तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज
चौहान की पराजय के पश्चात दिल्ली में तुर्क शासकों का राज्य स्थापित हो गया । इन
तुर्क शासकों का रहन - सहन , भाषा , धर्म तथा शासन करने का तरीका भारतीय शासकों से अलग था । तुर्क शासक सुल्तान
की उपाधि धारण करते थे । इन्होंने दिल्ली को शासन का केन्द्र बनाया और लगभग 320 साल तक शासन किया ।
मोहम्मद गोरी की मृत्यु 1206 ई0 में हो गई । उसके मृत्यु के समय तक लगभग पूरा
उत्तर भारत उसके अधीन हो चुका था । उसने भारत में शासन चलाने के लिए गुलाम अधिकारी
नियुक्त कर रखे थे । इन्हीं में एक योग्य गुलाम अधिकारी कुतुबुद्दीन ऐबक था । गोरी
की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वयं को भारत में तुर्क
राज्य का शासक घोषित कर दिया । यह तुर्क राज्य अब ' तूर्क सल्तनत ' कहलाया । अगले शासक इल्तुतमिश ने 1210
ई0 में सत्ता संभालने के साथ दिल्ली को
अपनी राजधानी बनाया । तब यह दिल्ली सल्तनत के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।
आपको इस बात से हैरानी हो
सकती है पर उन दिनों गुलाम रखने की प्रथा थी । तुर्किस्तान के । युवकों को खरीद कर
उन्हें युद्ध और प्रशासन के काम में प्रशिक्षण देकर सुल्तानों को बेचा जाता था ।
इसलिए वे गुलाम कहलाते थे । सुल्तान की सेवा में आने पर , योग्य और
होनहार गुलामों को ऊँचे और ज़िम्मेदारी के पद भी सौंपे जाते थे । सुल्तान मोहम्मद
गोरी की सेवा में भी ऐसे कई गुलाम थे और भारत में उसके राज्य का शासन चलाते थे ।
सल्तनत ( सुल्तनत ) के
सामने चुनौतियाँ-
सरदार जिन्हें ' अमीर ' कहा जाता था , तुर्क और अफगान कबीलों के होते थे ।
इनमें जातीय श्रेष्ठता तथा सल्तनत में ऊँचा स्थान पाने की भी होड़ रहती थी ।
इन्हीं आमीर सारद्वारों में से ही सुल्तान होता था । सुल्तान होने के लिए सैनिक
योग्यता एवं शासकीय क्षमता का होना आवश्यक था । इन क्षमताओं के प्रभाव से वह
सुल्तान बन सकता था और तभी तुर्क अमीरों का समर्थन प्राप्त करना भी सम्भव था ।
सुल्तान के लिए अमीर सरदारों का समर्थन और विश्वास जरूरी था । उसे हमेशा भय रहता
था कि कहीं ये अमीर सरदार आपस में मिलकर कोई षड्यंत्र न करें । अतः सुल्तान का
अधिकांश समय इन गुप्त षड्यंत्रों से बचने के उपायों में बीतता था । सुल्तानों को
इन अमीर सरदारों में संतुलन भी बनाए रखना
पड़ता था ।
सुल्तान इस्लाम धर्मावलम्बी थे तथा
बाहरी देशों से आए थे इसलिए भारतीय जनता पर शासन करने के । लिए तुर्क अमीरों , उलेमा ( धार्मिक वर्ग ) आदि को खुश करने के साथ ही
हिन्दुस्तानी जनता से भी सतर्क रहते । थे क्योंकि सल्तनत में विद्रोहों का भय
हमेशा बना रहता था । सल्तनत कालीन शासकों ने आन्तरिक शान्ति बनाए रखने के लिए
शासकीय प्रबन्ध तंत्र तथा राज्य । विस्तार एवं बाह्य आक्रमणों से रक्षा के लिए
मजबूत सैन्य संगठन भी बनाए । इनमें प्रारम्भिक खिलजी
वंश , तुगलक वश , सैय्यद वंश एवं लोदी वंश प्रमुख थे ।
' प्रारम्भिक तर्कशासक -
गुलाम वंश ( 1206 ई0 - 1290 ई० )
कुतुबुद्दीन ऐबक-
कुतुबुद्दीन ऐबक को भवन निर्माण में भी रुचि थी । उसने
दिल्ली में कुतुबमीनार , कुन्चत - उल - इस्लाम मस्जिद
और अजमेर में ' अढाई दिन का झोपडा का निर्माण
कराया
पूर्ण इल्तुतमिश ने कराया ।
कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में एक नये राज्य की नींव अवश्य
डाली , पर
उस राज्य को सुदृढ बनाने का अवसर उसे नहीं
