श्री लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री
डॉ. मुरली मनोहर जोशी का जन्म और उनके जीवन का अनमोल समय
डॉ. मुरली मनोहर जोशी का जन्म जनवरी 05
वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी ग्राम गल्ली अल्मोड़ा के मूल निवासी है और वर्तमान में इलाहबाद में स्थाई प्रवास है । प्रखर राष्ट्रवादी चिन्तक, विचारक और राजनेता। शिक्षाविद् और लेखक । हिन्दू दर्शन के व्याख्याकार। भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक महासचिव और पूर्व अध्यक्ष । भू.पू. गृह एवं मानव संसाधन विकास मंत्री ।
प्रारम्भिक जीवन
मुरली मनोहर जोशी जी का जन्म 5 जनवरी 1934 को दिल्ली में हुआ था और उनके पिता का नाम मन मोहन जोशी था। उनकी पत्नी का नाम तरला जोशी है जिनसे उन्हें दो बेटियां हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा उत्तराखंड से की। स्नातक की पढ़ाई के लिये मेरठ कालेज गये और वहां से स्नातक की डिग्री हासिल करी। आगे की पढ़ाई के लिये जोशी जी ने इलाहाबाद चले गए और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परस्नातक में एम. एस. सी (भौतिक) की डिग्री हासिल की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही आगे अपनी अध्ययन को बढ़ाते हुये डॉक्टरेट की उपाधि हासिल किये। उनका शोध का विषय स्पेक्ट्रोस्कोपी था और उन्होंने हिन्दी भाषा में अपना शोध पत्र प्रस्तुत किये और वो हिंदी भाषा में प्रस्तुत करने वाले प्रथम शोध छात्र थे। 1958 में इलाहाबाद वि.वि. से डी. फिल. की उपाधि ग्रहण की। इलाहाबाद वि. वि. में लेक्चरर बनकर अध्यापन के क्षेत्र में उतरे। 1994 में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष (भौतिक विज्ञान) पद से सेवा निवृत हुए। 1944 से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में परिचित हैं।
1949 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे। 1957 में भारतीय जनसंघ की सदस्यता ग्रहण की। आर. एस. एस. से प्रतिबन्ध हटाने के लिए सत्याग्रह करने पर 1948 में बंधी बनाए गए। ज्ञातव्य है, 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो जाने के बाद सरकार ने आर. एस. एस. पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । इन्दिरा गांधी के प्रधान मंत्रित्व काल में आपातकाल में 26 जून, 1975 से 1977 तक 'मीसा' के अन्तर्गत बन्दी रहे। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय से पहले प्रदेश सचिव और उपाध्यक्ष रहे।
राजनीतिक जीवन
युवा अवस्था से ही मुरली मनोहर जोशी जी को राजनीति की तरफ झुकाव रहा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही अपने प्राध्यापक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया जी के मार्गदर्शन में आने के कारण कुछ समय में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े गए और गौ रक्षा सम्बन्धी आंदोलनों में भागेदारी की। 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तो
मुरली मनोहर जोशी जी को पूरा आगे आकर सहयोग किया और फिर उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया।
मेरी जन्मभूमि 1996 में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार 13 दिनों के लिए बनी थी तब मुरली मनोहर जोशीजी देश गृहमंत्री की जिम्मेदारी संभाली थे और 13 दिनों के लिए वह गृहमंत्री रहे। जब भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की स्थापना की तो जोशी जी ने मंत्रिमंडल में मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में काम किया। इन्होंने कानपुर बनारस और इलाहाबाद जैसे शहरों में अपने एक अच्छे व्यक्तित्व के बदले चुनाव में जीत दर्ज की है। 2004 के लोकसभा चुनाव में वे जीत हासिल न कर सके। 2014 के लोकसभा के चुनाव में मुरली मनोहर जोशी जी ने बनारस से चुनाव लड़ा और जीत हासिल करी, बाद में उनको इस सीट को नरेंद्र मोदी जी के लिए खाली करना पड़ा और कानपुर से फिर चुनाव लड़े और 2.23 लाख की भारी अंतर से जीत हासिल करी । हिन्दुत्व के प्रबल समर्थक होने के कारण इनहें कुछ लोग कट्टरपंथी तक कहते हैं। विदेशी घुसपैठियों और आई. एस. आई के विरुद्ध डा. जोशी ने कई बार मोर्चा सम्भाला। भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष रहते इन्होंने सन 1992 में
