शिक्षा में मुद्दे - VI पेपर पाठ 1. Bed 2year की परीक्षा हेतु ।
लिंग , जाति , धर्म एवं असमर्थता पर आधारित भिन्नता पर एक मस्तिष्क को उद्वेलित करने वाले सेशन का संगठन
( Ogranization of a Brainstorming Session on Discrimination Based on Gender , Caste , Religion and Disability )
लिंग का अर्थ लिंग हेतु अंग्रेजी में ' Gender ' शब्द प्रयुक्त किया गया है । लिंग से मतलब स्त्री - पुरुष से है । व्याकरण में भी लिंग का उल्लेख मिलता है जहाँ स्त्रीलिंग , पुल्लिंग एवं नपुंसक लिंग है । स्त्रीलिंग द्वारा स्त्रियों का बोध पुल्लिंग द्वारा पुरुष तथा नपूंसक लिंग इन दोनों के अलावा प्रयुक्त होता है । कुछ इसी प्रकार हमारे समाज में भी लिंगीय व्यवस्था है , जिनमें स्त्री तथा पुरुष दो लिंग हैं एवं अभी हाल ही में तृतीय लिंग को भी मान्यता प्राप्त हुई है । लिंग व्यक्ति के हाथ में न होकर ईश्वरीय कृति है , परन्तु विज्ञान की प्रगति के परणिामस्वरूप वर्तमान में लिंग परिवर्तन कराया जा रहा है ।
लिंग को वैयाकरणों द्वारा यह कहकर परिभाषित किया गया है कि जिससे किसी के स्त्री या पुरुष होने का बोध हो , उसे लिंग कहते हैं । लिंग के निर्धारण में लैंगिक मापदण्डों का प्रयोग किया जाता है ,
जो निम्न प्रकार है -
पुरुष ( गुणसूत्र ) XY
महिला ( गुणसूत्र ) XX
( बालिका ) xx
( बालक ) xy
जैविक रूप से लिंग को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि जब स्त्री तथा पुरुष xx गुणसूत्र मिलते हैं तब बालिका और जब स्त्री - पुरुष के XY गुणसूत्र मिलते हैं तो बालक निर्माण होता है । स्पष्ट है कि लिंग के निर्धारण में जैविक सम्प्रत्यय महत्वपूर्ण है , परन्त इस हेत स्त्री या पुरुष किसी की इच्छा का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है । लिंग निर्धारण शरीर की ऐच्छिक क्रिया का परिणाम न होकर अनैच्छिक है । अतः इस हेतु किसी को भी दोष नहीं दिया जा सकता है । फिर भी लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है तथा बालकों की तलना में बालिकाओं को तुच्छ समझा जाता है । लिंग एक परिवर्तनशील धारणा है , जिसमें एक ही संस्कृति , जाति , वर्ग तथा आर्थिक परिस्थितियों और आयु में एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति तथा एक सामाजिक समूह से दूसरे सामाजिक समूह में भी भिन्नताएं होती हैं । स्त्री - पुरुष के लिंग के निरिण में जैविक तथा शारीरिक स्थितियों के साथ - साथ सामाजिक तथा सांस्कृतिक बोधों को दृष्टिगत रखना चाहिए ।
भारत में लिंगीय अवधारणा प्राचीन काल में स्वस्थ थी । बालक तथा बालिकाओं दो बाव नहीं किया जाता था तथा बराबरी का अधिकार प्राप्त था , परन्तु बाद में लि वारणा अत्यधिक जटिल और दूषित हो गयी , जिस कारण से स्त्रियों को पुरुषों की अपे हीन समझकर उनके अधिकारों की अवहेलना की जाने लगी । वर्तमान में शिक्षा के ना कता का प्रसार करके स्वस्थ लैंगिक दृष्टिकोण की शिक्षा प्रदान की जा रही है । आंकड़ों के अनसार स्त्रियों की उपेक्षा के कारण प्रतिवर्ष अर्थव्यवस्था को 920 करोड़ का नुकसान हो रहा है । और जिन देशों में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त है , वहाँ की अर्थव्यवस्था में वटि की दर दर्ज की गई है तथा जहाँ 10 प्रतिशत बालिका नामांकन में वृद्धि हुई वहाँ 3 % GDP में वृद्धि हुई ।
लिंगीय विभेद के कारण
लिंगीय भेदभावों का जन्म आज से नहीं अपित काफी समय पूर्व से ही चला आ रहा है । विभिन्न कालों में लिंगीय विभेद के कारणों का वर्णन निम्न प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है -
( 1 ) मुस्लिम काल से पूर्व लैंगिक विभेद के कारण - ( i ) साम्राज्य की सुरक्षा , ( ii ) वंश चलाने हेतु , ( iii ) पारिवारिक उत्तरदायित्वों के कारण आर्थिक क्षेत्र में सहयोग न कर पाना , ( iv ) स्त्रियों की रक्षा आदि उत्तरदायित्वों का वहन पुरुषों के द्वारा किए जाने से उसके प्रति सम्मान में धीरे - धीरे कमी ।
( 2 ) मुस्लिम काल में लैंगिक विभेद के कारण - ( i ) पर्दा प्रथा , ( ii ) विदेशी आक्रमण के कारण अस्मिता की रक्षा का भार , ( iii ) पारस्परिक संघर्ष तथा युद्ध , ( iv ) बाल - विवाह , ( v ) स्त्रियों को विलास की वस्तु मात्र मानना , ( vi ) अशिक्षा , ( vii ) शारीरिक शिक्षा का अभाव , ( viii ) सांस्कृतिक कारक ।
( 3 ) आधुनिक काल में लैंगिक विभेद के कारण - ( i ) दोषपूर्ण पाठ्यक्रम , ( ii ) आर्थिक समस्या , ( iii ) सामाजिक दृष्टिकोण , ( iv ) वंश परम्परा , ( v ) दहेज प्रथा , ( vi ) मनोवैज्ञानिक कारण , ( vii ) सामाजिक कुप्रथाएँ , ( viii ) संकीर्ण विचारधारा , ( ix ) पुरुष - प्रधान समाज , ( x ) सरकारी उदासीनता , ( xi ) अशिक्षा , ( xii ) लड़की पराया धन ।
इस प्रकार लैंगिक भेद - भावों की जड़ें अत्यन्त गहरी हैं , परन्तु इसके लिए सर्वाधिक दोषी हमारी मानसिकता है । यदि किसी घर में चार पुत्र हों तो वह स्वयं को मजबूत मानता है और यदि कहीं दो बेटियाँ भी हो गयीं , तो वह परिवार अपने अस्तित्व को समाप्तप्राय समझ कर चलने लगता है । अतः हमें बेटियों को अभिशाप न मानकर उनकी शिक्षा का समुचित प्रबन्ध करना चाहिए , जिससे वे आगे बढ़कर परिवार के सम्पूर्ण उत्तरदायित्व का निर्वहन कर सकें ।
समाज में लिंग की भूमिका परिवार के सन्दर्भ में -
हमारे समाज में लिंगीय आधार पर क्या कोई भेदभाव पाया जाता है तो इसका एक ही उत्तर है , हाँ । समाज में प्रायः बालकों की अपेक्षा बालिकाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है , जिसके कारण उन्होंने बाहा क्रियाकलापों , लोगों से मिलने - जुलने के कम ही अवसर । प्रदान किए जाते हैं , जिससे उनकी समाजीकरण की गति मन्द होती है । समाज में लिंग की । भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है , क्योंकि समाज और उसका ताना - बाना स्त्री - पुरुषों के इर्द - गिर्द ही बुना हुआ है । लिंग की भूमिका को परिवार चाहे तो समाज और समाजीकरण की प्रक्रिया में सशक्त बना सकता है । प्रत्येक प्रकार के भेदभाव और असमानता की नींव परिवार से ही प्रारम्भ होती है । परिवार में यदि लिंगीय भेदभाव के आधार पर बालिकाओं को बाहर निकलने सामाजिक क्रियाकलापों में भाग लेने की मनाही , शिक्षा ग्रहण करने इत्यादि से यदि राका तो उनकी समाजीकरण की प्रक्रिया बालकों से कम होगी । समाज और समाजीकरण का आधार परिवार ही हैं । परिवार की मान्यताएं , आदर्श और मल्य जैसे होंगे . वैसा ही समाज का स्वरूप और उसके सदस्यों का समाजीकरण होगा । परिवार ऐसा क्या करें कि समाज का प्रक्रिया म लैंगिक भेदभाव कम हो जाए । इस समस्या का समाधान निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तगत किया जा सकता है -
( 1 ) सर्वांगीण विकास का कार्य - परिवार में बालक - बालिकाओं के सर्वांगीण विकास का कार्य सम्पन्न किया जाता है । सर्वांगीण विकास के अन्तर्गत सामाजिक , शारीरिक , मानसिक , सांवेगिक , आध्यात्मिक इत्यादि का समन्वयकारी विकास आता है । कुछ परिवारों में बालका क सर्वांगीण विकास का कार्य तो सम्पन्न किया जाता है . परन्त बालिकाओं के विकास की अवहलना कर दी जाती है । ऐसी परिस्थितियों में लैंगिक विभेदों का जन्म होता है और बालिकाओं का समाजीकरण बालकों की अपेक्षा कम हो जाता है . जिसका दुष्परिणाम उन्हें आजीवन भुगतना पड़ता है और हमारे समाज को भी ।
