आदर्शवाद और शिक्षा के उद्देश्य, प्रक्रिया, पाठ्यक्रम, अनुशासन व अध्यापक की भूमिका

     आदर्शवाद और शिक्षा के उद्देश्य, प्रक्रिया, पाठ्यक्रम, अनुशासन व अध्यापक की भूमिका 


    मानव   सभ्यता   के   उदभव   और   विकास   के   समय   से   ही   आदर्शवादी   विचारधारा   का   किसी      किसी   रूप   में   अस्तित्व   रहा   है।   आधुनिक   काल   में   जब   मानव   ने   चिन्तन   एवं   मनन   आरम्भ   किया   तब   से   आदर्शवादी   विचारधारा   निरन्तर   पुष्पित   एवं   पल्लवित   होती   है।   आदर्शवादी   विचारधारा   जीवन   की   निश्चितताओं   से   जुड़ी   हुई   है।   इसका   आशय   है - जीवन   के   लिए   निश्चित   आदर्शों      मूल्यों   का   निर्धारण   कर   मनुष्य   को   उनके   अनुकरण   हेतु   निर्देशित   करना।   यह   विचारधारा   भौतिक   वस्तुओं   की   अपेक्षा   विचारों   पर   अधिक   बल   देती   है।   आदर्शवादी   दर्शन   का   प्रतिपादन   सुकरात ,  प्लेटो ,  डेकॉर्टी ,  स्पनोसा ,  वर्कलकान्ट ,  फिटशे ,  रोलिंग ,  हीगल ,  ग्रीन   जेन्टाइल   आदि   अनेक   पाश्चात्य   तथा   वेदों      उपनिषदों   के   प्रणेता   महर्षियों   से   लेकर   अरविन्द   घोष   तक   अनेक   पूर्वी   दार्शनिकों   ने   किया   है।

    प्रस्तावना

    आदर्शवाद   दार्शनिक   जगत   में   प्राचीनतम   विचारधाराओं   में   से   है।   एडम्स   के   शब्दों   में   ‘‘ आदर्शवाद   एक   अथवा   दूसरे   रूप   में   दर्शन   के   समस्त   इतिहास   में   व्याप्त   है।   आदर्शवाद   का   उदगम   स्वयं   मानव   प्रकृति   में   है।   आदर्शवाद   शास्त्रीय   दृष्टि   से   आध्यात्मवाद   है।   अर्थात्   इसके   अनुसार   विश्व   में   परम   सत्ता   की   प्रकृति   आध्यात्मिक   है।   समस्त   विश्व   आत्मा   या   मनस   से   अवस्थित   है।   प्रमाण   शास्त्र   की   दृष्टि   से   आदर्शवाद   प्रत्यवाद   है।   अर्थात्   इसके   अनुसार   विचार   ही   सत्य   है।   यह   प्रत्यवाद   प्राचीन   यूनानी   दार्शनिक   प्लेटो   के   विचारों   में   मिलता   है।   जिसके   अनुसार   विचारों   का   जगत   वस्तुजगत   से   कहीं   अधिक   यथार्थ   है।   मूल्यात्मक   दृष्टि   से   इस   दर्शन   को   आदर्शवाद   कहा   जाता   है।
    आदर्शवाद   के   दर्शन   को   संक्षेप   में   उपस्थित   करते   हुए   जी . टी .  डब्ल्यू   पैट्रिक   ने   लिखा   है , ‘ आदर्शवादी   यह   मानने   से   इन्कार   करते   हैं   कि   जगत्   एक   विशाल   यंत्र   है।   वे   हमारे   जगत्   की   व्याख्या   में   जड़तत्व ,  यंत्रवाद   और   ऊर्जा   के   संरक्षण   को   सर्वोच्च   महत्व   से   इन्कार   करते   हैं।   वे   अनुभव   करते   हैं।   कि   किसी      किसी   प्रकार   से   कुछ   विज्ञान   जैसे   मनोविज्ञान ,  तर्कशास्त्र ,  नीतिशास्त्र ,  सौन्दर्यशास्त्र   आदि   का   आधारभूत   और   अंतरंग   चीजों   से   संबंध   है।   वे   प्रकृति   के   रहस्यों   को   समझने   के   लिए   वैसी   ही   कुंजी   हैं   जैसे   कि   भौतिकशास्त्र   और   रसायनशास्त्र   हैं।   वे   यह   विश्वास   करते   हैं   कि   जगत   का   एक   अर्थ   है।   एक   प्रयोजन   है।   शायद   एक   लक्ष्य   है।   अर्थात्   जगत   के   हृदय   और   मानव   की   आत्मा   में   एक   प्रकार   का   आन्तरिक   समन्वय   है ,  जिसमें   कि   मानवबुद्धि   प्रकृति   के   बाहरी   आवरण   को   छेद   सकती   है।   आदर्शवाद   की   इस   व्याख्या   में   जड़वाद   के   विरूद्ध   आदर्शवाद   के   लक्षण   बतलाए   गये   हैं।

