आदर्श शिक्षण में शिक्षक एवं छात्रों का योगदान,CTET की परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स
आदर्श शिक्षण में शिक्षक एवं छात्रों का योगदान
( CONTRIBUTION OF TEACHERS AND STUDENTS IN GOOD TEACHING )
शिक्षण वह क्रिया है जिसके द्वारा शिक्षक , छात्र तथा विषय के मध्य सम्बन्ध स्थापित होता है । ' शिक्षण - शिक्षक तथा शिक्षार्थी में शिक्षक तथा शिक्षार्थी ' सजीव एवं सक्रिय बिन्दु हैं । शिक्षक शिक्षण के समय यदि अधिक सक्रिय एवं सजीव रहे तो छात्र भी सक्रिय एवं उत्साही रहता है । जब तक शिक्षण प्रक्रिया के ये दोनों बिन्दु सजीव तथा सक्रिय न रहेंगे , परस्पर सिखाने एवं सीखने की क्रिया में आवश्यक सहयोग न प्रदान करेंगे तब तक शिक्षण प्रक्रिया सफल नहीं हो सकती ।
सफल शिक्षण के लिये शिक्षक के कर्तव्य योजना
1 . शिक्षक को अपने पढ़ाये जाने वाले विषय की रूपरेखा पहले ही बना लेनी चाहिये । यह योजना क्रमबद्ध तथा तार्किक क्रम में मनोवैज्ञानिक प्रकृति की होनी चाहिये । शिक्षक को चाहिये कि वह सभी सामग्री सर्वश्रेष्ठ विधि से छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करे ।
2 . समाज की आवश्यकतानुसार शिक्षक को चाहिये कि वह पाठ्यक्रम में महत्ता के आधार पर पाठों का चयन करे तथा पढ़ाये । छात्र ऐसी स्थिति में अधिक रुचिपूर्वक अध्ययन करेंगे क्योंकि पाठ उनकी आवश्यकताओं तथा समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा ।
3 . शिक्षक को चाहिये कि वह पाठ को समय पर पढाये । जैसे यदि उसे मँगफली के विषय में पढाना है तो मूंगफली की ऋतु ( Season ) में पढ़ाये जिससे कि छात्र अपने खेतों में या कॉलेज फार्म पर वास्तविक रूप से मूंगफली की खेती के विषय में सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक कार्य का ज्ञान प्राप्त कर सकें ।
4 . अपना वर्ष भर का कार्यक्रम शिक्षक को तैयार कर लेना चाहिये ।
5. शिक्षक को अपने छात्रों के प्रति प्रेम एवं सहानुभूति रखनी चाहिये । उसमें धैर्य एवं सहनशीलता व्या - इन गुणों से युक्त शिक्षक छात्रों के सामीप्य से सम्पर्क में आ जाते हैं तथा छात्र शिक्षक में पापत कर स्वयं को अपने घर के समान वातावरण में पाते हैं तथा अधिक अच्छी तरह से नया करते हैं । अतः शिक्षक को सहयोगी प्रवृत्ति का होना चाहिये ।
6. छात्रों के प्रति व्यक्तिगत रूप से जागरूक रहे । यदि शिक्षक व्यक्तिगत रूप से छात्रों वह तो छात्र भी स्वयं को विशेष रूप से शिक्षक की संरक्षकता में पाता है तथा अधिक सीखता है। शिक्षक योग्यता के आधार पर श्रेणी विभाजन कर सीखने की प्रक्रिया को और भी अधिक सरल तथा उपादेय बना देता है ।
7. सफल शिक्षण के लिये यह आवश्यक है कि शिक्षक अपने छात्रों को भली प्रकार से जानता उनकी योग्यताओं तथा क्षमताओं का ज्ञान रखता हो - क्योंकि आजकल छात्र केन्द्रित शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाता है ।
8. शिक्षक पर्ण रुचि तथा उत्साह के साथ शिक्षण - प्रक्रिया में भाग ल - तभी छात्र सीखने के लिये अधिक प्रेरित होंगे तथा सीखेंगे ।
9 . शिक्षक को Resourceful होना चाहिये । उसकी बात करने की प्रक्रिया रोचक होनी चाहिये तथा उसे विषय के प्रयोगात्मक पक्ष में होना चाहिये ।
