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राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, मुख्य विशेषताएं, शिक्षक, स्कूल और उच्च शिक्षा

 राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, मुख्य विशेषताएं, शिक्षक, स्कूल और उच्च शिक्षा

National Education Policy

National Education Policy 2020: नई शिक्षा नीति को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी मिल गयी हैं, जो 34 वर्षों के बाद शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रमुख और ऐतिहासिक निर्णय है। कैबिनेट ने मानव संसाधन और विकास मंत्रालय (MHRD) का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय भी कर दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा और सीखने पर ध्यान केंद्रित करना और “भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति” बनाना है। नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 का प्रारूप पूर्व भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के प्रमुख के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में विशेषज्ञों के एक पैनल द्वारा तैयार किया गया था।


National Education Policy 

NEP 2020 भारत में 21वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है। स्वतंत्रता के बाद यह भारत की केवल तीसरी शिक्षा नीति है। शिक्षा के लिए पहली नीति 1968 में प्रख्यापित की गई थी और दूसरी 1986 में लागू की गई थी।

NEP 2020 का लक्ष्य 2040 तक एक कुशल शिक्षा प्रणाली बनाना है, जिसमें सभी शिक्षार्थियों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा तक समान पहुंच हो। इसका उद्देश्य एक नई प्रणाली का निर्माण करना है जो भारत की परंपराओं और मूल्य प्रणालियों पर निर्माण करते हुए SDG4 सहित 21वीं सदी की शिक्षा के आकांक्षात्मक लक्ष्यों के साथ संरेखित हो। यह राज्यों, केंद्र द्वारा शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च को जीडीपी के 6% तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित करता है

 

National Education Policy : मुख्य हाइलाईट

NEP 2020 का उद्देश्य 2035 तक व्यावसायिक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को 26.3% से बढ़ाकर 50% करना है।

सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) का उद्देश्य बहु-विषयक संस्थान बनना होगा, जिनमें से प्रत्येक में 3,000 या अधिक छात्र होंगे।

NEP 2020 के मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:

शिक्षक शिक्षा

  • 2030 तक, शिक्षण के लिए न्यूनतम डिग्री योग्यता चार वर्षीय एकीकृत बी.एड. डिग्री होगी।
  • डिजिटल डिवाइड को पाटने में मदद करने के लिए शिक्षकों को भारतीय स्थिति से संबंधित ऑनलाइन शैक्षिक तरीकों का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा।

स्कूली शिक्षा 

  • अगले दशक में चरणबद्ध तरीके से सभी स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा को एकीकृत किया जाना है।
  • शिक्षकों, और वयस्क शिक्षा के लिए स्कूलों में नयी National Curriculum framework पेश की जाएगी।
  • कक्षा 5 तक के छात्रों के लिए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होगा।
  •  सिर्फ रट्टा सीखने के बजाय मुख्य ध्यान बच्चे के कौशल और क्षमताओं पर होगा।
  • पाठ्यक्रम की संरचना में बड़े बदलाव
  • आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स के बीच कोई बड़ा अलगाव नहीं है।
  • बोर्ड परीक्षाएं ज्ञान के अनुप्रयोग पर आधारित होंगी
  • 5 + 3 + 3 + 4 पाठ्यक्रम और शैक्षणिक संरचना का पालन किया जाना है।
  • कक्षा 6 के बाद से पाठ्यक्रम और व्यावसायिक एकीकरण में कमी की गयी है।
  • भारतीय उच्च शिक्षा आयोग का निर्माण (HECI)।
  • 2025 तक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा (3-6 वर्ष की आयु सीमा) को सार्वभौमिक बनाना।
  • 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% जीईआर के साथ प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमिकरण।
  • कक्षा 6 से कोडिंग और व्यावसायिक अध्ययन के साथ एक नया स्कूल पाठ्यक्रम शुरू किया जाएगा।
  • कक्षा 5 तक शिक्षा के माध्यम के रूप में बच्चे की मातृभाषा का प्रयोग किया जाएगा।
  • एक नया पाठ्यचर्या ढांचा पेश किया जाना है, जिसमें प्री-स्कूल और आंगनवाड़ी वर्ष शामिल हैं।
  • 2025 तक आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मकता पर एक राष्ट्रीय मिशन कक्षा 3 के स्तर पर बुनियादी कौशल सुनिश्चित करेगा।
  • एनईपी द्वारा अनुशंसित स्कूल परीक्षा में सुधारों में छात्रों के पूरे स्कूल के अनुभव की प्रगति पर नज़र रखना शामिल है।
  • इसमें कक्षा 3, 5 और 8 में राज्य जनगणना परीक्षा शामिल है।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण सिफारिश 10वीं बोर्ड परीक्षा के पुनर्गठन की थी जो मुख्य रूप से केवल कौशल, मूल अवधारणाओं और उच्च-क्रम की सोच क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करेगी और उनका परीक्षण करेगी।

