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श्री लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री

श्री लाल बहादुर शास्त्री

कार्यकाल

प्रधानमंत्री - 9 जून, 1964 – 11 जनवरी, 1966 
विदेश मंत्री - 9 जून 1964 - 18 जुलाई 1964
रेल मंत्री - 13 मई 1952 - 7 दिसंबर 1956
राजनीति दल -   कॉन्‍ग्रेस
श्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं।

उस छोटे-से शहर में लाल बहादुर की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही लेकिन गरीबी की मार पड़ने के बावजूद उनका बचपन पर्याप्त रूप से खुशहाल बीता।

उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था ताकि वे उच्च विद्यालय की शिक्षा प्राप्त कर सकें। घर पर सब उन्हें नन्हे के नाम से पुकारते थे। वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर विद्यालय जाते थे, यहाँ तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था।

बड़े होने के साथ-ही लाल बहादुर शास्त्री विदेशी दासता से आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे। वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से अत्यंत प्रभावित हुए। लाल बहादुर शास्त्री जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था।

गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था। उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ हैं।

लाल बहादुर शास्त्री ब्रिटिश शासन की अवज्ञा में स्थापित किये गए कई राष्ट्रीय संस्थानों में से एक वाराणसी के काशी विद्या पीठ में शामिल हुए। यहाँ वे महान विद्वानों एवं देश के राष्ट्रवादियों के प्रभाव में आए। विद्या पीठ द्वारा उन्हें प्रदत्त स्नातक की डिग्री का नाम ‘शास्त्री’ था लेकिन लोगों के दिमाग में यह उनके नाम के एक भाग के रूप में बस गया।

1927 में उनकी शादी हो गई। उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था। उनकी शादी सभी तरह से पारंपरिक थी। दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे। वे दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहते थे।

1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की। इस प्रतीकात्मक सन्देश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी। लाल बहादुर शास्त्री विह्वल ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया एवं कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे। आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया।

आजादी के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई, उससे पहले ही राष्ट्रीय संग्राम के नेता विनीत एवं नम्र लाल बहादुर शास्त्री के महत्व को समझ चुके थे। 1946 में जब कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तो इस ‘छोटे से डायनमो’ को देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया। उन्हें अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए। कड़ी मेहनत करने की उनकी क्षमता एवं उनकी दक्षता उत्तर प्रदेश में एक लोकोक्ति बन गई। वे 1951 में नई दिल्ली आ गए एवं केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे। उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी। एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। देश एवं संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की। उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी। रेल दुर्घटना पर लंबी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा; “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ।”

अपने मंत्रालय के कामकाज के दौरान भी वे कांग्रेस पार्टी से संबंधित मामलों को देखते रहे एवं उसमें अपना भरपूर योगदान दिया। 1952, 1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था।

तीस से अधिक वर्षों तक अपनी समर्पित सेवा के दौरान लाल बहादुर शास्त्री अपनी उदात्त निष्ठा एवं क्षमता के लिए लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गए। विनम्र, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति वाले शास्त्री जी लोगों के बीच ऐसे व्यक्ति बनकर उभरे जिन्होंने लोगों की भावनाओं को समझा। वे दूरदर्शी थे जो देश को प्रगति के मार्ग पर लेकर आये। लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के राजनीतिक शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित थे। अपने गुरु महात्मा गाँधी के ही लहजे में एक बार उन्होंने कहा था – “मेहनत प्रार्थना करने के समान है।” महात्मा गांधी के समान विचार रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी का जन्म और उनके जीवन का अनमोल समय

 डॉ. मुरली मनोहर जोशी का जन्म जनवरी 05

डॉ. मुरली मनोहर जोशी का जन्म जनवरी 05, 1934 को जन्म स्थान दिल्ली में हुआ था इनके पिता श्री मन मोहन जोशी तथा पत्नी श्रीमती तरला जोशी थी, इनके 2 बच्चे थे, व्यवसाय राजनेता, शिक्षाविद और शिक्षा स्नातक (भौतिक), डॉक्टरेट सम्मान पद्म विभूषण मिला था।

वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी ग्राम गल्ली अल्मोड़ा के मूल निवासी है और वर्तमान में इलाहबाद में स्थाई प्रवास है । प्रखर राष्ट्रवादी चिन्तक, विचारक और राजनेता। शिक्षाविद् और लेखक । हिन्दू दर्शन के व्याख्याकार। भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक महासचिव और पूर्व अध्यक्ष । भू.पू. गृह एवं मानव संसाधन विकास मंत्री ।


प्रारम्भिक जीवन

मुरली मनोहर जोशी जी का जन्म 5 जनवरी 1934 को दिल्ली में हुआ था और उनके पिता का नाम मन मोहन जोशी था। उनकी पत्नी का नाम तरला जोशी है जिनसे उन्हें दो बेटियां हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा उत्तराखंड से की। स्नातक की पढ़ाई के लिये मेरठ कालेज गये और वहां से स्नातक की डिग्री हासिल करी। आगे की पढ़ाई के लिये जोशी जी ने इलाहाबाद चले गए और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परस्नातक में एम. एस. सी (भौतिक) की डिग्री हासिल की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही आगे अपनी अध्ययन को बढ़ाते हुये डॉक्टरेट की उपाधि हासिल किये। उनका शोध का विषय स्पेक्ट्रोस्कोपी था और उन्होंने हिन्दी भाषा में अपना शोध पत्र प्रस्तुत किये और वो हिंदी भाषा में प्रस्तुत करने वाले प्रथम शोध छात्र थे। 1958 में इलाहाबाद वि.वि. से डी. फिल. की उपाधि ग्रहण की। इलाहाबाद वि. वि. में लेक्चरर बनकर अध्यापन के क्षेत्र में उतरे। 1994 में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष (भौतिक विज्ञान) पद से सेवा निवृत हुए। 1944 से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में परिचित हैं।

1949 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे। 1957 में भारतीय जनसंघ की सदस्यता ग्रहण की। आर. एस. एस. से प्रतिबन्ध हटाने के लिए सत्याग्रह करने पर 1948 में बंधी बनाए गए। ज्ञातव्य है, 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो जाने के बाद सरकार ने आर. एस. एस. पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । इन्दिरा गांधी के प्रधान मंत्रित्व काल में आपातकाल में 26 जून, 1975 से 1977 तक 'मीसा' के अन्तर्गत बन्दी रहे। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय से पहले प्रदेश सचिव और उपाध्यक्ष रहे।

राजनीतिक जीवन

युवा अवस्था से ही मुरली मनोहर जोशी जी को राजनीति की तरफ झुकाव रहा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही अपने प्राध्यापक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया जी के मार्गदर्शन में आने के कारण कुछ समय में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े गए और गौ रक्षा सम्बन्धी आंदोलनों में भागेदारी की। 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तो 

मुरली मनोहर जोशी जी को पूरा आगे आकर सहयोग किया और फिर उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया।

मेरी जन्मभूमि 1996 में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार 13 दिनों के लिए बनी थी तब मुरली मनोहर जोशीजी देश गृहमंत्री की जिम्मेदारी संभाली थे और 13 दिनों के लिए वह गृहमंत्री रहे। जब भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की स्थापना की तो जोशी जी ने मंत्रिमंडल में मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में काम किया। इन्होंने कानपुर बनारस और इलाहाबाद जैसे शहरों में अपने एक अच्छे व्यक्तित्व के बदले चुनाव में जीत दर्ज की है। 2004 के लोकसभा चुनाव में वे जीत हासिल न कर सके। 2014 के लोकसभा के चुनाव में मुरली मनोहर जोशी जी ने बनारस से चुनाव लड़ा और जीत हासिल करी, बाद में उनको इस सीट को नरेंद्र मोदी जी के लिए खाली करना पड़ा और कानपुर से फिर चुनाव लड़े और 2.23 लाख की भारी अंतर से जीत हासिल करी । हिन्दुत्व के प्रबल समर्थक होने के कारण इनहें कुछ लोग कट्टरपंथी तक कहते हैं। विदेशी घुसपैठियों और आई. एस. आई के विरुद्ध डा. जोशी ने कई बार मोर्चा सम्भाला। भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष रहते इन्होंने सन 1992 में 