10 . शिक्षक को श्रव्य - दृश्य सामग्री का चयन तथा उनका उचित उपयोग करना अवश्य आना चाहिये । इसकी सहायता से वह अधिक सफलता के साथ शिक्षण कर सकेगा ।
11 . शिक्षण प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग शिक्षक को करना चाहिये । ये मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त निम्नांकित हैं
(i) अभ्यास का सिद्धान्त - ( अ ) यदि शिक्षक अभ्यास के लिये छात्रों को अधिक समय देता है तथा । अभ्यास के उद्देश्य ध्येय आदि के विषय में ज्ञान प्रदान कर उचित अवसर प्रदान करता है तो छात्र अधिक सरलता से सीखते हैं ।
( ब ) शिक्षक को केवल अभ्यास करने के लिये कहकर ही नहीं छोड़ देना चाहिये वरन उसे । समयानुसार निरीक्षण तथा सुधार करते रहना चाहिये । ।
( स ) शिक्षक को इस बात का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये कि उसे किन चीजों का अभ्यास करना चाहिये और किनका नहीं ।
( द ) आवश्यकतानुसार पाठ्य सामग्री पर जोर देना चाहिये ।
( य ) शिक्षक को सभी तथ्य प्रतिदिन के व्यवहारों ( Life Situations ) के आधार पर देने चाहिये ।
( ii ) प्रभाव का सिद्धान्त - शिक्षक को संतोषप्रद एवं असंतोषप्रद वस्तुओं का ज्ञान होना चाहिये । क्योंकि ये दोनों ही अपने - अपने स्वभावानुसार शिक्षण प्रक्रिया में योग देती हैं । शिक्षक को चाहिये कि अच्छे कार्य का उचित तथा धनात्मक श्लाघा करे ( Positive Appre ciation ) | यह कार्य स्वीकृति ( Approval ) तथा मान्यता देकर ( Recognition ) छात्रों को प्रेरित किया जा सकता है ।
12 . शिक्षक को सफल शिक्षण के लिये निम्नांकित शैक्षणिक सत्रों का प्रयोग करना चाहिय
( क ) ज्ञात से अज्ञात की ओर ।
( ख ) सरल से जटिल की ओर ।
( ग ) स्थूल से सूक्ष्म की ओर ।
( घ ) पूर्ण से अंश की और ।
( ङ ) अनिश्चित से निश्चित की और ।
( च ) प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर ।
( छ ) विशिष्ट से सामान्य की और ।
( ज ) विश्लेषण से संश्लेषण की ओर ।
( झ ) मनोवैज्ञानिक से तात्मक क्रम की ओर ,
( ञ ) अनुभूत से युक्ति - युक्त की ओर ।
( ट ) नैसर्गिक विधि ।
( ठ ) दृश्य से अदृश्य की ओर ।
( ड ) स्वयं अध्ययन को प्रोत्साहन ।
( ढ ) Follow Culture Epoch Theory .
इन सभी सूत्रों के आवश्यकतानुसार अनुसरण से शिक्षक अपने विषय को कक्षा में छात्रों के समक्ष भली प्रकार से प्रस्तुत कर सकता है तथा छात्र सरलता से अधिक सीख सकते है ।
13 . शिक्षक को सीखने - सिखाने का उचित वातावरण बनाना चाहिये ।
14 . शिक्षक को अपने छात्रों का मल्यांकन वास्तविक रूप से सही तथा निष्पक्षता से करना चाहिये ।
15 . शिक्षक को छात्रों की सहायता के लिये तथा उन्हें निर्देशन देने के लिये निर्देशन ( Guidance ) के विषय में पूर्ण ज्ञान होना चाहिये ।
वास्तव में शिक्षक अनेक प्रकार की प्रक्रियायें अपनाकर शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावोत्पादक बना सकता है । एक उत्तम अध्यापक का कार्यक्रम निम्नांकित बातों पर अवश्य आधारित होना चाहिय
( क ) समुदाय की आवश्यकता ।
( ख ) स्वस्थ शैक्षिक सिद्धान्त ।
( ग ) सही , पूर्ण तथा उचित ( Up - to - date ) तकनीकी सूचनायें ।
( घ ) ऋतु तथा मौसम के अनुसार पाठ्यक्रम ।
( ङ ) मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित सूचनायें ।
