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टालमैन का अधिगम सिद्धान्त

 

टालमैन का अधिगम सिद्धान्त

·        इसके अन्य नाम  -

1      चिन्ह सिद्धान्त

2    उद्देश्य सिद्धान्त

3    चिन्ह अधिगम सिद्धांत

4    चिन्ह-गेस्टाल सिद्धान्त

5     प्रत्यश सिद्धान्त

 

·        एडवर्ड चेस टालमैन वैज्ञानिक थे -

·        1932 मे प्रयोग किया गया !

·        अधिगम सिद्धान्त है !

·        व्यवहारवाद + समग्रवाद का एक अनोखा मिश्रण कहा जा सकता है !

·        व्यवहारवादी सिद्धांतों तथा संगयानतमक सिद्धांतों के मिले जुले रूप में  सीखने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है !

·        व्यवहार को उद्देश्यपूर्ण माना गया  है !

·        इसमे सीखने छाह प्रकारो की चर्चा की है ! 

      1 कैथेसिस

      2 तुल्यता विश्वास

     3 क्षेत्र प्रत्यस

4      क्षेत्र संज्ञान ढंग

5       प्रणोद विभेदन

6      पेशीय प्रारूप

 

टॉलमैन का चिन्ह अधिगम सिद्धान्त ( ( TOLMAN'S SIGN LEARNING THEORY ) 

 इस सिद्धान्त के पोषक प्रयोगपूर्ण व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक एडवर्क चेस टॉलमैन है । अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन उन्होंने पशुओं और मनुष्यों के प्रयोजनपूर्ण व्यवहार के आधार पर किया है । उनका विचार है कि सीखने के समय प्राणी के शरीर ग्रंथियों , माँसपेशियों तथा स्नायुओं में अनेक चिन्ह उभरते हैं तथा वह उन्हीं के अनुसार व्यवहार भी करता है । टॉलमैन का चिन्ह अधिगम सिद्धान्त सीखने को ज्ञानात्मक मानचित्र बनाना मानता है । उदाहरण के लिए , ताली बजाने से शिशु खुश होता है तथा ताली बजाने वाले की तरफ दौड़ता है । इस प्रकार यह यांत्रिक क्रिया नहीं है बल्कि संज्ञानात्मक क्रिया है । इसी तरह पुरस्कार , दण्ड एवं अनुबंधन ऐसे चिन्ह हैं जो मनुष्य को यह बताते हैं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए । टॉलमैन ने इस प्रकार से संकेत किया है कि सीखने वाला चिन्हों का अनुसरण करके उद्देश्य प्राप्त करता है । अतएव चिन्ह या पूर्व अनुभव से ही सीखना सम्भव होता है , ऐसा इस सिद्धान्त से पता चलता है । इसके साथ - साथ इस सिद्धान्त में सीखने वाले की आशाओं को भी ध्यान में रखा जाता है ।

इससे पता लगता है की अधिगम  के तीन स्तर होते है !

1      संबंध प्रत्यावर्तन द्वारा अधिगम

2      प्रयास एवं त्रटि द्वारा अधिगम

3       सूझ द्वारा अधिगम

टॉलमैन के अनुसार , “ जो अधिगम प्राप्त करते हैं उन लोगों का व्यवहार , गतियों की अन्य तांत्रिक शृंखला प्रदर्शित नहीं करता , बल्कि यह प्रदर्शित करता है |

·        एडवर्ड चेस टालमैन ने विभिन्न प्रकार की भूल-भुलैया में  चूहो के ऊपर अनेक प्रोग करके अधिगम सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है !

 

टालमैन के सिद्धान्त के शैक्षिक निहितार्थ ( Educational Implications of Tolman's Theory )

 ( i ) टालमैन का सिद्धान्त सीखने में उद्देश्य की भूमिका तथा महत्व को रेखांकित करता है । अतः बच्चों को जो कुछ भी सिखाया जाये वह उनके लिए लाभप्रद तथा उनकी आवश्यकता के अनुरूप ही होना चाहिए ।

( ii ) टालमैन के अनुसार अधिगम व्यर्थ नहीं होता है वरन उपयुक्त अवसर पर लुप्त अधिगम का प्रस्फुटन हो जाता है । अतः तात्कालिक निष्पादन न होने पर अधिगम के प्रयास जारी रखने चाहिए ।

( iii ) क्योंकि यांत्रिक सम्बन्ध या अनुकूलन का खंडन करते हुए यह सिद्धान्त संज्ञानात्मक अधिगम पर बल देता है इसलिए बच्चों को सिखाते समय समझ तथा बोध पर अधिक बल देना चाहिए ।

( iv ) इस सिद्धान्त के अनुसार सीखने में बाह्य पुरस्कार / पुनर्बलन का महत्व तो है परन्तु यह प्रत्येक सोपान पर आवश्यक नहीं है । अतः बालकों को नई बातों को सिखाते समय बाह्य पुरस्कार के स्थान पर आन्तरिक अभिप्रेरणा पर अधिक बल दिया जाना चाहिए ।

( v ) टालमैन के अनुसार वातावरणीय परिस्थितियाँ , प्रणोद , पूर्व अधिगम , आयु आदि मध्यवर्ती चर सीखने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं । अतः शिक्षण - अधिगम के दौरान इस प्रकार के मध्यवर्ती चरों को पहचानने तथा उनकी भूमिका पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए ।

 


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आदर्श शिक्षण में शिक्षक एवं छात्रों का योगदान , CTET की परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण


आदर्श शिक्षण में शिक्षक एवं छात्रों का योगदान,CTET की परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स 

आदर्श शिक्षण में शिक्षक एवं छात्रों का योगदान  


( CONTRIBUTION OF TEACHERS AND STUDENTS IN GOOD TEACHING ) 


शिक्षण वह क्रिया है जिसके द्वारा शिक्षक , छात्र तथा विषय के मध्य सम्बन्ध स्थापित होता है । ' शिक्षण - शिक्षक तथा शिक्षार्थी में शिक्षक तथा शिक्षार्थी ' सजीव एवं सक्रिय बिन्दु हैं । शिक्षक शिक्षण के समय यदि अधिक सक्रिय एवं सजीव रहे तो छात्र भी सक्रिय एवं उत्साही रहता है । जब तक शिक्षण प्रक्रिया के ये दोनों बिन्दु सजीव तथा सक्रिय न रहेंगे , परस्पर सिखाने एवं सीखने की क्रिया में आवश्यक सहयोग न प्रदान करेंगे तब तक शिक्षण प्रक्रिया सफल नहीं हो सकती ।
 सफल शिक्षण के लिये शिक्षक के कर्तव्य योजना 

1 . शिक्षक को अपने पढ़ाये जाने वाले विषय की रूपरेखा पहले ही बना लेनी चाहिये । यह योजना क्रमबद्ध तथा तार्किक क्रम में मनोवैज्ञानिक प्रकृति की होनी चाहिये । शिक्षक को चाहिये कि वह सभी सामग्री सर्वश्रेष्ठ विधि से छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करे । 