 

उच्च शिक्षा 

  • विषयों के ढील के साथ शिक्षा के प्रति एक समग्र और बहुआयामी दृष्टिकोण
  •  UG प्रोग्राम में एकाधिक बार प्रवेश/निकास। उदाहरण के लिए, व्यावसायिक और व्यावसायिक क्षेत्रों सहित एक अनुशासन में 1 वर्ष पूरा करने के बाद एक प्रमाण पत्र दिया जाएगा, 2 साल के अध्ययन के बाद एक डिप्लोमा और 3 साल के कार्यक्रम के बाद स्नातक की डिग्री प्रदान की जाएगी।
  • 4-वर्षीय बहु-विषयक बैचलर प्रोग्राम वैकल्पिक होगा।
  • यदि छात्र 4-वर्षीय प्रोग्राम में एक बड़ा अनुसंधान परियोजना पूरी करता है, तो उसे ‘रिसर्च’ की डिग्री दी जाएगी।
  • M.Phil को बंद किया जाएगा।
  • एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट जो एक छात्र द्वारा अर्जित शैक्षणिक क्रेडिट को डिजिटल रूप से संग्रहीत करेगा।

Research / Teaching Intensive विश्वविद्यालयों की स्थापना

  • भारत के परिसर में विदेशी विश्वविद्यालय की स्थापना
  • हर शैक्षणिक संस्थान में, छात्रों के टेंशन और इमोशन को संभालने के लिए परामर्श प्रणाली होगी।
  • कई प्रवेश और निकास विकल्पों के साथ चार वर्षीय स्नातक डिग्री शुरू की जाएगी।
  • एम.फिल की डिग्री समाप्त कर दी जाएगी।
  • चिकित्सा, कानूनी पाठ्यक्रमों को छोड़कर सभी उच्च शिक्षा के लिए नया अम्ब्रेला नियामक।
  • संस्थानों के बीच हस्तांतरण को आसान बनाने के लिए एक अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट की स्थापना की जाएगी।
  • कॉलेज संबद्धता प्रणाली को 15 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाएगा, ताकि प्रत्येक कॉलेज या तो एक स्वायत्त डिग्री देने वाली संस्था या किसी विश्वविद्यालय के एक घटक कॉलेज के रूप में विकसित हो सके।
  • इसका उद्देश्य व्यावसायिक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को 2018 में 26.3% से बढ़ाकर 2035 तक 50% करना है, जिसमें अतिरिक्त 3.5 करोड़ नई सीटें हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: पारंपरिक ज्ञान

  • आदिवासी और स्वदेशी ज्ञान सहित भारतीय ज्ञान प्रणालियों को सटीक और वैज्ञानिक तरीके से पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।
  • यह आकांक्षी जिलों जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगा, जहां बड़ी संख्या में छात्र आर्थिक, सामाजिक या जाति बाधाओं का सामना कर रहे हैं, उन्हें ‘विशेष शैक्षिक क्षेत्र’ के रूप में नामित किया जाएगा।

NEP 2020 – त्रि-भाषा सूत्र

  • नीति ने सिफारिश की कि त्रि-भाषा सूत्र को जारी रखा जाए और सूत्र के कार्यान्वयन में लचीलापन प्रदान किया जाए।
  • त्रि-भाषा सूत्र में कहा गया है कि राज्य सरकारों को हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा, एक आधुनिक भारतीय भाषा, अधिमानतः दक्षिणी भाषाओं में से एक के अध्ययन को और गैर-हिंदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी भाषा के अध्ययन को अपनाना और लागू करना चाहिए।

 


भारत के अलावा अन्य किस देशो में हिंदी बोली जाती है


भारत के अलावा अन्य किस देशो में हिंदी बोली जाती है


हिंदी जिन देशों में बोली जाती है उनमें पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, बांग्लोदश, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, चीन, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, मॉरिशस, यमन, युगांडा और त्रिनाड एंड टोबैगो, कनाडा आदि देश शामिल हैं ।

भारत में आधिकारिक भाषाएँ 22 बोली जाती है 


22 भाषाओं के नाम भारत में असम, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू की 22 आधिकारिक भाषाएँ हैं।

इतिहास मनोविज्ञान, सम्प्रदाय एवं शाखाएँ (Schools & branches)