कन्याकुमारी से कश्मीर तक 'एकता यात्रा' की और आतंकवाद के गहरे साए में 15 अगस्त को श्रीनगर (कश्मीर) के लाल चौक में राष्ट्रीय झण्डा फहराया। इनके साहस, संकल्प, दृढ़ इच्छा शक्ति और हिन्दू राष्ट्र की उत्कट मनेच्छा का यह अनोखा उदाहरण था। 6 दिसम्बर 1992 को उफनते राष्ट्रवाद ने अयोध्या स्थित ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। अन्यों के साथ जोशी जी पर भी उक्त मस्जिद को ध्वस्त करने का आरोप मढ़ दिया गया। फलस्वरूप गिरफ्तार कर लिए गए।
सम्मान
2017 में मुरली मनोहर जोशी जी को पद्म विभूषण के पुरस्कार से समानित किया गया।
राष्ट्रीय गणित दिवस का रामानुजन का संबंध
महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जीवन से गणित दिवस बनाने तक का अध्ययन
विषय प्रवेश
प्रारंभिक शिक्षा व जीवन
सारांश
मीराबाई का जीवन परिचय Meera bai ka jivan parichay
मीराबाई का जीवन परिचय - नमस्कार , दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं कृष्ण भक्ति में मधुरता भरी काव्य रचयिता व नजर मीराबाई के बारे में। जी हां, हम बिल्कुल मीराबाई की बात करने वाले हैं जिन्होंने कृष्ण भक्ति में लीन होकर जहर का प्याला तक पी लिया लेकिन कभी कृष्ण की भक्ति नहीं छोड़ी। अपने बचपन से अंत समय तक वे कृष्ण की पूजा की और अंत में उन्ही में समा गए।
मीराबाई की विरह वेदना
जब अबोधों से उनका मन भर गया और सहनशीलता समाप्त हो गई तब उन्होंने अपने सर्वस्व गिरधर को सौंप दिया और भगवत भजन में सभी लोग लज्जा छोड़कर भक्ति में नाचने लगे और अंत में द्वारका में गिरधर की मूर्ति में समा गए। तो अजीम कृष्ण भक्त मीराबाई के बारे में विस्तार से जानने का प्रयास करते हैं।(मीराबाई का जीवन परिचय)
जीवन परिचय (सामान्य)
मीरा बाई का सामान्य जीवन परिचय
नाम – मीराबाई
बचपन का नाम – पेमल
जन्म – 1498 ई. (विक्रम संवत् 1555)
जन्म स्थान – मेड़ता (राजस्थान)
पिता – रतन सिंह
पति – भोजराज
मृत्यु – 1546 ई. (विक्रम संवत् 1603) के आसपास
प्रारंभिक जीवन परिचय
मीराबाई का जन्म 1498 ई. पंचांग के अनुसार विक्रम संवत 1555 को राजस्थान में मेड़ता के पास कुकड़ी गांव में हुआ। इनके पिता रतन सिंह जी और दादा राव दुदा जी थे व राठौड़ राजा राव जोधा जीम परदादा थे। इनका बचपन का नाम पेमल था यह बचपन से गिरधर की भक्ति करता ही भजन गाया जाता है तथा अपने साथ गिरधर की मूर्ति सदा शत्रु थी।
गिरधर की मूर्ति को ग्रहण करना, स्नान करना, ग्रहण करना, ग्रहण करना आदि की व्यवस्था मीरा स्वयं करती है। यह मूर्ति उन्हें किसी साधु से प्राप्त हुई थी। (मीराबाई का जीवन परिचय)
ये अपनी कृष्ण भक्ति में लीन रहता है और खुश रहता है लेकिन उनकी बाल्यावस्था में ही उनकी माता का वंश हो गया। कम उम्र में मां का साया छिप गया और पिता अपने काम में व्यस्त रहने से उनके पास ज्यादा देर तक टिके नहीं रहे। छोटी उम्र में इतनी तकलीफ को जीतना पड़ा तो उनके दादा राव दुदा जी ने उन्हें अपने पास मेड़ता जीने के लिए बूला दिया।
मेड़ता में उन्हें अपने दादा के स्नेह के साथ धर्म-कर्म में भी बहुत ज्ञान प्राप्त हुआ। और इसी धार्मिकता ने मीराबाई को गिरधर के ज्यादा करीब ला दिया। (मीराबाई का बचपन) कुछ देर बाद जब राव दूदा की मृत्यु हो गई तब दुदा के बड़े बेटे राव वीरमदेव ने उन्हें अपने साथ रख लियान-पालन किया।(मीराबाई का जीवन परिचय)
मीराबाई का विवाह
उन्होंने एक बार अपनी माता से बातों-बातों में यह जाना कि उनका दूल्हा गिरधर ही है, माता ने तो परिहास में कहा कि जीमेल इसी को सत्य मान लिया और गिरधर की ओर चढ़ ले गए।
वे अपने सर्वस्व किसी को बैठी और गिरधर को अपना भ्रम समझकर प्यार करने लगे। वे तो अपना सर्वस्व गिरधर को किसी से तय किया हुआ संबंध रखते हैं लेकिन अटूट सूचनाओं के अनुसार उनके पिता ने अपना विवाह विवरण दिया है।
मेड़ता के प्रसिद्ध महाराणा सांगा के बड़े बेटे कुंवर भोजराज के संग विक्रम संवत 1573 को उनका विवाह हुआ। (मीराबाई का विवाह) विवाह के बाद वे मेड़ता में अपना सुखी जीवन जीने लगे लेकिन यह खुशियां ज्यादा वक्त तक नहीं टिक पाई कुछ समय बाद ही उनके पति भोजराज का शरीर हो गया और वे विधवा हो गईं।(मीराबाई का जीवन परिचय)
अपने पति की मृत्यु के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाला और गिरधर की पूजा कर अपना समय लिया। कुछ समय बाद ही उन पर दुखों का पहाड़ टूट गया और उनके श्वसुर और पिता की भी मृत्यु हो गई, इस दुख ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया।(मीराबाई का जीवन परिचय)