कन्याकुमारी से कश्मीर तक 'एकता यात्रा' की और आतंकवाद के गहरे साए में 15 अगस्त को श्रीनगर (कश्मीर) के लाल चौक में राष्ट्रीय झण्डा फहराया। इनके साहस, संकल्प, दृढ़ इच्छा शक्ति और हिन्दू राष्ट्र की उत्कट मनेच्छा का यह अनोखा उदाहरण था। 6 दिसम्बर 1992 को उफनते राष्ट्रवाद ने अयोध्या स्थित ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। अन्यों के साथ जोशी जी पर भी उक्त मस्जिद को ध्वस्त करने का आरोप मढ़ दिया गया। फलस्वरूप गिरफ्तार कर लिए गए।

सम्मान

2017 में मुरली मनोहर जोशी जी को पद्म विभूषण के पुरस्कार से समानित किया गया।

राष्ट्रीय गणित दिवस का रामानुजन का संबंध

महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जीवन से गणित दिवस बनाने तक का अध्ययन 


विषय प्रवेश

एक महान व्यक्ति का व्यक्तित्व दो तरह से प्रभावकारी होता है जब वह जीवित होता है तब वह वर्तमान को अपने कार्य कलापों और गतिविधियों से परिवर्द्धित करता है और जब उसका देहान्त हो जाता है तब उसके विचार सुनहरे भविष्य का मार्गदर्शन करते हैं। आज हम ऐसे व्यक्ति की बात करते है, जिसने रात भर जाग जाग कर गणित के नए-नए सूत्र तैयार किये। जिन्होने विभिन्न शोधों को स्लेट पर लिखा और अधिकतर समय अनेक गणितीय समस्याओं को सुलझाने में लगाया। रात को स्लेट पर चॉक घिसने की आवाज के कारण परिवार के अन्य सदस्यों की नींद भी चौपट हो जाती थी, फिर भी आधी रात को सोते से जागकर स्लेट पर गणित के सूत्र लिखने का सिलसिला रुकने के बजाय और तेज होता गया। स्कूली शिक्षा पूरी न कर पाने के बावजूद भी वे दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शामिल हो गए दोस्तों आज बात हो रही है उस महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की, जिन्होने भारतीय गणित को नयी उचाइयां दी। क्या रामानुजन जैसा पैशन हम भी अपने अंदर पैदा कर सकते हैं? गणित के लिए रामानुजन के योगदान के सम्मान में उनके जन्मदिन को हर साल राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में विख्यात महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को श्रद्धांजलि देते हुए वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया था। इस महान गणितज्ञ को श्रद्धाजलि देने के लिए भारत सरकार ने उनके जन्मदिन, 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस और 2012 के पूरे वर्ष को राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इस प्रकार भारत में प्रत्येक वर्ष 22 दिसम्बर को महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की स्मृति में राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रारंभिक शिक्षा व जीवन


गणित के जादूगर और भारतीय गणितीय प्रतिभा श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को को मद्रास और अब चेन्नई के छोटे से गांव इरोड नगर में हुआ था। पिता श्रीनिवास आयंगर कपड़े की फैक्ट्री में क्लर्क थे। रामानुजन का बचपन निर्धनता व कठिनाईयों में बीता। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद भी बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए वे सपरिवार कुंभकोणम शहर आ गए। रामानुजन की आरंभिक शिक्षा कुंभकोणम के प्राइमरी स्कूल में हुई। 1897 में रामानुजन ने स्कूल स्तर पर अपने जिले में अव्वल स्थान हासिल किया था। उसके बाद से वर्ष 1898 में उन्होंने टाउन हाई स्कूल में प्रवेश लिया और सभी विषयों में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए। वह अधिकतर विद्यालय में अपने दोस्तों से किताबें उधार लेकर पढ़ा करते थे। हाईस्कूल तक रामानुजन सभी विषयों में अच्छे थे। परन्तु गणित उनके लिए एक स्पेशल प्रोजेक्ट की तरह था, जो धीरे-धीरे जुनून की शक्ल ले रहा था। यहीं पर रामानुजन को जी. एस. कार की गणित पर लिखी पुस्तक पढ़ने का अवसर मिला। इसी पुस्तक से प्रभावित होकर उनकी रूचि गणित में बढ़ने लगी और उन्होंने गणित पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। सामान्य से दिखने वाले इस छात्र को दूसरे विषयों की कक्षा उबाऊ लगने लगी। गणित के अतिरिक्त अन्य विषयों में रुचि न होने के कारण वे कठिनाई से परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते, लेकिन गणित में वे 100 प्रतिशत अंक पाते थे।
वर्तमान में इनकी गणित के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है विद्यालयी शिक्षा भी पूरी न कर पाने के बावजूद वे दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शामिल हो गए तो इसकी एक वजह थी गणित के प्रति उनका जुनून । दसवीं तक स्कूल में अच्छा परफॉर्म करने की वजह से उन्हें स्कॉलरशिप मिली. लेकिन अगले ही साल उसे वापस ले लिया गया। इसका कारण गणित के अलावा उनका बाकी सभी विषयों की अनदेखी करना था। वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। इस कारण बिना डिग्री लिए ही उन्हें औपचारिक अध्ययन छोड़ना पड़ा था। युवा होने पर घर की आर्थिक आवश्यकताओं की आपूर्ति हेतु रामानुजन ने क्लर्क की नौकरी की। जहां वह अक्सर खाली पन्नों पर गणित के प्रश्न हल किया करते थे, इसी दौरान वे इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी के गणितज्ञों के संपर्क में आए। एक दिन एक अँग्रेज की नजर इन पन्नों पर पड़ गई, जिसने निजी रूचि लेकर उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. हार्डी के पास भेजने का प्रबंध कर दिया। प्रो. हार्डी ने उनमें छिपी प्रतिमा को शीघ्र ही पहचान लिया, जिसके बाद उनकी ख्याति विश्व भर में फैल गयी। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। अपने एक विशेष शोध के कारण उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. की उपाधि भी मिली, लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन में ये ढल नहीं पाए। उनका स्वास्थ्य और खराब होता गया। स्वास्थ्य के साथ नहीं देने से डॉक्टरों की सलाह पर वे भारत लौटे। लेकिन बीमार हालात में ही उच्चस्तरीय शोध पत्र लिखते रहे। इस अथक परिश्रम के कारण रामानुजन अस्वस्थ रहने लगे और 26 अप्रैल, 1920 को मात्र 32 वर्ष की आयु में ही उनका भारत में निधन हो गया। लेकिन इस कम समय में भी वह गणित में ऐसा अध्याय छोड़ गए, जिसे भुला पाना मुश्किल है। रामानुजन का गणित के क्षेत्र में योगदान

