कृषि शिक्षा
भारत एक कृषि प्रधान देश है । कृषि को भारत का प्रधान उद्योग कहा जा सकता है । इसकी अधिकांश आवादी गाँवों में निवास करती है और कृषि पर निर्भर रहती है । इसलिए भारत को प्रायः ग्रामीण संस्कृति ( Rural Culture ) का देश भी कहा जाता है । इस सबके बावजूद भारत कृषि शिक्षा के क्षेत्र में बहुत अधिक पिछड़ा है । हमारे अधिकांश किसान अशिक्षित हैं तथा कृषि शिक्षा की संस्थायें ग्रामीण जनता के सम्पर्क में नहीं आ पाती हैं । सुघरे बीज , उन्नत विधियाँ , परिष्कृत उपकरण , खाद व कीटनाशक आदि के प्रचार - प्रसार के बारे में इन संस्थाओं का कोई विशेष योगदान नहीं रहता है । कृषि शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय ग्रामीण परिस्थितियों पर ध्यान नहीं दिया जाता है । वस्तुतः कृषि शिक्षा , कृषि शक्ति तथा ग्रामीण अभी भी उपेक्षा का शिकार हैं । इस परिप्रेक्ष्य में कृषि शिक्षा की चर्चा का औचित्य स्वस्पष्ट है । प्रस्तुत अध्याय में कृषि शिक्षा के सम्बन्ध में चर्चा की जा रही है ।
भारत में कृषि शिक्षा का प्रारम्भ
यद्यपि भारत वर्ष में कृषि के पारिवारिक व अनौपचारिक शिक्षा की परम्परा प्राचीन काल से रही है एवं भारतीय किसान अपने पुत्र - पुत्रियों को एवं गाँव के समझदार अनुभवी किसान अपने गाँव व समाज के नागरिकों को खेती से सम्बन्धी कहावतों के माध्यम से अनौपचारिक ढंग से शिक्षा प्रदान करते हैं । औपचारिक रूप से कृषि शिक्षा प्रदान करने का प्रायः अभाव सा ही दृष्टिगोचर होता है । ब्रिटिश शासन के द्वारा पाश्चात्य प्रकार की शिक्षा व्यवस्था में भी कृषि शिक्षा उप्रेक्षणीय ही रही ।
कृषि प्रधान देश होने के कारण स्वतंत्रता के पूर्व ब्रिटिश सरकार का यह भी कर्तव्य था कि वह भारत के विपुल जनमानस को कृषि की औपचारिक शिक्षा प्रदान करने की दिशा में सार्थक प्रयास करती परन्तु ब्रिटिश शासन के प्रारम्भिक दिनों में निहित स्वार्थों से युक्त ब्रिटिश सरकार ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया । सन् 1880 में भारत में भीषण अकाल पड़ा जिसके कारण भारतीय किसान सरकार को कर चुकाने की स्थिति में भी नहीं रह गए । इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार की आय में मारी कमी आ गई । इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में कृषि शिक्षा की ओर ध्यान देना प्रारम्भ किया । तब सन् 1890 में डॉ ० बाइलकर को ब्रिटिश सरकार ने कृषि सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन करने का कार्य सौंपा । डॉ ० थाइलकर ने विभिन्न प्रांतों के कृषि प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन आयोजित किया और इनसे विचार - विमर्श प्रस्तुत करते हुए इन समस्याओं का समाधान करने हेतु सुझाव प्रस्तुत किये गए । ब्रिटिश सरकार ने इन सुझावों का अध्ययन करने के पश्चात् कुष्ठ महत्वपूर्ण निर्णय लिये जिनमें से कुछ प्रमुख निर्णय निम्नवत थे
1. उन कोटि की कृषि शिक्षा देने के लिए देश में चार संस्थायें खोली जानी चाहिए । यह संस्थायें क्रमशः मद्रास , कलकत्ता , बन्चाई और उत्तर प्रदेश में खोली जानी चाहिए । इन संस्थाओं का प्रयोग अन्य प्रान्तों के छात्रों द्वारा भी किया जाना चाहिए ।
2. कृषि विज्ञान की डिग्री अथवा डिप्लोमा को कला अथवा अन्य विज्ञान में प्राप्त डिग्रियों और डिप्लोमा के समान ही स्वीकार किया जाना चाहिए । कृषि विज्ञान के शिक्षकों और कृषि विभाग में कार्य करने वाले अधिकारियों के लिए इन डिग्रियों का होना आवश्यक होना चाहिए ।