अब वे अधिक समय तक कृष्ण भक्ति और भजन में रहने लगे , वे भगवत भजन और सत्संग में सभी लोक लज्जा को त्याग कर गिरधर प्रेमवश में भजन गाने और नाचने लगे। (मीरा की कृष्ण भक्ति)(मीराबाई का जीवन परिचय)
मीरा पर हुए अत्याचार
मीरा गिरधर की भक्ति में लीन भजन गीत शुरू हुए और प्रेम में वशीभूतु सभी लोग लज्जा त्याग नाचने लगे। उनके मंदिरों में यू नाचना मेवाड़ के घटनाक्रम की मर्यादा के खिलाफ जान पडने लगते हैं।(मीराबाई का जीवन परिचय)
इस बात से परेशान होकर महाराणा सांगा के दूसरे बेटे रतन सिंह और छोटे भाई विक्रमजीत सिंह ने मीरा पर कई तरह की अत्याचार करना शुरू कर दिया, (मीरा पर हुई अत्याचार) खुली अत्याचार नहीं ही उन्होंने उन्हें खत्म कर दिया और मौत के घाट तक उतरते के भी कई प्रयास किए।(मीराबाई का जीवन परिचय)
उन्होंने उन्हें सांपों से डसवाने का प्रयास भी किया लेकिन गिरधर के आशीर्वाद और चमत्कार से सांप शालिग्राम बन गए। (मीरा ने विष का प्याला पी लिया) जब राणा ने उन्हें एक बार विष का प्याला पीने को दिया तब उन्होंने गिरधर का भजन करते हुए वह प्याला पी लिया और यह विष का प्याला गिरधर की कृपा से अमृत में परिवर्तित हो गया।(मीराबाई का जीवन परिचय)
मीराबाई का अंतिम समय
नाना प्रकार के अत्याचारों से परेशान वे मेड़ता आ गई। मेड़ता में मीरा के अंकल वीरमदेवजी राज करते थे तो वे प्रस्थान कर तीर्थ को निकल मांगे। तीर्थ यात्रा में वे गिरधर के कई मंदिरों से होते हुए वृंदावन वहां से द्वारिका पहुंचते हैं। (मीराबाई की मृत्यु) द्वारिका में रणछोड़ भगवान की भक्ति में रहने लगी और अपना समय वही रहने लगी।(मीराबाई का जीवन परिचय)
मीराबाई की भक्ति भावना का अध्ययन
सन् 1546 (विक्रम संवत 1603) में द्वारिका में रणछोड़ की मूर्ति में समा गई और दुनिया से नाता टूट गई। दुनिया से तो उन्होंने आपको शुरू से ही अलग रखने के लिए अपना सर्वस्व गिरधर को सौंप दिया लेकिन उन्होंने अपने प्राण 1546 के आसपास त्याग दिए और अपने शरीर को त्याग छोड़ में समा गए।(मीराबाई का जीवन परिचय)
भाव तथा कला पक्ष
भाव पक्ष-: कृष्ण की भक्ति प्रद शाखा की सर्वगुण कवित्री मीराबाई है, उनकी सभी काव्य रचनाएँ, कविताएँ, भजन एकमात्र गिरधर नागर से ही संबंधित है।
भापक्ष के मुख्य पद
प्रार्थना व विनय से संबंधित पद
प्रेम से संबंधित पद
गिरधर के सौंदर्य विवरण से संबंधित पद
जीवन से संबंधित पद
रहस्यवादी भावना के पद
कला पक्ष-: कृष्ण की भक्त मीराबाई भक्ति काल की प्रसिद्ध कवित्री है।
भाषा शैली-: वे राजस्थानी, पंजाबी, भोजपुरी और गुजराती शब्दों को मिलाकर ब्रज भाषा में मधुर गीत गाने वाली है। (कृष्ण भक्त मीरा का जीवन परिचय)
रस : अलंकार : छंद -: इनके छंद गाय पद में अनेक राग रंगनियों से परिपूर्ण है।
रस की बात करें तो वक्र रस का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है और साथ ही शांत रस का भी प्रयोग किया गया है। अलंकार में विशेष रूप से रूप, उपमा, व दुष्ट आदि का प्रयोग भी किया जाता है। (मीरा के छंद)
काव्या की बोलियां
इन पदों की भाषा कहीं शुद्ध ब्रज है तो कहीं राजस्थानी व गुजराती है, कभी-कभी पंजाबी का प्रयोग कर काव्य की रचना की गई है। मुख्य रूप से ब्रजभाषा के पुट में 4 बोलियां दिखाई देती हैं जो कि इस प्रकार है -:
1. गुजराती
2. पांज
3. राजस्थानी
4. ब्रजभाषा। (मीराबाई की काव्य रचनाए)
मीरा बाई की रचनाएँ, साहित्य व पदावली
श्री कृष्ण के विभिन्न पदों की रचना उन्हीं द्वारा की गई है, वे कई पदों से प्रेम करते हैं। उनमें से प्रमुख-:
नरसी जी का मायरा,
• गीत गोविंद कि टीका,
• राग सीरथ के पद,
• रामगोविंद आदि है।
मीराबाई की भक्ति भावना का अध्ययन
हिंदी काव्य साहित्य में मीरा का प्रमुख स्थान है, प्रेम का दर्द उनका काव्य में स्पष्ट दृश्य है। (मीरा की रचनाएं) उनकी तरह प्रेम दर्द को किसी ने महसूस नहीं किया और कोई ऐसी रचनाएं वापस नहीं पाई हैं।(मीराबाई का जीवन परिचय)
इनके गीतों को "मीराबाई की पदावली" ग्रंथ में संकेतित किया गया है, इसकी प्रमुख मात्रा निम्न है -:
• रुकमणी मंगल,
नरसी जी का मायरा,
• कार्यकर्ता पद,
• मीरा की गरबी,
मलार राग,
•नरसिंह मेडता की हुंडी,
चरित सत्यभामा जी नुं रूसन (मीरा के पद)
