राज्य विधान मण्डल
राज्य विधान मण्डल भारतीय संविधान के अनुच्छेद - 168 में राज्यों के विधान हल के गठन का उपबंध है ।जो राज्यपाल , विधान परिषद और विधान सभा से मिलकर बना है ।
राज्य का विधान मण्डल = ( राज्यपाल + एक या दो सदनों को मिलाकर बनता है । )
1 . बिहार 2 . महाराष्ट्र 3 . आन्ध्र प्रदेश 4 . कर्नाटक 5 . उत्तर प्रदेश 6 . जम्मू - कश्मीर में द्वि - सदनीय व्यवस्था है ।
4 अप्रैल 2007 को आन्ध्र प्रदेश विधान परिषद का पुनगर्छन हुआ है ।
अनुच्छेद - 169 में राज्यों में विधान परिषदों के उत्सादन ( समाप्त ) एवं सृजन का उपबंध है । जो संसद विधि द्वारा संभव है लेकिन यदि उस राज्य की विधान सभा ने इस आशय का संकल्प विधान सभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाली सदस्यों की संख्या के कम से कम 2 / 3 बहुमत द्वारा पारित किया हो ।
उत्सादन ( समाप्त ) या सृजन के लिए । यदि उत्सादन के लिए संकल्प आया है तो उस राज्य में संसद विधि द्वारा विधान परिषद को समाप्त कर दी जाएगी यदि संकल्प सृजन के लिए है । तो संसद उस राज्य में विधान परिषद का गठन करेंगी ।
विधान सभा अनुच्छेद - 170 में विधान सभा की संरचना का उपबंध का विधान सभा के अधिकतम सदस्य संख्या - 500 तथा न्यूनतम 60 है ।
वर्तमान समय में सबसे बड़ा विधान सभा ऊ प्र० का है जबकि सबसे छोटी विधान सभा सिक्किम का है । जहाँ कमश : 403 और 32 सीटें है ।
अनुच्छेद 333 के तहत राज्यपाल विधान सभा में एक एंग्लो इण्डियन सदस्य को नामजद करता है । राज्यविधान सभा की कलावधि 5 वर्ष निर्धारित है । लेकिन आपात के समय अनु० 352 के तहत संसद द्वारा एक वर्ष के लिए अवधि बढ़ाया जा सकता है । 84वाँ विधान संसोधन अधिनियम 2001 के तहत यह प्रावधान बना है कि लोकसभा तथा विधानसभाओं की सीटों की संख्या में ।
वर्ष 2026 तक कोई वृद्धि नहीं की जाएगी । जब कि 87वाँ संविधान संसोधन अधिनियम - 2003 के तहत राज्य में निर्वाचन क्षेत्र 1991 के स्थान पर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन या समायोजन किये जा सकते हैं । का निर्धारण हुआ है । वर्तमान में सीटों के आवंटन का आधार 1971 की जनसंख्या है । विधान परिषद की संरचना भारतीय संविधान के अनुच्छेद - 171 के तहत विधान परिषद की संरचना का उपबंध है । विधान परिषद के सदस्यों की समस्त संख्या उस राज्य की विधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या के 1 / 3 से अधिक नहीं होगी ।
लेकिन किसी भी दशा में विधानसभा के सदस्यों की संख्या से 40 से कम नहीं होनी चाहिए । किसी राज्य की विधान परिषद की कुल संख्या निम्नवत 1 / 3 सदस्य नगरपालिकाओं , जिला परिषदों तथा स्थानीय निकायों के सदस्यों के निर्वाचन मण्डल द्वारा चुने जायेंगे । 1 / 3 सदस्य राज्य विधान सभा के सदस्यों द्वारा उन लोगों में चुने जायेंगे जो विधान सभा के सदस्य नहीं है ।
1 / 6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत् किये जायेंगे । .