( 2 ) समानतापूर्ण व्यवहार - सामाजिकता की प्रथम पाठशाला परिवार ही है । यदि परिवार में लिंग के आधार पर भेदभाव कर बालकों की अपेक्षा बालिकाओं को उपेक्षित किया जाता रहे तो समाज में उनको कभी भी समान स्थान की प्राप्ति नहीं हो पाती है । बालिकाओं को परिवार में बालकों के समान भोजन , वस्त्र , खेलने , पढ़ने के लिए तथा सोने के लिए उपयुक्त स्थान , सामाजिक कार्यों में भाग लेने तथा समान रूप से शैक्षिक अवसरों की प्राप्ति करानी चाहिए । इस पर यदि भेदभाव किया गया तो असमानता का जो अंकुर परिवार अपने बच्चों में डालता है वह भविष्य में विष - वृक्ष के रूप में समाज को नुकसान पहुंचाता है ।
( 3 ) शिक्षा के समान अवसर - यदि भोजन और वस्त्र थोड़ा कम ही मिले पर शिक्षा में बालिकाओं की समानता परिवार सुनिश्चित कर दें तो निकट भविष्य में लैंगिक भेदभाव समाप्तप्राय हो जायेंगे , परन्तु हमारे यहाँ बालकों को अच्छे - से - अच्छे विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करायी जाती है , और बालिकाओं की शिक्षा का या तो प्रबन्ध नहीं किया जाता और किया भी जाता है तो निम्न स्तर की । ऐसी परिस्थितियों में उनका समाजीकरण भली प्रकार से नहीं हो पाता है और उनकी समाज में स्थिति उन्नत नहीं हो पाती है । परिवार बालिकाओं की रुचियों इत्यादि की शिक्षा में अवहेलना करते हैं , जिससे उनकी शैक्षणिक उपलब्धि न्यून हो जाती है । तथा समाज में उनका स्तर ऊँचा नहीं हो पाता है ।
( 4 ) व्यापक तथा उदार दृष्टिकोण - पारिवारिक सदस्यों का दृष्टिकोण लिंगीय विषयों के प्रति उदार होना चाहिए । संकीर्ण तथा अनुदार दृष्टिकोण वाले परिवारों में बालिकाएं अपने घर वालों का दृष्टिकोण जानकर सदैव दबी - सहमी रहती है तथा भय के कारण उनका बाहर आना जाना तथा किसी से मिलना - जुलना नहीं हो पाता , जिससे वे समाज में निवास करते हुए भी समाजीकरण की प्रक्रिया से अछूती ही रह जाती है । परिवार में माँ , चाची , दादी इत्यादि के द्वारा भी बालिकाओं को सदैव उनके बालिका होने की हद में रहने की चेतावनी दी जाती है । बालिकाएँ स्वयं देखती हैं कि पारिवारिक मामलों में पिता , चाचा , दादा और भाई आप सलाह कर लेते हैं , पर औरतों की राय लेना कोई तनिक भी आवश्यक नहीं समाता है यदि इसके विपरीत पारिवारिक सदस्यों का दृष्टिकोण यदि व्यापक होगा . घर में महिला की इच्छा - अनिच्छा और निर्णयों को महत्व दिया जायेगा , तो लिंगीय भेदभावों में कमी आएगी । बालिकाओं का समाज में स्थान तथा समाजीकरण की गति में तीव्रता आएगी ।
( 5 ) लिंगीय महत्व में अवगतीकरण - परिवारिक सदस्यों को प्रारम्भ में ही बालक बालक तथा बालिकाओं को परस्पर लिंगों के महत्व से अवगत कराना चाहिए । लिंगीय आधार पर भेदभाव इसलिए बालकों को बालिकाओं की विभिन्न भूमिकाओं में माता , बहिन , पत्नी इत्यादि बालिकाओं को बालकों की विभिन्न भूमिकाओं , भाई , पति , पुत्र , पिता आदि से अवगत का चाहिए । लड़कों तथा लड़कियों में लिंगीय भेदभाव तब आते हैं , जब वे स्वयं को लड़का और लड़की समझते हैं । यदि वे पिता , भाई , पति तथा पुत्र समझें तो शायद कभी किसी स्त्री का समाज में अपमानित नहीं होना पड़ेगा । इस प्रकार लिंगीय महत्व से परिचित कराकर समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार योगदान देता है ।
( 6 ) साथ - साथ रहने , कार्य करने की प्रवृत्ति का विकास - परिवार की नींव आपसी सहयोग तथा समझदारी पर टिकी होती है , परन्तु बालकों को कार्य के उत्तरदायित्व न देकर सारे घरेलू कार्य बालिकाओं को सौंप दिए जाते हैं , जिससे बचपन से ही बालक स्वयं को बालिकाओं का मालिक समझने लगते हैं , परन्तु परिवार का समाज को सांस्कृतिक , आर्थिक इत्यादि वृद्धि . सांस्कृतिक गतिशीलता के लिए यह उत्तरदायत्वि बनता है कि वह बालक तथा बालिकाओं को प्रारम्भ से ही उनकी आयु के अनुरूप कार्य तथा पक्षपात रहित होकर प्रोत्साहन भी प्रदान करे । इस प्रकार साथ - साथ रहने तथा कार्य करने की प्रवृत्ति के विकास के कारण समाजीकरण तथा समाज में गति आयेगी ।
( 7 ) पारिवारिक कार्यों एवं उत्तरदायित्वों में समान सहभागिता - परिवार को सभी प्रकार के घरेलू तथा बाह्य उत्तरदायित्वों का वितरण समान सहभागिता के आधार पर करना चाहिए , न कि लिंगीय आधार पर । अधिकांश परिवारों में बालिकाओं के लिए एक लक्ष्मण रेखा खींच दी जाती है जिससे उनका समाजीकरण अवरुद्ध हो जाता है । अतः पारिवारिक कार्यों तथा उत्तरदायित्वों का जब समान रूप से विभाजन होगा तो आगे चलकर अभिभावकों को अपने बालकों से यह शिकायत नहीं होगी कि लड़का काम नहीं करना चाहता है । अतः प्रारम्भ से ही उत्तरदायित्व और कार्य के प्रति समुचित दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिए ।
( 8 ) हीनतायुक्त व्यवहार निषिद्ध - परिवार में अपने बड़ों का अनुकरण करके बालक बालिकाओं तथा स्त्रियों के प्रति अपमान तथा हीनता का व्यवहार करते हैं और टोका - टोकी न । होने के कारण उनके मनोबल में वृद्धि होती रहती है , जिससे वे आगे चलकर घर के बाहर भी । लड़कियों से अमर्यादित व्यवहार , अभद्र भाषा का प्रयोग , स्वयं को श्रेष्ठ मानना , पुरुषत्व । दिखाना , गाली - गलौज इत्यादि कर्म करते हैं , जिस कारण बालिकाएं स्वयं को असहज और . असुरक्षित महसूस कर रही है । इन दुर्व्यवहारों के परिणामस्वरूप बालिकाओं का घर से बाहर निकलना दुष्कर हो गया है और न वे अपनी क्षमताओं का प्रयोग कर पा रही है . न समाज को । कुछ दे पा रही हैं । अतः परिवार को प्रारम्भ से ही बालकों के ' भाषायी विकास तथा स्वयं की । श्रेष्ठता के झूठे विश्वास से अवगत कराने के साथ - साथ बालिकाओं को हीन मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए ।
( 9 ) सामाजिक वातावरण में बदलाव - यदि कोई परिवार सुशिक्षित और जागरूक है आर वह लिंगीय भेदभाव न करके बालिकाओं को बालकों के ही समान अवसर प्रदान करता है , तो ऐसे परिवार को सामाजिक वातावरण से जूझना पड़ता है , जिसस लाग के पहले ही सामाजिक असहयोगात्मक वातावरण के विषय में सोचकर भयभीत हो जाते है, परन्तु हिम्मात न हारतेे हुुुए परिवार को यह पहल करनी चाहिए , तभी हमारा सामाजिक वातावरण कभी आज हम खुद को यदि सभ्य समाज के निवासी कहकर गर्व करते हैं , तो इस बात पर विचार और कार्य करना आवश्यक है कि इस सभ्य समाज में महिलाएँ कहाँ पर स्थित हैं ।
(10) अन्धविश्वासों , रूढ़ियों तथा जड़ परम्पराओं का बहिष्कार - परिस्थितियों के समाज में समय - समय पर परिवर्तन होता आया है , परन्तु यह विडम्बना ही है कि वर्षों की परिस्थितियों में जो परम्पराएं प्रासंगिक थीं वे आज अप्रासंगिक होने के पश्चात भी २ रे समाज द्वारा रीति - रिवाजों , परम्पराओं और अन्धविश्वासों के कारण कि ऐसा न करने से पित कपित हो जायेंगे , अकाल तथा अनावृष्टि हो जायेगी तथा सृष्टि का विनाश हो जायेगा , प्यादि । इसी क्रम में बालिकाओं से जुड़े तमाम अन्धविश्वास तथा परम्पराएँ रूढ़ और अतार्किक होने के पश्चात् भी हमारे समाज में चली आ रही हैं , जैसे - ( 6 ) बाल विवाह , ( ii ) दहेज प्रथा , m स्त्री शिक्षा , ( iv ) विधवा विवाह निषेध , ( v ) लड़की पराया धन , ( vi ) पितृ कर्म तथा अंतिम संस्कार , ( vii ) सन्तान के लिंग के लिए स्त्री को उत्तरदायी मानना , ( viii ) स्त्री को बाँझ और डायन बनाकर प्रताड़ित करना , ( ix ) विधवापन को अभिशाप मानना , ( x ) पर्दा प्रथा आदि ।