मिल पाया । कुतुबुद्दीन ऐबक की
मृत्यु 1210 ई0 में चौगान
खेलते हुए घोड़े से गिर कर हो गई ।
1210 ई0 में कुतुबुददीन ऐबक की मृत्यु
पश्चात दिल्ली के अमीरों ने इल्तुतमिश को गद्दी पर बैठाया । उसे ही उत्तरी भारत में तुर्को के
राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है । गददी पर बैठने के बाद उसे आन्तरिक और
बाहरी समस्याओं से जूझना पड़ा । इल्तुतमिश ने चालीस गुलाम सरदारों का संगठन अर्थात
तुर्कान - ए - चेहलगानी का निर्माण किया ।
इल्तुतमिश का साम्राज्य-
शासन व्यवस्था
इल्तुतमिश ने देश में एक राजधानी , एक स्वतंत्र राज्य , राजतंत्रीय प्रशासनिक व्यवस्था और ।
अफसरशाही व्यवस्था की स्थापना की । उसने दिल्ली को भारत वर्ष में तुर्क साम्राज्य
का राजनैतिक , प्रशासनिक
और सांस्कृतिक केन्द्र बनाया । उसने ' इक्ता ( अक्ता ) व्यवस्था के द्वारा केन्द्र को
प्रान्तीय और स्थानीय शासन से जोड़ने की नींव डाली ।
सुल्तान ने अपनी सल्तनत ( राज्य ) को कछ प्रांतों में बॉटा ।
प्रांतों को इक्ता कहते था हर इक्ते सुल्तान अपने एक जिम्मेदार सेनापति को नियक्त
करता था , जिसे इक्तादार या अवतादार कहा जाता था
क्या पिछली कक्षा में आपने स्थानीय शासन की ऐसी किसी
सुनियोजित व्यवस्था के बारे में पढ़ा है ? सोचिए और बताइए । -
इक्तादार के पास
अपनी सेना होती थी और प्रशासन चलाने के लिए अधिकारी होते थे । इक्तादार इनकी
सहायता से राज्य की रक्षा करते थे और अपने नियंत्रण क्षेत्रों से कर वसूल करते थे
। अपने इक्ते से इकट्ठे किए गए कर से ही वे अपना , अपने अधिकारियों का और अपने सैनिकों का
खर्चा चलाते थे । इस खर्च के उपरान्त जो कर बचता था उसे इक्तादार सुल्तान को भेज
देते थे ।
इल्तुतमिश ने
मुद्रा व्यवस्था में सुधार करते हुए चाँदी का टंका और ताँबे जीतल चलाया । 1236
ई० में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई उसने
अपने जीवन काल में अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था ।
इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी बना दिया
था परन्तु सरदारों तथा उलेमा के विरोध के
चलते इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद । उसका पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठ गया
लेकिन दुर्बल शासक होने के कारण 1236 ई० में रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठी और सुल्तान कहीं जाने लगी
।
रजिया से पूर्व प्राचीन मिस्र
और ईरान में महिलाओं ने रानियों के रूप में | शासन किया था परन्तु
मध्यकालीन विश्व में पहली मुस्लिम महिला शासक थी ।
रजिया ने लगभग तीन
वर्ष आठ माह शासन किया । रज़िया ने स्त्रियों का पहनावा छोड़ दिया और बिना पर्दे
के दरबार में बैठने लगी । वह युद्ध में सेना का नेतृत्य करती । अमीरों को शीघ्र ही
पता लग गया कि स्त्री होने पर भी रजिया उनके हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं
थी । तुर्क सरदार भी किसी महिला के आधीन कार्य करने को तैयार नहीं थे । उन्होंने
एक षड्यंत्र के द्वारा उसे गद्दी से हटा दिया । रजिया के बाद उसका एक भाई एवं दो
भतीजे बारी - बारी से सुल्तान बने , जो अयोग्य थे । अतः इल्तुतमिश के छोटे पौत्र नासिरुद्दीन महमूद
को दिल्ली का सुल्तान बनाया गया ।
सोचिए और बताइए कि उस समय लोगों व दरबारी अमीरों ने
रजिया का विरोध क्यों किया होगा ? यदि रजिया आज शासक होती तो
क्या उसका विरोध होता ?
