मध्य प्रदेश 30, 8,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल के साथ दूसरा सबसे
बड़ा भारतीय राज्य है। भौगोलिक दृष्टि से यह देश में एक केन्द्रीय स्थान रखता
है।
सम्राट अशोक ने सबसे पहले उज्जैन पर शासन किया। मध्य भारत का काफी बड़ा
हिस्सा गुप्त साम्राज्य (300-500 ईसवी) का भाग था। ग्यारहवीं
शताब्दी के प्रारंम्भ में मध्य भारत में मुसलमानों का आगमन हुआ। सबसे पहले
महमूद गज़नवी यहां आया और फिर मुहम्मद गौरी आया, जिसने वहां
के कुछ भागों को अपनी दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। मध्य भारत मुगल साम्राज्य
का भी हिस्सा रहा। मराठों का प्रभाव आरंभ होने से लेकर 1794
में माधवजी सिंधिया के देहांत तक मध्य भारत पर मराठों का बोलबाला रहा। परंतु उसके
बाद छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य बनने लगे। ये छोटे राज्य ही आगे चलकर ब्रिटिश सत्ता
के जमने का कारण बने।
इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर, गोंड की महारानी कमलापति
और रानी दुर्गावती आदि कुछ महान महिला शासकों ने अपने उत्कृष्ट शासन के लिए
भारतीय इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवा लिया। मध्य प्रदेश की स्थापना
1 नवंबर, 1956 का हुई। नया राज्य छत्तीसगढ़
बनाने के लिए हुए विभाजन के बाद यह अपने वर्तमान स्वरूप में 1 नवंबर, 2000 को अस्तित्व में आया। मध्य प्रदेश
उत्तर में उत्तर प्रदेश, पूर्व में छत्तीसगढ़ तथा पश्चिम
में राजस्थान और गुजरात, दक्षिण में महाराष्ट्र से घिरा
है।
कृषि
कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार है, क्योंकि राज्य की 74.73 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और खेती पर निर्भर है। राज्य
की करीब 49 प्रतिशत जमीन खेती योग्य है। 2010-11 में शुद्ध बुवाई क्षेत्र 2,08,36,000 हेक्टेयर
रहने का अनुमान था और अनाज का कुल उत्पादन 171.77 मिलियन
मीट्रिक टन रहा। गेहूं, चावल, दलहन
जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन भी अच्छा रहा।
उद्योग
और खनिज
मध्य प्रदेश ने इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, मोटरवाहनों, सूचना प्रौद्योगिकी आदि उच्च-तकनीकी
उद्योगों के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। दूरसंचार प्रणालियों के लिए यह राज्य
ऑप्टिकल फाइबर का उत्पादन कर रहा है। इंदौर के पास पीथमपुर में बड़ी संख्या में
मोटर-वाहन उद्योग स्थापित हुए हैं। राज्य में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख उद्योग
हैं—भोपाल में भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लि., होशंगाबाद में सिक्योरिटी पेपर मिल, देवास में नोट
छापने की प्रेस, नेपानगर में अखबारी कागज की मिल और नीमच की
अल्कालॉयड फैक्ट्री। गत वर्ष राज्य में सीमेंट का उत्पादन 12.49 लाख मीट्रिक टन हुआ। पीथमपुर में जल्दी ही एक मालवाहक विमान परिसर स्थापित
किया जा रहा है। भारत सरकार इंदौर में विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित कर रही है।
समग्र आर्थिक विकास नीति लागू कर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया जा
रहा है। राज्य में निवेश को आकर्षित करने के लिए आकर्षक छूट देने के लिए औद्योगिक
प्रोत्साहन नीति की घोषणा की है। भारत सरकार ने धार जिले के पीथमपुर में एक
राष्ट्रीय ऑटोमोटिव परीक्षण, अनुसंधान तथा विकास परियोजना को
मंजूरी दे दी है।
सिंचाई
और बिजली
2009-10 में कुल 65.43 लाख हेक्टेयर
इलाके में सिंचाई सुविधा उपलब्ध थी। मध्य प्रदेश में निम्न स्तर का कोयला प्रचुर
मात्रा में होता है, जो बिजली उत्पादन के अनुकूल है। पनबिजली
उत्पादन की भी यहां अपार क्षमता है। राज्य में विद्युत उत्पादन की कुल स्थापित
क्षमता 9658.45 मेगावाट थी। यहां 902.5 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता के आठ पनबिजली केंद्र हैं।
विकास
की पहल
मध्य प्रदेश ग्रामीण रोजगार योजना सभी 50 जिलों में लागू की गई
है। इस योजना को लागू करने में मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर है। राज्य में बागवानी
उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन शुरू किया गया है।
परिवहन
सड़कें: मध्य
प्रदेश में सड़कों की कुल लंबाई 91,968 किलोमीटर है।
राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 4,280 कि.मी. और प्रांतीय
राजमार्गों की लंबाई 8,729 कि.मी. है। राज्य में सड़कों के
निर्माण तथा सुधार का कार्य बड़े पैमाने पर किया जा रहा है तथा लगभग 70 हजार कि.मी. सड़कों का निर्माण तथा सुधार किया जाएगा।
रेलवे: उत्तर भारत को दक्षिण
भारत से जोड़ने वाला प्रमुख रेलमार्ग मध्य प्रदेश से होकर गुजरता है। राज्य में
भोपाल, बीना, ग्वालियर, इंदौर, इटारसी, जबलपुर,
कटनी, रतलाम और उज्जैन मुख्य जंक्शन हैं।
रेलवे के क्षेत्रीय मुख्यालय भोपाल, रतलाम और जबलपुर में
हैं।
त्योहार
मध्य प्रदेश में कई त्योहार और उत्सव मनाए जाते हैं। आदिवासियों का एक
महत्वपूर्ण त्योहार भगोरिया है, जो परंपरागत हर्षोल्लास से मनाया
जाता है। खजुराहो, भोजपुर, पचमढ़ी और
उज्जैन में शिवरात्रि के पर्व के दौरान स्थानीय परंपराओं का रंग दिखाई देता है।
चित्रकूट और ओरछा में रामनवमी पर्व के आयोजन की अनोखी परंपरा है। ओरछा, मालवा और पचमढ़ी के उत्सवों में कला और संस्कृति का बड़ा सुंदर मेल दिखाई
देता है। ग्वालियर के तानसेन संगीत समारोह, मैहर के उस्ताद
अलाउद्दीन खां संगीत समारोह, उज्जैन के कालिदास समारोह और
खजुराहो के नृत्य समारोह मध्य प्रदेश के कुछ प्रसिद्ध कला उत्सव हैं। जबलपुर में
संगमरमर की चट्टानों के लिए मशहूर भेड़ाघाट में वार्षिक नर्मदा उत्सव की शुरुआत की
गई है। शिवपुरी में भी शिवपुरी उत्सव शुरू किया गया है।
“आप
किसी राष्ट्र में महिलाओं की स्थिति देखकर उस राष्ट्र के हालात बता सकते हैं”
-जवाहरलाल
नेहरू
किसी भी राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में
महिलाओं की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। महिला और पुरुष दोनों समान रूप से