मीराबाई के बारे में अलग-अलग तथ्य
• खराब राज्य के इतिहास में पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि "भोजराज का विवाह मीराबाई के संग विक्रम संवत् 1573 में हुआ"।
• “मीरा का विवाह राणा के अनुज से” नागरीदास द्वारा बताया गया है।
• “एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान” कर्नल में टॉड ने “राणा कुंभा से मीरा का विवाह” बताया है।
• विलियम क्रूक ने सबसे पहले बताया कि "असली में मीरा ने राणा कुंभा से विवाह नहीं किया बल्कि सांगा के पुत्र भोजराज से मीराबाई का विवाह हुआ था"। (मीराबाई के पति)
• “इनका जन्म विक्रम संवत 1503 मैं चौकड़ी गांव में हुआ व निर्माता के कुमार भोजराज से उनका विवाह हुआ” यह बात अपने इतिहास में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने लिखी है।
• “इनका जन्म 1498 ई. (विक्रम संवत 1555) में हुआ” यह डॉक्टर गणपति चंद्रगुप्त ने बताया है।
• प्रियादास ने भक्तमाल की टीका “भक्ति रस बोधिनी” में विक्रम संवत 1769 में लिखा है कि “मीराबाई की जन्मभूमि मेड़ता है”।
मीरा बाई से संबंधित प्रमुख तथ्य
• इनका जन्म 1498 ई. (विक्रम संवत 1555) को हुआ व मृत्यु 1546 ईस्वी (विक्रम संवत 1603) के आस-पास जाना जाता है।(मीराबाई का जीवन परिचय)
•इनके बचपन का नाम पेमल है इनकी कर्मभूमि वृंदावन है।
• ये भक्ति काल की कवित्री है जो कि मुख्य रूप से कृष्ण भक्ति के गीतों को गाती है। (मीराबाई का जीवन परिचय 10 लाइन में)
इन शिक्षकों व गुरु संत रविदास है तथा यह मान्यता है कि जीव गोस्वामी से उनकी दीक्षा ली गई थी।
• इन्हें डॉ नगेंद्र ने "संप्रदाय निरपेक्ष भक्त कवित्री" कहा है।
• ये कृष्ण के रूप की दीवानी है और उनकी भक्ति माधुरी भाव की है।
• ये अपना गुरु रैदास को मान लेते हैं।
• मीरा कृष्ण को अपना सर्वस्व मान लिया गया है तथा उन्हें अपना पति भी मान लिया गया है। (मीरा की बॉयोग्राफी इन हिंदी)
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मिल्खा सिंह (स्वर्ण पदक) का जीवन परिचय
मिल्खा सिंह (स्वर्ण पदक) का जीवन परिचय
भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले मिल्खा सिंह
मिल्खा सिंह आज तक
भारत के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित धावक हैं. कामनवेल्थ खेलो में भारत को स्वर्ण
पदक दिलाने वाले वे पहले भारतीय है. खेलो में उनके अतुल्य योगदान के लिये भारत
सरकार ने उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्म
श्री से भी सम्मानित किया है. पंडित जवाहरलाल नेहरू भी मिल्खा सिंह के
खेल को देख कर उनकी तारीफ करते थे. और उन्हें मिल्खा सिंह पर गर्व था.
मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब में एक सिख राठौर
परिवार में 20 नवम्बर 1929 को हुआ था। अपने माँ-बाप की कुल 15 संतानों
में वह एक थे। उनके कई भाई-बहन बाल्यकाल
में ही गुजर गए थे। भारत के विभाजन के बाद हुए दंगों में मिलखा सिंह ने अपने
माँ-बाप और भाई-बहन खो दिया। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन द्वारा पाकिस्तान से
दिल्ली आए। दिल्ली में वह अपनी शादी-शुदा बहन के घर पर कुछ दिन रहे। कुछ समय
शरणार्थी शिविरों में रहने के बाद वह दिल्ली के शाहदरा इलाके में एक पुनर्स्थापित
बस्ती में भी रहे ।
पाकिस्तान के फील्ड मार्शल ने दिया था ‘फ्लाइंग सिख’ की उपाधि
मिल्खा सिंह 14
भाई-बहन थे और वे वर्तमान पाकिस्तान में पैदा हुए थे. बंटवारे के समय उनके
माता-पिता और आठ भाई-बहन मारे गए. मिल्खा सिंह किसी तरह भारत पहुंचे थे और एक
साक्षात्कार में दिए गए बयान के बाद भारत आने के बाद वे किसी भी सूरत में
पाकिस्तान की धरती पर कदम नहीं रखना चाहते थे. वर्ष 1960 में उन्हें पाकिस्तान की
इंटरनेशन एथलीट प्रतियोगिता में भाग लेने का निमंत्रण मिला था लेकिन वह बंटवारे के
गम में इसमें हिस्सा नहीं लेना चाहते थे. हालांकि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री
पंडित जवाहरलाल नेहरू के समझाने पर वह पाकिस्तान गए और पाकिस्तान के सबसे तेज धावक
अब्दुल खालिक उनकी रफ्तार के सामने टिक नहीं पाए. इस जीत के बाद पाकिस्तान के
तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान ने उनकी रफ्तार से अभिभूत होकर उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ की उपाधि दी.