आवश्यकता इस बात की है कि परिवार के द्वारा इन रूढ़ियों का बहिष्कार कर समाज में बालिकाओं और स्त्रियों को उनका स्थान दिलाने के लिए एकजुट होकर बहिष्कार करना चाहिए । इस प्रकार बालिकाओं को बिना किसी लिंगीय भेदभाव के समाज के सम्पर्क में आने और समाजीकरण के अवसर प्रदान करने चाहिए ।
समाज में लिंग भूमिका के सशक्तिकरण के साधन के रूप में जाति के कार्य
समाज तथा समाजीकरण की प्रक्रिया में लिंग को सशक्त करने में जाति के कार्य तथा भूमिका भारतीय समाज के सन्दर्भ में अत्यधिक है । जातीय अवधारणा की जड़ें भारतीय समाज में दिन - प्रतिदिन गहरी होती जा रही हैं । यद्यपि भारतीय संविधान में जाति के आधार पर भेदभाव और अस्पृश्यता की समाप्ति कर समतामूलक समाज की स्थापना की है , परन्तु आज भी जातिगत आधार पर ऊंच - नीच की भावना चरम पर है । उच्च समझी जाने वाली जातियाँ निम्न जातियों का शोषण करती हैं , उनकी स्त्रियों का अपमान करती हैं , आर्थिक संसाधनों , समाज और समाजीकरण की प्रक्रिया पर अपना एकाधिकार समझकर उनको आगे आने के अवसर प्रदान नहीं करती हैं । आज भी जातियों में निम्न जातियाँ तथा इनमें भी स्त्रियों की स्थिति अधिक दियनीय है । अतः समाज में इनकी बराबरी का अधिकार मिले , शिक्षा मिले , यह सम्भव नहीं हो पा रहा है , जिससे ये स्त्रियाँ कपमण्डुक बनी रह जाती हैं और पीढ़ी - दर - पीढ़ी शोषण की परिपाटी चलती रहती है और इनका समाजीकरण अत्यंत संकीर्ण होता है , जिससे इनकी दशा में । अपेक्षित सुधार नहीं आ पा रहे हैं । यह विदित है कि जातियों का उसके व्यक्तियों पर प्रभाव तथा नयन्त्रण हाता है और यदि जातियाँ कतसंकल्पित होकर आयें , तो समाज और समाजीकरण में लिंगीय सशक्तिकरण को बढावा प्रदान कर सकती हैं । समाज तथा समाजीकरण में लिंगीय सशक्तिकरण हेतु जाति के कार्य तथा भमिकाएं निम्न प्रकार है -
( i ) जाति के आधार पर तथा उन जातियों में लिंगीय आधार पर स्त्रियों की उपेक्षा तथा भदभाव की समाप्ति का संकल्प लेना ।
( ii ) . महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए महिला स्वयं समूहों का निर्माण ।
( iii ) बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन द्वारा ।
(iv) संगठित होकर बालिका शिक्षा के लिए विद्यालयों तथा आवश्यक संसाधी व्यवस्था करना ।
(v) महिलाओं को जो आरक्षण प्राप्त है , उसका लाभ दिलाना तथा लाभ पार योग्यता का विकास करना ।
( vi ) इस बात का प्रसार करना कि संविधान और कानून की दृष्टि से महिला समान हैं ।
( vii ) महिलाओं को सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान कर इनके समाजीकरणार जातियाँ समुचित दिशा प्रदान कर सकती हैं ।
( viii ) महिलाओं को समाज और समाजीकरण की प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभाने अवसर प्रदान करने के लिए जातियों द्वारा उनके उद्योग - धन्धों तथा व्यापार में संलग्न करना ।
( ix ) महिलाओं से सम्बन्धित सरकारी तथा गैर - सरकारी योजनाओं की सफलता से सहायता करके । जातिगत आधार पर महिलाओं की सशक्त स्थिति से प्रोत्साहित होकर इनको और अधिक आगे आने के अवसर प्रदान करना ।
( xi ) प्रौढ़ शिक्षा को अपनाकर जातियों द्वारा लैंगिक भूमिका के सशक्तिकरण तथा समाजीकरण के दायित्व की पूर्ति की जानी चाहिए ।
( xii ) कुछ जाति तथा जनजातियों में महिलाओं से सम्बन्धित रूढ़ियाँ तथा अन्धविश्वास प्रचलित हैं , जिन्हें समाप्त करके जातियों को लैंगिक सुदृढ़ता का कार्य समाज में | करना चाहिए ।
( xiii ) जातियों को चाहिए कि वे घर तथा बाहर महिलाओं को निर्णय लेने , उत्तरदायित्व संभालने की छूट दे , जिससे वे सशक्त तथा सामाजिक बनेंगी ।
( xiv ) बन्द जातियों को अपनी संस्कृति की रक्षा के साथ - साथ कुछ विषयों में खुलापन अपनाना चाहिए , जिससे स्त्रियाँ अपनी क्षमताओं का सदुपयोग और अन्य जातियों के साथ सामाजिक संवाद स्थापित कर सकें ।
( xv ) जागरूकता कार्यक्रमों के द्वारा जातियों को लिंगीय सुदृढ़ता के कार्य हेतु प्रेरित करना ।
( xvi ) परस्पर जातियों के मध्य संवाद स्थापित कर महिलाओं की सुदृढ़ता के लिए एकजुट होना , जिससे उनके समाजीकरण की प्रक्रिया में तीव्रता आये और समाज को लाभ पहुंचे ।
( xvii ) महिलाओं को समाज में समुचित सम्मान प्रदान करके तथा बेवजह की रोक - टोक । को रोककर जातियों द्वारा महिला समाजीकरण की दिशा प्रदान करनी चाहिए ।
( xviii ) विभिन्न जातियों के सम्मानित तथा अग्रणी सदस्यों से प्रशासन अपील करे , जिससे जाति विशेष पर प्रभाव का सदुपयोग लिंग के अन्तर्गत हो ।
समाज में लिंग की भूमिका के सशक्तिकरण के साधन के रूप में धर्म के कार्य तथा भूमिका
धर्म का प्रभाव भारतीय जनमानस पर प्राचीन काल से ही अत्यधिक रहा है । भारतीय में दैनिक महत्व के कार्यों , पर्यावरण रक्षा , जीव - जन्तुओं की रक्षा आदि के कार्यों को भी से ही जोड दिया गया , जिससे हमारी प्रकृति तथा जैव - विविधता संरक्षित होती रहे । धर्म मी इस लम्बी यात्रा में अब दूषित रूप में हमारे समक्ष दिखता है । यह धर्म का वास्तविक रूप है । कोई भी धर्म सबसे पहले मानवता और प्रेम सिखाता है । धर्म के नाम पर तमाम अन्धविश्वास , रूढ़ियाँ और मनुष्यों का खून बहाया जा रहा है , परन्तु धर्म यदि अपने मूल रूप में आ जाये , तो यह पापियों का नाशक होता है । गीता में भगवान कृष्ण ने कुछ ऐसा ही उपदेश अर्जुन को दिया -
" यदा - यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः ।
परित्राणाय च साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम ॥
अहं संभवामि युगे - युगे ॥ "
अपने समाज में व्याप्त कुरीतियों में से एक है - लैंगिक भेदभाव । लैंगिक भेदभावों में एक भूमिका स्त्रियों के विषय में नकारात्मक धार्मिक विचारों की रही है , जिसको बढ़ा - चढ़ाकर धर्म के ठेकेदारों ने अपने ओछे स्वार्थों की सिद्धि हेतु प्रयुक्त किया है , परन्तु धर्म तथा उसके पहरेदार और मतावलम्बी चाह लें तो धार्मिक बुराइयाँ जड़ से समाप्त हो जायेंगी । स्त्रियों के साथ होने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार को भी धर्म अपनी सशक्त भूमिका द्वारा समाप्त कर सकता है । धर्म स्त्रियों को प्रोत्साहित कर समाज तथा समाजीकरण की प्रक्रिया में आने के लिए प्रेरित कर सकता है । धार्मिक प्रावधान कर सकता है , जिसका व्यापक प्रभाव होगा । धर्म की लैंगिक सुदृढ़ता , समाज में लिंगीय भेदभाव कम करने तथा बालिकाओं की समाजीकरण की गति तीव्र करने भूमिका तथा कार्य निम्न प्रकार से है - :
( i ) धर्म को अपने मूल स्वरूप तथा मूल स्रोतों की ओर अग्रसर होना , जिससे धर्म : आई विसंगतियों - दूर किया जा सके ।
