसायिक विकास

  • प्रस्तावना
  • परिभाषाएँ
  • गणित अध्यापकों के गुण एवं विशेषताएँ
  • गणित अध्यापकों के गुणों का वर्गीकरण(व्यक्तिगत गुण, व्यावसायिक गुण, सामाजिक गुण)
  • गणित अध्यापक के कर्तव्य
  • विद्यालय की प्रतिष्ठा सुधारने में गणित में गणित अध्यापक की भूमिका
  • कक्षा में जाने से पूर्व गणित अध्यापक की तैयारी

इकाईः4
8. गणित की पाठ्य-पुस्तक

  • प्रस्तावना
  • पाठ्य-पुस्तक का अर्थ
  • परिभाषाएँ
  • गणित पाठ्य-पुस्तक की आवश्यकता
  • गणित पाठ्य-पुस्तक की उपयोगिता
  • गणित पाठ्य-पुस्तक की विशेषताएँ
  • पाठ्य-पुस्तक के दोष
  • गणित पाठ्य-पुस्तक की सीमाएँ
  • पाठ्य-पुस्तक का मूल्यांकन

9. गणित में पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ

  • प्रस्तावना
  • पाठ्य सहगामी क्रियाओं का अर्थ
  • पाठ्य सहगामी क्रियाओं का महत्व
  • पाठ्य सहगामी क्रियाओं के उद्देश्य
  • पाठ्य सहगामी क्रियाओं के गुण
  • पाठ्य सहगामह क्रियाओं का गठन
  • कुछ पाठ्य सहगामी क्रियाएँ-गणितीय शैक्षिक भ्रमण
  • गणितीय प्रयोगशाला
  • गणितीय पुस्तकालय
  • गणितीय परिषद्
  • गणितीय संग्रहालय
  • गणितीय मेले व प्रदर्शनियाँ

10. गणित में श्रव्य-दृश्य सामग्री

  • प्रस्तावना
  • श्रव्य-दृश्य सामग्री का अर्थ
  • परिभाषाएँ
  • श्रव्य-दृश्य सामग्री के मुख्य कार्य एवं महत्व
  • श्रव्य-दृश्य सामग्री का चयन
  • श्रव्य-दृश्य सामग्री के प्रयोग में सावधानियाँ
  • श्रव्य-दृश्य सामग्री का वर्गीकरण
  • शिक्षण सहायक सामग्री की सापेक्षिक प्रभावशीलता
  • श्रव्य सामग्री
  • दृश्य सामग्री
  • श्रव्य-दृश्य सामग्री

इकाईः5
11. गणित में मूल्यांकन एवं मापन

  • प्रस्तावना
  • मूल्यांकन का अर्थ एवं परिभाषाएँ
  • मूल्यांकन के उद्देश्य
  • मूल्यांकन आवश्यकता
  • मूल्यांकन का महत्व
  • मूल्यांकन की प्रक्रिया
  • मूल्यांकन का क्षेत्र
  • मापन, मापन की परिभाषाएँ, मापन की विशेषताएँ, मापन की सीमाएं, माप के तत्व
  • मापन और मूल्यांकन में अन्तर
  • परीक्षा एवं मूल्यांकन में अन्तर

12. सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन

  • प्रस्तावना
  • मूल्यांकन के अंग
  • सतत् मूल्यांकन का महत्व
  • मूल्यांकन के क्षेत्र
  • सतत् मूल्यांकन का आयोजन
  • सतत् मूल्यांकन की कार्यप्रणाली तथा सोपान
  • व्यापक मूल्यांकन
  • दैनिक मूल्यांकन
  • साप्ताहिक मूल्यांकन
  • षट्मासिक मूल्यांकन
  • वार्षिक मूल्यांकन
  • मूल्यांकन के प्रकार
  • योगात्मक मूल्यांकन
  • संरचनात्मक मूल्यांकन
  • संरचनात्मक मूल्यांकन एवं योगात्मक मूल्यांकन में अन्तर

13. परीक्षण पत्र

  • प्रस्तवना
  • परिभाषाएँ
  • अच्छे परीक्षण की विशेषताएँ
  • परीक्षणों के प्रकार
  • वस्तुनिष्ठ परीक्षा की निर्माण विधि
  • वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के दोष
  • सावधानियाँ
  • लघु उत्तरात्मक प्रश्न निबन्धात्मक परीक्षाओं के प्रकार
  • निबन्धात्मक परीक्षाओं के गुण
  • निबन्धात्मक परीक्षाओं के दोष/सीमाएँ
  • निबन्धात्मक परीक्षाओं में सुधार हेतु सुझाव
  • निबन्धात्मक तथा वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं में अन्तर