 

इतिहास मनोविज्ञान

प्राक्-वैज्ञानिक काल (pre-scientific period) में मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र (Philosophy) का एक शाखा था। जब विल्हेल्म वुण्ट (Wilhelm Wundt) ने १८७९ में मनोविज्ञान की पहला प्रयोगशाला खोला, मनोविज्ञान दर्शनशास्त्र के चंगुल से निकलकर एक स्वतंत्र विज्ञान का दर्जा पा सकने में समर्थ हो सका।

 

सम्प्रदाय एवं शाखाएँ (Schools & branches)

व्यवहार विषयक नियमों की खोज ही मनोविज्ञान का मुख्य ध्येय था। सैद्धांतिक स्तर पर विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए। मनोविज्ञान के क्षेत्र में सन् 1912 ई के आसपास संरचनावाद, क्रियावाद, व्यवहारवाद, गेस्टाल्टवाद तथा मनोविश्लेषण आदि मुख्य मुख्य शाखाओं का विकास हुआ। इन सभी वादों के प्रवर्तक इस विषय में एकमत थे कि मनुष्य के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन ही मनोविज्ञान का उद्देश्य है। उनमें परस्पर मतभेद का विषय था कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने का सबसे अच्छा ढंग कौन सा है। सरंचनावाद के अनुयायियों का मत था कि व्यवहार की व्याख्या के लिये उन शारीरिक संरचनाओं को समझना आवश्यक है जिनके द्वारा व्यवहार संभव होता है। क्रियावाद के माननेवालों का कहना था कि शारीरिक संरचना के स्थान पर प्रेक्षण योग्य तथा दृश्यमान व्यवहार पर अधिक जोर होना चाहिए। इसी आधार पर बाद में वाटसन ने व्यवहारवाद की स्थापना की। गेस्टाल्टवादियों ने प्रत्यक्षीकरण को व्यवहारविषयक समस्याओं का मूल आधार माना। व्यवहार में सुसंगठित रूप से व्यवस्था प्राप्त करने की प्रवृत्ति मुख्य है, ऐसा उनका मत था। फ्रायड ने मनोविश्लेषणवाद की स्थापना द्वारा यह बताने का प्रयास किया कि हमारे व्यवहार के अधिकांश कारण अचेतन प्रक्रियाओं द्वारा निर्धारित होते हैं।

 

मनोविज्ञान के सम्प्रदाय

1.       1879, प्रयोगात्मक मनोविज्ञान, संरचनावाद -- डब्ल्यू वुन्ट

2.       1896, मनोविश्लेषण -- सिग्मण्ड फ्रॉयड

3.       1913, व्यवहारवाद -- जॉन ब्रोडस वाट्सन

4.       1954, रेशनल इमोटिव बिहेविअरल थिरैपी -- अल्बर्ट एलिस

5.       1960, संज्ञानात्मक चिकित्सा -- आरोन टी बैक

6.       1967, संज्ञानात्मक मनोविज्ञान -- उल्रिक नाइजर

7.       1962, मानववादी मनोविज्ञान -- अमेरिकन एसोशिएशन ऑफ ह्युमनिस्टिक साइकोलॉजी

8.       1940, गेस्ताल्तवाद -- फ्रिट्ज पर्ल्स

 

आधुनिक मनोविज्ञान में इन सभी "वादों" का अब एकमात्र ऐतिहासिक महत्व रह गया है। इनके स्थान पर मनोविज्ञान में अध्ययन की सुविधा के लिये विभिन्न शाखाओं का विभाजन हो गया है।

 

प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में मुख्य रूप से उन्हीं समस्याओं का मनोवैज्ञानिक विधि से अध्ययन किया जाने लगा जिन्हें दार्शनिक पहले चिंतन अथवा विचारविमर्श द्वारा सुलझाते थे। अर्थात् संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण। बाद में इसके अंतर्गत सीखने की प्रक्रियाओं का अध्ययन भी होने लगा। प्रयोगात्मक मनोविज्ञान, आधुनिक मनोविज्ञान की प्राचीनतम शाखा है।

 