( 1 ) साहित्य
( 2 ) कला
( 3 ) विज्ञान
( 4 ) समाज सेवक
( 5 ) सहकारिता
' सहकारिता , राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत राज्यसभा के सदस्यों । की योग्यता में नहीं है ।
1 / 12 सदस्य माध्यमिक शिक्षा संस्थानो में कम से कम 3 वर्ष से सेवारत शिक्षकों के निर्वाचन मण्डल से चुने जायेंगे ।
1 / 6 सदस्यों के अनु० 171 ( 3 ) ड के तहत राज्यपाल । नाम निर्दिष्ट करता है ।
1 / 3 नगरपालिका , जिला परिषद , स्थानीय निकाय के सदस्यों द्वारा
1 / 3 राज्यविधान सभा के सदस्यों द्वारा
1 / 12 सदस्य 3 वर्ष पूर्व का स्नातकों के द्वारा
1 / 123 वर्ष से , सेवारत म०शि० शि के द्वारा
सदस्यों की योग्यता
राज्यविधान सभा
1 . भारत का नागरिक हो ।2 . 25 वर्ष की आयु हो
3 . ऐसी योग्यता भी रखता हो, जो समय - समय पर संसद अर्हताएं हो
राज्य विधान परिषद
1 . भारत का नागरिक हो ।2 . 30 वर्ष की आयु
3 . उसके पास ऐसी अन्य जो इस विधि द्वारा नियत करे । निमित्त संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा विहित की जाए ।
अनु० - 190 ( 4 ) में यह उपबंधित है कि सदन का सदस्य 60 दिन तक लगातार सब अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है , तो सदन उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकती हैं । लेकिन इस कालावधि में वह समय नहीं जोड़ा जायेगा जिसमें सदन की बैठकें 4 दिन से स्थगित रही हो ।
अनुच्छेद - 172 में राज्यों के विधान मण्डलों की अवधि का उपबंध है । विधान सभा की अवधि 5 वर्ष की होगी । जबकि केन्द्र में राज्य की तरह विधान परिषद स्थायी सदन है , इसका कभी विघटन नहीं होगा , लेकिन इसके 1 / 3 सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष के बाद सेवा निवृत्त होंगे ।
अनुच्छेद - 188 में विधान सभा और विधान परिषद के सदस्यों के शपथ का उपबंध है जो सदस्य राज्यपाल के सामने शपथ लेते हैं यदि राज्यपाल नहीं हैं , तो राज्यपाल द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समय । ।
अन - 193 में यह अनुबंधित है कि यदि कोई सदस्य बिना शपथ का बैठता है , तो 500 रुपये का प्रतिदिन के हिसाब से दण्ड का भागी होगा ।
राज्य - मंत्रिपरिषद का गठन
अनु० - 163 में यह उपबंध है कि राज्यपाल को सहायता और परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी । जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा ।अनु० - 164 के तहत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है । और मुख्य मंत्री के परामर्श पर अन्य मंत्रियों की नियक्ति राज्यपाल करता है और मंत्रीगण , राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त पद पारण करते हैं । लेकिन राज्यपाल अपनी इस शक्ति का प्रयोग मुख्यमंत्री के परामर्श पर ही करेगा ।
91वाँ संविधान संसोधन अधिनियम - 2013 के तहत यह प्रावधान बना है कि केन्द्र और राज्य में मंत्रिपरिषद के सदस्य संख्या क्रमश : लोकसभा एवं राज्य के विधान सभा की सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत होगा । लेकिन जहाँ सदन की संख्या 40 है । वहाँ अधिकतम मंत्रियों की संख्या मुख्यमंत्री सहित 12 होगी । राज्यमंत्रि परिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होगा ।
अनु० - 167 में यह उपबंध है कि राज्यपाल को जानकारी देना मुख्यमंत्री का कर्तव्य होगा । मुख्यमंत्री या मंत्रीपद प्राप्त करने के लिए कोई भी व्यक्ति विधान मण्डल के किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है । यह भी आवश्यक नहीं है कि वह विधान मण्डल के किसी सदन का सदस्य हो , बल्कि ऐसे भी व्यक्ति को मंत्री बनाया जा सकता है , जो किसी सदन का सदस्य न हो लेकिन मंत्री पद प्राप्त करते ही 6 माह के भीतर किसी सदन का । सदस्य होना आवश्यक है अन्यथा अपने पद से उसे हटाना पड़ेगा । राज्य विधानसभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष भारतीय संविधान के अनु - 178 के तहत राज्य विधान सभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चयन का उपबंध है । राज्यविधान सभा अध्यक्ष मुख्य पदाधिकारी होता है । उसका चुनाव विधान सभा के विधान सभा के सदस्य अपने ही सदस्यों में से करते हैं । साथ ही विधान सभा अपने सदस्यों में ही उपाध्यक्ष का भी चुनाव करता है । अनु० - 179 में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना , पद से हटाये जाने , पद त्याग का उपबंध है । जो निम्नवत है