श्रीनिवास रामानुजन की गणना आधुनिक भारत के उन गणितज्ञों में की जाती है जिन्होंने विश्व में नए ज्ञान को पाने और खोजने की पहल की। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। रामानुजन को गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिया। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारंपरिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहे है। यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित की मुख्य धारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। रामानुजन के स्वर्णिम योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी परिसर में अपनी शोध पताका फहराकर भारत को गौरवान्वित कराया। रामानुजन की असाधारण प्रतिभा ने पिछली सदी के दूसरे दशक में गणित की दुनिया को एक नया आयाम दिया। ऐसे प्रतिभावान तथा गूढ ज्ञान वाले पुरुष और महिलाओं का कभी कभार जन्म होता है। पाश्चात्य गणितज्ञ जी. एस. हार्डी ने श्रीनिवास रामानुजन को यूलर, गॉस, आर्किमिडीज तथा आईजैक न्यूटन जैसे दिग्गजों की समान श्रेणी में रखा था। रामानुजन ने गणित के ऐसे फार्मूले दिए जिसे आज गणित के साथ-साथ टेक्नोलॉजी में भी प्रयोग किया जाता है। रामानुजन के प्रमुख गणितीय कार्यों में एक है किसी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात करने के फार्मूले की खोज ।

उदाहरण के लिए संख्या 5 के कुल विभाजनों की संख्या 7 है। इस प्रकार 5 4+1, 3+2, 3+11, 2+2+1, 2+1+1+1, 1+1+1+1+1। रामानुजन के फार्मूले से किसी भी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात की जा सकती है। उदाहरण के लिए संख्या 200 के कुल विभाजन होते है. 3972999029388, वर्तमान में भौतिक जगत की नयी थ्योरी सुपरस्ट्रिंग थ्योरी में इस फार्मूले का काफी उपयोग हुआ है। रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्रों जैसे संख्या सिद्धान्त, इलिप्टिक फलन, हाइपरज्योमैट्रिक श्रेणी इत्यादि में अनेक महत्त्वपूर्ण खोजें की। -

रामानुजन की स्मरण शक्ति गजब की थी। वे विलक्षण प्रतिमा के घनी और एक महान गणितज्ञ थे। अंकों के मित्र कहे जाने वाले श्रीनिवास रामानुजन के गणित पर लिखे लेख तत्कालीन समय की सर्वोत्तम विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित होते थे। ज्यादातर गणितज्ञ उनके सूत्रों से चकित तो थे, लेकिन वे उन्हें समझ नहीं पाते थे पर तत्कालीन विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी ने जैसे ही रामानुजन के कार्य को देखा, वे तुरंत उनकी प्रतिभा पहचान गए। यहां से रामानुजन के जीवन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होंने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे। एक बहुत ही प्रसिद्ध घटना है जब रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे तो डॉ. हार्डी उन्हें देखने आए डॉ. हार्डी जिस टैक्सी में आए थे उसका नंबर 1729 था और यह संख्या डॉ. हार्डी को अशुभ लगी। क्योंकि 1729 = 7 गुणा 13 गुणा 19 और इंग्लैण्ड के लोग 13 को एक अशुभ संख्या मानते हैं। परंतु रामानुजन ने कहा कि यह तो एक अद्भुत संख्या है यह यह सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो तरीके में व्यक्त कर सकते हैं।

1729 123+13
1729 103+93

भारतीय विद्वानों की अपनी प्रतिभा से गणित में नये युग का सूत्रपात हुआ तथा गणित की इसी शोध एवं साधना के बूते पर भारत गणित के क्षेत्र में विश्य का पथ प्रदर्शक एवं प्रेणता बना। रामानुजन का गणित के क्षेत्र में मुख्य योगदान निम्नांकित प्रकार से है।

• वर्ष 1903 में रामानुजन ने दसवीं की परीक्षा पास की और उसी साल घन (क्यूब) और चतुर्घात समीकरण ( दायक्वाड्रेटिक इक्वेशन) हल करने का सूत्र भी खोजा ।
• 1911 में 'सम प्रॉपर्टीज ऑफ बरनॉलीज नंबर्स शीर्षक से रामानुजन का पहला रिसर्च पेपर जर्नल ऑफ मैथमेटिक्स सोसायटी' में प्रकाशित हुआ। साल 1913 में तत्कालीन विख्यात गणितज्ञ एवं ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो प्रोफेसर हार्डी को रामानुजन ने पत्र लिखा। इसमें 120 प्रमेय और सूत्र शामिल थे प्रोफेसर हार्डी इस पत्र से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रामानुजन को कैम्ब्रिज आने का न्योता दिया।
•उनकी योग्यता को देखते हुए 28 फरवरी 1918 को रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना सदस्य बना कर सम्मानित किया और तो और, रॉयल सोसायटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है।

• रॉयल सोसायटी की सदस्यता के बाद वह ट्रिनिटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने। 
• रामानुजन ने कैम्ब्रिज जाने से पहले, 1903 से 1914 के बीच गणित की करीब साढ़े तीन हजार प्रमेयों को लिखा। उनके इन तमाम योगदानों को बाद में टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च बॉम्बे' (वर्तमान में मुम्बई) ने प्रकाशित किया।

• रामानुजन की गणितीय प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 26 अप्रैल, 1920 को उनका निधन हो जाने के बाद भी उनके दिए हुए कई प्रमेय आज भी अनसुलझे हैं। 
• उनके निधन के पश्चात् उनकी 5000 से अधिक प्रमेयों (थ्योरम्स) को छपवाया गया और उनमें से अधिकतर को कई दशक बाद तक सुलझाया नहीं जा सका। रामानुजन की गणित में की गई अदभुत खोजें आज के आधुनिक गणित और विज्ञान की आधारशीला बनी।

संख्या- सिद्धान्त पर रामानुजन के अदभुत कार्य के लिए उन्हें संख्याओं का जादूगर माना जाता है। रामानुजन संख्या उस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं, जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग द्वारा निरूपित किया जा सकता है। अपने महान गणितीय अवदान के लिए रामानुजन को गणितज्ञों का गणितज्ञ भी कहा जाता है।

सारांश


अक्सर बच्चे गणित से जी चुराते हैं, इसलिए वे इससे दूर भागने लगते हैं और नतीजन वे गणित में कमजोर हो जाते हैं। शोधकर्ताओं की मानें तो शारीरिक फिटनेस बच्चों को गणित समझने में सहायक होती है गणित का सीधा संबंध तर्कशक्ति और सोचने की क्षमता से होता है। गणित में बुद्धि को कुशाग्र बनाने के लिए आधारभूत गणित (बेसिक मैथ्स) जरुर पढ़नी चाहिए।

गणित में सबसे पहले आसान सवाल हल करने चाहिए, इससे गणित में रुचि पैदा होगी। बच्चे को हर सूत्र (फॉर्मूले) की एप्लीकेशन आनी चाहिए फॉर्मूला कैसे डेराइव हुआ और उसका अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) कैसे करना है, इसका भी अच्छी तरह ध्यान रखा जाना चाहिये। अध्याय के अनुसार फॉर्मूले अच्छी तरह याद कर लें एक बार समझ में नहीं आने पर निराश होने की अपेक्षा किसी जानकार की मदद से इसको हल कर लेना चाहिए।

•रटने से किसी भी विषय की समझ विकसित नहीं होती है। गणित भी रटने से नहीं, बल्कि बार-बार अभ्यास से आता है। यह कार चलाने जैसा अनुभव ही है, आप जितना चलाएंगे, अपने अनुभवों से उतना ही आप निखरते चले जाएंगे।

•दैनिक जीवन से जुड़े सवालों पर ध्यान दिया जाना चाहिये। गति और शुद्धता (स्पीड एंड एक्यूरेसी) के लिए ज्यादा से ज्यादा अभ्यास (प्रैक्टिस) किया जाना चाहिये।

•पहले से निश्चित समय (फिक्स्ट टाइम) में पेपर हल (सॉल्व कर अभ्यास करें। केवल सूत्र रटने की प्रवृत्ति से बचना चाहिये। किसी भी प्रमेय या फॉर्मूले को माइड मैप बनाकर याद किया जाना - चाहिये।