    कोई   भी   दार्शनिक   सिद्धान्त   दो   प्रकार   से   समझा   जा   सकता   है -  एक   तो   उन   सिद्धान्तों   को   समझकर ,  जिनका   कि   वह   प्रतिपादन   करता   है   और   दूसरे   उन   बातों   को   जानकर   जिनका   कि   वह   निराकरण   करता   है।   क्योंकि   प्रत्येक   दर्शन   कुछ   सिद्धान्तों   के   समर्थन   और   कुछ   बातों   के   निराकरण   पर   आधारित   होता   है।   इस   दृष्टि   से   आदर्शवाद   की   स्थिति   की   व्याख्या   करते   हुए   डब्लू .  .  हाकिंग   ने   लिखा   है   कि   आदर्शवाद   के   अनुसार   प्रकृति   आत्मनिर्भर   नहीं   है।   वह   स्वतंत्र   दिखलाई   पड़ती   है।   किन्तु   वास्तव   में   वह   मनस   पर   आधारित   है।   दूसरी   ओर   मनस ,  आत्मा   या   प्रत्यय   ही   वास्तविक   सत्ता   है। 

    आदर्शवाद   का   अर्थ

    आदर्शवाद ,  जिसे   हम   अंग्रेजी   में  ( Idealism )  कहते   हैं ,  दो   शब्दों   से   मिलकर   बना   हैप्कमंस़पेउ   लेकिन   कुछ   विचारक   यह   मानते   हैं   कि   इसमें   दो   शब्द   है  -  Idealism   इसमें   स्   सुविधा   के   लिए   जोड़   दिया   गया   है।   वास्तव   में   यदि   देखा   जाये   तो   इसे   प्कमं   या   विचार   से   ही   उत्पन्न   होना   माना   जाना   चाहिए।   चूंकि   इसके   प्रवर्तक   दार्शनिक   विचार   की   निरन्तर   सत्ता   में   विश्वास   करते   हैं ,  इस   कारण   इसे   विचारधारा   के   प्रत्ययवाद   की   संज्ञा   दी   जाती   है।   परन्तु   प्रचलन   में   हम   आदर्शवाद   का   प्रयोग   ही   करते   हैं।   यह   दर्शन   वस्तु   की   अपेक्षा   विचारों ,  भावों   तथा   आदर्शों   को   महत्व   देते   हुए   यह   स्वीकार   करता   है   कि   जीवन   का   लक्ष्य   आध्यात्मिक   मूल्यों   की   प्राप्ति   तथा   आत्मा   का   विकास   है।   इसी   कारण   यह   आध्यात्मिक   जगत   को   उत्कृष्ट   मानता   है   और   उसे   ही   सत्य      यथार्थ   के   रूप   में   स्वीकार   करता   है।