( ii ) धर्म को अपने तत्वों में आधुनिकता और गतिशीलता के आत्मसातीकरण द्वारा स्त्रियों को धार्मिक कार्यों में भाग लेने के अवसर तथा धार्मिक समाज में उनके महत्व की पुनर्स्थापना का कार्य सम्पन्न करना चाहिए ।
( iii ) अन्ध - विश्वास तथा कुरीतियाँ , जिसमें स्त्रियों की उपेक्षा तथा निरादर होता हो , उनको समाप्त करने का प्रयास कर लैंगिक सुदृढ़ता की स्थापना की जानी चाहिए ।
( iv ) धार्मिक सम्मेलनों तथा कार्यक्रमों में स्त्रियों को पुरुषों के ही समान अवसर प्रदान करना जिससे करना , जिससे समाज को उनकी क्षमताओं के विषय में ज्ञान हो सके ।
( v ) धर्म को चाहिए कि वह अपने सभी नागरिकों का चारित्रिक विकास तथा नैतिक विकास करे , जिससे वे स्त्रियों को समुचित स्थान और आदर प्रदान कर सकें । इससे लियों का सामाजिक सम्मान , सामाजिक आदान - प्रदान और सशक्तिकरण बढ़ेगा ।
( vi ) खिया के प्रति यदि कोई व्यक्ति अनादर या अभद्र व्यवहार करता है , तो धर्म में सख्त नियम तथा अनशासनात्मक कार्यवाही किए जाने का प्रावधान होना चाहिए । धर्म के इस उत्तरदायित्त्वपूर्ण कार्य से लोगों पर अंकुश रहेगा ।
(vii) स्त्रियों को समचित आदर और सम्मान जो लोग प्रदान नहीं करते हैं , उन्हें बहिष्कृत किया जाना चाहिए , इससे स्त्रियों का सशक्तिकरण होगा ।
( viii ) प्रत्येक धर्म के अपने संस्कार और रीति - रिवाज होते हैं , जिनका पालन सी धर्मानुयायियों हेतु आवश्यक होता है । धर्म के द्वारा स्त्रियों को वैवाहिक जीवन का गरिमापूर्ण जीने तथा उनके आर्थिक हितों की रक्षा हेतु आगे आना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो आवश्यक संशोधन भी किया जाना चाहिए , जिससे स्त्रियों का समाज में समाजीकरण और लैंगिक सुदृढ़ता में वृद्धि हो सके ।
( ix ) परस्पर धर्मों तथा संस्कृतियों का आदर कर लैंगिक भेदभावों की समाप्ति के प्रयास किए जाने चाहिए ।
( x ) धर्म को आर्थिक स्वावलम्बन तथा क्रिया के सिद्धान्त का पालन करना चाहिए जिसमें स्त्री - पुरुष दोनों की सहभागिता हो । इस प्रकार स्त्रियों को सामाजिक सम्पर्क में आने , समाजीकरण तथा सुदृढ़ीकरण के पर्याप्त अवसर प्राप्त होंगे ।
( xi ) कन्या भ्रूण हत्या , कन्या शिशु हत्या , दहेज प्रथा आदि को धर्म के द्वारा अनैतिक । कृत्य तथा दण्डनीय घोषित कर देना चाहिए , जिससे लैंगिक सुदृढ़ीकरण में सहायता प्राप्त होगी ।
( xii ) धर्म को चाहिए कि वह स्त्रियों के आदर्श चरित्र और कार्यों को सम्मुख रखकर लैंगिक सुदृढ़ता का कार्य करे ।
बालिका शिक्षा की समस्याएँ
बालिका शिक्षा से सम्बन्धित प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं -
( 1 ) रूढ़िवादिता की समस्या - भारतीय समाज अनेक रूढ़िवादिताओं से ग्रस्त है । - अधिकांश भारतीय रजोदर्शन से पूर्व ही अपनी कन्या का विवाह कर देना अपना कर्त्तव्य समझते । हैं , क्योंकि ऐसा नहीं करना स्मृतिकारों के अनुसार पाप है । मुसलमान रूढ़िवादिता में हिन्दुओं से । आगे है । पर्दा प्रथा और बाल विवाह का प्रचलन उनके यहाँ आज भी बड़े पैमाने पर है । इन सब कारणों से वे बालिकाओं को विद्यालय भेजना मजहब के विरुद्ध समझते हैं । वहाँ सह - शिक्षा का तो प्रश्न ही नहीं उठता है ।
( 2 ) आर्थिक समस्याएँ - हमारा देश आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है । अतः बालिका शिक्षा संस्थानों की स्थापना में आर्थिक बाधा सबसे आगे आ जाती है । कुछ विद्यालय जो व्यक्तिगत प्रयास द्वारा स्थापित किये जाते हैं , आर्थिक अभाव के कारण बीच में ही बन्द कर दिय । । जाते हैं , क्योंकि इन्हें सरकारी अनुदान नहीं मिलता । ऐसी दशा में प्रश्न उठता है कि बालिका शिक्षा के लिए धन की व्यवस्था किस प्रकार की जाय ?
( 3 ) सरकार के उदासीन दृष्टिकोण की समस्या - सरकार बालिका - शिक्षा के प्रति इतनी जागरूक नहीं है जितनी कि बालकों के प्रति है । वर्तमान सरकार ने यह अपेक्षा का दृष्टिकोण ब्रिटिश सरकार जैसा ही अपना रखा है और इस कारण ही बालिका - शिक्षा के विकास पर बहुत कम धन व्यय किया जा रहा है । सरकार के इस उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण के कारण बालिका - शिक्ष का वांछित विकास नहीं हो पा रहा है ।
( 4 ) बालिका विद्यालयों के अभाव की समस्या - हमारे देश में बालिका विद्यालय का पर्याप्त अभाव है । देश में दो - तिहाई ग्राम ऐसे हैं जहाँ प्राथमिक शिक्षा के लिए किसी भी प्रकार के भवन नहीं हैं । शेष ग्रामों में अधिकांश विद्यालय केवल छात्रों के लिए हैं । मजबूर होकर इन विद्यालयों में ही बालिकाओं को भी अध्ययन के लिए जाना पड़ता है ।
बालिका - विद्यालयों का सबसे अधिक अभाव माध्यमिक और उच्च स्तर पर है । नगरों में तो बालिकाओं के लिए कुछ स्कूल और कॉलेज होते भी हैं परन्तु गांवों में तो इसका पूर्णतया अभाव है । अभी बालिकाओं के लिए व्यावसायिक कॉलेजों का पर्याप्त अभाव है । अतः जब अधिकांश माता - पिता सहशिक्षा के विरोधी हैं , तो अनेक बालिकाएँ शिक्षा के लाभ से वंचित रह जाती हैं ।
( 5 ) अनुचित दृष्टिकोण की समस्या - भारत में निरक्षरता का बोलबाला है । निरक्षर व्यक्ति न तो शिक्षा के महत्व को समझता है और न जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण स्वस्थ होता है । अधिकांश भारतीयों के अनुसार शिक्षा का मूल उद्देश्य नौकरी प्राप्त करना है । अतः वे सोचते हैं कि जब हमें स्त्रियों से नौकरी करानी नहीं है , तो उन्हें शिक्षा क्यों दी जाए ?
( 6 ) अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या - बालिका शिक्षा सबसे अधिक अपव्यय और - अवरोधन की समस्या से ग्रस्त है । अपव्यय और अवरोधन बालकों की अपेक्षा बालिकाओं में अधिक है । कार्य अधिकता , निर्धनता , पर्दा - प्रथा , बाल - विवाह आदि के कारण अनेक कन्याओं . को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है । अनेक अभिभावक अपनी बालिकाओं को अधिक से अधिक प्राथमिक या मिडिल स्तर तक ही शिक्षा देने के पक्ष में हैं ।
( 7 ) दोषपूर्ण शिक्षा प्रशासन की समस्या - हमारे देश में बालिका - शिक्षा का प्रशासन भी दोषपूर्ण है । कुछ राज्यों को छोड़कर स्त्री - शिक्षा के प्रशासन का भार पुरुष अधिकारी वर्ग पर है । परन्तु पुरुष अधिकारी वर्ग बालिका - शिक्षा की विभिन्न समस्याओं तथा आवश्यकताओं को न तो भली प्रकार समझ पाता है और न उनमें ठीक से रुचि लेता है ।
( 8 ) दोषपूर्ण पाठ्यक्रम की समस्या - बालिका - शिक्षा का पाठ्यक्रम अनेक दोषों से युक्त है । शिक्षा के समस्त स्तरों पर बालक तथा बालिकाओं के पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का अन्तर नहीं है । केवल चित्रकला , संगीत - कला तथा गृह विज्ञान के अध्यापन की आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की गयी हैं । परन्तु इन विषयों के अध्ययन से बालिकाओं को विशेष लाभ नहीं है । उच्च स्तर पर तो इन विषयों का अध्ययन भी समाप्त हो जाता है । वास्तव में बालिकाओं को विषय पढ़ाये जाते हैं उनका गृहस्थ जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता है । स्वतन्त्रता और समानता का यह भी तात्पर्य नहीं है कि स्त्रियाँ अपने गृहस्थ के उत्तरदायित्व को छोड़कर अभियन्ता बनें , व्यापारी बनें तथा पुरुषों के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप करें ।