मिलखा सिंह का जन्म
२० नवंबर १९२९ को गोविन्दपुर (जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में पड़ता है) में
एक सिख परिवार में हुआ था।[2] भारत के विभाजन के बाद की अफ़रा तफ़री में मिलखा
सिंह ने अपने माँ-बाप को खो दिया। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन से पाकिस्तान से
भारत आए। ऐसे भयानक बचपन के बाद उन्होंने अपने जीवन में कुछ कर गुज़रने की ठानी।
मिल्खा सिंह सेना में
भर्ती होने की कोशिश करते रहे और अंततः वर्ष 1952 में वह सेना की विद्युत मैकेनिकल
इंजीनियरिंग शाखा में शामिल होने में सफल हो गये। एक बार सशस्त्र बल के उनके कोच
हवीलदार गुरुदेव सिंह ने उन्हें दौड़ (रेस) के लिए प्रेरित कर दिया, तब से वह अपना अभ्यास कड़ी मेहनत के साथ करने लगे। वह वर्ष 1956 में
पटियाला में हुए राष्ट्रीय खेलों के समय से सुर्खियों में आये।
एक होनहार धावक के
तौर पर ख्याति प्राप्त करने के बाद उन्होंने २०० मीटर और ४०० मीटर की दौड़े
सफलतापूर्वक की और इस प्रकार भारत के अब तक के सफलतम धावक बने। कुछ समय के लिए वे
४०० मीटर के विश्व कीर्तिमान धारक भी रहे।
कार्डिफ़, वेल्स, संयुक्त साम्राज्य में १९५८ के कॉमनवेल्थ
खेलों में स्वर्ण जीतने के बाद सिख होने की वजह से लंबे बालों के साथ पदक
स्वीकारने पर पूरा खेल विश्व उन्हें जानने लगा। इसी समय पर उन्हें पाकिस्तान में
दौड़ने का न्यौता मिला, लेकिन बचपन की घटनाओं की वजह से वे
वहाँ जाने से हिचक रहे थे। लेकिन न जाने पर राजनैतिक उथल पुथल के डर से उन्हें
जाने को कहा गया। उन्होंने दौड़ने का न्यौता स्वीकार लिया। दौड़ में मिलखा सिंह ने
सरलता से अपने प्रतिद्वन्द्वियों को ध्वस्त कर दिया और आसानी से जीत गए। अधिकांशतः
मुस्लिम दर्शक इतने प्रभावित हुए कि पूरी तरह बुर्कानशीन औरतों ने भी इस महान धावक
को गुज़रते देखने के लिए अपने नक़ाब उतार लिए थे, तभी से
उन्हें फ़्लाइंग सिख की उपाधि मिली।
सेवानिवृत्ति के बाद
मिलखा सिंह खेल निर्देशक, पंजाब के पद पर थे। मिलखा
सिंह ने बाद में खेल से सन्यास ले लिया और भारत सरकार के साथ खेलकूद के प्रोत्साहन
के लिए काम करना शुरू किया। वे चंडीगढ़ में रहते थे। जाने-माने फिल्म निर्माता,
निर्देशक और लेखक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने वर्ष 2013 में इनपर भाग
मिल्खा भाग नामक फिल्म बनायी। ये फिल्म बहुत चर्चित रही। 'उड़न
सिख' के उपनाम से चर्चित मिलखा सिंह देश में होने वाले विविध
तरह के खेल आयोजनों में शिरकत करते रहते थे। हैदराबाद में 30 नवंबर,2014 को हुए 10 किलोमीटर के जियो मैराथन-2014 को उन्होंने झंड़ा दिखाकर
रवाना किया।
In the passing away of Shri Milkha Singh Ji, we have lost a colossal sportsperson, who captured the nation’s imagination and had a special place in the hearts of countless Indians. His inspiring personality endeared himself to millions. Anguished by his passing away. pic.twitter.com/h99RNbXI28
— Narendra Modi (@narendramodi) June 18, 2021
मिलखा सिंह ने 18 जून, 2021 को चंडीगढ़ के पीजीआईएमईआर अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे कोविड-१९
से ग्रस्त थे। चार-पाँच दिन पूर्व उनकी पत्नी का देहान्त भी कोविड से ही हुआ था।
उनके पुत्र जीव मिलखा सिंह गोल्फ़ के खिलाड़ी हैं।
खेल कूद रिकॉर्ड, पुरस्कार
1. इन्होंने
1958 के एशियाई खेलों में 200 मीटर व ४०० मी में स्वर्ण पदक जीते।
2. इन्होंने
१९५८ के राष्ट्रमण्डल खेलों में स्वर्ण पदक जीता।
3. वर्ष
1958 के एशियाई खेलों की 400 मीटर रेस में – प्रथम
4. वर्ष
1958 के एशियाई खेलों की 200 मीटर रेस में – प्रथम
5.