समाज के दो पहियों की तरह कार्य करते हैं और समाज को प्रगति की ओर ले जाते हैं।
दोनों की समान भूमिका को देखते हुए यह आवश्यक है कि उन्हें शिक्षा सहित अन्य सभी
क्षेत्रों में समान अवसर दिये जाएँ, क्योंकि
यदि कोई एक पक्ष भी कमज़ोर होगा तो सामाजिक प्रगति संभव नहीं हो पाएगी। परंतु देश
में व्यावहारिकता शायद कुछ अलग ही है, वर्ष
2011 की
जनगणना के अनुसार, देश
में महिला साक्षरता दर मात्र 64.46 फीसदी
है, जबकि
पुरुष साक्षरता दर 82.14 फीसदी
है। उल्लेखनीय है कि भारत की महिला साक्षरता दर विश्व के औसत 79.7 प्रतिशत से काफी कम है।
भारत में महिला
शिक्षा वर्तमान परिदृश
§भारत
में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की साक्षरता दर काफी कम है। वर्ष 2011 की जनगणना के आँकड़े दर्शाते हैं
कि राजस्थान (52.12 प्रतिशत)
और बिहार (51.50 प्रतिशत)
में महिला शिक्षा की स्थिति काफी खराब है।
§जनगणना
आँकड़े यह भी बताते हैं कि देश की महिला साक्षरता दर (64.46 प्रतिशत) देश की कुल साक्षरता दर
(74.04 प्रतिशत)
से भी कम है।
§बहुत
कम लड़कियों का स्कूलों में दाखिला कराया जाता है और उनमें से भी कई बीच में ही
स्कूल छोड़ देती हैं। इसके अलावा कई लड़कियाँ रूढ़िवादी सांस्कृतिक रवैये के कारण
स्कूल नहीं जा पाती हैं।
§कई
अध्ययनों के अनुसार, भारत
में 15-24 वर्ष
आयु वर्ग की युवा महिलाओं की बेरोज़गारी दर 11.5
प्रतिशत है, जबकि
समान आयु वर्ग के युवा पुरुषों के मामले में यह 9.8
प्रतिशत है।
§वर्ष
2018 में
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि 15-18 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 39.4 प्रतिशत लड़कियाँ स्कूली शिक्षा
हेतु किसी भी संस्थान में पंजीकृत नहीं हैं और इनमें से अधिकतर या तो घरेलू
कार्यों में संलग्न होती हैं या भीख मांगने जैसे कार्यों में।
§आँकड़े
यह भी बताते हैं कि भारत में अभी भी लगभग 145
मिलियन महिलाएँ हैं,
जो पढ़ने या लिखने में असमर्थ हैं।
§उल्लेखनीय
है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा स्थिति और अधिक
गंभीर है।
भारत में महिला
शिक्षा का इतिहास
भारत में महिला शिक्षा की वर्तमान स्थिति को समझने
के लिये आवश्यक है कि इतिहास में इसकी विकास यात्रा को भी समझा जाए। इसे मुख्यतः 3 भागों (1) प्राचीन वैदिक काल, (2) ब्रिटिश इंडिया और (3) स्वतंत्र भारत में विभाजित कर
देखा जा सकता है।
प्राचीन वैदिक काल
§भारत
में महिला शिक्षा का इतिहास प्राचीन वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। उल्लेखनीय है कि
लगभग 3000 से
अधिक वर्ष पूर्व वैदिक काल के दौरान महिलाओं को समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान
प्राप्त था और उन्हें पुरुषों के समान समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग समझा जाता था।
§वैदिक
अवधारणा के स्त्री शक्ति सिद्धांत के अनुसार, महिलाओं
की देवी के रूप में पूजा शुरू हुई- उदाहरण के लिये शिक्षा की देवी सरस्वती।
§वैदिक
शास्त्र कहते हैं कि “लड़कों
के साथ लड़कियों को उचित देखभाल के साथ पोषित और प्रशिक्षित किया जाना
चाहिये।"
§वैदिक
साहित्य में उन महिलाओं का भी उल्लेख किया गया है जिन्होंने वैदिक अध्ययन का
रास्ता चुना।
ब्रिटिश इंडिया
§इस
काल में पहला ऑल-गर्ल्स बोर्डिंग स्कूल वर्ष 1821
में दक्षिण भारत के तिरुनेलवेली में स्थापित किया गया
था।
§वर्ष
1840 तक
स्कॉटिश चर्च सोसाइटी द्वारा दक्षिण भारत में निर्मित छह स्कूल मौजूद थे जिनमें
कुल 200 लड़कियों
का नामांकन कराया गया था।
§वर्ष
1848 में
पुणे में गर्ल्स स्कूल की शुरुआत करने वाले ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्री
बाई पश्चिमी भारत में भी महिला शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी थे।
§पश्चिम
भारत में महिला शिक्षा की शुरुआत पुणे में गर्ल्स स्कूल के निर्माण के साथ हुई
जिसे वर्ष 1848 में
ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्री बाई ने शुरू किया था।
§उल्लेखनीय
है कि 1850 तक
मद्रास मिशनरियों ने स्कूल में लगभग 8,000
से अधिक लड़कियों का नामांकन कराया था।
§ईस्ट
इंडिया कंपनी के कार्यक्रम वुड्स डिस्पैच ने वर्ष 1854
में महिलाओं की शिक्षा और उनके लिये रोज़गार की
आवश्यकता को स्वीकार किया।
§वर्ष
1879 में
स्थापित बेथ्यून कॉलेज वर्तमान में एशिया का सबसे पुराना महिला कॉलेज है।
§गौरतलब
है कि महिलाओं की समग्र साक्षरता दर वर्ष 1882
में 0.2
प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 1947 में 6 प्रतिशत हो गई।
स्वतंत्र भारत
§स्वतंत्रता
के समय देश में महिला साक्षरता दर काफी कम थी, जिसे
सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए
वर्ष 1958 में
सरकार ने महिला शिक्षा पर एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया, जिसकी सभी सिफारिशें स्वीकार कर ली गईं। इन
सिफारिशों का सार यह था कि महिला शिक्षा को भी पुरुष शिक्षा के सामानांतर पहुँचाया
जाए।
§वर्ष
1959 में
इसी विषय पर गठित एक समिति ने लड़कों और लड़कियों के लिये एक समान पाठ्यक्रम को
विभिन्न चरणों में लागू करने की सिफारिश की।
§वर्ष
1964 में
स्थापित शिक्षा आयोग ने बड़े पैमाने पर महिला शिक्षा के विषय में बात की और वर्ष 1968 में भारत सरकार से एक राष्ट्रीय
नीति विकसित करने की सिफारिश की।
महिला शिक्षा की
आवश्यकता
§महिलाओं
को शिक्षित करना भारत में कई सामाजिक बुराइयों जैसे- दहेज़ प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या और कार्यस्थल पर उत्पीड़न आदि को
दूर करने की कुंजी साबित हो सकती है।
§यह
निश्चित तौर पर देश के आर्थिक विकास में भी सहायक होगा, क्योंकि अधिक-से-अधिक शिक्षित महिलाएँ देश के श्रम
बल में हिस्सा ले पाएंगी।
§हाल
ही में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा एक सर्वेक्षण जारी किया गया है, जिसमें बच्चों की पोषण स्थिति और उनकी माताओं की
शिक्षा के बीच सीधा संबंध दिखाया गया है।
§इस
सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि महिलाएँ जितनी अधिक शिक्षित होती हैं, उनके बच्चों को उतना ही अधिक पोषण आधार मिलता है।