( च ) छात्रों का आयु स्तर तथा मानसिक स्तर ।
( छ ) छात्रों की योग्यतायें तथा उनका पूर्व ज्ञान ।
( ज ) पाठ्यक्रम पर आधारित सूचनायें ।
सफल शिक्षण क्रिया में छात्रों का कर्तव्य
1 . छात्रों को अध्ययन की प्रक्रिया में अध्यापक को पूर्ण सहयोग देना चाहिये । कक्षा में उन्हें नियमित रहना चाहिये । उन्हें अनुशासन में रहकर शिक्षक को विभिन्न शैक्षणिक क्रियाओं के प्रबन्ध तथा आयोजन में सहायक होना चाहिये तथा उन्हें चाहिये कि वे कक्षा वार्तालाप में सक्रिय रूप से भाग लें । बिना किसी संकोच तथा झिझक के अपनी समस्यायें अध्यापक के सामने रखें तथा इसके समाधान में योग दें । इस प्रकार से यदि छात्र शिक्षण प्रक्रिया में सहयोग दें तो निश्चित ही वे अधिक सरलता से अधिकतम सीख सकते हैं ।
2 प्रदत्त कार्य का अभ्यास छात्रों को स्वयं करना चाहिये । क्योकि Practice makes a man | active , interested and perfect in leaming .
3 . छात्रों को प्रत्येक विषय की उपादेयता के विषय में ज्ञान होना चाहिये कि वह वस्तु विशेष का ज्ञान किस ध्येय की प्राप्ति हेतु कर रहा है । इसकी जानकारी छात्रों को अधिक सीखने के लिये प्रेरित करती है ।
4 . छात्रों को इस विषय का भी ज्ञान होना चाहिये कि वह प्रदत्त ज्ञान का उपयोग अपने दैनिक जीवन में किस प्रकार से कर सकता है ? इस प्रकार का ज्ञान छात्रों में अधिक सीखने की इच्छा जाग्रत करता है ।
5 . यदि शिक्षण समुदाय की आवश्यकताओं एवं रुचि के अनुसार होता है तो छात्र अधिक सीखते हैं ।
6 छात्र के समक्ष कुछ शिक्षण ध्येयों के होने से छात्र अधिक परिश्रम के साथ अधिक सीख सकते ।
7. छात्रों को पढ़ते समय पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये । पूर्ण स्वतन्त्रता के वातावरण में छात्र परीक्षा अधिक सीखता है ।
8. शिक्षार्थी यदि कक्षा में अपने को सुरक्षित समझता है तो अधिक रुचिपूर्वक सीखेगा ।
9. शिक्षार्थी को इस बात का ज्ञान उसे स्वये है कि अध्ययन से दूसरों को कुछ लाभ पहुंचेगा ।
10 . यदि शिक्षार्थी सीखने के लिये प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करता है तो अधिक सीख सकता है तथा अधिक दक्ष हो सकता है ।
11 . यदि छात्र में सीखने के लिये तत्परता है , वह सीखने की मुद्रा में है , तो वह अधिक की सकता है ।
13 . यदि छात्र ध्येय एवं उद्देश्यों के ज्ञान के साथ अभ्यास करें तो अधिक सरलता से सीख सकते ।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि छात्रों का अधिक सीखने में अपना उत्तरदायित्व है । इनमें से कुछ उत्तरदायित्व शिक्षक तथा छात्र दोनों के ही हैं । अतः इन दोनों के परस्पर सहयोग एवं प्रयल के शिक्षण अधिक प्रभावोत्पादक , वास्तविक , उपादेय एवं सफल बन सकता है । शिक्षण तकनीकी शिक्षण को प्रभावशाली बनाने में , शिक्षक तथा छात्र दोनों को स्पष्ट निर्देश देती है , उपादेय सुचनायें प्रदान करती । है तथा आदर्श शिक्षण की प्रक्रिया को सरल , सुबोध तथा रोचक बनाने में पूर्ण रूप से सहयोग तथा सहायता प्रदान करती है , जिससे शिक्षक तथा छात्र संयक्त रूप से अपने - अपने प्रयासों से शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने में महत्वपूर्ण योगदान करने में समर्थ होते हैं ।
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