वर्ष 1959 में – पद्मश्री पुरस्कार
6. वर्ष
1962 के एशियाई खेलों की 400 मीटर दौड़ में – प्रथम
7. वर्ष
1962 के एशियाई खेलों की 4*400 रिले रेस में – प्रथम
8. वर्ष
1964 के कलकत्ता राष्ट्रीय खेलों की 400 मीटर रेस में – द्वितीय
सुंदरलाल बहुगुणा की जीवनी – Sunderlal Bahuguna Biography Hindi
सुंदरलाल
बहुगुणा की जीवनी – Sunderlal Bahuguna Biography Hindi
जन्म
सुन्दरलाल बहुगुणा
का जन्म 9 जनवरी,
1927
को देवों की भूमि उत्तराखंड के सिलयारा
नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता
का नाम अम्बादत्त बहुगुणाऔर उनकी माता का नाम पूर्णा देवी था। उनकी पत्नी का नाम विमला नौटियाल और उनकी बच्चो के नाम राजीवनयन बहुगुणा, माधुरी पाठक, प्रदीप
बहुगुणा है।
शिक्षा
प्राथमिक शिक्षा
के बाद वे लाहौर चले गए और वहीं से उन्होंने कला स्नातक की शिक्षा ग्रहण की ।
योगदान
अपनी पत्नी
श्रीमती विमला नौटियाल के सहयोग से उन्होंने सिलयारा में ही ‘पर्वतीय
नवजीवन मण्डल’ की स्थापना भी की। 1949 में
मीराबेन व ठक्कर बाप्पा के सम्पर्क में आने के बाद सुन्दरलाल बहुगुणा ने दलित वर्ग
के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए प्रयासरत हो गए और उनके लिए टिहरी में ठक्कर
बाप्पा होस्टल की स्थापना भी की। दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए
उन्होंने आन्दोलन छेड़ दिया।1971 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने
सोलह दिन तक अनशन किया। चिपको आन्दोलन के कारण वे विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम
से प्रसिद्ध हो गए।
चिपको
आंदोलन में भूमिका
पर्यावरण सुरक्षा
के लिए 1970
में शुरू हुआ आंदोलन पूरे भारत में फैलने लगा। चिपको आंदोलन उसी का
एक हिस्सा था। गढ़वाल हिमालय में पेड़ों के काटने को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन बढ़
रहे थे। 26 मार्च, 1974 को चमोली जिला
की ग्रामीण महिलाएं उस समय पेड़ से चिपककर खड़ी हो गईं जब ठेकेदार के आदमी पेड़
काटने के लिए आए। यह विरोध प्रदर्शन तुरंत पूरे देश में फैल गए। 1980 की शुरुआत में बहुगुणा ने हिमालय की 5,000 किलोमीटर
की यात्रा की। उन्होंने यात्रा के दौरान गांवों का दौरा किया और लोगों के बीच
पर्यावरण सुरक्षा का संदेश फैलाया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
से भेंट की और इंदिरा गांधी से 15 सालों तक के लिए पेड़ों के
काटने पर रोक लगाने का आग्रह किया। इसके बाद पेड़ों के काटने पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई।
टिहरी
बहुगुणा ने टिहरी
बांधी के खिलाफ आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने कई बार भूख हड़ताल
की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंहा राव के शासनकाल के दौरान उन्होंने डेढ़
महीने तक भूख हड़ताल की थी। सालों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद 2004 में बांध पर फिर से काम शुरू किया गया। उनका कहना है कि इससे सिर्फ धनी
किसानों को फायदा होगा और टिहरी के जंगल में बर्बाद हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि
भले ही बांध भूकंप का सामना कर लेगा लेकिन यह पहाड़ियां नहीं कर पाएंगे। उन्होंने
कहा कि पहले से ही पहाड़ियों में दरारें पड़ गई हैं। अगर बांध टूटा तो 12 घंटे के अंदर बुलंदशहर तक का इलाका उसमें डूब जाएगा।
पुरस्कार
•
बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर
अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में इनको पुरस्कृत
किया। इसके अलावा उन्हें कई बार पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
•
पर्यावरण को स्थाई सम्पति मानने वाला यह
महापुरुष ‘पर्यावरण गाँधी‘ बन गया। अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता के
रूप में 1981 में स्टाकहोम का वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार मिला।
•
सुन्दरलाल बहुगुणा को 1981 में पद्मश्री पुरस्कार दिया गया जिसे उन्होंने यह कह कर स्वीकार नहीं
किया कि जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस
सम्मान के योग्य नहीं समझता हूँ।
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1985 में जमनालाल बजाज पुरस्कार।
•
रचनात्मक कार्य के लिए 1986 में जमनालाल बजाज पुरस्कार, से सम्मानित किया गया।
•
1987 में राइट लाइवलीहुड पुरस्कार (चिपको आंदोलन),से
सम्मानित किया गया।
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1987 में शेर-ए-कश्मीर पुरस्कार से नवाजा गया।
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1987 में सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया।