( 9 ) अध्यापिकाओं के अभाव की समस्या - बालिका - शिक्षा के समस्त स्तरों पर अध्यापिकाओं की संख्या केवल 11 % थी । अध्यापिकाओं का अभाव नगरों की अपेक्षा ग्रामों में कहीं अधिक है । इस अभाव के अनेक कारण हैं । जैसे - स्त्रियों में शिक्षा प्रसार की कमी , स्त्रियों द्वारा नौकरी करना अपमानजनक मानला , आवास - निवास की सुविधाओं का अभाव । जो स्त्रियाँ शिक्षित भी होती हैं वे पिता या पति की इच्छा के विरुद्ध नौकरी करने के लिए बाहर नहीं जा सकतीं ।
( 10 ) ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़ेपन की समस्या - नगरवासियों की अपेक्षा ग्रामवासियों का दृष्टिकोण अत्यंत संकीर्ण और रूढ़िग्रस्त है । वे स्वयं निरक्षर होने के कारण शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझते तथा बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करना वे पूर्णतया व्यर्थ समझते हैं । इसी कारण से ही ग्रामीण क्षेत्रों में बालिका - शिक्षा का प्रसार सबसे कम है ।
बालिका शिक्षा की समस्याओं का समाधान
बालिका शिक्षा के विकास में यद्यपि अनेक बाधाएँ हैं परन्तु यदि साहसपूर्ण ढंग से इन बाधाओं का सामना किया जाय , तो इन पर विजय प्राप्त की जा सकती है । यहाँ हम बालिका शिक्षा की समस्याओं के निराकरण के लिए सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं -
( 1 ) दृष्टिकोण में परिवर्तन - बालिका शिक्षा के विकास के लिए जन - साधारण के दृष्टिकोण में भी परिवर्तन करना होगा । इसके लिए आवश्यक है कि जन - साधारण को शिक्षा के वास्तविक अर्थ बताये जायें तथा उसके उद्देश्यों पर व्यापक प्रकाश डाला जाय । शिक्षा को केवल नौकरी प्राप्त करने का साधन मात्र न माना जाय । शिक्षा के महत्व और लाभों का ज्ञान कराने के लिए फिल्मों , प्रदर्शनियों तथा व्याख्यानों आदि का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में करना आवश्यक है । जब हमारे देश के पुरुष वर्ग का शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण बदल जायेगा और वह यह समझने लगेगा कि सुयोग्य नागरिकों का निर्माण सुयोग्य और शिक्षित माताओं द्वारा ही सम्भव है , तो बालिका - शिक्षा के मार्ग में आने वाली समस्याओं का समाधान स्वतः हो जायेगा ।
( 2 ) अपव्यय एवं अवरोधन का उपचार - बालिका - शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन को समाप्त करने के लिए अनेक बातों पर ध्यान देना आवश्यक है , यथा -
( i ) विद्यालय के वातावरण को आकर्षक बनाना ।
( ii ) पाठ्यक्रम को यथासम्भव रोचक एवं उपयोगी बनाने का प्रयास ।
( iii ) रोचक और मनोवैज्ञानिक शिक्षण - प्रणालियों का प्रयोग । ( iv ) परीक्षण - प्रणाली में सुधार ।
( v ) अंशकालीन शिक्षा का प्रबन्ध ।
( vi ) शिक्षण में खेल विधियों का उपयोग ।
( vii ) बालिका - शिक्षा के प्रति अभिभावकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन करना ।
( 3 ) बालिका विद्यालयों की स्थापना - आर्थिक समस्या को हल करने के लिए केन्द्र सरकार का कर्त्तव्य है कि राज्य सरकारों को पर्याप्त अनुदान दे । राज्य सरकारों का कर्तव्य है कि वे इस अनुदान का उचित मात्रा में प्रयोग बालिका - शिक्षा के विकास के लिए करें तथा बालिका विद्यालयों को इतनी आर्थिक सहायता दें कि वे अपने यहाँ अधिक से अधिक बालिकाओं को प्रवेश दे सकें ।
( 4 ) बालिका विद्यालयों की स्थापना - बालिका विद्यालयों की स्थापना करके ही इस समस्या का हल किया जा सकता है । सरकार का कर्तव्य है कि यथासम्भव अधिक से अधिक बालिका विद्यालयों की स्थापना करें । माध्यमिक स्तर पर अधिक से अधिक विद्यालय खोलने की आवश्यकता है । जो बालिका विद्यालय अमान्य हैं उन्हें सरकार द्वारा शीघ्र मान्यता प्रदान की जाय । आवश्यकता पड़ने पर बालिका विद्यालयों के निर्माण के लिए स्थानीय कर का भी । निर्धारण किया जा सकता है । धनी और सम्पन्न व्यक्तियों को बालिका विद्यालयों की स्थापना हेत अधिक से अधिक सहायता के लिए प्रोत्साहित किया जाय ।
भारतीय समाज में धर्म विभिन्नता
हमारे समाज में धर्म के आधार पर भी विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है । धार्मिक विभिन्नता केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है , परन्तु हमारे देश में यह काफी उग्र रूप से है । विश्व के सभी धर्मों की अपनी - अपनी मान्यताएँ हैं जो दूसरे धर्मावलम्बियों से भिन्न हैं । हमारे देश में प्रमुख रूप से निम्न धर्म होते हैं -
1 . हिन्दू धर्म -
विश्व की कुल जनसंख्या के लगभग 13 % हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं । हिन्दुओं के सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद और उपनिषद हैं । इनके अनुसार आकाश , वायु , अग्नि , जल और पृथ्वी पंच तत्व हैं , जिनसे ही प्राणिमात्र को जीवन मिलता है और मृत्यु के बाद वह जीवन इन्हीं में विलीन हो जाता है , अतः ये तत्व उनके जीवन के आधार हैं ।
हिन्दुओं में पेड़ - पौधों को भी बहुत महत्त्व दिया जाता है । हर पेड़ को किसी न किसी देवी देवता से जोड़कर उनकी रक्षा करने का उपाय कालान्तर से बनाये रखा है । वैज्ञानिक दृष्टि से जो महत्त्व आज वृक्षों का बताया जाता है और जिस वस्तुनिष्ठ आधार पर उनकी रक्षा करने पर बल दिया जाता है , वह पूर्व काल में अप्रत्यक्ष रूप से ही प्रचलन में था ।
हिन्दुओं के मान्य ग्रन्थ ' वराह पुराण ' में वृक्षों के महत्त्व को निम्न प्रकार बताया गया है -
" एक व्यक्ति जो एक पीपल , एक नीम , एक बड़ , दस फूल वाले पौधे अथवा लताएँ , दो अनार , दो नारंगी और पाँच आम के वृक्ष लगाता है , वह नरक में नहीं जाएगा ।
" पशुओं और पक्षियों की रक्षा हेतु उन्हें पालना , भोजन खिलाना और उन पर किसी अत्याचार की आशंका को जड़ से हटाने के उद्देश्य से प्राचीन काल से ही हिन्दू धर्म में बड़ी सुन्दर व्यवस्था की गई है । अनेक देवी - देवताओं से इनको जोड़ना भी इसी क्रम में आंका जा सकता है कि पुराने लोगों को सभी पशु और पक्षियों के प्रति अत्यन्त लगाव रहा है और जिनसे निःसन्देह प्रकृति का सन्तुलन व्यवस्थित हुआ है ।
निम्न सारणी को देखें -
यही नहीं बल्कि पुराने ग्रन्थों में प्राकृतिक प्रदूषण फैलाने से रोकने तथा दोषी को दण्ड देखें । की व्यवस्था का विवरण भी कई स्थानों पर मिलता है । अवलोकन करें _
" किसी भी व्यक्ति को पानी में पेशाब , मल अथवा थूकना नहीं चाहिए । किसी भी वस्त को , जो इन अपवित्र वस्तुओं , रक्त और विष से मिश्रित हो , जल में फेंकना नहीं चाहिए । " ( मनुस्मृति )
" व्यक्ति जिसने शहर के अन्दर बिल्ली , कुत्ता , नेवला और साँप जैसे जीव के लोथ अथव कंकाल को फेंका तो उसे तीन पाना का दण्ड दिया गया था , ऊँट , खच्चर और नर कंकाल फेंकने वाले को पचास पाना का जुर्माना किया गया था । " ( कौटिल्य , अर्थशास्त्र )
इससे यह स्पष्ट है कि हिन्दू धर्म पर्यावरण के संरक्षण हेतु और उसे विकृति से बचाने हेतु कितना जागरूक था तथा उसमें कितनी रुचि रखता था ?