2 . समाज की आवश्यकतानुसार शिक्षक को चाहिये कि वह पाठ्यक्रम में महत्ता के आधार पर पाठों का चयन करे तथा पढ़ाये । छात्र ऐसी स्थिति में अधिक रुचिपूर्वक अध्ययन करेंगे क्योंकि पाठ उनकी आवश्यकताओं तथा समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा । 
3 . शिक्षक को चाहिये कि वह पाठ को समय पर पढाये । जैसे यदि उसे मँगफली के विषय में पढाना है तो मूंगफली की ऋतु ( Season ) में पढ़ाये जिससे कि छात्र अपने खेतों में या कॉलेज फार्म पर वास्तविक रूप से मूंगफली की खेती के विषय में सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक कार्य का ज्ञान प्राप्त कर सकें । 

4 . अपना वर्ष भर का कार्यक्रम शिक्षक को तैयार कर लेना चाहिये । 

5. शिक्षक को अपने छात्रों के प्रति प्रेम एवं सहानुभूति रखनी चाहिये । उसमें धैर्य एवं सहनशीलता व्या - इन गुणों से युक्त शिक्षक छात्रों के सामीप्य से सम्पर्क में आ जाते हैं तथा छात्र शिक्षक में पापत कर स्वयं को अपने घर के समान वातावरण में पाते हैं तथा अधिक अच्छी तरह से नया करते हैं । अतः शिक्षक को सहयोगी प्रवृत्ति का होना चाहिये । 

6. छात्रों के प्रति व्यक्तिगत रूप से जागरूक रहे । यदि शिक्षक व्यक्तिगत रूप से छात्रों वह तो छात्र भी स्वयं को विशेष रूप से शिक्षक की संरक्षकता में पाता है तथा अधिक सीखता है। शिक्षक योग्यता के आधार पर श्रेणी विभाजन कर सीखने की प्रक्रिया को और भी अधिक सरल तथा उपादेय बना देता है । 

 7. सफल शिक्षण के लिये यह आवश्यक है कि शिक्षक अपने छात्रों को भली प्रकार से जानता उनकी योग्यताओं तथा क्षमताओं का ज्ञान रखता हो - क्योंकि आजकल छात्र केन्द्रित शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाता है । 

8. शिक्षक पर्ण रुचि तथा उत्साह के साथ शिक्षण - प्रक्रिया में भाग ल - तभी छात्र सीखने के लिये अधिक प्रेरित होंगे तथा सीखेंगे । 

9 . शिक्षक को Resourceful होना चाहिये । उसकी बात करने की प्रक्रिया रोचक होनी चाहिये तथा उसे विषय के प्रयोगात्मक पक्ष में होना चाहिये । 

10 . शिक्षक को श्रव्य - दृश्य सामग्री का चयन तथा उनका उचित उपयोग करना अवश्य आना चाहिये । इसकी सहायता से वह अधिक सफलता के साथ शिक्षण कर सकेगा । 

                    

 11 . शिक्षण प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग शिक्षक को करना चाहिये । ये मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त निम्नांकित हैं 

(i) अभ्यास का सिद्धान्त - ( अ ) यदि शिक्षक अभ्यास के लिये छात्रों को अधिक समय देता है तथा । अभ्यास के उद्देश्य ध्येय आदि के विषय में ज्ञान प्रदान कर उचित अवसर प्रदान करता है तो छात्र अधिक सरलता से सीखते हैं । 

( ब ) शिक्षक को केवल अभ्यास करने के लिये कहकर ही नहीं छोड़ देना चाहिये वरन उसे । समयानुसार निरीक्षण तथा सुधार करते रहना चाहिये । । 

( स ) शिक्षक को इस बात का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये कि उसे किन चीजों का अभ्यास करना चाहिये और किनका नहीं । 

( द ) आवश्यकतानुसार पाठ्य सामग्री पर जोर देना चाहिये । 

( य ) शिक्षक को सभी तथ्य प्रतिदिन के व्यवहारों ( Life Situations ) के आधार पर देने चाहिये । 

( ii ) प्रभाव का सिद्धान्त - शिक्षक को संतोषप्रद एवं असंतोषप्रद वस्तुओं का ज्ञान होना चाहिये । क्योंकि ये दोनों ही अपने - अपने स्वभावानुसार शिक्षण प्रक्रिया में योग देती हैं । शिक्षक को चाहिये कि अच्छे कार्य का उचित तथा धनात्मक श्लाघा करे ( Positive Appre ciation ) | यह कार्य स्वीकृति ( Approval ) तथा मान्यता देकर ( Recognition ) छात्रों को प्रेरित किया जा सकता है । 


12 . शिक्षक को सफल शिक्षण के लिये निम्नांकित शैक्षणिक सत्रों का प्रयोग करना चाहिय 

( क ) ज्ञात से अज्ञात की ओर । 
( ख ) सरल से जटिल की ओर । 
( ग ) स्थूल से सूक्ष्म की ओर ।  
( घ ) पूर्ण से अंश की और । 
( ङ ) अनिश्चित से निश्चित की और । 
( च ) प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर । 
( छ ) विशिष्ट से सामान्य की और । 
( ज ) विश्लेषण से संश्लेषण की ओर । 
( झ ) मनोवैज्ञानिक से तात्मक क्रम की ओर , 
( ञ ) अनुभूत से युक्ति - युक्त की ओर । 
( ट ) नैसर्गिक विधि । 
( ठ ) दृश्य से अदृश्य की ओर । 
( ड ) स्वयं अध्ययन को प्रोत्साहन । 
( ढ ) Follow Culture Epoch Theory .

इन सभी सूत्रों के आवश्यकतानुसार अनुसरण से शिक्षक अपने विषय को कक्षा में छात्रों के समक्ष भली प्रकार से प्रस्तुत कर सकता है तथा छात्र सरलता से अधिक सीख सकते है । 

13 . शिक्षक को सीखने - सिखाने का उचित वातावरण बनाना चाहिये । 

14 . शिक्षक को अपने छात्रों का मल्यांकन वास्तविक रूप से सही तथा निष्पक्षता से करना चाहिये । 

15 . शिक्षक को छात्रों की सहायता के लिये तथा उन्हें निर्देशन देने के लिये निर्देशन ( Guidance ) के विषय में पूर्ण ज्ञान होना चाहिये । 
वास्तव में शिक्षक अनेक प्रकार की प्रक्रियायें अपनाकर शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावोत्पादक बना सकता है । एक उत्तम अध्यापक का कार्यक्रम निम्नांकित बातों पर अवश्य आधारित होना चाहिय 

( क ) समुदाय की आवश्यकता । 
( ख ) स्वस्थ शैक्षिक सिद्धान्त । 
( ग ) सही , पूर्ण तथा उचित ( Up - to - date ) तकनीकी सूचनायें । 
( घ ) ऋतु तथा मौसम के अनुसार पाठ्यक्रम । 
( ङ ) मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित सूचनायें । 
( च ) छात्रों का आयु स्तर तथा मानसिक स्तर । 
( छ ) छात्रों की योग्यतायें तथा उनका पूर्व ज्ञान । 
( ज ) पाठ्यक्रम पर आधारित सूचनायें ।