•
1989 सामाजिक विज्ञान के डॉक्टर की मानद उपाधि आईआईटी रुड़की द्वारा दी गई।
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1998 में पहल सम्मान से नवाजा गया।
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1999 में गाँधी सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया।
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2000 में सांसदों के फोरम द्वारा सत्यपाल मित्तल अवार्ड से नवाजा गया।
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2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
निधन
पर्यावरणविद और
चिपको आंदोलन नेता सुंदरलाल बहुगुणा का 94 साल की उम्र में ऋषिकेश
के एम्स में निधन हो गया है। वो कोविड-19 से संक्रमित थे। नौ
जनवरी, 1927 को टिहरी जिले में जन्मे बहुगुणा को चिपको
आंदोलन का प्रणेता माना जाता है ।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography
उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय Yogi adityanath biography इस लेख में हम आपको बताएंगे। यह भी आदित्यनाथ जी “एक हाथ में माला, दूसरे हाथ में भाला” ये सिद्धांत पर काफी चर्चित हैं। तो आइए जानते हैं की उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी का जन्म कहां और कब हुआ था। एवं इनका राजनैतिक जीवन के बारे में विस्तार से जानेंगे। एवं योगी आदित्यनाथ जी की राजनीति में एंट्री कैसे हुई।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जीवन परिचय | CM Yogi Adityanath biography
श्री योगी आदित्यनाथ जी का जन्म 5 जून सन 1972 ई° उत्तराखंड कि गढ़वाल जिले के पंचुर नामक ग्राम में एक गढ़वाल क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनका शुरुआती नाम अजय सिंह बिष्ट था। योगी आदित्यनाथ के पिता का नाम आनंद सिंह बिष्ट एवं माता का नाम सावित्री देवी है। अभी हाल ही में 20 अप्रैल 2020 को योगी आदित्यनाथ जी के पिता जी का स्वर्गवास हो गया।
योगी आदित्यनाथ जी ने 15 वर्ष की आयु में ही संयास ले लिया था एवं यह घर छोड़कर गोरखनाथ मंदिर में रहने लगे थे एवं इन्होने अपना नाम बदलकर अजय सिंह बिष्ट से यदि आदित्यनाथ रख लिया था। योगी आदित्यनाथ जी की शिक्षा की बात करें तो यह भी आदित्यनाथ जी ने गणित एवं विज्ञान में स्नातक की शिक्षा ग्रहण की है।
योगी आदित्यनाथ जी एक हिंदुत्ववादी नेता है इन्होंने हिंदू युवा वाहिनी नामक संगठन का निर्माण भी किया एवं आज यह संगठन बहुत ही विशाल रूप में है और योगी आदित्यनाथ जी अभी इसके संस्थापक हैं।
योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय संक्षेप | Yogi adityanath biography sort
· नाम -योगी आदित्यनाथ
· बचपन का नाम -अजय सिंह बिष्ट
· जन्मतिथि -05 जून 1972
· जन्म स्थान -ग्राम- पंचुर जिला- गढ़वाल, उत्तराखंड
· पिता का नाम -आनंद सिंह बिष्ट
· माता का नाम -सावित्री देवी
· गुरु -महान अवैधनाथ जी महाराज
· व्यवसाय -योगी, राजनेता, मुख्यमंत्री
· शिक्षा -गणित व विज्ञान में स्नाकोत्तर
योगी आदित्यनाथ जी की शिक्षा | Yogi Adityanath Education
योगी आदित्यनाथ जी की प्रारंभिक शिक्षा टेहरी के गजा के स्थानीय स्कूल में ही हुई। यहां इन्होंने दसवीं तक की शिक्षा ग्रहण की। एवं इसके बाद यह ऋषिकेश में यह शिक्षा ग्रहण करने चले गए एवं यहां श्री भरत मंदिर इंटर कॉलेज से इन्होंने 12वीं की परीक्षा पास की।
· इसके बाद इन्होंने श्रीनगर के हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित विषय में बीएससी पास की। एवं इसके बाद इनके कमरे से सामान चोरी हो जाने के कारण इनके कागज एवं प्रमाण पत्र मार्कशीट आदि जरूरी कागजात चोरी हो गए। लेकिन इन्होंने पुना ऋषिकेश में विज्ञान विषय से स्नातकोत्तर किया। एवं इसके बाद वह राम मंदिर आंदोलन में लग गए।
· एवं यहीं से योगी आदित्यनाथ जी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े और महंत श्री अवैध नाथ जी के संपर्क में आए। और इन्हें अपना गुरु बनाकर संयास ले लिया। एवं यहीं से इन्होंने अपना नाम बदल कर योगी आदित्यनाथ रख लिया।
· योगी आदित्यनाथ जी के पिता का नाम आनंद सिंह बिष्ट है एवं वह फॉरेस्ट रेंजर थे। एवं योगी आदित्यनाथ 7 बहन भाई हैं जिनमें इनसे बड़ी तीन बहने एवं एक बड़े भाई एवं दो छोटे भाई हैं। योगी के भाइयों के नाम मानवेंद्र मोहन, महेंद्र मोहन, और शैलेंद्र मोहन है। जिनमें से उनके छोटे भाई शैलेंद्र मोहन भारतीय सेना में तैनात हैं।
योगी आदित्यनाथ जी की राजनीति की कहानी | Yogi Adityanath Political Story