2 . जैन धर्म -
इस धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी जी हैं । जैन धर्म ने अपने कुछ विशिष्ट नियमों को बनाकर उनको कठोरता से पालन करने की प्रस्तुति की है । बौद्ध धर्म के समकालिक होने के कारण इस धर्म का भी प्रभाव जैन धर्म के अनुयायियों पर पड़ा है । जिन वस्तुओं पर जैन धर्म में अधिक महत्व है , वे निम्नलिखित हैं - ( i ) मनुष्य और प्रकृति के मध्य समन्वय । ( ii ) मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जैविक अथवा अजैविक संसाधनों का न्यूनतम विनाश । ( iii ) अहिंसा । ( iv ) सभी प्रकार की इच्छाओं से मुक्ति
ये सभी बातें पर्यावरण को किसी भी विनाश के बचाने और उसे पूर्ण व्यवस्थित रखे रहने की दिशा की प्रभावी सूचक हैं ।
3 . बौद्ध धर्म -
बौद्ध धर्म का फैलाव भारत , दक्षिण और दक्षिण एशिया के अनेक देशों में रहा है और सन् 2001 की जनसंख्या के अनुसार विश्व में लगभग 6 % व्यक्ति इस धर्म के अनुयायी हैं । भारत के संस्कारों का भी इस धर्म पर प्रभाव रहा है और इसी कारण पर्यावरणीय प्रबन्ध और मनुष्य की आवश्यकता के अनुकूल ही प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस धर्म के अनुयायियों ने करने को महत्त्व दिया है । सादगी और अहिंसा को मानने वाले बौद्ध धर्मी लोगों ने ' बुरे काम करना बन्द करो , अच्छे काम करने का प्रयास करो ' के अन्तर्गत सभी प्रकृति अनुकूल कार्य करने को स्वीकार किया है । वृक्ष लगाना और उनकी रक्षा करना तथा किसी पर अत्याचार न करना इस धर्म की विशिष्टताएँ रही हैं ।
4 . सिक्ख धर्म -
सिक्ख धर्म और उसका दर्शन गहराई से प्रकृति से जुड़ा है और इसी कारण इस धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक ने प्रकृति को दैविक मान्यता दी है । सिक्खों के पवित्र ग्रन्थ ' गुरुग्रन्थ साहब ' में लिखा है - " सिक्ख धर्म , दुनिया के सभी वस्तुओं से ऊपर प्राकृतिक नियम , पशु और पक्षी , मौसम , वन - वनस्पति और वन्य जीव को महत्त्व देता है , इन सबके । ऊपर सृष्टि रचयिता प्रमुख हैं ।
" उनके अनुसार " ईश्वर स्वयं पर्यावरण में निहित है । "
सिक्ख धर्म पाँच वस्तुओं - ( 0 वायु , ( ii ) जल , ( iii ) पृथ्वी , ( iv ) दिन और ( v ) राती को अधिक महत्त्व देकर अपने पर्यावरणीय दृष्टिकोण की प्रभावी भूमिका को प्रस्तुत करता है । इनके अनुसार - " ये तत्त्व मनुष्य जाति की शान्ति , प्रसन्नता , निश्चलता और विकास के लिए । आवश्यक हैं । ऐसा कोई क्षण नहीं होता जबकि मनुष्य और प्रकृति के मध्य कोई अलगाव सम्भव हो । प्रकृति और मनुष्य जाति के मध्य संतुलन सृष्टि का अविभाज्य अंग है । "
प्रकृति असन्तुलन के लिए इस धर्म की चेतावनी देखें - " अतः चेतावनी स्पष्ट है - सन्तुलन को बिगाडिए और लावस्था अस्त - व्यस्त हो जाएगी । ईमार के सम्पूर्ण पारिस्थितिकीय सन्तुलन के बिना समस्त पारिस्थितिकीय उथल - पुथल हो जाएगी ।
इसके अतिरिक्त भी परम पवित्र ग्रन्थ गुरुपन्थ साहिब में अनेक जगह ' पौध और वनस्पति ' , ' पश और पक्षी ' तथा ' वर्षा और तओं का वर्णन मिलता है । जो निश्चित ही पर्यावरण की महत्ता और सुरक्षा के लिए है ।
5 . इस्लाम धर्म -
इस्लाम धर्म एक एकेश्वरवादी धर्म है जिसके विश्व में लगभग 19 % अनुयायी है । उनकी एक सार्वभीम शक्ति प्रणेता खदा हैं जिनके अनसार ही परे जगत की सभी गतिविधियों चलती है । कुरान उनकी एकमात्र धर्म पुस्तक है जिसमें इस धर्म के लोगों को करने अथवा न करने के सभी कार्यों के लिए निर्देशन है । इस्लाम में तीन बिन्दुओं पर अधिक महत्व दिया गया है
( i ) ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु का निर्माण अल्लाह ने किया है और उसी ने नियम बनाये हैं ।
( ii ) उसने ही सभी वस्तुओं को एक निश्चित मात्रा में बनाया है ।
( iii ) प्रत्येक व्यक्ति को अनुपात के हिसाब से सन्तुलन को चलाना है ।
यह तीनों बिन्दु अपने आप में इतने सम्पूर्ण हैं कि इसमें प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं के प्रति सहज दृष्टिकोण और उनके साथ व्यक्तियों का व्यवहार स्पष्ट निर्देशित है ।
6 . ईसाई धर्म -
सम्पूर्ण संसार में सबसे अधिक अनुयायी रखने वाले ( 32 % ) ईसाई धर्म का पूर्व इंतिहास ' यहूदी - ईसाई आधार संहिता ' के नाम से जाना जाता है जिसमें प्रकृति को मान्यता तो प्रदान की गई है , पर उसे व्यक्ति के अधीन रखा है । सम्भवतः यह उनकी पूर्वग्रसित विचारधारा रही हो , लेकिन इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि -
( I ) व्यक्ति मूलतः पृथ्वी के अन्य सभी जीवों से भिन्न है , जिन पर उनका प्रभाव रहता है ।
( ii ) व्यक्ति स्वयं अपनी नियति के मालिक हैं , वे अपने लक्ष्य चुन सकते हैं और उनको प्राप्त करने के लिए जो भी आवश्यक है , उसे सीख सकते हैं ।
( iii ) मानव जाति का इतिहास प्रगति का रहा है , हर समस्या के लिए कोई समाधान है , अतः प्रगति अथवा उन्नति की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती है ।
( iv ) दुनिया विशाल है , अतः मनुष्य को असीमित अवसर मिलते हैं ।
और इसी कारण उनका मत था कि पृथ्वी और आकाश ( Earth and Space ) के मध्य प्राकृतिक संसाधन और ऊर्जा मनुष्य के उपयोग के लिए बने हैं । कुछ वस्तुएँ अनन्त हैं , उनका खलकर उपयोग करें और जो सीमित हैं , उनके समाप्त होने पर उनके विकल्प विज्ञान और तकनीकी से तैयार किये जा सकते हैं । उनका विचार रहा है - " मानव का प्रकृति पर प्रभाव बना रहेगा क्योंकि मनष्य जाति हर प्रकार से प्रकृति स श्रष्ठ हा प्रकृति की दुनिया वस्ततः मनष्य जाति के कल्याण और प्रसन्नता के लिए ही बनी है ।
( 7 ) पारसी धर्म -
पारसी धर्म का प्रारम्भ ईसा से 660 वर्ष पूर्व से माना जाता है और यह मीडिया , जो अब ईरान में समाहित है , से चलकर 8वीं शताब्दी में भारत में आकर स्थापित हो गया था । इनकी धार्मिक भावना विशेषतः दो बातों में , अच्छा और बुरा में निहित रही है । इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को ' अच्छा पाने के लिए संघर्ष करना चाहिए इसी से . स्वर्ग मिल सकता है ।
पर्यावरण के संदर्भ में विश्व स्तर पर यह माना गया है कि पारसी धर्म ने अपने प्रारम्भ से को पर्यावरण के प्रति आस्था की शिक्षा दी है । उनके धार्मिक ग्रन्थों में छः वस्तओं - नि खनिज , पृथ्वी , जल और वनस्पति का उल्लेख मिलता है जिनको यह किसी न किसी रूप में मान्यता देते हैं और उनकी पूजा करते हैं । इन सब तत्वों में ' अग्नि ' को प्रमुख रूप । से प्रधानता दी गई है । प्रकृति के बारे में इस धर्म की मान्यता है - " प्रकृति संवेदनशील और । विनाशकारी दोनों है , साथ ही असामान्य तौर से शक्तिशाली और लचीली भी । हमारे ग्रह है । लिए हमारी भूमिका इसे किसी भी प्रकार के और प्रदूषण से बचाना है ।
" पवत्रिता ( Purity ) को अपने धर्म का मूल मन्त्र मानते हुए पारसी धर्म के लोग प्रकृति के किसी भी संसाधन की अपवित्रता को किसी भी स्तर पर सहन नहीं करते । जल में लाश डालने अथवा उसे किसी भी प्रकार अपवित्र करने को यह लोग जघन्य कार्य मानते हैं ।
लैंगिक भेदभावों को कम करने में जनसंचार के कार्य एवं भूमिका
जन के साधनों से कोई भी क्षेत्र तथा समस्या अछती नहीं है , अपितु इन साधनों ने दीन - ही - यों , पिछड़ी जातियों , अक्षमतायुक्त तथा हाशिये पर खड़े लोगों की शिक्षा हेतु व्यापक प्रचा सार तथा कार्यक्रम तैयार कर उनकी समानान्तर धारा में लाने के लिए प्रयास किये हैं और . प्रयास अविराम गति से चल रहे हैं । हम यह भली . प्रकार जानते हैं कि लिंग अर्थात् लड़का - लड़की के आधार पर भेदभाव , ऊंच - नीच , अमीर - गरीब , शिक्षित - अशिक्षित सभी व्यक्तियों में व्याप्त है , क्योंकि यह हमारी मानसिकता बन चुकी है कि अगर कुछ भी लेना - देना हो या न हो , बेटी के जन्म की बात सुनते ही अनजान व्यक्तियों के चेहरे पर भी उदासी आ जाती है । ऐसे समाज में सहज ही परिकल्पना की जा सकती है कि लड़कियों की सुदृढ़ता और । सशक्तिकरण की क्या स्थिति होगी ।
समाजीकरण तो समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का होता है , परन्तु स्त्री - पुरुष के समाजीकरण में लैंगिक भेदभावों का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है । वर्तमान में सरकार द्वारा प्रायोजित तथा नैतिक सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए जनसंचार के साधन जागरूकता लाकर लैंगिक भेदभावों को कम करने का प्रयास कर रहे हैं । इस दिशा में जनसंचार के साधनों के कार्यों तथा भूमिका का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है -
( i ) मनोरंजन के साथ - साथ ज्ञान प्रदान करना ।
( ii ) लैंगिक दुर्व्यवहार , घरेलू हिंसा , लिंगीय असमानता आदि से सम्बोधित खबरों और उनके लिए बनाए गए कानूनी प्रावधानों से लोगों को अवगत कराकर स्त्रियों की समाजीकरण की गति को तीव्र करना ।
( iii ) जनसंचार के साधनों के पास विशाल जन - समूह की ताकत होती है । अतः यह किसी भी प्रकार के लैंगिक असमानतापूर्ण व्यवहार और हिंसा से न्याय प्रदान करने में दबाव बनाता है , जिससे इनसे दबंगों और असामाजिक तथा स्त्रियों के अधिकारों का हनन करने वाले डरते हैं ।