§इसके
अलावा कई विकास अर्थशास्त्रियों ने लंबे समय तक इस विषय का अध्ययन किया है कि किस
प्रकार लड़कियों की शिक्षा उन्हें परिवर्तन के एजेंट के रूप में उभरने में सक्षम
बनाती है।
महिला शिक्षा के
मार्ग में बाधाएँ:
§भारतीय
समाज पुरुष प्रधान है। महिलाओं को पुरुषों के बराबर सामाजिक दर्जा नहीं दिया जाता
है और उन्हें घर की चहारदीवारी तक सीमित कर दिया जाता है। हालाँकि ग्रामीण
क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में स्थिति अच्छी है, परंतु इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आज
भी देश की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है।
§हम
दुनिया की सुपर पॉवर बनने के लिये तेज़ी से प्रगति कर रहे हैं, परंतु लैंगिक असमानता की चुनौती आज भी हमारे समक्ष
एक कठोर वास्तविकता के रूप में खड़ी है। यहाँ तक कि देश में कई शिक्षित और कामकाजी
शहरी महिलाएँ भी लैंगिक असमानता का अनुभव करती हैं।
§समाज
में यह मिथ काफी प्रचलित है कि किसी विशेष कार्य या परियोजना के लिये महिलाओं की
दक्षता उनके पुरुष समकक्षों के मुकाबले कम होती है और इसी कारण देश में महिलाओं
तथा पुरुषों के औसत वेतन में काफी अंतर आता है ।
§देश
में महिला सुरक्षा अभी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है,
जिसके कारण कई अभिभावक लड़कियों को स्कूल भेजने से
कतराते हैं। हालाँकि सरकार द्वारा इस क्षेत्र में काफी काम किया गया है, परंतु वे सभी प्रयास इस मुद्दे को पूर्णतः संबोधित
करने में असफल रहे हैं।
महिला शिक्षा हेतु
सरकार के प्रयास
§‘बेटी बचाओ, बेटी
पढ़ाओ’ की
शुरुआत वर्ष 2015 में
देश भर में घटते बाल लिंग अनुपात के मुद्दे को संबोधित करने हेतु की गई थी। यह
महिला और बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य
एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा मानव संसाधन मंत्रालय की संयुक्त पहल है। इसके तहत
कन्या भ्रूण हत्या रोकने, स्कूलों
में लड़कियों की संख्या बढ़ाने, स्कूल
छोड़ने वालों की संख्या को कम करने, शिक्षा
के अधिकार के नियमों को लागू करने और लड़कियों के लिये शौचालयों के निर्माण में
वृद्धि करने जैसे उद्देश्य निर्धारित किये गए हैं।
§कस्तूरबा
गांधी बालिका विद्यालय योजना की शुरुआत वर्ष 2004
में विशेष रूप से कम साक्षरता दर वाले क्षेत्रों में
लड़कियों के लिये प्राथमिक स्तर की शिक्षा की व्यवस्था करने हेतु की गई थी।
§महिला
समाख्या कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1989
में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के लक्ष्यों के अनुसार महिलाओं की
शिक्षा में सुधार व उन्हें सशक्त करने हेतु की गई थी।
§यूनिसेफ
भी देश में लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने हेतु भारत सरकार के साथ
काम कर रहा है।
§इसके
अलावा महिला शिक्षा के उत्थान की दिशा में झारखंड ने भी एक बड़ी पहल की है। झारखंड
स्कूल ऑफ एजुकेशन ने कक्षा 9 से
12वीं
तक की सभी छात्राओं को मुफ्त पाठ्य पुस्तक, यूनिफॉर्म
और नोटबुक बाँटने का फैसला किया है।
विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग , 1948-49 ( University Education Commission , 1948-49 ) ( रापाकृष्णन आयोग )
ब्रिटिश शासन के अन्तिम 50 वर्षों में भारत में उप शिक्षा का विकास अत्यन्त तीव्र गति से हुआ या । इस अवधि में कई विश्वविद्यालयों की स्थापना भी हुई । परन्तु यह वृद्धि संख्यात्मक अधिक थी तथा गुणामक कम थी । परिणामतः प्रम शिक्षा का स्तर गिरने लगा । सन् 1947 में जब भारत ने स्वाधीनता प्राम की तो यह महसूस किया जाने लगा कि उस शिक्षा में ध्यान कमियों को दूर करके राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप उस शिक्षा का पुनर्गठन करना अत्यन्त आवश्यक है । अन्तर्विश्वविद्यालय परिषद् ( Inter - University Board ) तथा केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद ( Central Advisory Board on Education ) ने भी तत्कालीन विश्वविद्यालयी शिक्षा की स्थिति पर विचार किया तथा एक प्रस्ताव पारित किया कि भारत सरकार भारतीय विश्वविद्यालयों का मार्ग दर्शन करने के लिए एक ऐसा आयोग गठित को जो देश की वर्तमान तथा भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालयी शिक्षा में सुधार लाने तया इसका विकास करने के लिए मुनाव प्रस्तुत करें । इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने 4 नवम्था , सन् 1948 को डा ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ( University Education Commission ) का गठन किया । इस आयोग के अनलिखित सदस्य
अध्यक्ष - डा ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन , प्रोफेसर , पूर्वी धर्म तथा नीति शास्त्र , आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय
सदस्य -
1. डा ० तारा चन्द्र , सचिव तथा शिक्षा सलाहकार , भारत सरकार
2. डा ० जेम्स एफ ० इफ्फ , कुलपति , दुरहान विश्वविद्यालय
3. डा ० जाकिर हुसैन , कुलपति , अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय , अलीगढ़
4. डा ० आर्थर इ ० मार्गन , पूर्व अध्यक्ष , एन्टोख कालिज
6. डा ० मेघनाद साहा , विज्ञान संकायाध्यक्ष , कलकत्ता विश्वविद्यालय
7. डा ० कर्म नारायण बहल , प्रोफेसर , जन्तुविज्ञान विभाग , लखनऊ विश्वविद्यालय
8. डा ० जान जे ० टिगर्ट , मानद अध्यक्ष , फ्लोरिडा विश्वविद्यालय
सचिव - निर्मल कुमार सिद्धान्त , प्रोफेसर , अंग्रेजी विभाग तथा कला संकापाध्यक्ष , लखनऊ विश्वविद्यालय , लखनऊ
डा ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित इस आयोग को उस शिक्षा से सम्बन्धित निम्न बिन्दुओं पर विचार करके अपनी संस्तुतियाँ देने का कार्य सौंपा गया -
भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा तथा अनुसंधान के उद्देश्य
विश्वविद्यालयों के विधानों , नियन्त्रण , कार्य तथा क्षेत्र में आवश्यक व वांछनीय परिवर्तन
विश्वविद्यालयों की वित्त व्यवस्था
शिक्षण तथा परीक्षा के उस स्तर को बनाये रखना
विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम
विश्वविद्यालयों में प्रवेश के पानक
विश्वविद्यालयों में शिक्षण का माध्यम
भारतीय संस्कृति , इतिहास , साहित्य , भाषा , दर्शन व ललित कलाओं के उस अध्ययन का प्रावधान
क्षेत्रीय अथवा अन्य आधारों पर विश्वविद्यालयों की आवश्यकता
उच्च अनुसंधान
विश्वविद्यालयों में धार्मिक शिक्षा
अध्यापकों की योग्यता , सेवा शर्त , बेतन तथा कार्य
छात्र अनुशासन व छात्रावास
अखिल भारतीय स्तर की संस्थाओं की समस्याएँ
विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग , जिसे इसके अध्यक्ष के नाम पर राधाकृष्णन आयोग भी कहा जाता है , ने उय एवं विश्वविद्यालयी शिक्षा के सम्बन्ध में प्रश्नावली तथा साक्षात्कार के द्वारा सूचनाएँ संकलित की तथा इनका विश्लेषण किया । सभ्यक विचार - विनर्श के उपरान्त आयोग ने 25 अगस्त 1949 को 740 पृष्ठों का अपना प्रतिवेदन भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया । इस आयोग ने उच्च शिक्षा के विभिन्न पक्षों जैसे उप शिक्षा के उद्देश्य , अध्यापकों की सेवाशर्ती , शिक्षा के स्तर , पाट्यक्रम , व्यावसायिक शिक्षा , परीक्षा प्रणाली , छात्र कल्याण , अर्थव्यवस्था आदि के सम्बन्ध में अनेक बहुमूल्य सुझाव दिये । आयोग की प्रमुख संस्नुतियाँ अपांकित थीं :
1. विश्वविद्यालय शिक्षा के उद्देश्य ( ( Objectives of University Education )
आयोग ने उच्च शिक्षा के उद्देश्यों पर विचार करते हुए ऐसे शिक्षित नागरिक तैयार करने पर बल दिया जो विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान कर सकें , प्रजातान्त्रिक मूल्यों को स्थापित करें , सांस्कृतिक धरोहर व मूल्यों को बनाये रखें , नैतिक चरित्र , उग्र आदर्शों से युक्त हो , राष्ट्रीय एकता य अनुशासन में सहायक हों तथा स्वयं को अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना व भाई - चारे के लिए समर्पित कर सकें ।
2 . अध्यापक कल्याण ( Teacher's Welfare )
शिक्षा प्रक्रिया के गुणवत्ता उन्नयन में अध्यापकों के महत्व को स्वीकार करते हुए आयोग ने अध्यापकों के वेतनमान व सेवशता में सुधार करने तथा उन्हें भविष्यनिधि , जीवन बीमा , पेंशन व आवास की सुविधाएं देने की सिफारिश की ।
3 . उच्च शिक्षा का स्तर ( Standard of Higher Education )
उस शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारने के लिए आयोग ने विश्वविद्यालयों व कालेजों में छात्रों की संख्या नियन्त्रित करने , विश्वविद्यालयी शिक्षा से पूर्व 12 वर्ष की शिक्षा प्राप्त करने , माध्यमिक शिक्षकों के लिए अभिनव पाठ्यक्रमों की व्यवस्था करने , कम से कम 180 दिन कार्य दिवस रखने , पुस्तकालयों को समृद्ध करने , प्रयोगशालाओं का आधुनिकीकरण करने तथा उत्तीर्ण प्रतिशतांक बढ़ाने का सुझाव दिया ।
4 . अध्ययन पाठ्यक्रम ( Courses of Study )
विशिष्टीकरण की अति को दूर करने के लिए आयोग ने सामान्य शिक्षा के सिद्धान्त को अविलम्ब अपनाने का सुझाव दिया ।
5 . स्नातकोत्तर शिक्षा का अनुसंधान ( Post - Graduate Education and Research )
आयोग ने कहा कि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में एक विशिष्ट विषय का अध्ययन व अनुसंधान विधि को रखा जाये , पी ० एच ० डी ० के छात्रों का चयन अखिल भारतीय स्तर पर किया जाये , शिक्षा मन्त्रालय द्वारा बड़ी संख्या में छात्रवृत्तियाँ दी जायें तथा अध्यापक - छात्र सम्बन्धों में घनिष्ठता लाई जाये जिससे अनुसंधान कार्य का गुणात्मक स्तर सुधर सके ।
6 . वृत्तिक शिक्षा ( Professional Education )
आयोग ने कृषि , वाणिज्य , शिक्षा , अभियान्त्रिकी व तकनीकी , कानून तथा चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र सुधार करने के लिए अनेक संस्तुतियाँ की ।
7.शिक्षा का माध्यम Medium of Instruction )
आयोग ने शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में सिफारिश की थी कि अन्तर्राष्ट्रीय भाषाओं के शब्दों को यथावत् स्वीकार कर लेना चाहिए , अंग्रेजी के स्थान पर किसी आधुनिक भारतीय भाषा को उप शिक्षा का माध्यम बनाया जाना चाहिए तथा उच्च स्तर पर त्रिभाषा सूत्र के अन्तर्गत प्रादेशिक भाषा , संधीप भाषा व अंग्रेजी का अध्ययन कराया जाना चाहिए ।
8. परीक्षा प्रणाली ( Examination System )
आयोग ने परीक्षा प्रणाली में आमूल - चूल परिवर्तन करने तथा वस्तुनिष्ठ परीक्षा का आयोजन करने की महत्वपूर्ण सिफारिश की थी । आयोग ने कहा कि कम से कम 5 वर्ष का अनुभव प्राप्त शिक्षकों को परीक्षक नियुक्त किया जाये तया प्रथम श्रेणी 70 %% , द्वितीय श्रेणी 55 % व तृतीय श्रेणी 40 % पर रखने तथा कृपांक प्रणाली बन्द करने का सुझाव दिया ।
9.धार्मिक शिक्षा ( Religious Education )
आयोग ने सभी धर्मों को शिक्षा व महापुरुषों के जीवनवृत्तान्तों को पाठ्यक्रम में स्थान देने का मुनाव दिया जिससे छात्रों में सभी धर्मों के प्रति आदर उत्पन्न हो सके ।
10. छात्र कल्याण ( Student Welfare )
आयोग ने छात्रों के हितों का ध्यान रखने के लिए विश्वविद्यालयों तथा कालेजों में छात्र कल्याण परिषदें बनाने का सुझाव दिया ।
11. ग्रामीण विश्वविद्यालय ( Rural University )
कृषि शिक्षा के विकास के लिए राधाकृष्णन आयोग ने ग्रामीण विश्वविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की । आयोग ने कहा कि इनमें भूमि सुधार , अभियन्त्रण , जल नियन्त्रण अभियन्त्रण , ग्रामीण उद्योग , ग्राम्य कलाएँ , ग्राम्य चिकित्सा , ग्राम्य समाज - शास्त्र , ग्राम्य प्रशासन , विकसित ग्राम्य प्रशासन , विकसित ग्राम्य नियोजन जैसे पाठ्यक्रम चलाये जायें ।
12. संविधान तथा नियन्त्रण ( Constitution and Control )
आयोग ने विश्वविद्यालय शिक्षा को संविधान की समवर्ती सूची ( Concurrent List ) में रखने का सुझाव दिया । आयोग के अनुसार वित्त सुविधाओं के समन्यय , राष्ट्रीय नीतियों के अंगीकरण , प्रभावी प्रशासन के स्तर को बनाये रखने तथा विश्वविद्यालयों व राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के बीच सम्पर्क जैसे कार्य हेतु सरकार का उत्तरदायित्व होना चाहिए ।