14. निदानात्मक परीक्षण एवं उपचारात्मक शिक्षण

  • प्रस्तावना
  • निदानात्मक परीक्षण
  • परिभाषाएँ
  • नैदानिक परीक्षणों के उद्देश्य
  • निदानात्मक परीक्षणों की विशेषताएँ
  • निदानात्मक परीक्षणों की आवश्यकता एवं महत्व
  • निदानात्मक परीक्षणों का निर्माण
  • शैक्षिक निदान के स्तर
  • निदानात्मक परीक्षणों के निर्माण मे सावधानियाँ
  • विद्यार्थीयों के समस्याओं के सम्भावित प्रश्न
  • उपचारात्मक शिक्षण
  • मन्द बुद्धि विद्यार्थीयों के लिए उपचारात्मक शिक्षण
  • प्रखर बुद्धि विद्यार्थीयों के लिए उपचारात्मक शिक्षण

नोट:-हमारी पोस्ट अगर आप को अच्छी लगी हो तो कृपया इसे ज्यादा से ज्यादा और लोगो के पास शेयर करे, ऐसी जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहे।      धन्यबाद

                      By आलोक वर्मा
"अधिक जानकारी लेने के लिए हमारे
teligram से जुड़े"

डिस्लेक्सिया के कारण. by ALOK VERMA

डिस्लेक्सिया के कारण

आनुवंशिक कारक - कई लोगों में डिस्लेक्सिया जन्म से ही होता है । ऐसा DCDC2 जीन्स में डिफेक्ट होने के कारण भी होता है जो रीडिंग परफॉरमेंस से जुड़ा हुआ है ।

अन्य कारक कुछ लोगों को पैदा होने के बाद डिस्लेक्सिया होता है । इस डिस्लेक्सिया का सबसे आम कारण मस्तिष्क की चोट , स्ट्रोक या कुछ अन्य प्रकार के आघात होते हैं ।

जोखिम कारक - डिस्लेक्सिया का पारिवारिक इतिहास भी हो सकता है जहाँ मस्तिष्क के उन हिस्सों में समस्याएँ जो पढ़ने में सक्षम होते हैं ।

डिस्लेक्सिया के प्रकार

1 - प्राथमिक डिस्लेक्सिया - आम तौर पर अक्षर और संख्या पहचान करना , पढ़ना , अंक गणित और अन्य वे गतिविधियाँ जो मस्तिक के बायें हिस्से से सचारित होती हैं , उनमें ये समस्याएँ आती हैं ।

2 - दुनिया भर के स्कूलों में सामान्य शिक्षक विधियों में मुख्यतः बायीं तरफ के मस्तिष्क का उपयोग होता है । जिसमें डिस्लेक्सिया से ग्रस्त बच्चों को पढ़ाई में समस्या आती है ।

3 - यह डेवलपमेंटल डिस्लेक्सिया जो भ्रूण में मस्तिष्क के विकास में समस्याओं की वजह से होता है , जिसमें शब्दों की पहचान और उनकी वर्तनी की समस्याएँ आती हैं ।

4 - हाल की इस स्थिति की कठिनाइयाँ उम्र के साथ सुधर जाती हैं ।

5 - बच्चा बचपन में डिस्लेक्सिस लक्षण का अनुभव कर सकता है परन्तु उचित मार्गदर्शन हो तो कॉलेज में प्रदर्शन में सुधार आ सकता है ।

6 - ऐसे बच्चे आम तौर पर ध्वनि विज्ञान में अच्छे होते हैं ।

ट्रामा डिस्लेक्सिया

यह एक गंभीर बीमारी है ये मस्तिष्क की चोट के कारण होता है ।

इसके लक्षण छोटे बच्चों में निरंतर फ्लू , सर्दी या कान के संक्रमण से सुनने की क्षमता के नुकसान के कारण विकसित हो सकते हैं ।

इसमें बच्चे शब्दों की ध्वनि नहीं सुन पाते हैं इसलिए उन्हें शब्द बोलने , वर्तनी पढ़ने और लिखने में कठिनाई होती है ।

बड़े बच्चों या वयस्कों में मस्तिष्क की बीमारी की वजह से ट्रामा ४ डिस्लेक्सिया विकसित होता है , जो भाषा को समझने की क्षमता को प्रभावित करता है ।

ये लोग आम तौर पर आघात से पहले पढ़ने - लिखने और शब्दों की वर्तनी करने में ठीक होते हैं ।

डिस्लेक्सिया होने से रोका जा सकता है

डिस्लेक्सिया रोकने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता , खासकर अगर ये आनुवंशिक हैं ।

यद्यपि प्रारंभिक चरण में निदान और उपचार शुरू कर दिए जाएँ तो इसके प्रभाव को कम कर सकते हैं ।

डिस्लेक्सिया से ग्रस्त बच्चों को जितनी जल्दी विशेष शिक्षक सेवाएँ मिलती हैं , उतनी ही जल्दी वह पढ़ना - लिखना सीखते हैं ।



डिस्लेक्सिया क्या है ? by ALOK VERMA

डिस्लेक्सिया क्या है ?