3. कृषि विभाग के कुछ निम्न पदों के लिए कृषि में डिप्लोमा होना आवश्यक होना चाहिए । जनसाधारण को कृषि की शिक्षा देने के लिए विशेष स्कूल खोले जाने चाहिए ।
4. विद्यालय में शिक्षक के पद पर नियुक्त होने के पश्चात शिक्षकों को सरकारी फार्मों पर कृषि की व्यावहारिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए ।
कृषि मन्त्रालयों , सचिवालयों तथा निदेशालयों से सम्बन्धित कुछ पदों के लिए कृषि सम्बन्धी व्यावहारिक शिक्षा का होना अनिवार्य होना चाहिए । सन् 1902 तक ब्रिटिश भारत में पूना , शिवपुर , मद्रास , कानपुर तथा नागपुर में ऐसी पांच संस्थायें कार्य कर रही थीं जिनमें कृषि शिक्षा दिये जाने की समुचित व्यवस्था थी और इनमें कई सौ छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे थे । लार्ड कर्जन जब भारत में गर्वनर जनरल बन कर आये तो उन्होंने यहाँ की कृषि शिक्षा में विशेष रुचि ली और उनके निर्देशन में इस सम्बन्ध में निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य किये गये
1. ब्रिटिश भारत के प्रत्येक प्रान्त में एक कृषि विभाग की स्थापना की गयी तथा कृषि शिक्षा से सम्बन्धित कार्यों को समुचित ढंग से करने का उत्तरदायित्व इन विभागों को सौंप दिया गया ।
2. कृषि के क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिए विहार के पूसा ( समस्तीपुर ) नामक स्थान पर केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान ( Central Institute of Agricultural Research ) की स्थापना की गयी ।
3. देश के प्रत्येक प्रान्त में एक कृषि कालेज खोलने का निर्णय लिया गया तथा प्रत्येक कृषि कॉलेज के साथ एक कृषि फार्म खोलने का भी निश्चय किया गया ।
4. मिडिल तथा हाई स्कूल के पाठ्यक्रमों में कृषि शिक्षा नाम से एक नये विषय को सम्मिलित किया गया।
भारत में कृषि शिक्षा तथा कृषि अनुसंधान कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए सन् 1905 में यह निर्णय लिया गया कि राजकोष से 20 लाख रु ० की राशि प्रत्येक वर्ष उपलब्ध कराई जायेगी तत्पश्चात बंगलौर में इन्स्टीट्यूट ऑफ एनिमल हेसवेन्डरी एण्ड डेयरिंग ( Institute of Animal Husbandory and Dairing ) नामक संस्थान की स्थापना सन् 1923 में की गई । सन् 1928 में रायल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर ( Royal Commission on Agriculture ) की नियुक्ति हुई और इसने कृषि की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए जिनमें से कुछ निम्नवत् थे
1. हाई स्कूल स्तर पर व्यावहारिक तथा सैद्धान्तिक दोनों ही प्रकार की कृषि शिक्षा दी जानी चाहिए ।
2. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि शिक्षा प्रदान करने के लिए मिडिल स्कूलों की स्थापना की जानी चाहिए ।
3. प्रत्येक ग्रामीण विद्यालय के पास न्यूनतम तीन एकड़ भूमि का एक कृषि फार्म होना चाहिए ।
4. कृषि की शिक्षा ग्रामीण विद्यालयों में ही दी जानी चाहिए ।
पूसा के केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान को कालान्तर में सन् 1934 में दिल्ली स्थानान्तरित कर दिया गया । यह वर्तमान में दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ( Indian Agricultural Research Institute ) के रूप में कार्यरत है । इस संस्थान ने कृषि जगत को अनेक महत्वपूर्ण कृषि अनुसंधानों से लाभान्वित किया है ।
स्वतन्त्र भारत में कृषि शिक्षा