मनुष्य की अपेक्षा पशुओं को अधिक नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जा सकता है, साथ ही साथ पशुओं की शारीरिक रचना भी मनुष्य की भाँति जटिल नहीं होती। पशुओं पर प्रयोग करके व्यवहार संबंधी नियमों का ज्ञान सुगमता से हो सकता है। सन् 1912 ई के लगभग थॉर्नडाइक ने पशुओं पर प्रयोग करके तुलनात्मक अथवा पशु मनोविज्ञान का विकास किया। किंतु पशुओं पर प्राप्त किए गए परिणाम कहाँ तक मनुष्यों के विषय में लागू हो सकते हैं, यह जानने के लिये विकासात्मक क्रम का ज्ञान भी आवश्यक था। इसके अतिरिक्त व्यवहार के नियमों का प्रतिपादन उसी दशा में संभव हो सकता है जब कि मनुष्य अथवा पशुओं के विकास का पूर्ण एवं उचित ज्ञान हो। इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए विकासात्मक मनोविज्ञान का जन्म हुआ। सन् 1912 ई के कुछ ही बाद मैक्डूगल (1871-1938) के प्रयत्नों के फलस्वरूप समाज मनोविज्ञान की स्थापना हुई, यद्यपि इसकी बुनियाद समाज वैज्ञानिक हरबर्ट स्पेंसर (1820-1903) द्वारा बहुत पहले रखी जा चुकी थी। धीरे-धीरे ज्ञान की विभिन्न शाखाओं पर मनोविज्ञान का प्रभाव अनुभव किया जाने लगा। आशा व्यक्त की गई कि मनोविज्ञान अन्य विषयों की समस्याएँ सुलझाने में उपयोगी हो सकता है। साथ ही साथ, अध्ययन की जानेवाली समस्याओं के विभिन्न पक्ष सामने आए। परिणामस्वरूप मनोविज्ञान की नई-नई शाखाओं का विकास होता गया। इनमें से कुछ ने अभी हाल में ही जन्म लिया है, जिनमें प्रेरक मनोविज्ञान, सत्तात्मक मनोविज्ञान, गणितीय मनोविज्ञान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

 

मनोविज्ञान की मूलभूत एवं अनुप्रयुक्त - दोनों प्रकार की शाखाएं हैं। इसकी महत्वपूर्ण शाखाएं सामाजिक एवं पर्यावरण मनोविज्ञान, संगठनात्मक व्यवहार/मनोविज्ञान, क्लीनिकल (निदानात्मक) मनोविज्ञान, मार्गदर्शन एवं परामर्श, औद्योगिक मनोविज्ञान, विकासात्मक, आपराधिक, प्रायोगिक परामर्श, पशु मनोविज्ञान आदि है। अलग-अलग होने के बावजूद ये शाखाएं परस्पर संबद्ध हैं।

नैदानिक मनोविज्ञान - न्यूरोटिसिज्म, साइकोन्यूरोसिस, साइकोसिस जैसी क्लीनिकल समस्याओं एवं शिजोफ्रेनिया, हिस्टीरिया, ऑब्सेसिव-कंपलसिव विकार जैसी समस्याओं के कारण क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। ऐसे मनोवज्ञानिक का प्रमुख कार्य रोगों का पता लगाना और निदानात्मक तथा विभिन्न उपचारात्मक तकनीकों का इस्तेमाल करना है।

विकास मनोविज्ञान में जीवन भर घटित होनेवाले मनोवैज्ञानिक संज्ञानात्मक तथा सामाजिक घटनाक्रम शामिल हैं। इसमें शैशवावस्था, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था के दौरान व्यवहार या वयस्क से वृद्धावस्था तक होने वाले परिवर्तन का अध्ययन होता है। पहले इसे बाल मनोविज्ञान भी कहते थे।

आपराधिक मनोविज्ञान चुनौतीपूर्ण क्षेत्र है, जहां अपराधियों के व्यवहार विशेष के संबंध में कार्य किया जाता है। अपराध शास्त्र, मनोविज्ञान आपराधिक विज्ञान की शाखा है, जो अपराध तथा संबंधित तथ्यों की तहकीकात से जुड़ी है।

पशु मनोविज्ञान एक अद्भुत शाखा है।

मनोविज्ञान की प्रमुख शाखाएँ हैं -

 

1.       असामान्य मनोविज्ञान (Abnormal psychology)

2.       जीववैज्ञानिक मनोविज्ञान (Biological psychology)

3.       नैदानिक मनोविज्ञान (Clinical psychology)

4.       संज्ञानात्मक मनोविज्ञान (Cognitive psychology)

5.       सामुदायिक मनोविज्ञान (Community Psychology)

6.       तुलनात्मक मनोविज्ञान (Comparative psychology)

7.       परामर्श मनोविज्ञान (Counselling psychology)

8.       आलोचनात्मक मनोविज्ञान (Critical psychology)

9.       विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental psychology)

10. शैक्षिक मनोविज्ञान (Educational psychology)

11. विकासात्मक मनोविज्ञान (Evolutionary psychology)