     आदर्शवाद   की   परिभाषाएं

    रॉस    आदर्शवादियों   के   अनेक   रूप   हैं ,  किन्तु   सबका   सार   यह   है   कि   मन   या   आत्मा   ही   इस   जगत   का   पदार्थ   है   और   मानसिक   स्वरूप   सत्य   है। 
     आदर्शवादियों   के   अनुसार -  इस   जगत   को   समझने   के   लिए   मन   केन्द्रीय   बिन्दु   है।   इस   जगत   को   समझने   हेतु   मन   की   क्रियाशीलता   से   बढ़कर   उनके   लिए   अन्य   कोई   वास्तविकता   नहीं   है।    आदर्शवाद   मनुष्य   के   आध्यात्मिक   पक्ष   पर   बल   देता   है ,  क्योंकि   आदर्शवादियों   के   लिए   आध्यात्मिक   मूल्य   जीवन   के   तथा   मनुष्य   के   सर्वाधिक   महत्वपूर्ण   पहलू   है।   एक   तत्वज्ञानी   आदर्शवादी   का   विश्वास   है   कि   मनुष्य   का   सीमित   मन   असीमित   मन   से   पैदा   होता   है।   व्यक्ति   और   जगत   दोनों   बुद्धि   की   अभिव्यक्ति   है   और   भौतिक   जगत   की   व्याख्या   मन   से   की   जा   सकती   है।
    डी . एम . दत्ता    आदर्शवाद   वह   सिद्धान्त   है   जो   अन्तिम   सत्ता   आध्यात्मिकता   को   मानता   है।
    राजन   के   अनुसार , “ आदर्शवादियों   का   विश्वास   है   कि   ब्रह्माण्ड   की   अपनी   बुद्धि   एवं   इच्छा   है   और   सब   भौतिक   वस्तुओं   को   उनके   पीछे   विद्यमान   मन   द्वारा   स्पष्ट   किया   जा   सकता   है।   9.3.3   आदर्शवाद   प्रक्रिया।

    आदर्शवाद   जीवन   की   एक   प्राचीन   विचारधारा   है।   आज   भी   इस   बात   का   पर्याप्त   सम्मान   है।   जीवन   दर्शन   के   रूप   में   इसने   विश्व   के   उच्च   कोटि   के   दार्शनिकों   को   आकृष्ट   किया   है।   आदर्शवाद   विकास   में   विश्वास   करता   है ,  किन्तु   उसका   विकासवाद   प्रकृतिवादी   विकासवाद   से   भिन्न   है।   आदर्शवाद   के   अनुसार   विकास   का   अन्तिम   लक्ष्य   आत्मा   की   प्राप्ति   ही   है      कि   निचले   स्तर   से   ऊंचे   स्तर   के   प्राणी   में   विकास   करना।   आदर्शवाद   के   अनुसार   पदार्थ   अन्तिम   सत्य   नहीं   है।   पदार्थ   का   प्रत्यय   वास्तविक   है ,  पदार्थ   का   भौतिक   रूप   असत्य   है।   भौतिक   जगत   नश्वर   है ,  परिवर्तनशील   है।   सत्य   को   स्थायी   एवं   अपरिवर्तनशील   होना   चाहिए।   अतः   सत्य   विचारात्मक   एवं   मानसिक   है ,  क्योंकि   विचार   एवं   प्रत्यय   में   स्थायित्व   होता   है।   इस   आधार   पर   शरीर   नश्वर   है ,  अतः   असत्य   है ,  आत्मा   अनश्वर   सत्य   है।   अंतिम   सत्य   का   ज्ञान   ही   वास्तविक   ज्ञान   है ,  शेष   तो   अज्ञान   अथवा   ज्ञानाभास   है।   यह   ज्ञान   तर्कजन्य   है ,  चिन्तन   एवं   मनन   तथा   अंतदृष्टि   का   परिणाम   है।   यह   इन्द्रियों   का   विषय   नहीं   है।   आदर्शवाद   अनेकता   में   एकता   का   दर्शन   करता   है।   सत्य   मानसिक   है।   सृष्टि   के   अनेक   रूपों   में   उस   एक   चरम   सत्य   को   देखना   ही   अनेकता   में   एकता   का   दर्शन   करना   है।