( iv ) ये माध्यम स्त्री शिक्षा के महत्व और सरकार द्वारा किए गए प्रावधानों से लोगों को अवगत कराते हैं , जिससे इनका समाजीकरण और सशक्तिकरण होता है ।
( v ) स्त्रियों के लिए विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण तथा मुद्रित साधन अलग से स्तम्भ प्रकाशित करते हैं ।
( vi ) स्त्री संवाद के द्वारा स्त्रियों की समस्याओं से लोगों को अवगत कराकर उनके प्रति संवेदना जाग्रत करने का कार्य ।
( vii ) स्त्रियों के प्रति हो रहे अपराधों से सम्बन्धित खबरों और स्थलों तथा अपराधियों को चिन्हित कर सावधान करना , जिससे महिलाओं का सशक्तिकरण और समाजीकरण हो रहा है ।
( viii ) ये माध्यम शिखर पर पहुंचने वाली महिलाओं के जीवन कार्यों , संघर्ष तथा परिवार के साथ को दिखाते हैं , जिससे अन्य लोग प्रेरणा ग्रहण कर इनको सुदृढ़ता और समाज में सम्मान दिलाने हेतु आगे आते हैं ।
( ix ) बालिकाओं तथा स्त्रियों में ये साधन लेखों , कहानियों , कविता , खबर , कक्षा , डॉक्यूमेंट्री , धारावाहिक आदि के द्वारा उत्साह भरते हैं , जिससे उनमें हीन मनोवैज्ञानिकता का अन्त होता है और आत्मविश्वास जाग्रत होता है ।
( x ) महिलाओं को उनके अधिकारों तथा स्वतंत्रता से परिचित कराते हैं , जिससे वे समाजीकरण में सक्रिय भूमिका निभाकर अपने सशक्तिकरण की राह तय करती हैं ।
( xi ) जनसंचार के साधनों द्वारा लैंगिक मुद्दों पर खली बहस तथा परिचर्चा का आयोजन किया जाता है , जिससे जागरूकता आती है ।
( xii ) जनसंचार के साधन सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलन्द करते हैं , जिससे भी लिंगीय सशक्तिकरण तथा समाजीकरण में वृद्धि होती है ।
( xii ) जनसंचार के साधनों द्वारा समय - समय पर घटते लिंगानुपात तथा उससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं से अवगत कराया जाता है । आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है । इससे भी जन - जागरूकता आती है तथा लिंगीय सुदृढ़ता और उनके समाजीकरण में सहायता प्राप्त होती है ।
लिंग भिन्नता
लिंग भिन्नताएँ जेण्डर पर आधारित भिन्नताएँ होती हैं । समाज में प्राचीनकाल से ही लिंग के आधार पर लड़के एवं लड़कियों में भेद समझा जाता है । लड़कियों तथा महिलाओं के साथ खान - पान , शिक्षा , वेतन एवं सम्मान सभी क्षेत्रों में असमानता का व्यवहार किया जाता है । लड़कियों को जन्म से ही पुरुषों के मुकाबले द्वितीय श्रेणी दी जाती है । भ्रूण हत्या इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है । आज बालक एवं बालिका के जन्म प्रतिशत में भी काभी अन्तर व्याप्त है । बालकों की तुलना में बालिकाओं का जन्म अनुपात निम्न है । यह स्थिति भ्रूण हत्या के परिणामस्वरूप ही आयी है । भ्रूण हत्याओं के बढ़ते आँकड़ों के कारण सरकार को कई सख्त कदम उठाने पड़े हैं । इससे सामाजिक असमानता भी बढ़ी है और स्त्री - पुरुष के अनुपात में भी अंतर आया है ।
लिंग भिन्नता
समाज में महिला शोषण को बढ़ावा दे रही है । यह केवल घरेल स्तर पर ही नहीं वरन् सामाजिक जीवन में भी भिन्नता को बढ़ावा दे रही है । जाति विभिन्नता समाज में एकता एवं भाई - चारे को नष्ट करने में जाति भिन्नता का भी हाथ है । कल जा को अन्य की तुलना में श्रेष्ठ माना जाता है । प्राचीन काल में इस प्रकार जाति व्यवस्था नहीं थी । सम्पूर्ण समाज में वर्ण व्यवस्था व्याप्त थी । वर्ण अधिकतर व्यवसायों के आधार पर बने थे परन्तु धीरे - धीरे इन्हीं वर्णों ने जाति का स्वरूप धारण कर लिया । जाति भिन्नताओं के कारण एक मनुष्य अपने को दूसरे से उच्च मानता है । जाति जन्म पर आधारित व्यवस्था है । बदला नहीं जा सकता है । इस जाति व्यवस्था के कारण समाज में वैवाहिक सम्बन्धों का क्षेत्र भी काफी छोटा होता जा रहा है । जाति भिन्नता ने समाज को कई टुकड़ों में बाँट दिया है, इससे राष्ट्रीय एकता भी छिन्न - भिन्न हो गयी है । जाति व्यवस्था के कारण अपवंचित वर्ग , जैसे - अनुसूचित जाति , जनजाति , पिछड़ी जाति , घुमन्तू जाति तथा श्रमिक परिवारों के बच्चों की शिक्षा सम्बन्धी समस्याएँ भी बढ़ी हैं और इन जातियों को समाज में वह सम्मान प्राप्त नहीं है जो उच्च जातियों को प्राप्त है । जातियों में भी बहुत - सी उपजातियाँ बनती जा रही हैं जिनके कारण समाज कई टुकड़ों में बंटता जा रहा है । सामाजिक एकता की स्थापना में जाति व्यवस्था एक बहुत बड़ी रुकावट है ।
असमर्थता पर आधारित भिन्नता
समाज में असमर्थता कई प्रकार की होती है , जैसे - ( i ) अस्थिबाधिता , ( ii ) श्रवणबाधिता , ( iii ) दृष्टिबाधिता , ( iv ) मानसिक मन्दिता , ( v ) अपंगता , ( vi ) अधिगम असमर्थी , ( vii ) अन्धे ( जिन्होंने ब्रेल विधि से पढ़ने - लिखने का शिक्षण प्राप्त कर लिया है ) , ( viii ) बधिर जिन्होंने सम्प्रेषण में निपुणता कर ली है ।
उपरोक्त सभी प्रकार की असमर्थता के आधार पर समाज विभिन्नीकृत हो जाता है । असमर्थ बच्चों की अपनी समस्याएँ होती हैं तथा अपनी आवश्यकताएँ होती हैं , इन्हें विशिष्ट ध्यान की आवश्यकता होती है परन्तु फिर भी उन्हें समाज से अलग नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे समाज का ही एक हिस्सा होते हैं । उन्हें भी समाज में सम्मान से जीना है तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनने में उनकी सहायता करके समाजोपयोगी बनाना है परन्तु यह असमर्थता उन्हें सामान्य लोगों से अलग करती है । उन्हें सामान्य तौर पर शिक्षित करना कठिन है । इन्हें विशिष्ट ध्यान एवं सहयोग की आवश्यकता होती है ।
कक्षाकक्ष में लिंग समानता लाने में अध्यापक की भूमिका
कक्षाकक्ष में लिंग समानता लाने में अध्यापक के मुख्य भूमिका होती है । अध्यापक द्वारा लिंग सम्बन्धी रूढ़ियों को खत्म करना चाहिए तथा कक्षाकक्ष सम्प्रेषण में लड़कियों की भागीदारी उचित मात्रा में होना चाहिए । कक्षाकक्ष में लिंग समानता लाने में अध्यापक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है ,
जो कि इस प्रकार है -
( 1 ) अध्यापक सभी लड़कियों पर समान ध्यान दें । यह ध्यान रखें कि प्रत्येक लड़की कक्षा की प्रत्येक गतिविधि में समान रूप से भाग ले रही है । यदि कोई लड़की गतिविधि में | भाग नहीं ले रही है तो उसका कारण जानकर उस समस्या को दूर करना चाहिए ।
( 2 ) यदि कुछ लड़कियाँ किसी विषय में पिछड़ रही है तो उसका कारण जानकर उसे दर करने का प्रयास करना चाहिए तथा उनको समय - समय पर उत्साहित करना चाहिए ।
( 3 ) अध्यापक द्वारा कक्षा में लिंग भेद को प्रदर्शित करने वाले कथनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
( 4 ) यदि किसी कार्य के लिए समूह बनाने हैं तो लड़के - लड़कियों के मिले - जुले समूह बनाने चाहिए ।
( 5 ) लड़कियों को भी चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपे जाएँ । इससे उनमें आत्मविश्वास को बढ़ावा मिलता है ।
( 6 ) अध्यापक का स्वयं का दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिए । उसके द्वारा लड़के - लड़कियों । में कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए ।
( 7 ) अध्यापक लड़के व लड़कियों के कार्य की तुलना न करे । उन्हें परम्परागत भूमिका से हट कर अन्य भूमिकाएं निभाने का अवसर प्रदान करें ।
( 8 ) अध्यापक द्वारा लड़के व लड़कियों की योग्यताओं के आधार पर उन्हें विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्र चुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
( 9 ) समाज में विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत सफल महिलाओं को विद्यालयों में आमंत्रित कर विद्यार्थियों को प्रेरण के अवसर प्रदान करें । इससे लड़कियों को प्रेरणा मिलती है ।
( 10 ) अपना विषय पढ़ाते समय अध्यापक विषय - सामग्री के प्रस्तुतिकरण के माध्यम से विद्यार्थियों को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए ।
( 11 ) अध्यापक द्वारा कक्षा में लड़कों व लड़कियों को प्रश्न पूछकर उन्हें बोलने का समान अवसर प्रदान करने चाहिए ।
( 12 ) अध्यापक विभिन्न विषयों पर लड़के व लड़कियों को सामूहिक चर्चा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
विद्यालय में लिंग पहचान तथा समाजीकरण
विद्यालय से संबंधित अनेक कारक बच्चों में लिंग पहचान की भूमिका को प्रभावित करते हैं । इसमें अध्यापक , पाठ्यकम व सहपाठियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । विद्यालय में लिंग असमानता का अभिप्राय विद्यालय पाठ्यक्रम , पाठ्य - पुस्तकों , कक्षाकक्ष प्रक्रियाओं तथा विद्यार्थी अध्यापक , अन्तःक्रियाओं में लिंग असमानता से है । पाठ्यक्रम तथा पाठ्यपुस्तकों में लिंग असमानता देखने को मिलती है । पाठ्यक्रम तथा पाठ्यपुस्तकों का बच्चों की लिंग - भूमिका निर्धारित करने में महत्वपूर्ण योगदान होता है । पाकिस्तान में बहुत से विद्यार्थियों का साक्षात्कार किया गया जिसमें उन्होंने कहा कि वे पाठ्यपुस्तक में दी गई प्रतिमाओं को अपने लिए मॉडल के रूप में देखते हैं । पाठ्यपुस्तकों में निम्नलिखित लिंग असमानताएँ देखने को मिलती हैं . . . .