स्वतंत्रता प्राति के उपरान्त भारत सरकार ने कृषि शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जिसके परिणाम स्वरूप सन् 1976 तक देश में सौ से भी अधिक कृषि शिक्षा प्रदान करने वाली उद्य संस्थायें स्थापित जोरहाट , कल्याणी , कानपुर , पन्तनगर , जबलपुर , फैजाबाद , अहमदाबाद , हिसार , विजूर , रहूरी , लुधियाना , पटना , अकोला , कोयम्बटूर , बंगलौर आदि स्थानों पर स्थित है । सन् 1969 में दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ( Indian Council of Agricultural Research ) की स्थापना की गई । यह संस्था कृषि , पशुपालन तथा मछली पालन आदि क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य को प्रोत्साहित करने एवं इनसे सम्बन्धित योजनाओं में आपसी समन्वय रखने वाली एक राष्ट्रीय संस्था है । यह परिषद राज्यों में कृषि विद्यालयों की स्थापना एवं उनके विकास के लिए सहायता भी प्रदान करती है । सन् 1973 में कृषि और सिंचाई मंत्रालय में कृषि अनुसंधान तथा कृषि शिक्षा से सम्बन्धित एक विभाग की स्थापना की गयी । यह विभाग कृषि अनुसंधान परिषद को प्रशासनिक सहायता प्रदान करने का कार्य करता है । भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत 30 अनुसंधान संस्थान , लगभग 23 विश्वविद्यालय तथा अनेक अखिल भारतीय कृषि परियोजनायें संचालित हो रही हैं । इस परिषद के द्वारा कृषि के क्षेत्र में छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए छात्रवृत्तियाँ भी प्रदान की जाती हैं । यह ऐसे बेरोजगार युवकों के लिए जो किसी कारणवश अपनी विद्यालय शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाये हैं को कृषि से सम्बन्धित व्यावहारिक शिक्षण प्रदान करने का कार्य कर रही है । साथ ही साथ यह देश के विभिन्न भागों में कृषि विज्ञान केन्द्रों की स्थापना भी कर रही है । सन् 1976-77 में देश के कुछ चुने हुए क्षेत्रों में ऐसे केन्द्र स्थापित किये गए हैं । इन कृषि विज्ञान केन्द्रों के साथ प्रशिक्षण केन्द्र भी सम्बद्ध हैं ।
कोठारी आयोग एवं कृषि शिक्षा
छठे एवं सातवें दशक में देश में खायात्रों की भारी कमी , भारत में कृषि विकास की असंतुलित स्थिति एवं कृषि शिक्षा पर विशेष जोर देने की आवश्यकता की ओर कोठारी आयोग का ध्यान आकर्षित होना स्वाभाविक ही था । खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाने , भोजन आदतों में बदलाव लाने , खेती उत्पादन में विविधता लाने , वर्षा जल पर निर्भरता कम करने एवं ग्रामीण जीवन में आधुनिकता लाने जैसे व्यापक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कोठारी आयोग ने कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण उत्थान की समस्याओं के समाधान में विज्ञान ब तकनीकी प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया । उन्होंने इस हेतु सिंचाई खाद , कीटनाशक , उन्नत बीज , भण्डारण व वितरण दुलाई , विद्युतीकरण जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं में निवेश करने के साथ - साथ उस गुणवत्ता की कृषि शिक्षा तथा अनुसंधान की अपरिहार्य आवश्यकता पर जोर दिया । कोठारी आयोग ने कहा कि कृषि के लिए शिक्षा के कार्यक्रमों को निम तीन बातों पर आधारित होना चाहिए
( i ) अनुसंधान अर्थात् उपयुक्त प्रौद्योगिकी का विकास करना ।
( ii ) प्रसार अर्थात् प्रायोगिकी की किसानों को जानकारी देना ।
( iii ) प्रशिक्षण अर्थात किसानों व अन्यों को प्रौद्योगिकी के प्रयोग में निपुण करना ।