12. आपराधिक मनोविज्ञान (Forensic psychology)

13. वैश्विक मनोविज्ञान (Global psychology)

14. स्वास्थ्य मनोविज्ञान (Health psychology)

15. औद्योगिक एवं संगठनात्मक मनोविज्ञान (Industrial and organizational psychology

16. विधिक मनोविज्ञान (Legal psychology)

17. व्यावसायिक स्वास्थ्य मनोविज्ञान (Occupational health psychology (OHP)

18. व्यक्तित्व मनोविज्ञान (Personality psychology)

19. संख्यात्मक मनोविज्ञान (Quantitative psychology)

20. मनोमिति (Psychometrics)

21. गणितीय मनोविज्ञान (Mathematical psychology)

22. सामाजिक मनोविज्ञान (Social psychology)

23. विद्यालयीन मनोविज्ञान (School psychology)

24. पर्यावरणीय मनोविज्ञान (Environmental psychology)

25. योग मनोविज्ञान (Yoga Psychology)

 

मनोविज्ञान का स्वरूप एवं कार्यक्षेत्र (Nature and Scope of Psychology)

मनोविज्ञान के कार्यक्षेत्र (scope) को सही ढंग से समझने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण श्रेणी वह श्रेणी है जिससे यह पता चलता है कि मनोविज्ञानी क्या चाहते हैं ? किये गये कार्य के आधार पर मनोविज्ञानियों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है:

1.       पहली श्रेणी में उन मनोविज्ञानियों को रखा जाता है जो शिक्षण कार्य में व्यस्त हैं,

2.       दूसरी श्रेणी में उन मनोवैज्ञानियों को रखा जाता है जो मनोविज्ञानिक समस्याओं पर शोध करते हैं तथा

3.       तीसरी श्रेणी में उन मनोविज्ञानियों को रखा जाता है जो मनोविज्ञानिक अध्ययनों से प्राप्त तथ्यों के आधार पर कौशलों एवं तकनीक का उपयोग वास्तविक परिस्थिति में करते हैं।

इस तरह से मनोविज्ञानियों का तीन प्रमुख कार्यक्षेत्र है—शिक्षण (teaching), शोध (research) तथा उपयोग (application)। इन तीनों कार्यक्षेत्रों से सम्बन्धित मुख्य तथ्यों का वर्णन निम्नांकित है—

 

शैक्षिक क्षेत्र (Academic areas)

शिक्षण तथा शोध मनोविज्ञान का एक प्रमुख कार्य क्षेत्र है। इस दृष्टिकोण से इस क्षेत्र के तहत निम्नांकित शाखाओं में मनोविज्ञानी अपनी अभिरुचि दिखाते हैं—

 

(1) जीवन-अवधि विकासात्मक मनोविज्ञान (Life-span development Psychology)

(2) मानव प्रयोगात्मक मनोविज्ञान (Human experimental Psychology)

(3) पशु प्रयोगात्मक मनोज्ञान (Animal experimental Psychology)

(4) दैहिक मनोविज्ञान (Psychological Psychology)

(5) परिणात्मक मनोविज्ञान (Quantitative Psychology)

(6) व्यक्तित्व मनोविज्ञान (Personality Psychology)

(7) समाज मनोविज्ञान (Social Psychology)

(8) शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology)

(9) संज्ञात्मक मनोविज्ञान (Cognitive Psychology)

(10) असामान्य मनोविज्ञान (Abnormal Psychology)

 

1.      जीवन-अवधि विकासात्मक मनोविज्ञान

बाल मनोविज्ञान का प्रारंभिक संबंध मात्र बाल विकास के अध्ययन से था परंतु हाल के वर्षों में विकासात्मक मनोविज्ञान में किशोरावस्था, वयस्कावस्था तथा वृद्धावस्था के अध्ययन पर भी बल डाला गया है। यही कारण है कि इसे 'जीवन अवधि विकासात्मक मनोविज्ञान' कहा जाता है। विकासात्मक मनोविज्ञान में मनोविज्ञान मानव के लगभग प्रत्येक क्षेत्र जैसे—बुद्धि, पेशीय विकास, सांवेगिक विकास, सामाजिक विकास, खेल, भाषा विकास का अध्ययन विकासात्मक दृष्टिकोण से करते हैं। इसमें कुछ विशेष कारक जैसे—आनुवांशिकता, परिपक्वता, पारिवारिक पर्यावरण, सामाजिक-आर्थिक अन्तर का व्यवहार के विकास पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है। कुल मनोविज्ञानियों का 5% मनोवैज्ञानिक विकासात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत हैं।