13. अर्थ - व्यवस्था ( Educational Finance )
आयोग ने उच्च शिक्षा की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए अधिक मात्रा में अनुदान देने की सिफारिश की तथा केन्द्रीय अनुदान आयोग की स्थापना का सुझाव किया ।
14. नारी शिक्षा ( Women Education )
आयोग ने नारी शिक्षा का तेजी से विकास करने की सिफारिश की तया कहा कि लड़कियों के लिए गृह - अर्थशास्त्र - नर्सिंग , व ललितकला जैसे विषयों की शिक्षा व्यवस्था की जानी चाहिए । वस्तुतः विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने विश्वविद्यालयी शिक्षा के संतुलित विकास की दृष्टि से इसके विभिन्न पक्षों का विस्तृत विवेचन करके अपने बहुमूल्य सुझाव दिये । यदि ये सुझाव स्वीकार कर लिये गये होते तो सम्भवतः भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा की रूपरेखा ही बदल गई होती । परन्तु अनेक राजनैतिक , आर्थिक व अन्य व्यावहारिक कारणों से इस आयोग की अनेक सिफारिशें स्वीकार नहीं की जा सकीं । परन्तु फिर भी इस आयोग की सिफारिशों ने भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा के विकास में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अदा की एवं इसे एक नई दिशा व गति प्रदान की ।
2. माध्यमिक शिक्षा आयोग , 1952-53
( Secondary Education Commission, 1952-53 )
मुदलियार आयोग
स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त यद्यपि विश्वविद्यालय शिव के विकास के सम्बन्ध में एक आयोग का गठन किया जा चुका था तथापि शैक्षिक क्षेत्रों में यह महसूस किया जा रहा था कि माध्यमिक शिक्षा के सम्बन्ध में विस्तृत ढंग से विचार किया जाना चाहिए जिससे माध्यमिक शिक्षा को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके । सन् 1949 में केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद् ने सरकार से आग्रह किया कि वह माध्यमिक शिक्षा के अध्ययन के लिए एक आयोग का गठन करें । सन् 1951 में केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद ने अपने इस सुझाव को पुनः दोहराया । केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद की इस सिफारिश को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने 23 सितम्बर सन् 1952 को डा ० मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया । इस आयोग में निम्न सदस्य थेः
अध्यत - डॉ ० ए ० लक्ष्मण स्वामी मुदालियर , कुलपति , मद्रास विश्वविद्यालय
एम ० टी ० व्यास , प्राचार्य , न्यू इरा स्कूल , बम्बई
के ० जी ० सैयेदेन , सह सचिव , शिक्षा मन्त्रालय , भारत सरकार
सदस्य सचिव - ए ० एन ० वसु , सेन्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ एजूकेशन , दिल्ली
सहायक सचिव - डा ० एस ० एम ० एम ० चारी , ऐजूकेशन आफिसर , शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार
डॉ ० मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग को भारत में माध्यमिक शिक्षा के सभी पक्षों की वर्तमान स्थिति को जाँच करके उस पर आख्या देने एवं सम्पूर्ण राष्ट्र में हमारी आवश्यकताओं व संसाधनों के अनुरूप एक सुसंगठित व उचित समानता वाली माध्यमिक शिक्षा प्रणाली प्रदान करने के लिए निम बिन्दुओं के सन्दर्भ में उपाय सुझाने का कार्य दिया गया था -
माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्य , संगठन तथा विषयवस्त
इसका प्राथमिक , थेसिक तथा उप शिक्षा से सम्बन्ध
विभिन्न प्रकार के माध्यमिक स्कूलों में परस्पर सम्बन्ध
अन्य समस्याएँ स्पष्ट है कि इस आयोग
शिक्षा आयोग , 1964-66
( Education Commission , 1964-66 )
3. ( कोठारी आयोग )
स्वतन्त्रता के उपरान्त शिक्षा का अत्यन्त तीब्रगति से विकास हुआ , परन्तु यह विकास केवल मख्यात्मक या गुणात्मक नहीं । इसके साथ - साथ संविधान में शिक्षा के प्रति किये गये संकल्पों को भी पूरा नहीं किया जा सका जिससे शिक्षा क्षेत्रों में असन्तोष प्रकट किया जाने लगा तथा स्वतन्त्रोत्तर भारत में शिक्षा के समस्त पकों की विस्तारपूर्वक जाँच करने के लिए एक आयोग के गठन की मांग की जाने लगी । सामाजिक आर्षिक व राजनैतिक क्षेत्रों से भी सभी स्तरों की शिक्षा में सुधार करने की माँग की जा रही थी , तब ।। जुलाई सन् 1964 को भारत सरकार ने डा ० दौलत सिंह कोटारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग के गटन की घोषणा की । आयोग के सदस्य इस प्रकार से थे ।
अध्यक्ष -
प्रो ० दौलत सिंह कोठारी , अध्यक्ष , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग , नई दिल्ली
सदस्य -
श्री ए ० आर ० दाबौद , पूर्व - कार्यकारी निदेशक , माध्यमिक शिक्षा प्रसार कार्यक्रम निदेशालय , नई दिल्ली
मि ० एच ० एल ० एल्विन , निदेशक , इन्स्टीट्यूट ऑफ ऐजूकेशन , लन्दन विश्वविद्यालय , लन्दन
श्री आर ० ए ० गोपालस्वामी , निदेशक , प्रयुक्त जनशक्ति अनुसंधान संस्थान , नई दिल्ली
प्रो ० सदातोशी इहारा , स्कूल आफ साइंस एंड इन्जीनियरिंग , वासेदा विश्वविद्यालय , टोक्यो
प्रो ० एम ० ए ० शुमोवस्की , गोपे सर , भौतिकशास्त्र , मास्को विश्वविद्यालय , मास्को
श्री एम ० जीन टामस , इन्स्पेक्टर जनरल , शिक्षा , फ्रांस
सदस्य सचिनश्री जे ० पी ० नायक , अध्यक्ष शैक्षिक नियोजन , प्रशासन व वित्त विभाग , गोखले इनटीट्यूट ऑफ पोलिटिक्स एंड इकोनोमिक्स , पूना
सहसचिवमि ० जे ० एफ ० मैक्लूगल , उप निदेशक , डिपार्टमेन्ट आफ स्कूल एंड हायर एजूकेशन , यूनेस्को , पेरिस
कोटारी आयोग ने अपने कार्य को पूरा करने के लिये 12 मुख्य कार्य दल तया 7 सहायक कार्यदल बनाये । इन कार्यदलों ने लगभग 100 दिन तक राष्ट्र के विभिन्न राज्यों के स्कूलों , कालेजों तथा विश्वविद्यालयों का भ्रमण किया तथा लगभग 9000 व्यक्तियों से साक्षात्कार किया । आयोग ने 2400 में अधिक लिखित उत्तरों का विश्लेषण भी किया तथा इन सभी सूचनाओं के आधार पर 673 पृटों का प्रतिवेदन तैयार किया जिसे 20 जून 1966 को भारत सरकार को समर्पित किया गया । आयोग ने अपने विस्तृत प्रतिवेदन में शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर सघन प्रकाश डाला तथा राष्ट्रीय उत्थान में शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में विकसित करने की दृष्टि से अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये ।