कृषि शिक्षा के इन तीन मूलभूत अंगों के बीच समन्वय के लिए किसानों की अनुसंधानकर्ताओं व कक्षा कक्षों के बीच एवं अनुसंधान प्रयोगशालाओं व शिक्षा विभागों की किसानों तक द्विमार्गी वार्तालाप संस्थाओं , महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में कार्य कर रहे अनुसंधानकर्ता व शिक्षकों का कृषि शिक्षा में तथा विचार - विनिमय को सुनिश्चित करना आवश्यक होगा । कृषि शिक्षा के सैद्धान्तिक पक्ष अर्थात् अनुसंधान अनुपयुक्त पक्ष अर्थात् खेतों में काम कर रहे किसानों व अन्यों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध के होने पर ही कृषि शिक्षा का लाभ समुचित ढंग से प्राप्त किया जा सकता है । कोठारी आयोग ने कृषि शिक्षा के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिये जाये ।
( I ). अनुसंधान , प्रशिक्षण तथा प्रसार के एकीकृत कार्यक्रम बाले कृषि विश्वविद्यालय स्थापित किये
( ii ) अन्य विश्वविद्यालयों व संस्थाओं में कृषि अनुसंधान , प्रशिक्षण प्रसार के का ww grm for जायें ।
( iv ) कृषि महाविद्यालयों को उन्नत पनाया जाये ।
( v ) कृषि प्रौद्योगिकी का प्रशिक्षण देने के लिए कृषि पालिटेक्निकों को स्थापित किया जाये ।
( vi ) सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली में कृषि तथा ग्रामीण समस्याओ का कुछ अभिमुखीकरण किया जाय ।
( vi ) कृषि प्रसार कार्यक्रम के विकास के लिए प्राथमिक प्रसार केन्द्र स्थापित किया जाये ।
( vii ) सफल व प्रगतिशील किसानों को कृषि विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों , पॉलिटनीको नया प्राथमिक प्रसार केन्द्रों से धनिष्ठ रूप से जोड़ा जाये एवं उने समुचित मान व सुविधा जाये ।
कोठारी आयोग के द्वारा दिये गए इन सुझावों को भारत में खाद्यान्न उत्पादन व प्रबन्धन की रिक अत्यंत उपयोगी एवं अपरिहार्य स्वीकार किया गया । कोठारी आयोग ने सभी नागरिकों को खाद्यान सर्वोपयोगी व आवश्यक मद से जोड़ने की दृष्टि से प्राथमिक शिक्षा स्तर पर कृषि शिक्षा को एक अनिवार्य अंग के रूप में एवं माध्यमिक स्तर पर कार्य अनुभव के रूप में सम्मिलित करने का महत्वपूर्ण मुझाव भी दिया । इनमें से अनेक सुझावों का क्रियान्वयन करके भारत में कृषि शिक्षा के एक नये युग का मूत्रपात किया गया जिससे खाधान्न उत्पादन में भारत आत्मनिर्भर हो सका ।
कृषि विश्वविद्यालय
भारत में कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना करने की कोठारी आयोग द्वारा की गई संस्तुति को भारतीय कृषि शिक्षा के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जाता है । यद्यपि यह कोई नया मुझाव नहीं था एवं इसमें पूर्व विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग सहित अनेक समितियाँ , आयोगों व शिक्षाविदों के द्वारा ग्रामीण विश्वविद्यालयों या कृषि विश्वविद्यालयों की आवश्यकता व महत्व की चर्चा की जा चुकी थी एवं कई कृषि विश्वविद्यालय स्थापित भी हो चुके थे । परन्तु इनकी संस्था नगण्य होने के साथ - साथ इनके लक्ष्य व कार्य क्षेत्र में अनेक विसंगतियाँ थीं , जिन्हें कोठारी आयोग ने अपने प्रतिवेदन में विस्तार से चर्चा की एवं कृषि विश्वविद्यालयों को एक स्पष्ट कार्यपरक तथा प्रतिष्ठापूर्ण लक्ष्य तथा कार्यक्षेत्र से युक्त किया । कृषि विश्वविद्यालय जहाँ एक ओर कृषि के दोत्र में अनुसंधान , प्रशिक्षण व प्रसार के एकीकृत कार्यक्रमों को चलाने का कार्य करते हैं वहीं दूसरी ओर के ग्रामीण परिवेश की सामाजिक व आर्थिक समस्याओं के निराकरण , प्रौढ़ व सतत् शिक्षा कार्यक्रमों के संचालन तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए आवश्यक व अप्रयुक्त विज्ञानों व प्रौद्योगिकी के विकास शिक्षण व संचरण का महत्वपूर्ण कार्य भी करते हैं । इन विश्वविद्यालयों के द्वारा संचालित किये जाने वाले प्रमुख पाठ्यक्रम निम से सम्बन्धित हो सकते हैं -