•मैथ्स की मिस्ट्री इजीनियरिंग या फिर अन्य परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र कुछ ऐप्स की हेल्प ले सकते हैं। ये ऐप्स मैथ्स की पेचीदा प्रॉब्लम्स को भी आसानी से सॉल्व कर देते हैं। मैथमेटिकल समस्याओं को हल करने के लिए फोटोमैथ हेल्पफुल ऐप है। इस ऐप का बेसिक वर्जन आईओएस और एंड्रॉयड यूजर्स के लिए फ्री है, लेकिन प्रो वर्जन पेड हैं।

भारत की गणित के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी और गौरवशाली परंपरा है जिसे प्रोत्साहित करने और बढ़ाने की जरूरत है। आज जीवन के हर क्षेत्र में रच बस चुके गणित को उन गणित साधकों की भावना के अनुरूप ज्यादा व्यावहारिक बनाने का संकल्प लेते हुए हमें इस अभियान को जारी रखने का प्रण लेना है। गणित के क्षेत्र में अभी भी ऐसी प्रतिमाएं हैं, जिनका सही तरीके से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों को इस समस्या के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। महान गणितज्ञ का यह कथन आज भी प्रासंगिक बना हुआ है कि हमारे जीवन की कोई भी ऐसी धारा नहीं है, जिसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गणित का योगदान न हो। आशा और विश्वास है कि रामानुजन जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी चमक जरुर बिखेरेंगे, लेकिन हमें ऐसी प्रतिभाओं को भी उत्साहित।करना चाहिए जो गणित के क्षेत्र में मेधावी हो अतः उस महान गणितज्ञ को सच्ची श्रद्धाजलि तभी सार्थक होगी जब हम यह वचन लें कि उनके दिखाये रास्ते पर चल कर देश की भावी पीढ़ी को गणित में सशक्त कर देश को अग्रणी बनाने में अपना योगदान दे सकें।

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मीराबाई का जीवन परिचय - नमस्कार , दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं कृष्ण भक्ति में मधुरता भरी काव्य रचयिता व नजर मीराबाई के बारे में। जी हां, हम बिल्कुल मीराबाई की बात करने वाले हैं जिन्होंने कृष्ण भक्ति में लीन होकर जहर का प्याला तक पी लिया लेकिन कभी कृष्ण की भक्ति नहीं छोड़ी। अपने बचपन से अंत समय तक वे कृष्ण की पूजा की और अंत में उन्ही में समा गए।

मीराबाई की विरह वेदना 

जब अबोधों से उनका मन भर गया और सहनशीलता समाप्त हो गई तब उन्होंने अपने सर्वस्व गिरधर को सौंप दिया और भगवत भजन में सभी लोग लज्जा छोड़कर भक्ति में नाचने लगे और अंत में द्वारका में गिरधर की मूर्ति में समा गए। तो अजीम कृष्ण भक्त मीराबाई के बारे में विस्तार से जानने का प्रयास करते हैं।(मीराबाई का जीवन परिचय)


जीवन परिचय (सामान्य)

मीरा बाई का सामान्य जीवन परिचय

नाम – मीराबाई

बचपन का नाम – पेमल

जन्म – 1498 ई. (विक्रम संवत् 1555)

जन्म स्थान – मेड़ता (राजस्थान)

पिता – रतन सिंह

पति – भोजराज

मृत्यु – 1546 ई. (विक्रम संवत् 1603) के आसपास

प्रारंभिक जीवन परिचय

मीराबाई का जन्म 1498 ई. पंचांग के अनुसार विक्रम संवत 1555 को राजस्थान में मेड़ता के पास कुकड़ी गांव में हुआ। इनके पिता रतन सिंह जी और दादा राव दुदा जी थे व राठौड़ राजा राव जोधा जीम परदादा थे। इनका बचपन का नाम पेमल था यह बचपन से गिरधर की भक्ति करता ही भजन गाया जाता है तथा अपने साथ गिरधर की मूर्ति सदा शत्रु थी।

गिरधर की मूर्ति को ग्रहण करना, स्नान करना, ग्रहण करना, ग्रहण करना आदि की व्यवस्था मीरा स्वयं करती है। यह मूर्ति उन्हें किसी साधु से प्राप्त हुई थी। (मीराबाई का जीवन परिचय)

ये अपनी कृष्ण भक्ति में लीन रहता है और खुश रहता है लेकिन उनकी बाल्यावस्था में ही उनकी माता का वंश हो गया। कम उम्र में मां का साया छिप गया और पिता अपने काम में व्यस्त रहने से उनके पास ज्यादा देर तक टिके नहीं रहे। छोटी उम्र में इतनी तकलीफ को जीतना पड़ा तो उनके दादा राव दुदा जी ने उन्हें अपने पास मेड़ता जीने के लिए बूला दिया।

मेड़ता में उन्हें अपने दादा के स्नेह के साथ धर्म-कर्म में भी बहुत ज्ञान प्राप्त हुआ। और इसी धार्मिकता ने मीराबाई को गिरधर के ज्यादा करीब ला दिया। (मीराबाई का बचपन) कुछ देर बाद जब राव दूदा की मृत्यु हो गई तब दुदा के बड़े बेटे राव वीरमदेव ने उन्हें अपने साथ रख लियान-पालन किया।(मीराबाई का जीवन परिचय)

 मीराबाई का विवाह

उन्होंने एक बार अपनी माता से बातों-बातों में यह जाना कि उनका दूल्हा गिरधर ही है, माता ने तो परिहास में कहा कि जीमेल इसी को सत्य मान लिया और गिरधर की ओर चढ़ ले गए।

वे अपने सर्वस्व किसी को बैठी और गिरधर को अपना भ्रम समझकर प्यार करने लगे। वे तो अपना सर्वस्व गिरधर को किसी से तय किया हुआ संबंध रखते हैं लेकिन अटूट सूचनाओं के अनुसार उनके पिता ने अपना विवाह विवरण दिया है।

मेड़ता के प्रसिद्ध महाराणा सांगा के बड़े बेटे कुंवर भोजराज के संग विक्रम संवत 1573 को उनका विवाह हुआ। (मीराबाई का विवाह) विवाह के बाद वे मेड़ता में अपना सुखी जीवन जीने लगे लेकिन यह खुशियां ज्यादा वक्त तक नहीं टिक पाई कुछ समय बाद ही उनके पति भोजराज का शरीर हो गया और वे विधवा हो गईं।(मीराबाई का जीवन परिचय)

अपने पति की मृत्यु के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाला और गिरधर की पूजा कर अपना समय लिया। कुछ समय बाद ही उन पर दुखों का पहाड़ टूट गया और उनके श्वसुर और पिता की भी मृत्यु हो गई, इस दुख ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया।(मीराबाई का जीवन परिचय)

अब वे अधिक समय तक कृष्ण भक्ति और भजन में रहने लगे , वे भगवत भजन और सत्संग में सभी लोक लज्जा को त्याग कर गिरधर प्रेमवश में भजन गाने और नाचने लगे। (मीरा की कृष्ण भक्ति)(मीराबाई का जीवन परिचय)

मीरा पर हुए अत्याचार

मीरा गिरधर की भक्ति में लीन भजन गीत शुरू हुए और प्रेम में वशीभूतु सभी लोग लज्जा त्याग नाचने लगे। उनके मंदिरों में यू नाचना मेवाड़ के घटनाक्रम की मर्यादा के खिलाफ जान पडने लगते हैं।(मीराबाई का जीवन परिचय)