संस्कृत आयोग , 1956-57 ( Sanskrit Commission 1956-57 )
संस्कृत शिक्षा , संस्कृत भाषा के शिक्षण , संस्कृत विश्वविद्यालयों की दशा , संस्कृत पाण्डुलिपियों के संरक्षण तथा संस्कृत भाषा में अनुसंधान कार्य सम्बन्धी विभिन्न ज्वलन्त प्रकरणों पर विचार करने के लिए भारत सरकार के द्वारा अक्टूबर 1956 में संस्कृत आयोग का गठन किया गया था । इस आयोग के अध्यक्ष डा ० सुनीति कुमार चटर्जी अध्या , विधान परिषद , पश्चिम बंगाल थे एवं इसके सात अन्य सदस्य थे । आयोग के सदस्यों के नाम निम्नवत थे
अध्यक्ष डा ० सुनीति कुमार दवे
सदस्य-
प्रो ० एस ० के ० डे
श्री टी ० आर ० वी ० मूर्ति
श्री जे ० एच ० दवे
डा ० वी ० राघवन
श्री वी ० एस ० रामचन्द्रन शास्त्री
श्री विश्व वन्धु शास्त्री
डॉ० आर ० एन ० डाँडेकर
संस्कृत भाषा , शिक्षण उपयोग तथा संरक्षण के विभिन्न पदों पर विचार विमर्श करने के लिए हाल गुरीति कुमार घटी की अध्यक्षता में गठित इस आयोग को निम दो प्रमुख कार्य सौंपे गये थे
विश्वविद्यालयों तथा अन्य संरखानों में संस्कृत शिक्षा के लिए उपलब्य मुविधाओं का सर्वेक्षण करके अनुसंधान सहित संस्कृत के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए प्रस्ताव देना ।
आधुनिक शिक्षा में उपयोगी ग से समाहित किये जा सकने वाली विशेषताओं को जानने की दृषि से संस्कृत शिक्षा की परम्परागत प्रणाली का परीक्षण करना ।
संस्कृत आयोग के द्वारा नवम्बर 1957 में अपना प्रतिवेतन भारत सरकार को प्रस्तुत किया गया जिसमें का शीर्षकों
संस्कृत शिक्षा ,
संस्कृत शिक्षण ,
संस्कृत अनुसंधान ,
पाणडुलिपियाँ ,
संस्कृत विश्वविद्यालप ,
सामान्य-
के अन्तर्गत संस्तुतियाँ प्रस्तुत की गई थी । इस आशंग के द्वारा की गई कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ अप्रांकित प्रस्तुत है
संस्कृत शिक्षा
सभी विद्यालयों में अनिवार्य रूप से संस्कृत शिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
माध्यमिक विद्यालयों में मातृभाषा ( पा क्षेत्रीय भाषा ) , अंग्रेजी तथा संस्कृत पढ़ाई जानी चाहिए । कुछ विशेष स्थितियों में संस्कृत के स्थान पर अन्य प्राचीन भाषाएं जैसे अरबी , फारसी , प्राचीन तमिल , सटिन या ग्रीक पढ़ाई जा सकती है ।
विद्यालय स्तर पर हिन्दी को चतुर्थ भाषा के रूप में न पाकर मातृभाषा व संस्कृत के शान के आधार पर कालिज स्तर पर पाया जाना चाहिए ।
सामाजिक अध्ययन के अन्तर्गत भी संस्कृत में अभिव्यक्त विचार , संस्कृति व साहित्य प्रस्तुतियों को सम्मिलित करना चाहिए ।
संस्कृत शिक्षा व डा अध्ययन की परम्परागत पाट्याला प्रणाली को न केवल जारी रखा जाये बरन अन्य प्रकार की शिक्षा प्रणाली के समान मान्य प्रणाली के रूप में स्वीकार किया जाये ।
भारत में कोई विश्वविद्यालय ऐसा नहीं होना चाहिए जहाँ पर संस्कृत बिभाग अथवा संस्कृत पीठ न हो ।
संस्कृत पाठशाला प्रणाली तथा संस्कृत शिक्षा की विश्वविद्यालयी प्रणाली में समन्वय करना उचित नहीं है परन्तु दोनों प्रणालियों को परस्पर सहयोग से कार्य करना चाहिए ।
स्त्रातक तथा मरास्त्रताक स्तरों पर अन्य भारतीय भाषाओं के विशेष अध्ययन में संस्कृत को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए ।
संस्कृत की विशेष प्रकृति को ध्यान में रखकर स्कूल स्तर पर संस्कृत शिक्षा में कुछ रटन्त स्मरण की अनुमति दी जानी चाहिए ।
पाठ्यवस्तु के अध्ययन को गहराई से कराने की दृष्टि से कालेज स्तर पर पाठों की संख्या कम करनी चाहिए ।
संस्कृत पाठशालाओं का अध्यपन कम अधिक व्यापक होना चाहिए एवं किसी एख शास्त्र में अत्यधिक संकुचित निपुणता कराने से बचना चाहिए ।
विभिन्न शास्त्रों के अध्यपन के समय छात्राओं को पाश्चात्य विचारों में तत्समय हुए वैचारिक विकास का मान दिया जाना चाहिए ।
संस्कृत अनुसंधान
संस्कृत पाठशालाओं से पढ़कर निकले छात्रों के लिए विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों से पद छात्रों के समान विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग इतने सम्पन्न होने चाहिए कि शिक्षण कार्य के कारण अनुसंधान कार्य पर कोई दुष्परिणाम न पड़ सके ।
विभिन्न विश्वविद्यालयों में संस्कृत के क्षेत्र में किये गये अनुसंधान के परिणामों को प्रकाशित करने की सुविधाएं , उपलब्ध कराई जानी चाहिए ।
संस्कृत अनुसंधान के प्यापक हितों की रक्षा के लिए संस्कृत के पूर्व में जारी वृहत प्रोजेक्टों को पूरा करने के लिए सहायता दी जानी चाहिए । (
भारत सरकार को केन्द्रीय भारतीय अध्ययन संस्थान स्थापित करना चाहिए ।
संस्कृत तथा भारतीय अध्ययन सम्बन्धी कार्यों पर साहित्य अकादमी की तर्ज पर पुरस्कार दिये जाने चाहिए ।
पांडुलिपियां
संस्कृत में किये जाने वाले अनुसंधानों की विषयवस्तु , तथा उनका स्तर मुख्यतः पाण्डुलिपियों में वर्णित सामग्री पर ही निर्भर करता है ।
भारत सरकार को देशभर में तितर - बितर विखरी पाण्डुलिपियों के रखरखाव व संरक्षण के सम्बन्ध में विशेष ध्यान देना चाहिए ।
संस्कृत विश्वविद्यालय
संस्कृत शिक्षा की परम्परागत प्रणाली के उन्नयन तया उसके आधुनिकीकरण के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में संस्कृत विश्वविद्यालय खोले जाने चाहिए ।
संस्कृत विश्वविद्यालयों का कार्य संस्कृत पाठशालाओं व संस्कृत महाविद्यालयों में समन्वय करना , उनके पाठ्यक्रमों का संचालन व निरीक्षण करना तथा परीक्षाओं का संचालन करना होना ।
सामान्य संस्तुतियाँ
हिन्दी व अंग्रेजी के साथ - साथ संस्कृत को अतिरिक्त कार्यालयी भाषा घोषित करना चाहिए ।
विभिन्न पदों की शपथ लेने , शपथ पत्र दाखिल करने , राष्ट्रीय सम्मानों की प्रस्तुति तथा विश्वविद्यालयों के दीक्षान्त समारोह आदि में संस्कृत को अधिकृत ढंग से प्रयोग में लाया जाना ।
संस्कृत साहित्य के अर्थ व स्रोतों , विशेषकर श्लोकों व सुभाषितों का स्कूलों व महाविद्यालयों में नैतिक व धार्मिक शिक्षा के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए ।