( i ) पाठ्यपुस्तकों में लड़कों तथा पुरुषों की अपेक्षा लड़कियों तक स्त्रियों की प्रतिभाएँ कम होती है । सामान्यतः लड़कियों का अनुपात घट जाता है , जैसे यह स्तर बढ़ता जाता है ।
( ii ) पाठ्यक्रमों तथा पाठ्यपुस्तकों में स्त्री तथा पुरुषों को रूढ़ियुक्त भूमिकाओं में प्रदर्शित किया जाता है । स्त्रियों को प्रायः घरों में कार्य करते हुए प्रदर्शित किया जाता है जबकि पुरुषों को नेतृत्व या व्यावसायिक भूमिकाओं में प्रदर्शित किया जाता है । पाठ्यपुस्तकों में दिखाई गई यह भूमिका समाज में लड़के तथा लड़कियों के लिए उनकी भूमिका निर्धारित करने में मदद करती है ।
( iii ) पाठ्यपुस्तकों तथा पाठ्यक्रम में लड़के तथा लड़कियों को सामाजिक रूढ़िवादी भूमिकाओं के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है । जैसे लड़कों तथा पुरुषों को आक्रामक , शक्तिशाली , प्रभावशाली , बहादुर प्रदर्शित किया जाता है जबकि महिलाओं को कमजोर , निष्क्रिय , आज्ञाकारी , सौम्य तथा भावात्मक प्रदर्शित किया जाता है ।
कक्षा में लिंग समानता के लिए किये गये जाने वाले प्रयास
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट सन् 1995 के अनुसार महिला शिक्षा . महिला समानता तथा महिलाओं को अधिकार सम्पन्न बनाने के वर्तमान कार्यक्रम तथा उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं
( i ) बालिकाओं के नामांकन तथा उन्हें कक्षा में रोक रखने पर बल दिया जा रहा है ।
( ii ) ग्रामीण अध्यापिकाओं की नियुक्ति तथा पाठ्यचर्या से लैंगिक पक्षपात से हटाये जाने पर दिया जा रहा है । ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना के संशोधित नीति - निर्धारणों में यह शर्त है कि भविष्य में नियुक्त किये जाने वाले शिक्षकों में कम - से - कम 50 % महिलाएं होंगी ।
( iii ) मंत्रालय ने औपचारिक शिक्षा की योजना के अन्तर्गत 90 % सहायता ऐसे केन्द्रों को दी है जो केवल बालिकाओं के लिए हैं । केवल बालिकाओं के लिए अनौपचारिक । शिक्षा केंद्रों तथा सह - शिक्षा वाले अनौपचारिक केन्द्रों के अनुपात को 25 : 75 से बढ़ाकर 40 : 60 करके हाल ही में इस योजना को संशोधित किया गया है जिससे बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए और अधिक सुविधाएं प्राप्त हों और वे अधिक शिक्षित हो सके ।
( iv ) बालिकाओं को विद्यालय ( IX से XII ) में रोके रखने हेतु छात्रावास सुविधाओं को सुदृढ़ बनाने की एक योजना प्रारम्भ की गई है । कक्षा IX से XII की छात्रावासों में रह रही छात्राओं के भोजन , फर्नीचर , बर्तन , मनोरंजन सम्बन्धी सामग्री , आदि के लिए सहायता प्रदान की जाती है । आठवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि में इस योजना में 3 , 580 बालिकाओं को सम्मिलित करने का प्रस्ताव है ।
( v ) यह सुनिश्चित करने के लिए सचेत प्रयास किये जायेंगे कि प्रत्येक नवोदय विद्यालय के कुछ विद्यार्थियों में से एक - तिहाई बालिकाएं अवश्य हों ।
( vi ) सम्पूर्ण साक्षरता अभियानों में महिलाओं को सामर्थ्यवान बनाने पर विशेष बल दिया जा रहा है । सम्पूर्ण साक्षरता अभियानों में महिलाओं का नामांकन सामान्यतः हर स्थान पर 60 % से अधिक है ।
( vii ) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विश्वविद्यालयों को लैंगिक समानता , महिलाओं के स्वावलम्बन , बालिका शिक्षा , जनसंख्या सम्बन्धी पहलुओं , मानवाधिकार , आदि के क्षेत्र में शोध परियोजना प्रारम्भ करने , पाठ्यचर्या , प्रशिक्षण और विस्तार का विकास करने के लिए सामाजिक और शैक्षिक विकास के महत्वपूर्ण साधन के रूप में अध्ययन कार्यक्रमों को बढ़ावा देने तथा महिला अध्ययन केंद्र स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता देता आ रहा है ।
लिंग आधारित भेदभाव के कारण
भारतीय समाज में लिंग आधारित भेदभाव के कई कारण होते हैं , जो कि निम्नलिखित हैं -
( 1 ) शिक्षा का अभाव - जैसा कि सर्वविदित है कि सामाजिक परिवर्तन का मुख्य साधन है - शिक्षा : शिक्षा के प्रावधानों से सामाजिक गतिशीलता आती है तथा नए अवसर मिलते हैं । औपचारिक शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति को आवश्यक कौशलों द्वारा सशक्त करती है ।
( 2 ) बाहरी संसार से सम्पर्क का अभाव - महिलाओं को अपने घर में निकलने और बाहरी दुनिया से सम्पर्क के अवसर प्रायः नहीं मिलते । वे परिवार में ही अपनी भूमिकाएं निभाने तक सीमित हो जाती हैं । वे घर के बाहर की दुनिया से अलग - थलग पड़ जाती हैं । विकास के लिए उनमें ऐसे कौशलों और अभिवृत्तियों का विकास होना चाहिए जो बाहरी दुनिया से जुड़ने में सहायक हों ।
( 3 ) पुरुषों पर निर्भरता - परम्परागत भारतीय परिवारों में महिलाओं को सदैव परुषों पर । निर्भर रहना पड़ता है । उन्हें स्त्री , पत्नी , बहन , मां और दादी की भूमिका निभानी होती है । इन परिवारों में पीढ़ियों का अंतर महत्वपूर्ण है । परिवार में पति , पिता और अततः अपने पुत्रों पर निर्भर रहना ही महिलाओं की नियति रही है ।
( 4 ) रीति - रिवाज - हमारी सामाजिक गतिशीलता पहले से ही कम थी तथा लोग अपने बाल - बच्चों के साथ एक समुदाय के रूप में रहते थे । जीवन - निर्वाह के लिए लोगों को प्राकृतिक परिस्थिति तथा अन्य स्थानीय लोगों के साथ अंतःक्रिया करते रहना पड़ता था । परिवार को आधार बनाकर त्यौहार , सामाजिक गतिविधियाँ और मनोरंजन की योजना बनाई जाती थीं । महिलाएं सामाजिक संबंधों के जाल में कैद रही थीं ।
प्रयोगात्मक कार्य
1 . प्रयोगात्मक कार्य भारत में विभिन्न जातियों पर आधारित एक लघु नाटिका के प्रस्तुतीकरण के बारे में परियोजना कार्य दीजिए ।
2. धर्मों पर आधारित एक सत्र का ( प्रमुख तथ्यों व मान्यताओं सहित ) संगठन कीजिए ।
3. किसी एक प्रमुख भेदभाव का चयन कीजिए तथा कोई ऐसा भावनात्मक नाटक तैयार कीजिए जो मन को उद्वेलित करने वाला हो ।
4. मानव मन को द्रवित करने वाला एकांकी तैयार कीजिए जो दिव्यांगों के सम्बन्ध में हो ।
5. लिंग - भेदभाव तथा जनसंचार ' पर नाटिका तैयार कीजिए ।
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