 सफल शिक्षण क्रिया में छात्रों का कर्तव्य 

1 . छात्रों को अध्ययन की प्रक्रिया में अध्यापक को पूर्ण सहयोग देना चाहिये । कक्षा में उन्हें नियमित रहना चाहिये । उन्हें अनुशासन में रहकर शिक्षक को विभिन्न शैक्षणिक क्रियाओं के प्रबन्ध तथा आयोजन में सहायक होना चाहिये तथा उन्हें चाहिये कि वे कक्षा वार्तालाप में सक्रिय रूप से भाग लें । बिना किसी संकोच तथा झिझक के अपनी समस्यायें अध्यापक के सामने रखें तथा इसके समाधान में योग दें । इस प्रकार से यदि छात्र शिक्षण प्रक्रिया में सहयोग दें तो निश्चित ही वे अधिक सरलता से अधिकतम सीख सकते हैं । 

2 प्रदत्त कार्य का अभ्यास छात्रों को स्वयं करना चाहिये । क्योकि Practice makes a man | active , interested and perfect in leaming .
3 . छात्रों को प्रत्येक विषय की उपादेयता के विषय में ज्ञान होना चाहिये कि वह वस्तु विशेष का ज्ञान किस ध्येय की प्राप्ति हेतु कर रहा है । इसकी जानकारी छात्रों को अधिक सीखने के लिये प्रेरित करती है । 

4 . छात्रों को इस विषय का भी ज्ञान होना चाहिये कि वह प्रदत्त ज्ञान का उपयोग अपने दैनिक जीवन में किस प्रकार से कर सकता है ? इस प्रकार का ज्ञान छात्रों में अधिक सीखने की इच्छा जाग्रत करता है । 

5 . यदि शिक्षण समुदाय की आवश्यकताओं एवं रुचि के अनुसार होता है तो छात्र अधिक सीखते हैं । 

6 छात्र के समक्ष कुछ शिक्षण ध्येयों के होने से छात्र अधिक परिश्रम के साथ अधिक सीख सकते ।

7. छात्रों को पढ़ते समय पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये । पूर्ण स्वतन्त्रता के वातावरण में छात्र परीक्षा अधिक सीखता है । 

8. शिक्षार्थी यदि कक्षा में अपने को सुरक्षित समझता है तो अधिक रुचिपूर्वक सीखेगा ।

9. शिक्षार्थी को इस बात का ज्ञान उसे स्वये है कि अध्ययन से दूसरों को कुछ लाभ पहुंचेगा । 

 10 . यदि शिक्षार्थी सीखने के लिये  प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करता है तो अधिक सीख सकता है तथा अधिक दक्ष हो सकता है ।

11 . यदि छात्र में सीखने के लिये तत्परता है , वह सीखने की मुद्रा में है , तो वह अधिक की सकता है ।


12. यदि छात्र को उसके अध्ययन एवं कार्य की उपयोगिता के विषय में ज्ञान है तो वह अधिक परिश्रम से कार्य करता है । 

13 . यदि छात्र ध्येय एवं उद्देश्यों के ज्ञान के साथ अभ्यास करें तो अधिक सरलता से सीख सकते । 

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि छात्रों का अधिक सीखने में अपना उत्तरदायित्व है । इनमें से कुछ उत्तरदायित्व शिक्षक तथा छात्र दोनों के ही हैं । अतः इन दोनों के परस्पर सहयोग एवं प्रयल के शिक्षण अधिक प्रभावोत्पादक , वास्तविक , उपादेय एवं सफल बन सकता है । शिक्षण तकनीकी शिक्षण को प्रभावशाली बनाने में , शिक्षक तथा छात्र दोनों को स्पष्ट निर्देश देती है , उपादेय सुचनायें प्रदान करती । है तथा आदर्श शिक्षण की प्रक्रिया को सरल , सुबोध तथा रोचक बनाने में पूर्ण रूप से सहयोग तथा सहायता प्रदान करती है , जिससे शिक्षक तथा छात्र संयक्त रूप से अपने - अपने प्रयासों से शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने में महत्वपूर्ण योगदान करने में समर्थ होते हैं ।

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शिक्षण की प्रकृति तथा विशेषताएँ by आलोक वर्मा

शिक्षण की प्रकृति तथा विशेषताएँ


( Characteristics & Nature of Teaching )

उपर्युक्त परिभाषाओं की विवेचना के पश्चात् शिक्षण की निम्नांकित विशेषताएँ परिलक्षित की गयीं
1 . शिक्षण अधिगम की क्रिया को प्रभावशाली तथा व्यवस्थित बनाता है ।
2 . शिक्षण की समस्त प्रक्रियाओं का आधार मनोविज्ञान है ।
3 . शिक्षण के दो प्रमुख अंग हैं - ( 1 ) सीखने वाला तथा ( 2 ) सिखाने वाला ।
4 . शिक्षण और अधिगम की परिस्थितियों में सम्बन्ध स्थापित करता है ।
5 . शिक्षण का कार्य ज्ञान प्रदान करना है ।
6 . शिक्षण मार्गदर्शन करता है ।
7 . शिक्षण क्रियाशीलता बनाये रखता है ।
8 . शिक्षण का अर्थ अधिगम तथा शिक्षण की समस्त प्रक्रियाओं के संगठन से सम्बन्धित है ।
9 . शिक्षण छात्रों में उत्सुकता जाग्रत करता है ।
10 . शिक्षण कला एवं विज्ञान दोनों ही है । '
11 . शिक्षण एक कौशल युक्त क्रिया है ।
12 . शिक्षण में सांकेतिक , क्रियात्मक तथा शाब्दिक व्यवहार निहित रहते हैं ।
उपर्युक्त परिभाषाओं तथा विशेषताओं के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से छात्रों के व्यवहारों में वांछित परिवर्तन लाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की । क्रियाएँ सम्पादित की जाती हैं । इन क्रियाओं के फलस्वरूप शिक्षण और सिखाने वाली परिस्थितियों में । सम्बन्ध स्थापित हो जाता है ।
           
                    ( by आलोक वर्मा )

शिक्षण की परिभाषाएँ by आलोक वर्मा

शिक्षण की परिभाषाएँ

( DEFINITIONS OF TEACHING )

शिक्षक के अर्थ को और अधिक स्पष्ट कर पका और अधिक स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित परिभाषाएं अधिक सहायता करेंगी

( a ) शिक्षण का शब्दकोषीय अर्थ ( Dictionary Meaning of Teaching )