संस्कृत के लिए देवनागरी को एक समान लिपि के रूप में अपनाते हुए छात्रों को पढ़ाई जानी
संस्कृत साहित्य तथा भारतीय विधारों व दर्शन में वेदों के महत्व को देखते हुए उनकी मौखिक परम्परा के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ।
अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा तथा विदेश सेवा के प्रशिक्षण में संस्कृत विचारों तथा भारतीय संस्कृति के ज्ञान के व्याख्यानों का विशेष रूप से आयोजन किया जाना चाहिए । संस्कृत का नहीं ।
संस्कृत का सरल रूप जपनाया जा सकता है परन्तु व्याकरण से मुक्त होने वाली सरलीकृत संस्कृति का नही ।
राष्ट्रीय अध्यापक आयोग- प्रथम 1983-85 ( National Commission on Teachers - I 1983-85 )
राष्ट्र के विकास व पुननिर्माण के कार्य में अध्यापकों के माल व उनकी भूमिका को स्वीकार करते हुए वर्ष 1983 भारत सरकार ने अध्यापकों पर दो राष्ट्रीय आयोगों का गठन च्यिा जिनमें से एक को विद्यालयी स्तर के शिक्षकों तथा दूसरे को उस शिक्षा स्तर के शिक्षकों के सम्बन्ध में विचार - विमर्श करके अपनी संस्तुतियाँ देनी थी । विद्यालयी स्तर के शिक्षकों के लिए बने आयोग को अध्यापक राष्ट्रीय आयोग प्रपन ) कहा गया तथा इसके सदस्य निमवत् ।
अध्यक्ष - प्रो ० डी ० पी ० पटोपाध्याय ।
सदस्य -
प्रो ० पी ० जी ० कुलकर्णी
प्रो ० सत्य भूषण
कामोडोर सतवीर
डा ० पी ० एल ० मल्होत्रा
डॉ० टी ० वी कुनाकल
डा ० के ० कटावरमनियन
श्रीहरी डंग
श्री वेद प्रकाश
मुश्री मरी गांजा
डॉ० ( श्रीमती ) चित्रा नायक
हामृगूवती शाह
कुछ अहल्या धारी
डा ० एम ० पी ० छाया
श्री एच ० मुखर्जी
डा ० एम ० मोहिओद्दीन
श्री डेविड होगुंग
डॉ० काल वासुदेव
श्री अनिल सदगोपाल
सदस्य सचिव- श्री किरीट जोशी इस आयोग को अध्यापन मृत्ति के उद्देश्यों को निर्धारित करने , अध्यापकों को उचित सम्मान दिलाने के उपाय बनाने , अध्यापन गत्यामकता माने , प्रतिभाशाली व्यक्तियों को अध्यापन में आकर्षित करने , पूर्व पारत अध्यापक प्रशिक्षण की समीक्षा करने , अध्यापकों के लिए आधार संहिता तैयार करने , शिक्षक संघों की भूमिका को रेखांकित करने तथा अध्यापक कल्याण के उपाय मुझाने जैगे अनेक महत्वपूर्ण अर्य सीप गये थे । आयोग ने वर्ष 1985 में अध्यापक तथा समाज ( The teacher and Society ) नामक अपना प्रतिवेदन भारत सरकार को सौंपा । आयोग का मानना था कि राष्ट्र के अध्यापकों के कल्याण व उनकी स्थिति में गुपार करने का संकल्प करना चाहिए एवं शिक्षकों को अपने कर्तव्यों व अपनी वृत्तिक योग्यता बढ़ाने के लिए समर्पित होना चाहिए ।
इस आयोग को प्रमुख संस्तुतियां निमबत् थी : "
एकीकृत धर्मनिरपेक्ष भारत , आधुनिक राष्ट्र , उत्पादनशील व्यक्ति व मानवीय समाज के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्रति हेतु शिक्षा को एक शक्तिशाली साधन स्वीकार करना चाहिए ।
शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्रप्ति में अध्यापकों की सर्वाधिक महत्वपर्ण भूमिका है । अध्यापकों को इस हेतु समर्पण के साथ सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए ।
शिक्षा की राष्ट्रीय प्रणाली स्कूली शिक्षा की सार्थकता व संदर्भता को बढ़ाना चाहिए तथा कार्य संसार की मांग के अनुरूप व्यापार व उद्योगों से सम्पर्क रखना चाहिए ।
सार्थभौधिक प्रारम्भिक शिक्षा को लागू करने का सर्वाधिक प्रभावी ढंग स्कूल संकुल या शिक्षा गंकुल है तथा इसके लिए व्यापक जनान्दोलन चलाने चाहिए ।
जबतक अध्यापकों की स्थिति उग्र नहीं होगी तब तक योग्य व्यक्तियों को आकर्षित करना कठिन होगा । अतः अध्यापकों की सामाजिक व आर्षिक स्थिति बढ़ाई जानी चाहिए तथा उन नीतिगत व क्रियाचपन में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करनी चाहिए ।
अध्यापकों के वेतन एक समान व उप होने चाहिए जिससे वे अपने पारबारिक व वृत्तिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन समुचित ढंग से कर सकें ।
इस आयोग के द्वारा वर्ष 1985 में अपनी आख्या प्रस्तुत करने के बावजूद लगभग दो वर्षों तक इसकी संस्तुतियों को सार्वजनिक नहीं किया गया एवं इसकी संस्तुतियों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया । वस्तुतः शिक्षकों के लिए पूरी तरह से समर्पित इस आयोग की संस्तुतियों के प्रति केन्द्र सरकार पूरी तरह से लापरवाह रही एवं आयोग का प्रतिवेदन गुमनामी के अंधेरे में खो गया । परिणामतः भारतीय शिक्षा के इतिहास में पहली बार अध्यापकों के लिए गठित आयोग की सिफारिशों के आधार पर कोई कार्यवाही न हो सकी ।
राष्ट्रीय अध्यापक आयोग - द्वितीय 1983-85 ( National Commission on Teachers - II 1983-85 )
भारतीय शिक्षा के इतिहास में प्रथम बार अध्यापकों के लिए गठित दो आयोगों में से दूसरा आयोग प्रो ० बस अहमद की अध्यक्षता में गठित किया गया था जिसे उस स्तर की शिक्षा , जिसमें तकनीकी शिक्षा भी सम्मिलित है , में कार्यरत अध्यापकों से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार करके संस्तुइत देने का कार्य सीमा गया था । इस आयोग को निम को नामित किया गया था
अध्यक्ष- प्रो . रईस अहमद
सदस्य-
प्रो . एल . सी . पाराशर
प्रो . इकवात नारायण
प्रो . एस . बी . वित्तीवायू
डॉ . बी . सी . पारेख
प्रो . बी आनन्द स्वरूप
प्रो . एस . एस . बल
प्रो . एस . रामसेशन
डॉ . हेमलता स्वरूप
डॉ . एस.एस. बलियाथन
डॉ . बी . के . आनन्द
प्रो . मुनीस रजा
डॉ . ए . आर . वर्मा
प्रो . दुर्गानन्द सिन्हा
प्रो . आर . सी . महरोत्रा
डॉ . ( श्रीमती ) अनीता बनर्जी
प्रो . एस . इजहार हुसैन
प्रो . आर . पी . बम्वाह
प्रो . एस . कृष्णास्वामी
डॉ . ( कु . ) एस . एम . लूयरा
सदस्य सचिव - श्री किरीट जोशी इस आयोग का कार्य स्कूली स्तर के लिए गठित आयोग के समान ही था । इस आयोग का मुख्य कार्य उच्च शिक्षा स्तर पर अध्यापकों की सेवाशर्ती , प्रशिक्षण नियुक्ति अर्थात् पदोन्नति तया अध्यापकों की भूमिका को सुदृढ़ करने सम्बन्धी विभिन्न समस्याओं का अध्ययन करके अपने सुझाय प्रस्तुत करने थे । इस आयोग ने मार्च 1985 में अपनी आख्या प्रस्तुत कर दी थी परन्तु उसे सन् 1987 में ही सार्वजनिक किया जा सका था । इस आयोग की प्रमुख संस्तुतियों निम्नवत् थीं -