 

2.      मानव प्रयोगात्मक मनोविज्ञान

मानव प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ मानव के उन सभी व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है जिस पर प्रयोग करना सम्भव है। सैद्धान्तिक रूप से ऐसे तो मानव व्यवहार के किसी भी पहलू पर प्रयोग किया जा सकता है परंतु मनोविज्ञानी उसी पहलू पर प्रयोग करने की कोशिश करते हैं जिसे पृथक किया जा सके तथा जिसके अध्ययन की प्रक्रिया सरल हो। इस तरह से दृष्टि, श्रवण, चिन्तन, सीखना आदि जैसे व्यवहारों का प्रयोगात्मक अध्ययन काफी अधिक किया गया है। मानव प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में उन मनोवैज्ञानिकों ने भी काफी अभिरुचि दिखलाया है जिन्हें प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का संस्थापक कहा जाता है। इनमें विलियम वुण्ट, टिचेनर तथा वाटसन आदि के नाम अधिक मशहूर हैं।

 

3.      पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान

मनोविज्ञान का यह क्षेत्र मानव प्रयोगात्मक विज्ञान (Human experimental Psychology) के समान है। सिर्फ अन्तर इतना ही है कि यहाँ प्रयोग पशुओं जैसे—चूहों, बिल्लियों, कुत्तों, बन्दरों, वनमानुषों आदि पर किया जाता है। पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में अधिकतर शोध सीखने की प्रक्रिया तथा व्यवहार के जैविक पहलुओं के अध्ययन में किया गया है। पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में स्कीनर, गथरी, पैवलव, टॉलमैन आदि का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। सच्चाई यह है कि सीखने के आधुनिक सिद्घान्त तथा मानव व्यवहार के जैविक पहलू के बारे में हम आज जो कुछ भी जानते हैं, उसका आधार पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान ही है। इस मनोविज्ञान में पशुओं के व्यवहारों को समझने की कोशिश की जाती है। कुछ लोगों का मत है कि यदि मनोविज्ञान का मुख्य संबंध मानव व्यवहार के अध्ययन से है तो पशुओं के व्यवहारों का अध्ययन करना कोई अधिक तर्कसंगत बात नहीं दिखता। परंतु मनोविज्ञानियों के पास कुछ ऐसी बाध्यताएँ हैं जिनके कारण वे पशुओं के व्यवहार में अभिरुचि दिखलाते हैं। जैसे पशु व्यवहार का अध्ययन कम खर्चीला होता है। फिर कुछ ऐसे प्रयोग हैं जो मनुष्यों पर नैतिक दृष्टिकोण से करना संभव नहीं है तथा पशुओं का जीवन अवधि (life span) का लघु होना प्रमुख ऐसे कारण हैं। मानव एवं पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में कुछ मनोविज्ञानियों की संख्या का करीब 14% मनोविज्ञानी कार्यरत है।

 

4.     दैहिक मनोविज्ञान

दैहिक मनोविज्ञान में मनोविज्ञानियों का कार्यक्षेत्र प्राणी के व्यवहारों के दैहिक निर्धारकों (Physical determinants) तथा उनके प्रभावों का अध्ययन करना है। इस तरह के दैहिक मनोविज्ञान की एक ऐसी शाखा है जो जैविक विज्ञान (biological science) से काफी जुड़ा हुआ है। इसे मनोजीवविज्ञान (Psychobiology) भी कहा जाता है। आजकल मस्तिष्कीय कार्य (brain functioning) तथा व्यवहार के संबंधों के अध्ययन में मनोवैज्ञानिकों की रुचि अधिक हो गयी है। इससे एक नयी अन्तरविषयक विशिष्टता (interdisplinary specialty) का जन्म हुआ है जिसे ‘न्यूरोविज्ञान’ (neuroscience) कहा जाता है। इसी तरह के दैहिक मनोविज्ञान हारमोन्स (hormones) का व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन में भी अभिरुचि रखते हैं। आजकल विभिन्न तरह के औषध (drug) तथा उनका व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन दैहिक मनोविज्ञान में किया जा रहा है। इससे भी एक नयी विशिष्टता (new specialty) का जन्म हुआ है, जिसे मनोफर्माकोलॉजी (Psychopharmacology) कहा जाता है तथा जिसमें विभिन्न औषधों के व्यवहारात्मक प्रभाव (behavioural effects) से लेकर तंत्रीय तथा चयापचय (metabolic) प्रक्रियाओं में होने वाले आणविक शोध (molecular research) तक का अध्ययन किया जाता है।