इस बात से परेशान होकर महाराणा सांगा के दूसरे बेटे रतन सिंह और छोटे भाई विक्रमजीत सिंह ने मीरा पर कई तरह की अत्याचार करना शुरू कर दिया, (मीरा पर हुई अत्याचार) खुली अत्याचार नहीं ही उन्होंने उन्हें खत्म कर दिया और मौत के घाट तक उतरते के भी कई प्रयास किए।(मीराबाई का जीवन परिचय)

उन्होंने उन्हें सांपों से डसवाने का प्रयास भी किया लेकिन गिरधर के आशीर्वाद और चमत्कार से सांप शालिग्राम बन गए। (मीरा ने विष का प्याला पी लिया) जब राणा ने उन्हें एक बार विष का प्याला पीने को दिया तब उन्होंने गिरधर का भजन करते हुए वह प्याला पी लिया और यह विष का प्याला गिरधर की कृपा से अमृत में परिवर्तित हो गया।(मीराबाई का जीवन परिचय)


मीराबाई का अंतिम समय

नाना प्रकार के अत्याचारों से परेशान वे मेड़ता आ गई। मेड़ता में मीरा के अंकल वीरमदेवजी राज करते थे तो वे प्रस्थान कर तीर्थ को निकल मांगे। तीर्थ यात्रा में वे गिरधर के कई मंदिरों से होते हुए वृंदावन वहां से द्वारिका पहुंचते हैं। (मीराबाई की मृत्यु) द्वारिका में रणछोड़ भगवान की भक्ति में रहने लगी और अपना समय वही रहने लगी।(मीराबाई का जीवन परिचय)

मीराबाई की भक्ति भावना का अध्ययन 

सन् 1546 (विक्रम संवत 1603) में द्वारिका में रणछोड़ की मूर्ति में समा गई और दुनिया से नाता टूट गई। दुनिया से तो उन्होंने आपको शुरू से ही अलग रखने के लिए अपना सर्वस्व गिरधर को सौंप दिया लेकिन उन्होंने अपने प्राण 1546 के आसपास त्याग दिए और अपने शरीर को त्याग छोड़ में समा गए।(मीराबाई का जीवन परिचय)

भाव तथा कला पक्ष

भाव पक्ष-: कृष्ण की भक्ति प्रद शाखा की सर्वगुण कवित्री मीराबाई है, उनकी सभी काव्य रचनाएँ, कविताएँ, भजन एकमात्र गिरधर नागर से ही संबंधित है।


भापक्ष के मुख्य पद

प्रार्थना व विनय से संबंधित पद

प्रेम से संबंधित पद

गिरधर के सौंदर्य विवरण से संबंधित पद

जीवन से संबंधित पद

रहस्यवादी भावना के पद

कला पक्ष-: कृष्ण की भक्त मीराबाई भक्ति काल की प्रसिद्ध कवित्री है।


भाषा शैली-: वे राजस्थानी, पंजाबी, भोजपुरी और गुजराती शब्दों को मिलाकर ब्रज भाषा में मधुर गीत गाने वाली है। (कृष्ण भक्त मीरा का जीवन परिचय)

रस : अलंकार : छंद -: इनके छंद गाय पद में अनेक राग रंगनियों से परिपूर्ण है।

रस की बात करें तो वक्र रस का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है और साथ ही शांत रस का भी प्रयोग किया गया है। अलंकार में विशेष रूप से रूप, उपमा, व दुष्ट आदि का प्रयोग भी किया जाता है। (मीरा के छंद)

काव्या की बोलियां

इन पदों की भाषा कहीं शुद्ध ब्रज है तो कहीं राजस्थानी व गुजराती है, कभी-कभी पंजाबी का प्रयोग कर काव्य की रचना की गई है। मुख्य रूप से ब्रजभाषा के पुट में 4 बोलियां दिखाई देती हैं जो कि इस प्रकार है -:

1. गुजराती

2. पांज

3. राजस्थानी

4. ब्रजभाषा। (मीराबाई की काव्य रचनाए)

 

मीरा बाई की रचनाएँ, साहित्य व पदावली

श्री कृष्ण के विभिन्न पदों की रचना उन्हीं द्वारा की गई है, वे कई पदों से प्रेम करते हैं। उनमें से प्रमुख-:

नरसी जी का मायरा,

• गीत गोविंद कि टीका,

• राग सीरथ के पद,

• रामगोविंद आदि है।

मीराबाई की भक्ति भावना का अध्ययन 

हिंदी काव्य साहित्य में मीरा का प्रमुख स्थान है, प्रेम का दर्द उनका काव्य में स्पष्ट दृश्य है। (मीरा की रचनाएं) उनकी तरह प्रेम दर्द को किसी ने महसूस नहीं किया और कोई ऐसी रचनाएं वापस नहीं पाई हैं।(मीराबाई का जीवन परिचय)

इनके गीतों को "मीराबाई की पदावली" ग्रंथ में संकेतित किया गया है, इसकी प्रमुख मात्रा निम्न है -:

• रुकमणी मंगल,

नरसी जी का मायरा,

• कार्यकर्ता पद,

• मीरा की गरबी,

मलार राग,

•नरसिंह मेडता की हुंडी,

चरित सत्यभामा जी नुं रूसन (मीरा के पद)

मीराबाई के बारे में अलग-अलग तथ्य

• खराब राज्य के इतिहास में पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि "भोजराज का विवाह मीराबाई के संग विक्रम संवत् 1573 में हुआ"।

• “मीरा का विवाह राणा के अनुज से” नागरीदास द्वारा बताया गया है।

• “एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान” कर्नल में टॉड ने “राणा कुंभा से मीरा का विवाह” बताया है।

• विलियम क्रूक ने सबसे पहले बताया कि "असली में मीरा ने राणा कुंभा से विवाह नहीं किया बल्कि सांगा के पुत्र भोजराज से मीराबाई का विवाह हुआ था"। (मीराबाई के पति)

• “इनका जन्म विक्रम संवत 1503 मैं चौकड़ी गांव में हुआ व निर्माता के कुमार भोजराज से उनका विवाह हुआ” यह बात अपने इतिहास में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने लिखी है।

• “इनका जन्म 1498 ई. (विक्रम संवत 1555) में हुआ” यह डॉक्टर गणपति चंद्रगुप्त ने बताया है।

• प्रियादास ने भक्तमाल की टीका “भक्ति रस बोधिनी” में विक्रम संवत 1769 में लिखा है कि “मीराबाई की जन्मभूमि मेड़ता है”।

मीरा बाई से संबंधित प्रमुख तथ्य

• इनका जन्म 1498 ई. (विक्रम संवत 1555) को हुआ व मृत्यु 1546 ईस्वी (विक्रम संवत 1603) के आस-पास जाना जाता है।(मीराबाई का जीवन परिचय)

•इनके बचपन का नाम पेमल है इनकी कर्मभूमि वृंदावन है।

• ये भक्ति काल की कवित्री है जो कि मुख्य रूप से कृष्ण भक्ति के गीतों को गाती है। (मीराबाई का जीवन परिचय 10 लाइन में)

इन शिक्षकों व गुरु संत रविदास है तथा यह मान्यता है कि जीव गोस्वामी से उनकी दीक्षा ली गई थी।

• इन्हें डॉ नगेंद्र ने "संप्रदाय निरपेक्ष भक्त कवित्री" कहा है।

• ये कृष्ण के रूप की दीवानी है और उनकी भक्ति माधुरी भाव की है।

• ये अपना गुरु रैदास को मान लेते हैं।

• मीरा कृष्ण को अपना सर्वस्व मान लिया गया है तथा उन्हें अपना पति भी मान लिया गया है। (मीरा की बॉयोग्राफी इन हिंदी)

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मिल्खा सिंह (स्वर्ण पदक) का जीवन परिचय

 

मिल्खा सिंह (स्वर्ण पदक) का जीवन परिचय

 


    भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले मिल्खा सिंह

    मिल्खा सिंह आज तक भारत के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित धावक हैं. कामनवेल्थ खेलो में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले वे पहले भारतीय है. खेलो में उनके अतुल्य योगदान के लिये भारत सरकार ने उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्म श्री से भी सम्मानित किया है. पंडित जवाहरलाल नेहरू भी मिल्खा सिंह के खेल को देख कर उनकी तारीफ करते थे. और उन्हें मिल्खा सिंह पर गर्व था.

    मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब में एक सिख राठौर परिवार में 20 नवम्बर 1929 को हुआ था। अपने माँ-बाप की कुल 15 संतानों में वह एक थे। उनके कई भाई-बहन बाल्यकाल में ही गुजर गए थे। भारत के विभाजन के बाद हुए दंगों में मिलखा सिंह ने अपने माँ-बाप और भाई-बहन खो दिया। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन द्वारा पाकिस्तान से दिल्ली आए। दिल्ली में वह अपनी शादी-शुदा बहन के घर पर कुछ दिन रहे। कुछ समय शरणार्थी शिविरों में रहने के बाद वह दिल्ली के शाहदरा इलाके में एक पुनर्स्थापित बस्ती में भी रहे ।

     

    पाकिस्तान के फील्ड मार्शल ने दिया था ‘फ्लाइंग सिख’ की उपाधि

    मिल्खा सिंह 14 भाई-बहन थे और वे वर्तमान पाकिस्तान में पैदा हुए थे. बंटवारे के समय उनके माता-पिता और आठ भाई-बहन मारे गए. मिल्खा सिंह किसी तरह भारत पहुंचे थे और एक साक्षात्कार में दिए गए बयान के बाद भारत आने के बाद वे किसी भी सूरत में पाकिस्तान की धरती पर कदम नहीं रखना चाहते थे. वर्ष 1960 में उन्हें पाकिस्तान की इंटरनेशन एथलीट प्रतियोगिता में भाग लेने का निमंत्रण मिला था लेकिन वह बंटवारे के गम में इसमें हिस्सा नहीं लेना चाहते थे. हालांकि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समझाने पर वह पाकिस्तान गए और पाकिस्तान के सबसे तेज धावक अब्दुल खालिक उनकी रफ्तार के सामने टिक नहीं पाए. इस जीत के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान ने उनकी रफ्तार से अभिभूत होकर उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ की उपाधि दी.

     

    मिलखा सिंह का जन्म २० नवंबर १९२९ को गोविन्दपुर (जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में पड़ता है) में एक सिख परिवार में हुआ था।[2] भारत के विभाजन के बाद की अफ़रा तफ़री में मिलखा सिंह ने अपने माँ-बाप को खो दिया। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन से पाकिस्तान से भारत आए। ऐसे भयानक बचपन के बाद उन्होंने अपने जीवन में कुछ कर गुज़रने की ठानी।

     


    मिल्खा सिंह सेना में भर्ती होने की कोशिश करते रहे और अंततः वर्ष 1952 में वह सेना की विद्युत मैकेनिकल इंजीनियरिंग शाखा में शामिल होने में सफल हो गये। एक बार सशस्त्र बल के उनके कोच हवीलदार गुरुदेव सिंह ने उन्हें दौड़ (रेस) के लिए प्रेरित कर दिया, तब से वह अपना अभ्यास कड़ी मेहनत के साथ करने लगे। वह वर्ष 1956 में पटियाला में हुए राष्ट्रीय खेलों के समय से सुर्खियों में आये।

    एक होनहार धावक के तौर पर ख्याति प्राप्त करने के बाद उन्होंने २०० मीटर और ४०० मीटर की दौड़े सफलतापूर्वक की और इस प्रकार भारत के अब तक के सफलतम धावक बने। कुछ समय के लिए वे ४०० मीटर के विश्व कीर्तिमान धारक भी रहे।

    कार्डिफ़, वेल्स, संयुक्त साम्राज्य में १९५८ के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण जीतने के बाद सिख होने की वजह से लंबे बालों के साथ पदक स्वीकारने पर पूरा खेल विश्व उन्हें जानने लगा। इसी समय पर उन्हें पाकिस्तान में दौड़ने का न्यौता मिला, लेकिन बचपन की घटनाओं की वजह से वे वहाँ जाने से हिचक रहे थे। लेकिन न जाने पर राजनैतिक उथल पुथल के डर से उन्हें जाने को कहा गया। उन्होंने दौड़ने का न्यौता स्वीकार लिया। दौड़ में मिलखा सिंह ने सरलता से अपने प्रतिद्वन्द्वियों को ध्वस्त कर दिया और आसानी से जीत गए। अधिकांशतः मुस्लिम दर्शक इतने प्रभावित हुए कि पूरी तरह बुर्कानशीन औरतों ने भी इस महान धावक को गुज़रते देखने के लिए अपने नक़ाब उतार लिए थे, तभी से उन्हें फ़्लाइंग सिख की उपाधि मिली।

    सेवानिवृत्ति के बाद मिलखा सिंह खेल निर्देशक, पंजाब के पद पर थे। मिलखा सिंह ने बाद में खेल से सन्यास ले लिया और भारत सरकार के साथ खेलकूद के प्रोत्साहन के लिए काम करना शुरू किया। वे चंडीगढ़ में रहते थे। जाने-माने फिल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने वर्ष 2013 में इनपर भाग मिल्खा भाग नामक फिल्म बनायी। ये फिल्म बहुत चर्चित रही। 'उड़न सिख' के उपनाम से चर्चित मिलखा सिंह देश में होने वाले विविध तरह के खेल आयोजनों में शिरकत करते रहते थे। हैदराबाद में 30 नवंबर,2014 को हुए 10 किलोमीटर के जियो मैराथन-2014 को उन्होंने झंड़ा दिखाकर रवाना किया।

    मिलखा सिंह ने 18 जून, 2021 को चंडीगढ़ के पीजीआईएमईआर अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे कोविड-१९ से ग्रस्त थे। चार-पाँच दिन पूर्व उनकी पत्नी का देहान्त भी कोविड से ही हुआ था।

    उनके पुत्र जीव मिलखा सिंह गोल्फ़ के खिलाड़ी हैं।

     

    खेल कूद रिकॉर्ड, पुरस्कार

    1.     इन्होंने 1958 के एशियाई खेलों में 200 मीटर व ४०० मी में स्वर्ण पदक जीते।

    2.     इन्होंने १९५८ के राष्ट्रमण्डल खेलों में स्वर्ण पदक जीता।

    3.     वर्ष 1958 के एशियाई खेलों की 400 मीटर रेस में – प्रथम

    4.     वर्ष 1958 के एशियाई खेलों की 200 मीटर रेस में – प्रथम

    5.     वर्ष 1959 में – पद्मश्री पुरस्कार        

    6.     वर्ष 1962 के एशियाई खेलों की 400 मीटर दौड़ में – प्रथम

    7.     वर्ष 1962 के एशियाई खेलों की 4*400 रिले रेस में – प्रथम

    8.     वर्ष 1964 के कलकत्ता राष्ट्रीय खेलों की 400 मीटर रेस में – द्वितीय

     

    सुंदरलाल बहुगुणा की जीवनी – Sunderlal Bahuguna Biography Hindi

    सुंदरलाल बहुगुणा की जीवनी – Sunderlal Bahuguna Biography Hindi

     


    जन्म

    सुन्दरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी, 1927 को देवों की भूमि उत्तराखंड के सिलयारा नामक स्थान पर हुआ था।  उनके पिता का नाम अम्बादत्त बहुगुणाऔर उनकी माता का नाम पूर्णा देवी था। उनकी पत्नी का नाम विमला नौटियाल और उनकी बच्चो के नाम राजीवनयन बहुगुणा, माधुरी पाठक, प्रदीप बहुगुणा है।