1. कृषि अभियान्त्रिकी ( Agricultural Engineering )
2. मानव पोषण तया भोजन प्रायोगिकी ( Human Nutrition and food Technology )
3. कृषि अर्थशास्त्र ( Agricultural Economics )
4. जन प्रशासन ( Public Administration )
5. जन सम्प्रेषण ( Mass Communication )
6. समाजशास्त्र , मानवशास्त्र व कानून ( Sociology . Anthropology and Law )
7. संसाधन संरक्षण ( Resowces Conservation )
8 , बनशास्त्र ( Forestry )
9. मत्स्य उद्योग ( Fisheries )
10. मृदा विज्ञान ( Earth Science )
11. आधारभूत विज्ञान ( Basic Sciences )
12. मानविकी ( Humanities )
कृषि विश्वविद्यालयों के अंतर्गत कृषि उत्पादों , प्रक्रियाओं व विपणन को उन्नत करने के लिए किये जाने वाले अनुसंधान , स्नातकोत्तर व खातक स्तर की शिक्षा एवं प्रसार कार्य प्रमुख रूप से समाहित रहते ET इसके लिए इन विश्वविद्यालयों के पास आधुनिकतम मुविधाओं से युक्त प्रयोगशाला , पुस्तकालय तथा प्रदर्शन खेतों का होना अत्यंत आवश्यक तथा महत्वपूर्ण है । कृषि विश्वविद्यालयों के छात्रों को कृषि सम्बन्धी प्रयोगासक ज्ञान प्रदान करने के लिए उपाधि देने से पूर्व एक वर्ष की इन्टर्नशिप की सम्भावना पर विद्यार करने का आग्रह भी कोठारी आयोग द्वारा किया गया था । इस समय भारत में लगभग तीस कृषि विश्वविद्यालय एवं लगभग एक सौ साठ कृषि महाविद्यालय कृषि एवं सम्बन्धित विषयों की शिक्षा प्रदान करने का कार्य कर रहे हैं । इस संख्या में पशुधन , डेरी उद्योग , वानिकी , फल उत्पादन मत्यपालन आदि की शिक्षा व अनुसंधान से सम्बन्धित विश्वविद्यालय / महाविद्यालय भी सम्मिलित हैं । कुछ प्रमुख कृषि विश्वविद्यालय निमवत् हैं
1. आचार्य एन . जी . रंगा कृषि विश्वविद्यालय हैदराबाद ( आंध्रप्रदेश )
2. आसाम कृषि विश्वविद्यालय , जोरहाट ( आसाम )
3. राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय , पूसा ( बिहार )
4. इन्दिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय , रायपुर ( छत्तीसगढ़ )
5. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान , नई दिल्ली
6. गुजरात कृषि विश्वविद्यालय , सरदार कृषिनगर ( गुजरात )
7. राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान , करनाल ( हरियाणा )
8. ची ० चरनसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय , हिसार ( हरियाणा )
9. शेर - ए - कश्मीर कृषि विज्ञान व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , श्रीनगर ( जम्मू - कश्मीर )
10. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय , राँची ( झारखण्ड )
11. कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय , धारवाड़ ( कर्नाटक )
12. कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय , बंगलौर ( कर्नाटक ) 13. केरल कृषि विश्वविद्यालय , ध्रीसुर ( केरल )
14. मराठवाडा कृषि विश्वविद्यालय , पारभानी ( महाराष्ट्र )
15. केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय , इम्फाल ( मणिपुर )
16. उड़ीसा कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , भुवनेश्वर ( उड़ीसा )
17. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय , लुधियाना ( पंजाब ) 18. राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय , बीकानेर ( राजस्थान )
19. महाराणा प्रताप कृषि य प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , उदयपुर ( राजस्थान )
20. तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय , कोयम्बटूर ( तमिलनाडु )
21. भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान , बरेली ( उत्तर प्रदेश )
22. इलाहाबाद कृषि संस्थान , इलाहाबाद ( उत्तर प्रदेश )
23 , सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , मेरठ ( उत्तर प्रदेश )
24. नरेन्द्र देव कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , फैजाबाद ( उत्तर प्रदेश )
25. चन्द्रशेखर आजाद कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , कानपुर ( उत्तर प्रदेश )
26. गोविन्द यल्लभ पन्त कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , पन्तनगर ( उत्तराखंड )
27. दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थान , मधुरा ( ३० प्र ० )
28. पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान , इज्जतनगर ( उत्तर प्रदेश )
कृषि शिक्षा से सम्बन्धी विभिन्न क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों का विभाजन निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है ।
वर्तमान समय में कृषि व सम्बन्धित विधाओं से जुड़े ये विश्वविद्यालय तथा विभिन्न महाविद्यालय कृषि जुड़े विभिन्न क्षेत्रों की शिक्षा प्रदान करने व अनुसंधान कार्य करने के साथ - साथ नवीनतम कृषि प्रौद्योगिकी को किसानों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ।
राष्ट्रीय कृषि आयोग
सन् 1970 में भारत सरकार के द्वारा एक राष्ट्रीय कृषि आयोग की स्थापना की गई । इस आयोग ने 31 जनवरी 1976 को भारत सरकार के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय को निर्देशक सिद्धान्त मानकर विज्ञान और तकनीकी का उपयोग करके कृषि को आधुनिक बनाया जाना चाहिए । राष्ट्रीय कृषि आयोग ने आने वाले 25 वर्षों के लिए कृषि अर्थव्यवस्था के बारे में अपने विस्तृत प्रस्ताव व योजनायें प्रस्तुत किये हैं । निःसंदेह विगत कुछ दशकों में भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है । भारत की इतनी विशाल जनसंख्या होने के बावजूद भी सामान के मामले में हम पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर हैं । हमें अपनी विशाल जनसंख्या के भरण - पोषण के लिए खाद्यान जुटाने हेतु अन्य राष्ट्र की ओर ताकना नहीं पड़ता है बल्कि समय - समय पर खाद्यान्न का प्रचुर मात्रा में अन्य देशों को निर्यात भी करते रहते हैं । यह सब स्वतंत्र भारत की कृषि सम्बन्धी नीतयों व कृषि वैज्ञानिकों अथक प्रयासों का ही सुपरिणाम है ।
सारांश
भारत कृषि प्रधान देश है जहाँ की अधिसंख्य आबादी गाँवों में रहती है तथा किसी न किसी रूप में कृषि पर आधारित रहती है । यद्यपि पारिवारिक रूप से वंशानुगत ढंग से तथा कहावत आदि के रूप में सामाजिक रूप से कृषि की शिक्षा अनौपचारिक रूप से देने की परम्परा प्राचीन काल से विद्यमान रही है । फिर भी आधुनिक काल में सन् 1890 में कृषि की समस्याओं के अध्ययन ने औपचारिक कृषि शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया । स्वतन्त्रता के उपरान्त कृषि शिक्षा में तेजी आई एवं अनेक कृषि संस्थान व कृषि विश्वाविद्यालय खोले गये । कोठारी आयोग ने कृषि शिक्षा को प्रोत्साहित करने तथा अनुसंधान , प्रसार व प्रशिक्षण के माध्यम से क्रमशः नबीन प्रौद्योगिकी विकसित करने , किसानों को जानकारी देने व किसानों को प्रशिक्षण देने की आवश्यकता पर जोर दिया । वर्तमान में लगभग तीस कृषि विश्वविद्यालय तथा दो सी महाविद्यालय प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्षरूप से कृषि शिक्षा के विभिन्न पक्षों के शिक्षण व अनुसंधान में सक्रिय हैं ।
