सल्तनत काल की शुरुआत इतिहास 2

सल्तनत काल की शुरुआत

तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के पश्चात दिल्ली में तुर्क शासकों का राज्य स्थापित हो गया । इन तुर्क शासकों का रहन - सहन , भाषा , धर्म तथा शासन करने का तरीका भारतीय शासकों से अलग था । तुर्क शासक सुल्तान की उपाधि धारण करते थे । इन्होंने दिल्ली को शासन का केन्द्र बनाया और लगभग 320 साल तक शासन किया ।

मोहम्मद गोरी की मृत्यु 1206 0 में हो गई । उसके मृत्यु के समय तक लगभग पूरा उत्तर भारत उसके अधीन हो चुका था । उसने भारत में शासन चलाने के लिए गुलाम अधिकारी नियुक्त कर रखे थे । इन्हीं में एक योग्य गुलाम अधिकारी कुतुबुद्दीन ऐबक था । गोरी की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वयं को भारत में तुर्क राज्य का शासक घोषित कर दिया । यह तुर्क राज्य अब ' तूर्क सल्तनत ' कहलाया । अगले शासक इल्तुतमिश ने 1210 0 में सत्ता संभालने के साथ दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया । तब यह दिल्ली सल्तनत के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।



आपको इस बात से हैरानी हो सकती है पर उन दिनों गुलाम रखने की प्रथा थी । तुर्किस्तान के । युवकों को खरीद कर उन्हें युद्ध और प्रशासन के काम में प्रशिक्षण देकर सुल्तानों को बेचा जाता था । इसलिए वे गुलाम कहलाते थे । सुल्तान की सेवा में आने पर , योग्य और होनहार गुलामों को ऊँचे और ज़िम्मेदारी के पद भी सौंपे जाते थे । सुल्तान मोहम्मद गोरी की सेवा में भी ऐसे कई गुलाम थे और भारत में उसके राज्य का शासन चलाते थे

सल्तनत ( सुल्तनत ) के सामने चुनौतियाँ-

        सरदार जिन्हें ' अमीर ' कहा जाता था , तुर्क और अफगान कबीलों के होते थे । इनमें जातीय श्रेष्ठता तथा सल्तनत में ऊँचा स्थान पाने की भी होड़ रहती थी । इन्हीं आमीर सारद्वारों में से ही सुल्तान होता था । सुल्तान होने के लिए सैनिक योग्यता एवं शासकीय क्षमता का होना आवश्यक था । इन क्षमताओं के प्रभाव से वह सुल्तान बन सकता था और तभी तुर्क अमीरों का समर्थन प्राप्त करना भी सम्भव था । सुल्तान के लिए अमीर सरदारों का समर्थन और विश्वास जरूरी था । उसे हमेशा भय रहता था कि कहीं ये अमीर सरदार आपस में मिलकर कोई षड्यंत्र न करें । अतः सुल्तान का अधिकांश समय इन गुप्त षड्यंत्रों से बचने के उपायों में बीतता था । सुल्तानों को इन अमीर सरदारों में संतुलन भी बनाए रखना पड़ता था ।

      सुल्तान इस्लाम धर्मावलम्बी थे तथा बाहरी देशों से आए थे इसलिए भारतीय जनता पर शासन करने के । लिए तुर्क अमीरों , उलेमा ( धार्मिक वर्ग ) आदि को खुश करने के साथ ही हिन्दुस्तानी जनता से भी सतर्क रहते । थे क्योंकि सल्तनत में विद्रोहों का भय हमेशा बना रहता था । सल्तनत कालीन शासकों ने आन्तरिक शान्ति बनाए रखने के लिए शासकीय प्रबन्ध तंत्र तथा राज्य । विस्तार एवं बाह्य आक्रमणों से रक्षा के लिए मजबूत सैन्य संगठन भी बनाए । इनमें प्रारम्भिक खिलजी वंश , तुगलक वश , सैय्यद वंश एवं लोदी वंश प्रमुख थे ।

' प्रारम्भिक तर्कशासक - गुलाम वंश ( 1206 0 - 1290 ई० )  
कुतुबुद्दीन ऐबक-

           
          1206 ई . में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के पश्चात उसका तुर्क गुलाम कुतुबुददीन ऐबक उत्तर भारत का पहला तुर्की शासक बना । कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया । उसकी उदारता के कारण ही उसे लाखबख्श कहा जाता था , अर्थात वह लाखों का दान करने वाला दानप्रिय व्यक्ति था । भारतवर्ष में उसके जीवन का अधिकांश कुतुबमीनार समय सैनिक चित्र देखकर बताइए कि कुतुबमीनार गतिविधियों में ही बीता । कितने मंजिल की है ?
कुतुबुद्दीन ऐबक को भवन निर्माण में भी रुचि थी । उसने
दिल्ली में कुतुबमीनार , कुन्चत - उल - इस्लाम मस्जिद
और अजमेर में ' अढाई दिन का झोपडा का निर्माण कराया
। कुतुबमीनार की शुरुआत ऐबक ने की थी परन्तु इसको
पूर्ण इल्तुतमिश ने कराया ।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में एक नये राज्य की नींव अवश्य
डाली , पर उस राज्य को सुदृढ बनाने का अवसर उसे नहीं
मिल पाया । कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु 1210 0 में चौगान
खेलते हुए घोड़े से गिर कर हो गई ।