     

     

    शिक्षा

    प्राथमिक शिक्षा के बाद वे लाहौर चले गए और वहीं से उन्होंने कला स्नातक की शिक्षा ग्रहण की ।

     

     

    योगदान

    अपनी पत्नी श्रीमती विमला नौटियाल के सहयोग से उन्होंने सिलयारा में ही ‘पर्वतीय नवजीवन मण्डल’ की स्थापना भी की। 1949 में मीराबेन व ठक्कर बाप्पा के सम्पर्क में आने के बाद सुन्दरलाल बहुगुणा ने दलित वर्ग के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए प्रयासरत हो गए और उनके लिए टिहरी में ठक्कर बाप्पा होस्टल की स्थापना भी की। दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने आन्दोलन छेड़ दिया।1971 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने सोलह दिन तक अनशन किया। चिपको आन्दोलन के कारण वे विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

     

     

    चिपको आंदोलन में भूमिका

     

    पर्यावरण सुरक्षा के लिए 1970 में शुरू हुआ आंदोलन पूरे भारत में फैलने लगा। चिपको आंदोलन उसी का एक हिस्सा था। गढ़वाल हिमालय में पेड़ों के काटने को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन बढ़ रहे थे। 26 मार्च, 1974 को चमोली जिला की ग्रामीण महिलाएं उस समय पेड़ से चिपककर खड़ी हो गईं जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने के लिए आए। यह विरोध प्रदर्शन तुरंत पूरे देश में फैल गए। 1980 की शुरुआत में बहुगुणा ने हिमालय की 5,000 किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने यात्रा के दौरान गांवों का दौरा किया और लोगों के बीच पर्यावरण सुरक्षा का संदेश फैलाया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट की और इंदिरा गांधी से 15 सालों तक के लिए पेड़ों के काटने पर रोक लगाने का आग्रह किया। इसके बाद पेड़ों के काटने पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई।

     

     

    टिहरी

     

    बहुगुणा ने टिहरी बांधी के खिलाफ आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने कई बार भूख हड़ताल की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंहा राव के शासनकाल के दौरान उन्होंने डेढ़ महीने तक भूख हड़ताल की थी। सालों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद 2004 में बांध पर फिर से काम शुरू किया गया। उनका कहना है कि इससे सिर्फ धनी किसानों को फायदा होगा और टिहरी के जंगल में बर्बाद हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि भले ही बांध भूकंप का सामना कर लेगा लेकिन यह पहाड़ियां नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि पहले से ही पहाड़ियों में दरारें पड़ गई हैं। अगर बांध टूटा तो 12 घंटे के अंदर बुलंदशहर तक का इलाका उसमें डूब जाएगा।

     


     

    पुरस्कार

    •                     बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में इनको पुरस्कृत किया। इसके अलावा उन्हें कई बार पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

    •                     पर्यावरण को स्थाई सम्पति मानने वाला यह महापुरुष ‘पर्यावरण गाँधी‘ बन गया। अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता के रूप में 1981 में स्टाकहोम का वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार मिला।

    •                     सुन्दरलाल बहुगुणा को 1981 में पद्मश्री पुरस्कार दिया गया जिसे उन्होंने यह कह कर स्वीकार नहीं किया कि जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता हूँ।

    •                     1985 में जमनालाल बजाज पुरस्कार।

    •                     रचनात्मक कार्य के लिए 1986 में जमनालाल बजाज पुरस्कार, से सम्मानित किया गया।

    •                     1987 में राइट लाइवलीहुड पुरस्कार (चिपको आंदोलन),से सम्मानित किया गया।

    •                     1987 में शेर-ए-कश्मीर पुरस्कार से नवाजा गया।

    •                     1987 में सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया।

    •                     1989 सामाजिक विज्ञान के डॉक्टर की मानद उपाधि आईआईटी रुड़की द्वारा दी गई।

    •                     1998 में पहल सम्मान से नवाजा गया।

    •                     1999 में गाँधी सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया।

    •                     2000 में सांसदों के फोरम द्वारा सत्यपाल मित्तल अवार्ड से नवाजा गया।

    •                     2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

     

     

    निधन

    पर्यावरणविद और चिपको आंदोलन नेता सुंदरलाल बहुगुणा का 94 साल की उम्र में ऋषिकेश के एम्स में निधन हो गया है। वो कोविड-19 से संक्रमित थे। नौ जनवरी, 1927 को टिहरी जिले में जन्मे बहुगुणा को चिपको आंदोलन का प्रणेता माना जाता है ।


    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography

     

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय  Yogi Adityanath Biography

     

    उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय Yogi adityanath biography  इस लेख में हम आपको बताएंगे। यह भी आदित्यनाथ जी “एक हाथ में माला, दूसरे हाथ में भाला” ये सिद्धांत पर काफी चर्चित हैं। तो आइए जानते हैं की उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी का जन्म कहां और कब हुआ था। एवं इनका राजनैतिक जीवन के बारे में विस्तार से जानेंगे। एवं योगी आदित्यनाथ जी की राजनीति में एंट्री कैसे हुई।

     


    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जीवन परिचय | CM Yogi Adityanath biography

     

    श्री योगी आदित्यनाथ जी का जन्म 5 जून सन 1972 ई° उत्तराखंड कि गढ़वाल जिले के पंचुर नामक ग्राम में एक गढ़वाल क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनका शुरुआती नाम अजय सिंह बिष्ट था। योगी आदित्यनाथ के पिता का नाम आनंद सिंह बिष्ट एवं माता का नाम सावित्री देवी है। अभी हाल ही में 20 अप्रैल 2020 को योगी आदित्यनाथ जी के पिता जी का स्वर्गवास हो गया।

     

    योगी आदित्यनाथ जी ने 15 वर्ष की आयु में ही संयास ले लिया था एवं यह घर छोड़कर गोरखनाथ मंदिर में रहने लगे थे एवं इन्होने अपना नाम बदलकर अजय सिंह बिष्ट से यदि आदित्यनाथ रख लिया था। योगी आदित्यनाथ जी की शिक्षा की बात करें तो यह भी आदित्यनाथ जी ने गणित एवं विज्ञान में स्नातक की शिक्षा ग्रहण की है।

     

    योगी आदित्यनाथ जी एक हिंदुत्ववादी नेता है इन्होंने हिंदू युवा वाहिनी नामक संगठन का निर्माण भी किया एवं आज यह संगठन बहुत ही विशाल रूप में है और योगी आदित्यनाथ जी अभी इसके संस्थापक हैं।

     

    योगी आदित्यनाथ जी का जीवन परिचय संक्षेप | Yogi adityanath biography sort

     

    ·        नाम                   -योगी आदित्यनाथ

    ·        बचपन का नाम     -अजय सिंह बिष्ट

    ·        जन्मतिथि            -05 जून 1972

    ·        जन्म स्थान           -ग्राम- पंचुर जिला- गढ़वाल, उत्तराखंड

    ·        पिता का नाम        -आनंद सिंह बिष्ट

    ·        माता का नाम        -सावित्री देवी

    ·        गुरु                   -महान अवैधनाथ जी महाराज

    ·        व्यवसाय              -योगी, राजनेता, मुख्यमंत्री

    ·        शिक्षा                -गणित व विज्ञान में स्नाकोत्तर

     

    योगी आदित्यनाथ जी की शिक्षा | Yogi Adityanath Education

     