ज्ञान के विस्तार वाले वर्तमान युग में शिक्षक की भूमिका परिवर्तन के ऐसे एजेन्ट की होनी चाहिए जो शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक हो सकें ।
अध्यापकों को नये साधनों के प्रयोग का प्रशिक्षण दिया जाये जिससे वे समुदाय व सरकार के सहयोगी के रूप में अपने उत्तरदायित्वों को पूरा कर सकें ।
अध्यापन वृत्ति की वर्तमान सामाजिक स्वीकृति बहुत निम्न स्तर की है । वेतन व सेवाशतों में सुधार लाकर एवं वृत्तिक योग्यता व समर्पण को बढ़ाकर इसका उन्नयन किया जाना चाहिए ।
रहन - सहन व कार्य की दशाओं , आवास सुविधा एवं चिकित्सीय देखभाल जैसी सुविधाओं को उपलब्ध कराया जाना चाहिए ।
शिक्षकों की अकादमिक स्वतन्त्रता बढ़ाने तया उनको विश्वविद्यालयों की कार्य परिषदों व सीनेटों में कम से कम आधे स्थान दिये जाने चाहिए ।
अध्यापकों को अपनी स्वयं की मूल्य प्रणाली का अवलोकन करके उच्चतम स्तर के नैतिक परित्र का प्रदर्शन करना चाहिए |
यह एक आश्चर्य का विषय है कि इस आयोग के प्रतिवेदन को लगभग दो वर्षों तक सार्वजनिक नहीं किया गया एवं इसकी संस्तुतियों को लागू करने की दिशा में भी कोई ठोस कदम सरकार के द्वारा मात्र या ना कि इस दिशा में कोई सार्थक कदम उठाकर शिक्षक की स्थिति का उन्नयन करने का कोई सुविधारित संकल्प था । कुछ भी क्यों न हो इन दोनों आयोगों ने शिक्षकों की समस्याओं को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण कार्य अवश्य किया ।
स्वतन्त्रता के उपरान्त भारत में अनेक शिक्षा आयोगों तथा समितियों का गठन किया गया । इन आयोगों तथा समितियों ने अपने - अपने क्षेत्र की शिक्षा समस्याओं पर विचार - विमर्श किया तथा अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये । शिक्षा प्रणाली से सम्बन्धित इन आयोगों के द्वारा दिए सुझावों के आधार पर स्वतन्त्र भारत में शिक्षा के विकास को महत्वपूर्ण दिशा प्रदान की गई ।
राधाकृष्णन् आयोग- सन् 1948-49 में डा ० राधाकृष्णन् की अध्यक्षता में गठित किए गये विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने उच्च शिक्षा के उद्देश्यों , अध्यापक कल्याण , शिक्षा के स्तर , सातकोत्तर शिक्षा , अनुसंधान , शिक्षा के माध्यन , परीक्षा प्रणाली , धार्मिक शिक्षा , छात्र कल्याण , ग्रामीण विश्वविद्यालयों की स्थापना , नारी शिक्षा तथा अर्थ व्यवस्था आदि में सुधार के लिए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये ।
मुदालियर आयोग - सन् 1952-53 में डा ० लक्ष्मण स्यामी मुदालियर की अध्यक्षता में गठित किए गये माध्यमिक शिक्षा आयोग ने माध्यमिक शिक्षा में सुधार लाने के लिए अनेक सुझाव दिए । इस आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्यों , माध्यमिक शिक्षा के पुनर्गठन , बहु - उद्देश्यीय विद्यालयों , त्रिभाषा सूत्र का पाठ्यक्रम , पाठ्यपुस्तकों , परीक्षा प्रणाली , अध्यापकों की सेवा शर्ते , निरीक्षण , न्यूनतम कार्य दिवस आदि से सम्बन्धित अनेक सिफारिशें की थी ।
कोठारी आयोग - सन् 1964-66 में डा ० दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन किया गया था । इस आयोग ने सभी स्तरों की शिक्षा के सम्थन्ध में विचार - विमर्श किया तथा भारत सरकार को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था । आयोग ने राष्ट्रीय विकास में शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में विकसित करने के लिए राष्ट्रीय उद्देश्य बताये तथा सम्पूर्ण राष्ट्र में एक समान शिक्षा संरचना लागू करने की सिफारिश की । आयोग ने अध्यापक प्रशिक्षण , शैक्षिक समानता , स्कूल शिक्षा के विस्तार , पाठ्यक्रम , शिक्षण पद्धति य निरीक्षण , उच्च शिक्षा के उद्देश्यों व कार्यक्रम , विश्वविद्यालयों की व्यवस्था , कृषि तकनीकी , व्यावसायिक व इंजीनियरिंग शिक्षा अनुसंधान , प्रौढ़ - शिक्षा , नियोजन व प्रशासन तथा शैक्षिक वित्त - प्रबन्ध जैसे विषयों पर विस्तार से अध्ययन करने के सुझाव प्रस्तुत किए ।
संस्कृत आयोग - सन् 1956-57 में संस्कृत भाषा व शिक्षा की विभिन्न समस्याओं पर विचार करने के लिए डॉ . सुनीति कुमार घटी की अध्यक्षता में संस्कृत आयोग का गठन किया गया था । इन आयोग ने संस्कृत शिक्षा , संस्कृत शिक्षण , संस्कृत अनुसंधान , पाण्डुलिपियाँ संस्कृति विश्वविद्यालय तथा सामान्य नामक छह शीर्षकों में अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्तुतिया की आयोग संस्कृत की शिक्षा व शिक्षण पर जोर देते हुए संस्कृत विश्वविद्यालय खोलने व संस्कृत में अनुसंधान की आवश्यकता पर ध्यान केन्द्रित किया । आयोग ने संस्कृत भाषा को राष्ट्र के पुरातन गौरव से जोड़ने तथा प्राशनिक सेवाओं में इसे सम्मिलित करने व कार्यालयी भाषा बनाने का सुझाव भी दिया ।
राष्ट्रीय अध्यापक आयोग , प्रथम - विद्यालयी स्तर के अध्यापकों से सम्बन्धित समस्याओं पर विचार करने के लिए सन् 1983-85 में प्रो ० डी ० पी ० चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में इस आयोग का गठन किया गया था । इस आयोग ने अध्यापन वृत्ति के उद्देश्य , अध्यापक सम्मान , अध्यापक प्रशिक्षण , आचार संहिता , अध्यापक कल्याण तथा प्रतिभाशाली व्यक्तियों को अध्यापन में आर्पित करने जैसी विभिन्न मुद्दों पर भारत सरकार को सुझाव दिये । परन्तु केन्द्र सरकार की निष्क्रियतता से इस आयोग की आख्या अध्यापकी की समस्याओं की ओर लालफीता शाही के कारण कोई विशेष ध्यान आकर्षित नहीं कर सकी ।
राष्ट्रीय अध्यापक आयोग , द्वितीय - तकनीकी शिक्षा सहित उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अध्यापकों के लिए भी सन् 1983-85 में प्रो ० रईस अहमद की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था जिसने विश्वविद्यालय स्तर पर अध्यापकों की सेवा शता , प्रोत्रति प्रावधानों तथा प्रशिक्षण से सम्बन्धित समस्याओं का विश्लेषण करके अनेक महत्वपूर्ण सुझाव अपने प्रतिवेदन में प्रस्तुत किये । विद्यालयी स्तर की तरह से इस आयोग की संस्तुतियाँ भी उपेक्षित रही तया कालान्तर में गुमनामी के अंधेरों में खो गई ।