इल्तुतमिश ( 1210 0 - 1236 ई० )


  1210 0 में कुतुबुददीन ऐबक की मृत्यु पश्चात दिल्ली के अमीरों ने इल्तुतमिश को गद्दी पर बैठाया । उसे ही उत्तरी भारत में तुर्को के राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है । गददी पर बैठने के बाद उसे आन्तरिक और बाहरी समस्याओं से जूझना पड़ा । इल्तुतमिश ने चालीस गुलाम सरदारों का संगठन अर्थात तुर्कान - ए - चेहलगानी का निर्माण किया ।


           इल्तुतमिश का साम्राज्य-



शासन व्यवस्था
इल्तुतमिश ने देश में एक राजधानी , एक स्वतंत्र राज्य , राजतंत्रीय प्रशासनिक व्यवस्था और । अफसरशाही व्यवस्था की स्थापना की । उसने दिल्ली को भारत वर्ष में तुर्क साम्राज्य का राजनैतिक , प्रशासनिक और सांस्कृतिक केन्द्र बनाया । उसने ' इक्ता ( अक्ता ) व्यवस्था के द्वारा केन्द्र को प्रान्तीय और स्थानीय शासन से जोड़ने की नींव डाली ।

सुल्तान ने अपनी सल्तनत ( राज्य ) को कछ प्रांतों में बॉटा । प्रांतों को इक्ता कहते था हर इक्ते सुल्तान अपने एक जिम्मेदार सेनापति को नियक्त करता था , जिसे इक्तादार या अवतादार कहा जाता था
क्या पिछली कक्षा में आपने स्थानीय शासन की ऐसी किसी सुनियोजित व्यवस्था के बारे में पढ़ा है ? सोचिए और बताइए । -

    इक्तादार के पास अपनी सेना होती थी और प्रशासन चलाने के लिए अधिकारी होते थे । इक्तादार इनकी सहायता से राज्य की रक्षा करते थे और अपने नियंत्रण क्षेत्रों से कर वसूल करते थे । अपने इक्ते से इकट्ठे किए गए कर से ही वे अपना , अपने अधिकारियों का और अपने सैनिकों का खर्चा चलाते थे । इस खर्च के उपरान्त जो कर बचता था उसे इक्तादार सुल्तान को भेज देते थे ।
 
    इल्तुतमिश ने मुद्रा व्यवस्था में सुधार करते हुए चाँदी का टंका और ताँबे जीतल चलाया । 1236 ई० में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई उसने अपने जीवन काल में अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था ।

रजिया सुल्तान - प्रथम मुस्लिम महिला शासिका ( 12360 - 12400 )                                                         

इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था परन्तु सरदारों तथा उलेमा के विरोध के चलते इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद । उसका पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठ गया लेकिन दुर्बल शासक होने के कारण 1236 ई० में रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठी और सुल्तान कहीं जाने लगी ।

रजिया से पूर्व प्राचीन मिस्र और ईरान में महिलाओं ने रानियों के रूप में | शासन किया था परन्तु मध्यकालीन विश्व में पहली मुस्लिम महिला शासक थी ।
 
    रजिया ने लगभग तीन वर्ष आठ माह शासन किया । रज़िया ने स्त्रियों का पहनावा छोड़ दिया और बिना पर्दे के दरबार में बैठने लगी । वह युद्ध में सेना का नेतृत्य करती । अमीरों को शीघ्र ही पता लग गया कि स्त्री होने पर भी रजिया उनके हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं थी । तुर्क सरदार भी किसी महिला के आधीन कार्य करने को तैयार नहीं थे । उन्होंने एक षड्यंत्र के द्वारा उसे गद्दी से हटा दिया । रजिया के बाद उसका एक भाई एवं दो भतीजे बारी - बारी से सुल्तान बने , जो अयोग्य थे । अतः इल्तुतमिश के छोटे पौत्र नासिरुद्दीन महमूद को दिल्ली का सुल्तान बनाया गया ।

सोचिए और बताइए कि उस समय लोगों व दरबारी अमीरों ने रजिया का विरोध क्यों किया होगा ? यदि रजिया आज शासक होती तो क्या उसका विरोध होता ?