बाजरा की खेती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न

 

बाजरा की खेती से महत्वपूर्ण प्रश्न जो PGT /TGT Agriculture मे पूछे जाते |

 

·        बाजरा के अन्य नाम- पर्ल मिलेट, बुलरस मिलेट, स्पकड मिलेट इत्यादि |

·        वानस्पतिक नाम- पेनिसेटम ग्लोकम

·        कुम- ग्रेमानी

·        उत्पत्ति- भारत ( कुछ विद्वानो के अनुसार अफ्रीका भी बताया जाता  है )

·        इसे गरीबो का भोजन कहा जाता है |

·        यह कम पानी वाली फसल है |

·        बाजरा में 11॰ 6 % प्रोटीन पायी जाती हए |

·        5 % वसा होता है |

·        बाजरा अनुसंधान केंन्द्र जोधपुर मे है |

बाजरा मनुष्य व पशु दोनों के काम आता है

मनुष्य – उवालकर, भून कर, रोटिया बनाकर, बियर बनती है |

पशु- हारा चारा, सूखा चारा, मुर्गी का भोजन आदि |

विश्व मे बाजरा – प्रमुख रूप में बाजरा उगाने वाले महादीप के नाम अफ्रीका, एवं एशिया महादीप आदि |

चीन, भारत, पाकिस्तान, अरब, फारस, मिस्त्र, दक्षिण, पश्चिम अफ्रीका, रूस, वेस्टाइडीज़ आदि |

भारत – अधिक वर्षा वाले क्षेत्रो को छोड़ कर अन्य सभी क्षेत्रो मे बाजरा पाया जाता है \

सर्वाधिक – राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश आदि |

उत्तर प्रदेश- आगरा, बरेली, कानपुर के पूरे मण्डल सर्वाधिक उगाया जाता है |

बाजरा के लिए उन्नतशील प्रजातियाँ- 

संकुल

राज-171,  आई.सी.टी.पी.-8203,  न.दे.यफ.बी.-3 (नरेन्द्र चारा बाजरा-3),  आई.सी.एम.बी-155 डब्लू.सी.सी.

संकर प्रजातियाँ –

पूसा-322, पूसा-23,  आई.सी.एम.एच.-451

भूमि का चुनाव –

बाजरा के लिए हल्की या दोमट बलुई मिट्टी उपयुक्त होती है। भूमि का जल निकास उत्तम होना आवश्यक हैं।

 

खेत की तैयारी  करना –

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा अन्य 2-3 जुताइयां देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करके खेत तैयार कर लेना चाहिए।

 

बुवाई का समय तथा बिधि-

बाजरे की बुवाई जुलाई के मध्य से अगस्त से मध्य तक सम्पन्न कर लें। बुवाई 50 सेमी. की दुरी पर 4 सेमी. गहरे कूंड में हल के पीछे करें।

बीज़ दर –

4-5 किलोग्राम प्रति हे |

 

बीज का उपचार –

यदि बीज उपचारित नहीं है तो बोने से पूर्व एक किग्रा. बीज को थीरम के 2.50 ग्राम से शोधित कर लेना चाहिए। अरगट के दोनों को 20 प्रतिशत नमक के घोल में डुबोकर निकाला जा सकता है।

 

उर्वरक का प्रयोग –

मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें। यदि परीक्षण के परिणाम उपलब्ध न हो तो संकर प्रजाति के लिए 80-100 किलोग्राम नत्रजन] 40 किलोग्राम फास्फोरस, एवं 40 किलोग्राम पोटाश तथा देशी प्रजाति के लिए 40-45 किग्रा. नत्रजन, 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हे. प्रयोग करें। फास्फोरस पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पहली बेसल ड्रेसिंग और शेष नत्रजन की आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में जब पौधे 25-30 दिन के हो जाने पर देनी चाहिए।

 

निराई-गुड़ाई –

बाजरा की खेती में निराई-गुड़ाई का अधिक महत्व है। निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही आक्सीजन का संचार होता है जिससे वह दूर तक फैल कर भोज्य पदार्थ को एकत्र कर पौधों को देती है।

सिचाई –

खरीफ में फसल की बुवाई होने के कारण वर्षा का पानी ही उसके लिए पर्याप्त होता है। इसके अभाव में एक या दो सिंचाई फूल आने पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए।

 

फसल सुरक्षा

रोग –

1 बाजरा का अरगट

पहचान

यह रोग केवल भुट्टों के कुछ दानों पर ही दिखार्इ देता हैं इसमें दाने के स्थान पर भूरे काले रंग के सींक के आकार की गांठे बन जाती है। जिन्हें स्केलेरेशिया कहते है। संक्रमित फूलों में फफूंद विकसित होती है जिनमें बाद में मधु रस निकलता है। प्रभावित दाने मनुष्यों एवं जानवरों के लिए हानिप्रद होते है।