    योगी आदित्यनाथ जी की प्रारंभिक शिक्षा टेहरी के गजा के स्थानीय स्कूल में ही हुई। यहां इन्होंने दसवीं तक की शिक्षा ग्रहण की। एवं इसके बाद यह ऋषिकेश में यह शिक्षा ग्रहण करने चले गए एवं यहां श्री भरत मंदिर इंटर कॉलेज से इन्होंने 12वीं की परीक्षा पास की।

     

    ·        इसके बाद इन्होंने श्रीनगर के हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित विषय में बीएससी पास की। एवं इसके बाद इनके कमरे से सामान चोरी हो जाने के कारण इनके कागज एवं प्रमाण पत्र मार्कशीट आदि जरूरी कागजात चोरी हो गए। लेकिन इन्होंने पुना ऋषिकेश में विज्ञान विषय से स्नातकोत्तर किया। एवं इसके बाद वह राम मंदिर आंदोलन में लग गए।

     

    ·        एवं यहीं से योगी आदित्यनाथ जी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े और महंत श्री अवैध नाथ जी के संपर्क में आए। और इन्हें अपना गुरु बनाकर संयास ले लिया। एवं यहीं से इन्होंने अपना नाम बदल कर योगी आदित्यनाथ रख लिया।

     

    ·        योगी आदित्यनाथ जी के पिता का नाम आनंद सिंह बिष्ट है एवं वह फॉरेस्ट रेंजर थे। एवं योगी आदित्यनाथ 7 बहन भाई हैं जिनमें इनसे बड़ी तीन बहने एवं एक बड़े भाई एवं दो छोटे भाई हैं। योगी के भाइयों के नाम मानवेंद्र मोहन, महेंद्र मोहन, और शैलेंद्र मोहन है। जिनमें से उनके छोटे भाई शैलेंद्र मोहन भारतीय सेना में तैनात हैं।

     

    योगी आदित्यनाथ जी की राजनीति की कहानी | Yogi Adityanath Political Story

     

    आज जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं इनकी राजनीति की शुरुआत 20 वर्ष की आयु में ही हो गई थी। एवं इन्होंने 20 वर्ष की आयु में ही बीजेपी को ज्वाइन कर लिया था। एवं गोरखपुर के सन्यासी थे एवं सबसे पहले भारत के 12वें लोकसभा चुनाव में गोरखपुर सीट पर चुनाव लड़ा एवं गोरखपुर से सांसद बने एवं इसके बाद 13वें लोकसभा चुनाव में फिर से गोरखपुर से सांसद बने एवं वहीं कार्यभार संभाला। इस तरह 2004, 2009, 2014 लगातार पांच बार योगी आदित्यनाथ जी सबसे कम उम्र के सांसद बने रहे।

     

    एवं इसके बाद 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ जी को बीजेपी के द्वारा प्रत्याशी चुना गया एवं इसके बाद योगी आदित्यनाथ जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और हाल ही में अभी मुख्यमंत्री हैं और अपना कार्यभार बहुत ही अच्छी तरीके से संभाल रहे हैं।

     

    योगी आदित्यनाथ राजनैतिक विवाद

     

    योगी आदित्यनाथ हिंदुत्ववादी राजनेता है एवं उनके राजनैतिक सफर में कई विवाद उत्पन्न हुए एवं इन पर कई आपराधिक मामले भी लगाए गए हैं एवं इनकी आवाज को कोई भी दवा नहीं सका है एवं उन पर कई विवादों के आरोप हैं जिनमें से मुक्त कुछ इस प्रकार हैं –

     

    ·        योगी आदित्यनाथ सबसे पहले धर्म परिवर्तन विवाद में फंसे। इन पर आरोप लगाया गया कि यह ईसाई धर्म के लोगों को हिंदू धर्म अपनाने पर मजबूर कर रहे हैं। इन पर आरोप था कि उन्होंने अब तक 1800 इसाई धर्म के लोगों को हिंदू धर्म परिवर्तन करवा दिया है।

    ·        इसके बाद 2007 में हिंदू मुस्लिम के मध्य मुहर्रम पर हुए दंगों का आरोप लगा। एवं इस दंगे में हिंदू युवा वाहिनी के एक सदस्य राजकुमार अग्रहरि की मृत्यु हो गई। एवं वहां कर्फ्यू लगा दिया गया एवं योगी को वहां जाने से मना किया गया लेकिन यह भी अपने सदस्यों को लेकर वहां गए एवं वहां के कुछ स्थानों पर आग लगा दी। जिससे इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इनके गिरफ्तार होते ही मुंबई-गोरखपुर एक्सप्रेस ट्रेन के कुछ डिब्बे जला दिए गए। जिसका आरोप योगी आदित्यनाथ पर लगा।

    ·        योगी आदित्यनाथ जी ने सन 2015 में एक और विवादित बयान दीया। एवं उन्होंने कहा कि “जो लोग योग नहीं करते एवं सूर्यनमस्कार नहीं करते उन्हें देश में रहने का कोई अधिकार नहीं, एवं सूर्य नमस्कार करने में हिंदू-मुस्लिम नहीं होना चाहिए” इस बयान पर काफी विवाद उत्पन्न विभाग लेकिन शांत हो गया।

    ·        इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने एक और विवादित बयान शाहरुख खान पर दिया। बात उस समय की है जब शाहरुख खान ने कुछ असहिष्णुता युक्त बयान जारी किए थे। तब योगी ने पलटवार करते हुए कहा – शाहरुख को इस देश के बहुसंख्यक समुदाय का ध्यान रखना चाहिए देश ने उन्हें स्टार बनाया है यदि देश के लोग उनकी फिल्में देखना छोड़ दें तो शाहरुख को गली गली फिरना पड़ेगा।

    योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ बड़े फैसले

     

    जैसे ही योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने बड़े-बड़े फैसले लिए जो कि उत्तर प्रदेश को एक अच्छा राज्य बनाने के लिए उपयुक्त है। योगी आदित्यनाथ द्वारा लिए गए कुछ बड़े फैसले इस प्रकार हैं-

     

    ·        योगी आदित्यनाथ जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ देने के बाद अपनी प्रथम कैबिनेट मीटिंग के बाद किसानों की कर्ज माफी की। एवं उत्तर प्रदेश के सभी किसानों का एक लाख तक का कर्ज माफ किया गया।

    ·        उत्तर प्रदेश में लड़कियों के खिलाफ छेड़खानी एवं बलात्कार जैसी घटनाओं को रोकने के लिए योगी आदित्यनाथ ने एंटी रोमियो दस्ते का गठन किया। एंटी रोमियो दस्ता हर कॉलेज एवं सार्वजनिक स्थान पर इनकी टीम तैनात रहती है। एवं जो भी लड़कियों से छीन छेड़खानी करते हैं उन्हें सबक सिखाया जाता है।

    ·        योगी आदित्यनाथ में सबसे बड़ा फैसला यह लिया कि जो भी उत्तर प्रदेश में अवैध एवं यांत्रिक बूचड़खाने चल रहे थे उन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया।

    ·        योगी आदित्यनाथ ने एक और फैसला लिया जो गौ तस्करी पर था। उत्तर प्रदेश में गौ तस्करी बहुत चल रही कि इसको देखते हुए योगी आदित्यनाथ जी ने इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। एवं गोवंश के लिए कई गौशालाओं आदि का प्रबंध किया।

    ·        योगी आदित्यनाथ जी जनता की बहुत सुनते हैं एवं उन्होंने फैसला लिया कि वह जनता दरबार लगाएंगे जिसमें लोगों की समस्याएं सुनेंगे एवं उनका निदान जल्द से जल्द करेंगे। इसके साथ साथ ही उन्होंने लोगों की शिकायत ऑनलाइन के माध्यम से लेने के लिए जनसुनवाई (Jansunwai) पोर्टल भी लॉन्च किया।

     

     

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