1. Dictionary of Psychological and Psychoanalytical Terms -इस शब्दकोष के अनुसार इस शब्दकाम दूसरे को सीखने में मदद करने की प्रक्रिया को शिक्षण कहते हैं ।
" The art of assisting another to learn ( which includes ) . ( instruction ) and of appropriate situations , conditions ora another to leam ( which includes ) providing of information appropriate situations , conditions or activities designed to facintate learning . "
2. World Boom Encyclopaedia - के अनसार - " शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे का ज्ञान , कौशल तथा अभिरुचियों को सीखने या प्राप्त करने में सहायता करता है ।
The process by which one person helps others achieve knowledge , skills and ' aptitudes .
3. " The Lettle Oxford Dictionary के अनुसार - " ज्ञान प्रदान करना , कौशल का विकास करना , अनुदशन देना , पाठ पढाना तथा उन्हें उत्साहित करना शिक्षण का अर्थ है । " " Impart knowledge or skill , give instruction or lessons , instil and inspire with .
( b ) विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रदत्त परिभाषाएँ ( Definitions Given by Experts )
गेज ( Gage ) - " शिक्षण एक प्रकार का पारस्परिक प्रभाव है जिसका उद्देश्य है दूसरे व्यक्ति के व्यवहारों में वांछित परिवर्तन लाना । " _ " Teaching is an act of interpersonal influence aimed at changing the ways in which other person can or will behave .
" रायन्स ( Ryans ) - " दूसरों को सीखने के लिए दिशा निर्देश देने तथा अन्य प्रकार से उन्हें निर्देशित करने की प्रक्रिया को शिक्षण कहा जाता है । " " Teaching is concerned with the activities which are concerned with the guidance or direction of the learning of others .
" स्किनर ( Skinner ) - " शिक्षण पुनर्बलन की Contingencies का क्रम है । " " Teaching is the arrangement of contingencies of reinforcement .
" स्मिथ ( Smith ) - " शिक्षण का उद्देश्य निर्देशित क्रिया है । " " Teaching is a goal directed activity .
" जेम्स एम० थाइन ( James M . Thyne ) - " समस्त शिक्षण का अर्थ है सीखने में वृद्धि करना । ' " All teaching is the promotion of learning .
" क्लार्क ( Clarke . 1970 ) - " शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसके प्रारूप तथा संचालन की व्यवस्था इसलिए की जाती है जिससे छात्रों के व्यवहारों में परिवर्तन लाया जा सके । " " Teaching process is designed and performed to produce change in student behaviour .
" बर्टन ( Burton ) ने शिक्षण को अधिगम हेतु उद्दीपन , मार्ग प्रदर्शन तथा दिशाबोध कहा है । बैन ( Banm ) इसे प्रशिक्षण कहता है । रायबर्न ( Rybum ) इसे एक ऐसा सम्बन्ध मानता है जो छात्रों को उनकी शक्तियों के विकास में सहायता देता है । के० पी० पाण्डेय के अनुसार
" Teaching is an influence - directed activity . . . . . . It is influencing the learner with a specific content structure . "
एडमंड एमीडन ( Edmond Amidon ) - " शिक्षण एक अन्तःप्रक्रिया है , जिसमें मुख्यतः कक्षा तक होती है , जो शिक्षक व छात्रों के मध्य कुछ परिभाषित की जा सकने वाली क्रियाओं के माध्यम से पनि होती है ।
" Teaching is an interactive process , primarily involving classroom talk which tato place between teacher and pupil and occurs during certain definable activities .
" मौरीसन ( H . C . Morrison ) - " शिक्षण एक परिपक्व व्यक्तित्व तथा कम परिपक्व के मध्य आप या घनिष्ट सम्बन्ध / सम्पर्क है जिसमें कम परिपक्व को शिक्षा की दिशा की ओर अग्रसित किया जाता ।
" Teaching is an intimate contact between a more mature personality and a less mature one which is designed to further the deduation of the later .
" विभिन्न प्रकार की अनेक परिभाषाओं का विश्लेषण करने के पश्चात् डॉ० शिव के० मित्रा इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
" Teaching is a series of acts carried out by a teacher and guided by the formulation of teaching task in a formalised instructional situation . "
डॉ० एस० पी० कुलश्रेष्ठ ( 1999 ) के शब्दों में कहा जा सकता है कि शिक्षण , प्रक्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे को ज्ञान प्रदान करने के लिये शिक्षण के कार्य को सम्पन्न करने के लिए अनेक प्रकार की क्रियायें करता है और छात्रों के व्यवहार में आत्मीयता के साथ वाँछित परिवर्तन लाने का प्रयास करता है ।
                  
                       By आलोक वर्मा

यू० पी० में शैक्षिक प्रसारण (by आलोक वर्मा )

 यू० पी० में शैक्षिक प्रसारण

( 1 ) यू० पी० में प्राथमिक कक्षाओं के लिये DD - 1 पर शैक्षिक दूरदर्शन कार्यक्रम ' तरंग ' प्रा . 10 - 30 से 11 . 00 तक प्रसारित होता है ।
( 2 ) आकाशवाणी से रेडियो पर प्राथमिक कक्षाओं के लिये 12 . 10 से 12 . 30 तक शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है ।
( 3 ) स्कूल टेलीविजन के अन्तर्गत DD - 2 पर प्रातः 11 . 00 से 11 . 45 तक तथा 1 . 15 से 2 बजे तक कक्षा 6 से 10 तक के छात्रों के लिये दूरदर्शन कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं ।
शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में यू० पी० के जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान ( डायट ) भी महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं । कम लागत की शिक्षण सामग्री विकसित करना , डी० आर० यू० को अनौपचारिक शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा के लिये कम लागत की शिक्षण सामग्री विकसित करने में सहायता देना , संस्थान के सभी श्रव्य - दृश्य उपकरणों का रख - रखाव करना , कम्प्यूटर लैव संचालित करना , कम लागत की शिक्षण सामग्री का प्रदर्शन करना , पास के रेडियो स्टेशन से बच्चों , प्रौढ़ों तथा शिक्षकों के कार्यक्रम प्रसारण हेतु सम्पर्क करना तथा सेवारत शिक्षकों को शैक्षिक तकनीकी में आवश्यक प्रशिक्षण देना - इन संस्थानों के प्रमुख कार्य हैं ।
संशोधित शैक्षिक तकनीकी योजना के अन्तर्गत 1988 में केन्द्रीय सहायता से विद्यालयों को रेडियो कम - कैसेट प्लेयर ( 2 in 1 ) वितरित किये गये और उनके उपयोग को प्रभावशाली बनाने के लिये अनेक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया गया । अब तक यू० पी० में 1800 प्राथमिक तथा उच्च विद्यालयों को रंगीन टी० वी० एवं 14412 उच्च प्राथमिक विद्यालयों को रेडियो - कम - कैसेट प्लेयर वितरित किये जा चुके हैं । इन उपकरणों का प्रयोग , औपचारिक , अनौपचारिक , प्रौढ़ शिक्षा तथा सामुदायिक उपयोग के लिये सफलतापूर्वक किया जा रहा है । इस प्रकार से उत्तर प्रदेश राज्य भी शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में सक्षम नेतृत्व देने की तैयारी में है ।
                   
                      By आलोक वर्मा

तकनीकी क्या है ? By आलोक वर्मा

तकनीकी क्या है ?