नासिरुद्दीन महमूद ( 1246ई0 - 1265ई0 )
" चालीस तुर्की सरदारों का दल " इस
समय अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था । वे जिसे चाहते गद्दी से उतार देते थे और जिसे
चाहते गद्दी पर बैठा देते थे । 1246 ई0 में
इस दल ने इल्तुतमिश के पौत्र नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बना दिया ।
महमद ने एक अमीर
जिसका नाम बलबन था को अपना नायक बनाया । बलबन धीरे - धीरे अपनी स्थिति सदृढ़ कर ली और
वह एक शक्तिशाली सरदार बन गया । 1266 ई0 में
नासिसददी । महमूद के बाद बलबन गद्दी पर बैठा ।
बलबन एक योग्य और अनुभवी शासक था । उसने अपने शासन काल में कई
महत्त्वपूर्ण कार्य किए । उसने दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए लिया आस - पास के
जंगलों को कटवाया तथा साफ़ करवाकर वहाँ पुलिस चौकियों का निर्माण कराया । इस
प्रकार वह दिल्ली के आसपास रहने वाले मेवातियों के विद्रोह को रोकने में सफल रहा ।
मेवातियों के अलावा उसने अन्य विद्रोहों का भी दमन किया ।
बलबन ने कानून
को लागू करने में कठोरता बरती । उसने राजा के पद को प्रतिष्ठित बनाया । वह राजा को
धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानता था । बलबन का मानना था कि राजा को ईश्वर से शक्ति
प्राप्त होती है । इसलिए उसके कार्यों की सार्वजनिक जाँच नहीं की जा सकती । इससे
उसकी निरंकुशता सुरक्षित होती थी । इसलिए वह दरबार में अत्यंत गम्भीर मुद्रा में
बैठला था । वह न तो कभी मज़ाक करता था और न ही हँसता था । उसने दरबार में
निर्धारित ढंग से वस्त्र पहनकर आने , बैठने आदि के बारे में नियम बनाए जिनका कठोरता से पालन किया
जाता था । बलबन ने दरबार में सिजदा एवं पासबोस
परम्परा प्रारम्भ कराई । उसने सुदृढ़ गुप्तचर व्यवस्था बनाई जिससे राज्य की पूरी
खबरें गुप्तचर सुल्तान को देते थे । बलबन की प्रमुख विशेषता थी कि उसने सदैव न्याय
को सुल्तान का प्रमुख कार्य समझा । उसने शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना पर
भी ध्यान दिया । सैनिकों को संतुष्ट रखने के लिये उसने उनका वेतन सदैव समय पर दिया
। उन्हें सक्रिय रखने के लिए निरन्तर अभ्यास पर बल दिया ।
मंगोल आक्रमण

यह नए आक्रमणकारी मंगोल थे , जिन्हें उस महान साम्राज्य के लिए सबसे
अधिक जाना जाता है , जिसका
गठन उन्होंने चंगेज खों के नेतृत्व में किया । तेरहवीं सदी का अंत होते - होते
मंगोल साम्राज्य ज्ञात दुनिया के बड़े भाग तक फैल चुका था । चंगेज खाँ के नेतृत्व में उनकी शक्ति बहुत बढ़ गई थी
।
चंगेज खाँ मंगोल आक्रमण की भयंकरता को बलबन भलीभाँति
अनुभव करता था । इसलिए उन्हें रोकने के लिए उसने मंगोलों के मार्ग में पड़ने वाले
पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा नये दुर्गा का निर्माण करवाया । वहाँ पर
हृष्टपुष्ट सैनिकों एवं विश्वसनीय और अनुभवी अधिकारियों को नियुक्त किया । शस्त्र
तथा भोजन आपूर्ति की पूर्ण व्यवस्था भी वहाँ पर की गई ।
फारसी
शब्द ' मुगल ' का उद्भव मंगोल शब्द से हुआ है ।
उसकी मृत्यु के बाद दिल्ली
की गद्दी पर उसके वंश का शासन अधिक दिन तक न रह पाया , परन्तु दिल्ली को जो शक्ति बलबन ने
प्रदान की , उसी
के परिणामस्वरूप खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सफल
रहा ।
शब्दावली-
मलिक - सरहद और पंजाब के मुसलमानों की एक सम्मानजनक
उपाधि ।
इक्ता - प्रान्तों को इक्ता कहते थे ।
मंगोल - मध्य एशिया , तिब्बत एवं चीन के क्षेत्रों में रहने
वाली जाति । ।
सिजदा - घुटने पर बैठकर सुल्तान के सामने सिर झुकाना
पायबोस - सुल्तान के
चरणों को चूमना ।
नोट :-
प्रारम्भिक तुर्क वंश (गुलाम वंश )
1206-1290
⇓
⇓
इल्तुतमिश 1210-1236
⇓
⇓
रज़िया सुल्तान
1236-1240
⇓
नासिरुद्दीन
महमूद 1246-1265
⇓
गयासुद्दीन
बलबन 1265-1287
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