जस्लेक्सिया कोई मारी नहीं है और न ही ये कोई मानसिक अयोग्यता है

डिसलेक्सिया पढ़ने - लिखने से सम्बन्धी एक विकार है जिसने बच्चो को शब्दों को पहचानने , पढ़ने याद करने और बोलने में परेशानी आती है ।

वे कुछ अक्षर और शव्दों को उल्टा पढ़ते है और कुछ अक्षरों का उच्चारण भी नहीं कर पाते । .

डिस्लेक्सिया को कंट्रोल किया जा सकता है . इसके लिए बच्ची पर - कोई मानसिक बीमारी नहीं है ।

डिस्लेक्सिया के लक्षण

1 नए शब्दों को धीमे सोखना । .

2 नर्सरी की पिता को पचने में कठिनाई ।

3 कविताओं वाले खेल खेलने में कठिनाई ।

4 सभायें प्रबंधन करने में कविता ।

5 ऊंची आवाज में पढ़ने में कठिनाई ।

6 याद रखने में समस्या ।

7 कहानी को संक्षिप्त करने में कठिनाई ।

8 उम्र के हिसाब से अपेक्षित स्तर से कम पढ़ पाना ।

9 . तेजी से दिए गए निर्देशों को समझने में कठिनाई ।

डिस्लेक्सिया में क्या करें ?

डिस्लेक्सिया ( Dyslexia ) से प्रभावित बच्चों को पढ़ाई में बहुत समस्या का सामना करना पड़ता है । इसका समाधान ये नहीं है कि आप बच्चों को पढ़ाई में ज्यादा मेहनत करने के लिए जोर दें । इसके बदले आप को अपने बच्चे को पढ़ने के तरीकों में बदलाव लाने की जरूरत पड़ेगी ।

आपका बच्चा सामान्य बच्चों से भिन्न है । आपको उसकी गलतियों को नजरंदाज करना होगा ताकि आपके बच्चे का मनोबल बना रहे और वह अपने आप में विश्वास न खोये ।

अगर आपका बच्चा पढ़ी हुई चीजें भूल जाये तो आप उसको hint दें । फिर भी उसे याद न आये तो आप उसे उत्तर बता दें , लेकिन बिना दूसरे बच्चों से तुलना किये और बिना डांटे ।

आपके बच्चे के लिए भूल जाना बहुत स्वाभाविक है । इसमें उसकी कोई गलती नहीं है ।

बच्चे से ज्यादा मेहनत कराने से उसमें शायद ही कोई सुधार हो । लेकिन इससे आप का बच्चा हताश हो जायेगा और पढ़ाई से दूर भागने लगेगा । इससे नुकसान ज्यादा और फायदा कम होगा ।

पढ़ाते वक्त ये काम कभी न करें ।

कभी - कभी पढ़ाते वक्त अनजाने में माँ - बाप ऐसे काम कर जाते हैं जिनकी वजह से बच्चों की डिस्लेक्सिया ( Dyslexia ) की समस्या और बढ़ जाती है । पढ़ाते वक्त बच्चों के साथ नीचे दिए काम कभी न करें ।

डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों को इस तरह बनायें पढाई में अव्वल

1 घर के माहौल को बच्चे की पढ़ाई के लिए अनुकूल बनायें ।

2 बच्चों के साथ हर दिन समय बिताएँ । उनसे ढेर सारी बातें करें । बच्चों - के प्रारम्भिक जीवन में उनसे बातें करने से उनकी बुद्धि का प्रखर विकास होता है ।।

3 पढ़ाई के लिए एक निश्चित दिनचर्या का निर्धारण करें । डिस्लेक्सिया ( Dyslexia ) से पीड़ित बच्चे पढ़ाई से भागने की कोशिश करते हैं । क्योंकि दूसरे बच्चों की तुलना में पढ़ाई उन्हें सहजता से नहीं आती है । निश्चित दिनचर्या का निर्धारण करने से आप को हर दिन बच्चों को पढ़ाई के लिए बाध्य नहीं करना पड़ेगा । एक निर्धारित दिनचर्या के कारण वे निश्चित समय पर ( बिना कुदकुढ़ाये ) खुद पढ़ने बैठ जायेंगे ।

4 . बच्चों की मेमोरी को बूस्ट करने के उपाये करें ।

5 . घर को इस तरह व्यस्थित करें ताकि बच्चे में पढ़ाई को लेकर रुचि बढ़े ।

6 . डिस्लेक्सिया ( Dyslexia ) से पीड़ित बच्चों का पढ़ाई में कमजोर होने की वजह से मनोबल कम रहता है । आप अपनी तरफ से वे तरीके अपनायें जिनसे पढ़ाई में बच्चों का मन लगे और उनका आत्मविश्वास बदे । ।