( WHAT IS TECHNOLOGY )

तकनीकी या तकनीकी विज्ञान अंग्रेजी के Technology शब्द का पर्याय है । तकनीकी ' का अर्थ है - दैनिक जीवन में वैज्ञानिक ज्ञान का प्रयोग करने की विधियाँ । प्रो० गालब्रेथ ( Golbraith ) के अनुसार , तकनीकी ( Technology ) की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं
( 1 ) Systematic application of scientific or other organized knowledge to practical tasks .
( 2 ) Forming the division and sub - division of any such task into its component parts .
जैकोटा ब्लूमर ( Jacquetta Bloomer ) ने सन् 1973 में तकनीकी की परिभाषा निम्न प्रकार दी - " Technology is the application of scientific theory to practical ends " .
अतः यह कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक व्यवस्थाओं तथा प्रविधियों का प्रयोगात्मक रूप ही तकनीकी या तकनीकी विज्ञान है । ' तकनीकी ' शब्द को अधिकतर ' मशीन ' या ' मशीन सम्बन्धी प्रत्ययों से साधारणतः लोग जोड़ते हैं । लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि ' तकनीकी ' में मशीन या मशीनरी का प्रयोग किया ही जाय । इसका तात्पर्य तो किसी भी प्रयोगात्मक कार्य से है , जिसमें वैज्ञानिक ज्ञान या सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाय ।
यह ग्रीक शब्द ' Technikos ' से निकला है , जिसका अर्थ है - कला । इसका पर्याय लैटिन भाषा का शब्द ' Texere ' है , जिसका अभिप्राय बुनने तथा निर्माण करने ( Weave or construct ) से होता है । डॉ० दास के अनुसार , “ Any system of interrelated parts which are organized in a scientific manner as to attain some desired objective could be called technology . "
   
               By Alok Verma 

शिक्षा क्या है ? By आलोक वर्मा

शिक्षा क्या है ?


( WHAT IS EDUCATION ? )
शिक्षा की उत्पत्ति ' शिक्ष् ' धातु से हुई है । इसका अर्थ है - विद्या प्राप्त करना । दूसरे शब्दों में , ज्ञानार्जन या विद्या - प्राप्ति के माध्यम से संस्कारों एवं व्यवहारों का निर्माण करना ही शिक्षा कहलाता है । शिक्षा , लैटिन भाषा के शब्द " एडूकेटम ' ( Educatum ) का पर्याय है , जिसका अंग्रेजी में Education पर्याय शब्द है । इसका अर्थ है - " शिक्षण की कला ' | Universal Dictionary of English Language के अनुसार शिक्षा से तात्पर्य है - ( 1 ) शिक्षित करना , प्रशिक्षण देना , ( 2 ) मस्तिष्क तथा चरित्र का विकास करना , तथा ( 3 ) किसी विशेष राज्य की शिक्षा - व्यवस्था । ये सभी शब्द शिक्षा के विभिन्न अभिप्रायों तथा शैक्षणिक क्रिया - प्रक्रियाओं की ओर संकेत करते हैं । शिक्षा बालक को नये - नये अनुभव प्रदान कर उसे इस योग्य बनाती है कि वह अपने वातावरण में समायोजित होकर अपनी शक्तियों तथा निहित योग्यताओं का पूर्ण विकास कर , योग्यतानुसार अपने परिवार , समाज तथा राष्ट्र को किसी विशिष्ट क्षेत्र में योगदान कर सके ।
शिक्षा से तात्पर्य बालक के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाना है । शिक्षा से बालक की मूलप्रवृत्तियाँ परिमार्जित होती हैं । मूलप्रवृत्तियों के परिमार्जन में मनोविज्ञान , तकनीकी तथा विज्ञान अपना प्रभावपूर्ण योगदान शिक्षा के क्षेत्र में प्रदान करता है । अतः शिक्षा स्वय में एक आत्मनिर्भर ( Independent ) प्रत्यय नहीं है वरन यह तकनीकी विज्ञान से सम्बन्धित है । तकनीकी विज्ञान बालकों के व्यवहार के अध्ययन में शिक्षा की मदद करता है और साथ ही उनमें परिमार्जन तथा संशोधन के लिये दिशा - निर्देश प्रदान करता है ।
    
                     By आलोक वर्मा

शैक्षिक तकनीकी का अर्थ तथा स्वरूप by आलोक वर्मा

शैक्षिक तकनीकी का अर्थ तथा स्वरूप


( MEANING AND NATURE OF EDUCATIONAL TECHNOLOGY )

' एजूकेशनल टेक्नॉलॉजी ' ( Educational Technology ) शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - एक , एजूकेशन ' और दूसरा , " टेक्नॉलॉजी ' । सर्वप्रथम हम एजूकेशन या शिक्षा का अर्थ देखेंगे , फिर ' टेक्नॉलॉजी ' का , और इसके आधार पर इस विषय को परिभाषित करने का प्रयत्न करेंगे ।

                                      By आलोक वर्मा

भारत में शैक्षिक तकनीकी by आलोक वर्मा

भारत में शैक्षिक तकनीकी


( EDUCATIONAL TECHNOLOGY IN INDIA )

भारत में शिक्षा के विभिन्न अंगों को सबल और सक्षम बनाने का कार्य राष्ट्रीय शैक्षिक अनसंधान शिक्षण परिषद , नई दिल्ली का है । इस परिषद के अन्तर्गत एक विभाग ' शैक्षिक तकनीकी केन्द्र के नाम से कार्यरत है । यह विभाग शोध एवं प्रशिक्षण के साथ - साथ शैक्षिक तकनीकी पर विशिष्ट सामग्री भी विकसित करने में संलग्न है । इस केन्द्र की परामर्शदाता प्रो० स्नेह शुक्ला तथा प्राचार्य श्रीमती विजय मुले आदि रहे हैं । इन लोगों के प्रयासों के फलस्वरूप यह विभाग शैक्षिक तकनीकी चेतना का विकास पूर्ण जोर - शोर के साथ कर रहा है ।

सन् 1960 - 70 के दशकों में अनेक शोध - अध्ययन , सेमीनार सिम्पोजियम आदि ‘ अभिक्रमित अध्ययन के क्षेत्र में किये गये । अनेक विषयों में अभिक्रमित सामग्री विकसित की गयी । इस क्षेत्र में शाह , कलकर्णी . के० पी० पाण्डे , प्रेम प्रकाश , कपाडिया तथा कुलश्रेष्ठ ने काफी कार्य किया । शीक्षक लक्ष्या के क्षेत्र में डॉ० दवे तथा उनका RCEM System उल्लेखनीय है । शैक्षिक नियन्त्रण के क्षेत्र में CASE Baroda , II . T . खड़गपुर , ईविंग क्रिश्चियन कॉलेज , इलाहाबाद तथा NCERT , नई दिल्ली ने काफी कार्य किया ।