 उपचार –

  • खेत की गहरी जुताई करें।
  • फसल चक्र सिद्धान्त का प्रयोग करें।
  • फसल एवं खरपतवारों के अवशेषों को नष्ट करें।
  • सिंचाई का समुचित प्रबन्ध करें।
  • उन्नतशील/संस्तुत प्रजातियों की ही बुवाई करें।
  • बीजशोधन हेतु थिरम 75 प्रतिशत डब्लू.एस.2.5 ग्राम अथवा कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 ग्राम अथवा मेटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू.एस. की 6.0 ग्राम प्रति किग्रा.बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए।
  • अप्रमाणित बीजों को 20 प्रतिशत नमक के घोल से शोधित कर साफ पानी से 4-5 बार धोकर बुवाई के लिए प्रयोग करना चाहिए।
  • निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे. बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिये।
  • जिरम 80 प्रतिशत डब्लू.पी.2.0 किग्रा. अथवा मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.0 किग्रा.

बाजरा का कंडुआ रोग –

पहचान

कन्डुआ रोग से बीज आकार में बड़े गोल अण्डाकार हरे रंग के होते हैं] जिसमें काला चूर्ण भरा होता हैं।

उपचार –

  • खेत की गहरी जुताई करें।
  • फसल चक्र सिद्धान्त का प्रयोग करें।
  • फसल एवं खरपतवारों के अवशेषों को नष्ट करें।
  • सिंचाई का समुचित प्रबन्ध करें।
  • रोग ग्रसित बालियों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिए
  • बीजशोधन हेतु थिरम 75 प्रतिशत डब्लू.एस. 2.5 ग्राम अथवा कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 ग्राम अथवा मेटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू.एस.की 6.0 ग्राम प्रति किग्रा.बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए।
  • निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे. बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए
  • जिरम 80 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 ग्राम अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 ग्राम अथवा मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.0 किग्रा.

बाजरे का हरित बाली रोग –

पहचानः इनमें बाजरा की बालियों के स्थान पर टेढ़ी-मेढ़ी हरी-हरी पत्तियॉ सी बन जाती हैं] जिससे पूर्ण बाली झाडू के समान दिखाई देती हैं। पौधों बौने रह जाते हैं।

उपचार –

  • खेत की गहरी जुताई करें।
  • फसल चक्र सिद्धान्त का प्रयोग करें।
  • फसल एवं खरपतवारों के अवशेषों को नष्ट करें।
  • सिंचाई का समुचित प्रबन्ध करें।
  • उन्नतशील /संस्तुत प्रजातियों की ही बुवाई करें।
  • रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी. अथवा थायोफिनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2 ग्राम मात्रा प्रति ली. पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तराल पर दो छिड़काव करना चाहिए।
  • अत्यधिक प्रकोप की दशा में ग्रसित पौधों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिए।

कीट

दीमक –

खड़ी फसल में प्रकोप होने पर सिंचाई के पानी के साथ क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. 2.5 ली. प्रति हे. की दर से प्रयोग करें।

2 सूत्रक्रमी –

रसायनिक नियंत्रण हेतु बुवाई से एक सप्ताह पूर्व खेत में 10 किग्रा. फोरेट 10 जी फैलाकर मिला दें।

3 ताना छेदक कीट -

निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे. बुरका/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किग्रा. अथवा फोरेट 10 प्रतिशत सी.जी. 20 किग्रा.अथवा डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. 1.0 ली. प्रति हे. अथवा क्युनालफास 25 प्रतिशत ई.सी 1.50 लीटर

 

प्रोहर मक्खी -

निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसाययन को प्रति हे. बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किग्रा. अथवा फोरेट 10 प्रतिशत सी.जी. 20 किग्रा. अथवा डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. 1.0 ली. प्रति हे. अथवा क्युनालफास 25 प्रतिशत ई.सी 1.50 लीटर

 

मुख्य बिन्दु –

  • क्षेत्र की अनुकूलता के अनूसार संस्तुत प्रजाति का शुद्ध बीज ही प्रयोग करें।
  • उपचारित बीज बोयें।
  • मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों को प्रयोग करें।
  • फूल आने पर वर्षा के अभाव में पानी अवश्य दें।
  • कीट/बीमारियों का समय से नियंत्रण अवश्य करें।