' अध्यक्ष और उपाध्यक्ष उस समय अपने पद को रिक्त कर । देंगे जब उनकी विधान सभा की सदस्यता समाप्त हो जायेगी । विधान सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुतम द्वारा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाया जा सकता है लेकिन 14 दिन पूर्व इसकी सूचना देनी पड़ेगी । किसी भी समय , यदि वह सदस्य अध्यक्ष है , तो उपाध्यक्ष को यदि सदस्य उपाध्यक्ष है तो अध्यक्ष तो सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
अनु० - 179 ( ग ) में यह भी उपबंध जुड़ा है कि विध पानसभा के विघटन के बाद भी , विधान सभा अध्यक्ष अपना पद उस समय तक रिक्त नहीं करता जब तक नई विधान सभा द्वारा , नया अध्यक्ष चुन नहीं लिया जाता है । अध्यक्ष एक निष्पक्ष तथा स्वतंत्र पीठासीन अधिकारी होता है ।
अनु० - 181 में उपबंध है कि विधान सभा की किसी बैठक में , जब अध्यक्ष , उपाध्यक्ष को उसके पद से हाटने का संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा ।
अनु० - 174 में राज्य विधान मण्डल के सत्र , संत्रावधान , और विघटन का उपबंध हो । राज्यपाल समय - समय पर अधिवेशन के लिए विधान मण्डल के सदस्यों को आहूत करता है । पिछले सत्र के अन्तिम दिन तथा आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तिथि के बीच 6 माह से अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए ।
भारतीय संविधान के अनु० - 182 में - विधान परिषद के सभापति एवं उपसभापति का उपबंध है । इसके लिए जिस राज्य में विधान परिषद है । उस राज्य के विधान परिषद के सदस्य अपने में से ही एक सभापति तथा एक उपसभापति का चुनाव करती है । राज्यसभा में उपराष्ट्रपति के तहत राज्यपाल विधान परिषद का अध्यक्ष नहीं होता है । केवल राज्यपाल अनु० 171 ( 3 ) ड . के तहत 1 / 6 सदस्यों का नाम निर्दिष्ट करता है । विधान प्रक्रिया - सामान्यत : संसद में जिस विधायी प्रक्रिया का उपबंध है , ठीक उसी प्रकार राज्य विधान मण्डल में प्रक्रिया का उल्लेख है ।
भारतीय संविधान के अनु० - 199 धन विधेयक को परिभाषित किया गया है । जो अनु० - 199 क से छ तक उपबंधित है । धन विधेयक और वित्त विधेयक को केवल विधान सभा में पारित किया जायेगा । धन विधेयक को विधान परिषद केवल 14 दिन तक T रोक रख सकती है ।
अनु० - 199 के खण्ड ( 4 ) में यह उपबंध है कि - जब धन विधेयक अनु० - 198 के अधीन विधान परिषद के पास भेजा जाता है । और उसके बाद अनु० - 200 तक के राज्यपाल के समक्ष रखा जाता है । , तब प्रत्येक धन विधेयक पर विधान सभा के अध यक्ष का हस्ताक्षर रहेगा कि यह धन विधेयक है । जबकि अनु० 199 के खण्ड ( 3 ) में यह निश्चय है कि कोई विधेयक धन विष्ट यक है कि नहीं इसका अन्तिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष करेगा । धन और वित्त विधेयक को छोड़कर सामान्य विधेयक को विधान परिषद पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है ।
विधान परिषद को धन विधेयक की तुलना में सामान्य या साधारण विधेयक में अधि क शक्तियाँ प्राप्त हैं । केन्द्रीय विधान मण्डल में साधारण विधेयक को लेकर यदि दोनों सदनों में मतभेद है , तो अनु० - 108 के तहत संयुक्त बैठक का उपबंध है । संयुक्त बैठक की सूचना राष्ट्रपति देता है और उसकी अध्यक्षता लोक सभा अध्यक्ष करता है । लेकिन राज्य विधान मण्डल में साधारण विधेयक पर मतभेद होने पर संयुक्त बैठक का कोई उपबंध नहीं है ।
भारतीय संविधान के अनु० - 208 के तहत प्रक्रिया संबन्धी नियमो का उपबंध है । इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए राज्य के विधान - मण्डल का कोई सदन अपनी प्रक्रिया और अपने कार्य संचालन के लिए नियम बना सकता है । राज्य के विधान मण्डल के किसी सदन की बैठक के लिए गणपूर्ति 1 / 10 सदस्यों की उपस्थिति होगी । यदि बैठक के समय गणपूर्ति नहीं है , तो विध न सभा अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह सदन को स्थगित कर दें , या निलम्बित कर दें , जब तक कि कोरम पूर्ण न हो जाय ।
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By आलोक वर्मा