क्रियानसंधान के क्षेत्र में डॉ० शेरी , वर्मा , अहलूवालिया , कुलश्रेष्ठ तथा भार्गव आदि के नाम उल्लेखनीय हैं । Micro - Teaching के क्षेत्र में डॉ० एल० सी० सिंह , डॉ० दास , डॉ० पासी , डॉ० जंगीरा तथा डॉ० अजीत सिंह आदि ने काफी कार्य किया है । NCERT ने इस क्षेत्र में इन्दौर यूनीवर्सिटी के साथ कई National Research Projects पूर्ण किये हैं । मिनी टीचिंग तथा इण्टीग्रेशन ऑफ टीचिंग स्किल्स के क्षेत्र में डॉ० एस० पी० कुलश्रेष्ठ तथा डॉ० एन० के० जंगीरा का काफी कार्य है ।

आज शैक्षिक तकनीकी विज्ञान भारत में अनेक विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों के शिक्षक - प्रशिक्षण के पाठ्यक्रमों में समावेशित किया जा रहा है । हिमाचल , मेरठ , पंजाब , गढ़वाल , इन्दौर के विश्वविद्यालयों तथा रीजनल कॉलेज ऑफ एजूकेशन ने इस विषय को अपने पाठयक्रमों मे समावेशित करने में पहल की है ।

इस विषय की पुस्तकों के प्रणयन के सम्बन्ध में डॉ० रूहेला , डॉ० ए० आर० शर्मा , डॉ० ए० पी० शर्मा , डॉ० आर० ए० शर्मा , डॉ० एस० पी० कुलश्रेष्ठ , श्री सुरेश भटनागर , श्री गुलाटी तथा श्री एन० आर० स्वरूप सक्सेना का नाम स्वयं ही आ जाता है । इन लोगों ने ' शिक्षण तकनीकी ' पर लिखकर अध्यापकों तथा छात्राध्यापकों की जो सेवा की है , वह अविस्मरणीय है । बड़ौदा के डॉ० एम० एस० यादव तथा डॉ० गोविन्दा ने भी इस विषय पर पिटमैन की ' Aspects of Educational Technology ' के विभिन्न वॉल्यूम्स में आधिकारिक शोध - प्रपत्र प्रकाशित कराये हैं ।

                               By आलोक वर्मा 

शैक्षिक तकनीकी का संक्षिप्त इतिहास by Alok Verma

शैक्षिक तकनीकी का संक्षिप्त इतिहास


( A BRIEF HISTORY OF EDUCATIONAL TECHNOLOGY )

शैक्षिक तकनीकी का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप अनेक मशीनों का आविष्कार हुआ लेकिन शिक्षा की समस्त रूपरेखा सरल तथा सीमित ही रही । किन्तु बाद में धीरे - धीरे शिक्षा के क्षेत्र में भी परिवर्तन और प्रयोग होने लगे । शैक्षिक खिलौनों का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में किया जाने लगा । सर्वप्रथम सन् 1926 ई० में अमेरिका के ओहियो ( Ohio ) के एक विश्वविद्यालय में सिडनी प्रेसी ( Sidney Pressey ) नामक व्यक्ति ने शिक्षण - मशीन ( Teaching Machine ) का प्रयोग शिक्षण के क्षेत्र में किया । लम्सडेन ( Lumsdain ) , ग्लेजर ( Glaser ) आदि व्यक्तियों ने सन् 1930 - 40 के मध्य विशिष्ट प्रकार की पुस्तकों , कार्डों और बोर्डों ( Scrambled Books , Cards & Boards ) का प्रयोग किया । फिर भी सन् 1900 से 1950 तक यह विज्ञान शिक्षा को विशेष प्रभावित नहीं कर सका । सन् 1950 में बी० एफ० स्किनर ( B . E . Skinner ) ने ' प्रोग्राम्ड लर्निंग ' ( Programmed Learning ) पद्धति का विकास किया । इसी वर्ष ब्राइनमोर ( Brynmor ) ने ' शैक्षिक तकनीकी ' शब्द का प्रयोग प्रथम बार किया । स्टेनली एडवर्ड ( Stanley Edward ) तथा स्किनर के प्रयासों के फलस्वरूप ' प्रोग्राम्ड लर्निंग मैटीरियल ' के प्रयोगों में विभिन्न राष्ट्रों में रुचि ली जाने लगी । फलस्वरूप तकनीकी स्वयं ही शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ने लगी और एक समय ऐसा आया कि ' प्रोग्राम्ड लर्निंग ' तथा ' श्रव्य - दृश्य - सामग्री को ही शैक्षिक तकनीकी का पर्याय माना जाने लगा । क्रमशः शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी उपकरणों के माध्यम से व्यवहार तकनीकी , अनुदेशन - तकनीकी तथा शिक्षण - तकनीकी आदि के क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के शिक्षण - प्रतिमानों ( Teaching Models ) आदि का प्रतिपादन होने लगा । इस प्रकार धीरे - धीरे शैक्षिक तकनीकी , शिक्षण प्रक्रिया को अधिक ठोस , व्यावहारिक एवं प्रभावपूर्ण बनाने में स्वयं को अधिक सक्षम रूप में प्रस्तुत करने में समर्थ होती गयी ।

                      By आलोक वर्मा 

शैक्षिक तकनीकी का सम्प्रत्यय (विषय प्रवेश) by आलोक वर्मा

शैक्षिक तकनीकी का सम्प्रत्यय ( CONCEPT OF EDUCATIONAL TECHNOLOGY )


विषय - प्रवेश

आज के युग में मानव जीवन का प्रत्येक पक्ष वैज्ञानिक खोजों तथा आविष्कारों से प्रभावित है । शिक्षा का क्षेत्र भी इसके प्रभाव से मुक्त नहीं रह सका है । रेडियो , टेपरिकॉर्डर , टेलीविजन , रेडियो - विजन , लिंग्वाफोन , कम्प्यूटर आदि का बढ़ता हुआ उपयोग शिक्षा को तकनीकी ( Technology ) के निकट लाता जा रहा है । शिक्षाशास्त्र का कोई भी अंग , चाहे वह विधियों - प्रविधियों का हो , चाहे उद्देश्यों का हो , चाहे शिक्षण - प्रक्रिया का हो , चाहे शोध का हो , बिना तकनीकी के अपंग , अवश और लुंज महसूस होता है । छात्राध्यापकों की चाहे सैद्धान्तिक ज्ञान से सम्बन्धित समस्या हो , चाहे उनके प्रयोगात्मक शिक्षण ( Practice Teaching ) के क्षेत्र की अड़चन हो , तकनीकी हमें सहायता देती है । सत्य तो यह है कि तकनीकी विज्ञान इतना समृद्ध और शक्तिशाली होता जा रहा है कि बिना इसका अध्ययन किये छात्राध्यापकों का शिक्षण सम्बन्धी ज्ञान या उनके परीक्षण तथा प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान और कौशल अधूरे समझे जाते हैं । शैक्षिक तकनीकी ( Educational Technology ) ने शिक्षा के क्षेत्र में पुरानी अवधारणाओं में आधुनिक सन्दर्भ के साथ अभूतपूर्व क्रान्तिकारी परिवर्तन कर उन्हें एक नवीन स्वरूप प्रदान किया है ।