 नासिरुद्दीन महमूद ( 12460 - 12650 )

" चालीस तुर्की सरदारों का दल " इस समय अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था । वे जिसे चाहते गद्दी से उतार देते थे और जिसे चाहते गद्दी पर बैठा देते थे । 1246 0 में इस दल ने इल्तुतमिश के पौत्र नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बना दिया ।

    महमद ने एक अमीर जिसका नाम बलबन था को अपना नायक बनाया । बलबन धीरे - धीरे अपनी स्थिति सदृढ़ कर ली और वह एक शक्तिशाली सरदार बन गया । 1266 0 में नासिसददी । महमूद के बाद बलबन गद्दी पर बैठा ।

बलबन ( 12860 - 12870 )
बलबन एक योग्य और अनुभवी शासक था । उसने अपने शासन काल में कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए । उसने दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए लिया आस - पास के जंगलों को कटवाया तथा साफ़ करवाकर वहाँ पुलिस चौकियों का निर्माण कराया । इस प्रकार वह दिल्ली के आसपास रहने वाले मेवातियों के विद्रोह को रोकने में सफल रहा । मेवातियों के अलावा उसने अन्य विद्रोहों का भी दमन किया ।

       बलबन ने कानून को लागू करने में कठोरता बरती । उसने राजा के पद को प्रतिष्ठित बनाया । वह राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानता था । बलबन का मानना था कि राजा को ईश्वर से शक्ति प्राप्त होती है । इसलिए उसके कार्यों की सार्वजनिक जाँच नहीं की जा सकती । इससे उसकी निरंकुशता सुरक्षित होती थी । इसलिए वह दरबार में अत्यंत गम्भीर मुद्रा में बैठला था । वह न तो कभी मज़ाक करता था और न ही हँसता था । उसने दरबार में निर्धारित ढंग से वस्त्र पहनकर आने , बैठने आदि के बारे में नियम बनाए जिनका कठोरता से पालन किया जाता था । बलबन ने दरबार में सिजदा एवं पासबोस परम्परा प्रारम्भ कराई । उसने सुदृढ़ गुप्तचर व्यवस्था बनाई जिससे राज्य की पूरी खबरें गुप्तचर सुल्तान को देते थे । बलबन की प्रमुख विशेषता थी कि उसने सदैव न्याय को सुल्तान का प्रमुख कार्य समझा । उसने शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना पर भी ध्यान दिया । सैनिकों को संतुष्ट रखने के लिये उसने उनका वेतन सदैव समय पर दिया । उन्हें सक्रिय रखने के लिए निरन्तर अभ्यास पर बल दिया ।

मंगोल आक्रमण


   बलबन ने राज्य को बाहरी आक्रमणों से बचाने एवं मंगोलों की शक्ति को रोकने का प्रयास किया । तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में एशिया और यूरोप में आक्रान्ताओं की नई लहर आई ।
    यह नए आक्रमणकारी मंगोल थे , जिन्हें उस महान साम्राज्य के लिए सबसे अधिक जाना जाता है , जिसका गठन उन्होंने चंगेज खों के नेतृत्व में किया । तेरहवीं सदी का अंत होते - होते मंगोल साम्राज्य ज्ञात दुनिया के बड़े भाग तक फैल चुका था । चंगेज खाँ के नेतृत्व में उनकी शक्ति बहुत बढ़ गई थी ।

       चंगेज खाँ मंगोल आक्रमण की भयंकरता को बलबन भलीभाँति अनुभव करता था । इसलिए उन्हें रोकने के लिए उसने मंगोलों के मार्ग में पड़ने वाले पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा नये दुर्गा का निर्माण करवाया । वहाँ पर हृष्टपुष्ट सैनिकों एवं विश्वसनीय और अनुभवी अधिकारियों को नियुक्त किया । शस्त्र तथा भोजन आपूर्ति की पूर्ण व्यवस्था भी वहाँ पर की गई ।

          फारसी शब्द ' मुगल ' का उद्भव मंगोल शब्द से हुआ है ।
उसकी मृत्यु के बाद दिल्ली की गद्दी पर उसके वंश का शासन अधिक दिन तक न रह पाया , परन्तु दिल्ली को जो शक्ति बलबन ने प्रदान की , उसी के परिणामस्वरूप खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सफल रहा ।

शब्दावली-

मलिक    - सरहद और पंजाब के मुसलमानों की एक सम्मानजनक उपाधि ।
इक्ता     - प्रान्तों को इक्ता कहते थे ।
मंगोल    - मध्य एशिया , तिब्बत एवं चीन के क्षेत्रों में रहने वाली जाति । ।
सिजदा   - घुटने पर बैठकर सुल्तान के सामने सिर झुकाना
पायबोस  - सुल्तान के चरणों को चूमना ।


नोट :-
प्रारम्भिक तुर्क वंश (गुलाम वंश ) 1206-1290


                                        ⇓
कुतुबुद्दीन ऐबक 1206-1210
                                                                             ⇓
इल्तुतमिश 1210-1236
रज़िया सुल्तान 1236-1240
  ⇓
नासिरुद्दीन महमूद 1246-1265
  ⇓
गयासुद्दीन बलबन 1265-1287


                                                                                                                                                                  
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