आज जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं इनकी राजनीति की शुरुआत 20 वर्ष की आयु में ही हो गई थी। एवं इन्होंने 20 वर्ष की आयु में ही बीजेपी को ज्वाइन कर लिया था। एवं गोरखपुर के सन्यासी थे एवं सबसे पहले भारत के 12वें लोकसभा चुनाव में गोरखपुर सीट पर चुनाव लड़ा एवं गोरखपुर से सांसद बने एवं इसके बाद 13वें लोकसभा चुनाव में फिर से गोरखपुर से सांसद बने एवं वहीं कार्यभार संभाला। इस तरह 2004, 2009, 2014 लगातार पांच बार योगी आदित्यनाथ जी सबसे कम उम्र के सांसद बने रहे।
एवं इसके बाद 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ जी को बीजेपी के द्वारा प्रत्याशी चुना गया एवं इसके बाद योगी आदित्यनाथ जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और हाल ही में अभी मुख्यमंत्री हैं और अपना कार्यभार बहुत ही अच्छी तरीके से संभाल रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ राजनैतिक विवाद
योगी आदित्यनाथ हिंदुत्ववादी राजनेता है एवं उनके राजनैतिक सफर में कई विवाद उत्पन्न हुए एवं इन पर कई आपराधिक मामले भी लगाए गए हैं एवं इनकी आवाज को कोई भी दवा नहीं सका है एवं उन पर कई विवादों के आरोप हैं जिनमें से मुक्त कुछ इस प्रकार हैं –
· योगी आदित्यनाथ सबसे पहले धर्म परिवर्तन विवाद में फंसे। इन पर आरोप लगाया गया कि यह ईसाई धर्म के लोगों को हिंदू धर्म अपनाने पर मजबूर कर रहे हैं। इन पर आरोप था कि उन्होंने अब तक 1800 इसाई धर्म के लोगों को हिंदू धर्म परिवर्तन करवा दिया है।
· इसके बाद 2007 में हिंदू मुस्लिम के मध्य मुहर्रम पर हुए दंगों का आरोप लगा। एवं इस दंगे में हिंदू युवा वाहिनी के एक सदस्य राजकुमार अग्रहरि की मृत्यु हो गई। एवं वहां कर्फ्यू लगा दिया गया एवं योगी को वहां जाने से मना किया गया लेकिन यह भी अपने सदस्यों को लेकर वहां गए एवं वहां के कुछ स्थानों पर आग लगा दी। जिससे इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इनके गिरफ्तार होते ही मुंबई-गोरखपुर एक्सप्रेस ट्रेन के कुछ डिब्बे जला दिए गए। जिसका आरोप योगी आदित्यनाथ पर लगा।
· योगी आदित्यनाथ जी ने सन 2015 में एक और विवादित बयान दीया। एवं उन्होंने कहा कि “जो लोग योग नहीं करते एवं सूर्यनमस्कार नहीं करते उन्हें देश में रहने का कोई अधिकार नहीं, एवं सूर्य नमस्कार करने में हिंदू-मुस्लिम नहीं होना चाहिए” इस बयान पर काफी विवाद उत्पन्न विभाग लेकिन शांत हो गया।
· इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने एक और विवादित बयान शाहरुख खान पर दिया। बात उस समय की है जब शाहरुख खान ने कुछ असहिष्णुता युक्त बयान जारी किए थे। तब योगी ने पलटवार करते हुए कहा – शाहरुख को इस देश के बहुसंख्यक समुदाय का ध्यान रखना चाहिए देश ने उन्हें स्टार बनाया है यदि देश के लोग उनकी फिल्में देखना छोड़ दें तो शाहरुख को गली गली फिरना पड़ेगा।
योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ बड़े फैसले
जैसे ही योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने बड़े-बड़े फैसले लिए जो कि उत्तर प्रदेश को एक अच्छा राज्य बनाने के लिए उपयुक्त है। योगी आदित्यनाथ द्वारा लिए गए कुछ बड़े फैसले इस प्रकार हैं-
· योगी आदित्यनाथ जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ देने के बाद अपनी प्रथम कैबिनेट मीटिंग के बाद किसानों की कर्ज माफी की। एवं उत्तर प्रदेश के सभी किसानों का एक लाख तक का कर्ज माफ किया गया।
· उत्तर प्रदेश में लड़कियों के खिलाफ छेड़खानी एवं बलात्कार जैसी घटनाओं को रोकने के लिए योगी आदित्यनाथ ने एंटी रोमियो दस्ते का गठन किया। एंटी रोमियो दस्ता हर कॉलेज एवं सार्वजनिक स्थान पर इनकी टीम तैनात रहती है। एवं जो भी लड़कियों से छीन छेड़खानी करते हैं उन्हें सबक सिखाया जाता है।
· योगी आदित्यनाथ में सबसे बड़ा फैसला यह लिया कि जो भी उत्तर प्रदेश में अवैध एवं यांत्रिक बूचड़खाने चल रहे थे उन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया।
· योगी आदित्यनाथ ने एक और फैसला लिया जो गौ तस्करी पर था। उत्तर प्रदेश में गौ तस्करी बहुत चल रही कि इसको देखते हुए योगी आदित्यनाथ जी ने इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। एवं गोवंश के लिए कई गौशालाओं आदि का प्रबंध किया।
· योगी आदित्यनाथ जी जनता की बहुत सुनते हैं एवं उन्होंने फैसला लिया कि वह जनता दरबार लगाएंगे जिसमें लोगों की समस्याएं सुनेंगे एवं उनका निदान जल्द से जल्द करेंगे। इसके साथ साथ ही उन्होंने लोगों की शिकायत ऑनलाइन के माध्यम से लेने के लिए जनसुनवाई (Jansunwai) पोर्टल भी लॉन्च किया।