सर्वप्रथम ' एजूकेशनल टेक्नॉलॉजी ' शब्द का प्रयोग इंग्लैण्ड में Brynmor Jones ने सन् 1967 में किया था । इसके पश्चात् इंग्लैण्ड की N . C . E . T . ( National Council of Educational Technolgy ) संस्था द्वारा आयोजित एक कॉफ्रेंस में इसकी व्याख्या की गयी । N . C . E . T . तथा अन्य ऐसी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं ने इतना और इस स्तर तक का कार्य प्रस्तुत किया कि 1967 में जन्मा यह विषय आज शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा - दर्शन , शिक्षा - मनोविज्ञान या शिक्षा - समाजशास्त्र के समकक्ष पहुँच चुका है । भारत के अनेक विश्वविद्यालयों ( हिमाचल , मेरठ , इन्दौर , गढ़वाल , आगरा , राजस्थान आदि ) ने इसे अपने बी० एड० तथा एम० एड० के पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय के रूप में रखा है । इस विषय की महत्ता तथा उपयोगिता को देखते हुए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद् ( N . C . E . R . T . ) , नई दिल्ली ने शैक्षिक तकनीकी केन्द्र ( Centre for Educational Technology ) प्रारम्भ कर दिया है , जहाँ पर शोध , प्रशिक्षण तथा निर्देशन की व्यवस्था की गई है ।

                            By आलोक वर्मा

NCF 2005 से सम्बंधित प्रश्न और उत्तर ( पूछे गए UPTET में ) by आलोक वर्मा

NCF 2005  से सम्बंधित प्रश्न और उत्तर ( पूछे गए UPTET में )

  1. " अधिक गणित जानने की अपेक्षा यह जानना अधिक उपयोगी है कि गणितीयकरण कैसे जाए? "यह कथन ........ के द्वारा दिया जाता है ।

उत्तर  डेविड हीलर ने यह कथन दिया कि आप का अपेक्षा यह जानना अधिक उपयोगी है कि गणितीयकरण कैसे किया जाए ।

  1. " एनसीएफ , 2005 के अनुसार विद्यालयों में गणित शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य यह है

Ans : ( d ) NCF 2005 के अनुसार बच्चों की चिन्तन प्रक्रिया का गणितीयकरण करना , गणित शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है । NCF | 2015 अर्थात् National curriculum framework एन . सी . ई . आर . टी . द्वारा प्रकाशित चार राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखाओं 1975 , 1988 , 2000 व 2005 में से एक है

  1. एन सी एफ , 2005 के अनुसार गणित की पाठाचा महत्वाकांक्षी , सुसंगत है और यह महत्वपूर्ण गणित ' पढ़ाती है । यहाँ महत्वकांक्षी का अर्थ है -

Ans : ( B ) NCF 2005 के अनुसार महत्वकांक्षी का अर्थ विद्यालय में गणित शिक्षण के उच्च उद्देश्यों को खोजना है ।

  1. अनिल सभी प्रश्नों के मौखिक उत्तर तो दे देता है परन्तु ,जब समस्याओं का हल लिखता है तो गलतियाँ करता है । उसके लेखन में गलतियों को हटाने हेतु निम्नलिखित में से कौन - सी उपचारात्मक विधि सर्वश्रेष्ठ है ?

Ans : ( c ) अनित प्रश्नों का मौखिक उत्तर देता है . परन्तु लिखित समस्या आ रही है इसका अर्थ है कि उसके आलेख को कुछ खाली स्थान करके उसे दिया जाये ताकि उसकी आंशिक समस्या का हल किया जाए ।

  1. . एक शिक्षिका शिक्षार्थियों से पत्तियों को एकत्र करने और सममिति पैटर्न की पहचान करने के लिए कहती है । यह कार्य शिक्षिका के . . . . . . . प्रयास को दर्शाता है ।

उत्तर :-  एक शिक्षिका शिक्षार्थियों से पत्तियों को एकत्र करने और सममिति पैटर्न की पहचान करने के लिए कहती हैं । इस प्रकार शिक्षिका शिक्षार्थियों के वास्तविक जीवन को गणितीय अवधारणाओं से जोड़ने का प्रयास कर रही है ।

  1. . हमारी विद्यालयी पाठ्यचर्या में गणित शिक्षण के स्थान को सुनिश्चित करने के लिए युगल आधार - वाक्य है

Ans :  गणित शिक्षण के स्थान को सुनिश्चित करने के लिए युगल आधार वाक्य " किस प्रकार प्रत्यक शिक्षार्थी के मस्तिष्क - व्यस्त रखा जाए और किस प्रकार शिक्षार्थियों के संसाधनों को समय बनाया जाय ” हमारी विद्यालयी पाठ्यचर्या में शामिल है ।

  1. . एक शिक्षक शिक्षिका ने शिक्षार्थियों को पाँच देकर उन्हें जोड़कर बनने वाली सभी सम्मान पंचवर्गाकार आकृतियों की संख्या ज्ञात करने को कहा इसके उपरान्त छह वर्ग देकर उन्हें जोड़कर बनने वाली । सम्भव छह वर्गाकृतियों की संख्या ज्ञात करने को कहा । इसी तरह आगे बढ़ने को कहा । इस प्रकार की गतिविधियाँ शिक्षार्थी की सहायता करती हैं ।

Ans : इस प्रकार कि गतिविधि संख्या पैटर्न और आकृतियों के बीच सम्बन्धों की पहचान करने में सहायता करती है ।

  1. . एन सी एफ , 2005 के लक्ष्य कथन के अनुसार विद्यालयी गणित उस स्थिति में नहीं होता , जहाँ बच्चे सूत्रों व एल्गोरिदम को कण्ठस्थ करे।

Ans : ( d ) NCF 2005 के अनुसार “ विद्यालयी गणित उस स्थिति में नहीं होता जहाँ बच्चे सूत्रों व एल्गोरिदम को कण्ठस्थ करें ।

  1. "  . ' जियोजेब्रा ' सॉफ्टवेयर की सहायता से शिक्षार्थी . . . . के द्वारा ज्यामिति की सभी अवधारणाओं को सीख सकते हैं ।

Ans : ( a ) जिआजेब्रा ज्यामिति , बीजगणित तथा कैलकुलस सिखान का सॉफ्टवेयर है । यह एक इंटरैक्टिव प्रोग्राम है जो विद्यार्थिया । खोज परक उपागम का निर्माण करते हैं ।

  1. . विद्यालय स्तर पर गणित में शिक्षार्थियों की असफलता पार का एक मुख्य कारण यह है कि हमारी आकलन प्रक्रिया ।

Ans : विद्यालय स्तर पर गणित में शिक्षार्थियों की असफलता का एक मुख्य कारण यह है कि हमारी आकलन प्रक्रिया योग्यता के गणितीयकरण की अपेक्षा प्रक्रमण सम्बन्धी ज्ञान के परीक्षण पर बल देती है ।

   

                      By आलोक वर्मा 

NCF 2005 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005  (NCF) से संबंधित सभी महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर by आलोक वर्मा

NCF 2005 Important Questions in Hindi 

National curriculum framework 2005 (NCF 2005 Important Questions in Hindi )  के सभी महत्वपूर्ण  प्रश्न उत्तर का अध्यन करेंगे   राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005  (NCF) से संबंधित सभी महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर को भी  शामिल किया है, जो कि  पिछली परीक्षाओं में पूछे गए थे ,मुझे लगता है कि आप लोगो के लिए बहुत ही उपयोगी रहेगा ।

 "पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 महत्वपूर्ण  प्रश्न उत्तर"

प्रश्न1  NCF 2005 में गुणवत्ता आयाम शीर्षक के अंतर्गत महत्व दिया गया है?
उत्तर- बालकों के लिए संरचित अनुभव एवं पाठ्यक्रम सुधार को
प्रश्न2  NCF 2005 का प्रारंभ रविंद्र नाथ टैगोर के किस निबंध से होती है?
उत्तर-   सभ्यता और प्रगति
प्रश्न3 NCF 2005  मैं बल दिया गया है?
उत्तर-  शांति के लिए शिक्षा
प्रश्न4  सामाजिक अध्ययन शिक्षण का राष्ट्रीय पाठ्यक्रम कब बनाया गया?
उत्तर-  2005 में
प्रश्न4  यशपाल शर्मा समिति में कुल कितने सदस्य थे?
उत्तर- 38
प्रश्न5  पाठ्यक्रम निर्माण की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर-  शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु
प्रश्न6 NCF 2005  का भाषा फॉर्मूला है?
उत्तर-  त्रिभाषायी  फार्मूला
प्रश्न7  प्रथम भाषा,द्वितीय भाषा एवं तृतीय भाषा है?
उत्तर-  क्रमशः प्रथम- हिंदी( राष्ट्रीय भाषा/ राज्य की भाषा),  द्वितीय- अंग्रेजी( अंतरराष्ट्रीय भाषा), तृतीय- स्थानीय भाषा( पंजाबी, संस्कृत, तमिल)
प्रश्न8  विद्यालय शिक्षा का अब तक का नवीनतम राष्ट्रीय दस्तावेज है?
उत्तर- NCF 2005
प्रश्न9  इस मंत्रालय की पहल परNCF 2005  तैयार किया गया था?
उत्तर-  मानव संसाधन विकास मंत्रालय
प्रश्न10 किसकी अध्यक्षता में विद्वानों ने NCF 2005 तैयार किया?
उत्तर-  प्रोफेसर यशपाल
प्रश्न11 NCF 2005 का प्रमुख सूत्र है?
उत्तर-  (Learning Without Burdon)बिना भार के अधिगम
प्रश्न12 NCF 2005 मी सुझाव दिया गया है कि सूचना को क्या माननीय से बचा जाए?
उत्तर-  ज्ञान
प्रश्न13 NCF 2005  के अनुसार बच्चों की गलतियां क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर-  यह समाधान को पहचानने में सहायता करती है
प्रश्न14 ” शिक्षा बिना बोझ के” जोNCF 2005  का प्रमुख स्रोत है इसका अर्थ होता है?
उत्तर-  पाठ्यचर्या के बोझ को कम करना
प्रश्न15 NCF 2005  सिफारिश करता है कि प्राथमिक स्तर पर गणित की शिक्षा का केंद्र होना चाहिए?
उत्तर-  कक्षा में पढ़ाई गए टॉपिक्स को विद्यार्थियों के दैनिक जीवन से जोड़ना
प्रश्न16 NCF 2005  में गणित शिक्षण के बारे में बताया गया है कि” गणित शिक्षण महत्वाकांक्षी ,सुगमता और महत्वपूर्ण होना चाहिए” यहां महत्वाकांक्षी का मतलब क्या है?
उत्तर-  गणित के उच्च उद्देश्य( लक्ष्य) की प्राप्ति
प्रश्न17 NCF 2005 मे ” गणित की लंबी आकृति” का मतलब है?
उत्तर-  एकता संकल्पना पर दूसरी संकल्पना बनाना
प्रश्न18  NCF 2005 में कला शिक्षा को विद्यालय में जोड़ने का उद्देश्य है?
उत्तर- सांस्कृतिक विरासत की प्रशंसा करना एवं छात्रों के व्यक्तित्व और मानसिक स्वास्थ्य को विकसित करना
प्रश्न19  NCF 2005 के अनुसार सीखना है?
उत्तर- मानसिक विकास, शिल्प कला केंद्र एवं व्यावसायिक ज्ञान
प्रश्न20  NCF 2005 मैं किस परीक्षा के संबंध में सुधार के लिए सुझाव दिए गए थे?
उत्तर- कक्षा दसवीं की परीक्षा   ऐच्छिक हो
प्रश्न21  NCF 2005 बल देती है?
उत्तर- करके सीखने पर
प्रश्न22  NCF 2005 मैं सामाजिक अध्ययन मे कौन से  मुद्दों को शामिल करने की अनुशंसा की गई थी?
उत्तर- सभी स्तर के विद्यार्थियों के लैंगिक एवं स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे
प्रश्न23 NCF 2005 की कार्यशाला कहां पर आयोजित की गई?
उत्तर-  NCERT नई दिल्ली
प्रश्न24  NCF 2005 का मुख्य सूत्र “शिक्षा बिना बोझ के” कब आए हुआ विचार था?
उत्तर- 1993  ई. में
प्रश्न25  NCF 2005 के अंतर्गत परीक्षा सुधारों में कि सुधार को सुझाया गया है?
उत्तर- सामूहिक कार्य मूल्यांकन, सतत मूल्यांकन, खुली पुस्तक की परीक्षा मूल्यांकन
प्रश्न26 NCF 2005  में बताया गया है?
उत्तर-   सपनों के भारत को धरातल पर उतारने की युक्ति
प्रश्न27 NCF 2005  के अध्याय “विद्यालय एवं कक्षा का वातावरण” में बताया गया है?
उत्तर-  वातावरण के भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक आयाम अधिगम को कैसे प्रभावित करते हैं
प्रश्न28 करिकुलम किस भाषा का शब्द है?
उत्तर-  लेटिन भाषा का
प्रश्न29 NCF 2005  में किन शिक्षण सूत्रों के अधिकतम प्रयोग का सुझाव दिया है?
उत्तर- ज्ञात से अज्ञात की ओर एवं मूर्त से अमूर्त की ओर
प्रश्न30 NCF 2005  के अनुसार मार्गदर्शक सिद्धांत में निहितार्थ है?
उत्तर- ज्ञान को स्कूल के बाहर के जीवन से जोड़ना

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दोस्तो इस पोस्ट मे हमने  राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005 Important Questions in Hindi ) पर आधारित प्रश्न उत्तर आप के सामने लाया हूँ  जो कि सभी शिक्षक भर्ती परीक्षाओ मे पूछे जा सकते है  मुझे लगता है, यह पोस्ट आपके लिए उपयोगी साबित होगी! ऐसे ही कॉम्पिटेटिव एग्जाम्स की तैयारी के लिए हमारी वेबसाइट को लॉगिन करते रहे।

                  
                      By आलोक वर्मा