    उद्देश्य

    1. आदर्शवाद   का   ज्ञान   प्राप्त   करा   सकेंगे।
    2. आदर्शवाद   का   अर्थ ,  परिभाषाएं      जीवन   दर्शन   के   रूप   में   आदर्शवाद   को   समझ   सकेंगे। 
    3. आदर्शवाद      शिक्षा   के   उद्देश्यों   को   जान   सकेंगे। 
    4. आदर्शवाद   में   पाठ्यक्रम      शिक्षण   पद्धति   का   ज्ञान   प्राप्त   कर   सकेंगे। 

    5. आदर्शवाद   में   शिक्षक      बालक   के   गुणों   को   समझ   सकेंगे।

    शिक्षा   के   उद्देश्य

    आदर्शवादी   दार्शनिकों   के   मतानुसार   मानव   के   जीवन   का   लक्ष्य ,  मोक्ष   की   प्राप्ति ,  आध्यात्मिक   विकास   करना   या   उसे   जानना   है।   इस   कार्य   के   लिए   मानव   को   चार   चरणों   पर   सफलता   प्राप्त   करनी   होती   है।   प्रथम   चरण   पर   उसे   अपने   प्राकृतिक    स्व    का   विकास   करना   होता   है।   इसके   अंतर्गत   मनुष्य   का   शारीरिक   विकास   आता   है।   दूसरे   चरण   पर   उसे   अपने   सामाजिक    स्व  का   विकास   करना   होता   है।   इसके   अंतर्गत   सामाजिक ,  सांस्कृतिक ,  नैतिक ,  चारित्रिक   एवं   नागरिकता   का   विकास   आता   है।   तीसरे   चरण   पर   उसे   अपने   मानसिक    स्व    का   विकास   करना   होता   है।   इसके   अंतर्गत   मानसिक ,  बौद्धिक   एवं   विवेक   शक्ति   का   विकास   करना   होता   है।   और   चैथे   तथा   अंतिम   चरण   पर   उसे   अपने   आध्यात्मिक    स्व    का   विकास   करना   होता   है।   इसके   अंतर्गत   आध्यात्मिक   चेतना   का   विकास   आता   है।   आदर्शवादी   इन्हीं   सबको   शिक्षा   के   उद्देश्य   निश्चित   करते   हैं।

    आदर्शवाद   व   शिक्षा   के   उद्देश्य

    आत्मानुभूति   का   विकास  ( Development of Self-Realization ) -  आदर्शवादी   विचारधारा   यह   मानती   है   कि   प्रकृति   से   परे   यदि   कोई   चेतन   सत्ता   के   अनुरूप   है   तो   वह   है।   मनुष्य।   इस   कारण   विश्व   व्याप्त   चेतन   सत्ता   की   अनुभूति   मनुष्य   तब   तक   नहीं   कर   सकता ,  जब   तक   उसके   अंदर   व्याप्त   चैतन्यता   का   विकास      हो।   इस   कारण   शिक्षा   का   सर्वोच्च   कार्य   यह   है   कि   वह   मनुष्य   को   इतना   सक्षम   बनाये   कि   वह   अपने   वास्तविक   स्वरूप   को   पहचाने      उसकी   अनुभूति   कर   सके।   इस   आत्मानुभूति   के   प्रमुख   रूप   से   चार   सोपान   होते   है :

    शारीरिक   व   जैविकीय

     सामाजिक
     बौद्धिक 
     आध्यात्मिक 
    शारीरिक   आत्मानुभूति   का   निम्नतम   सोपान   है ,  जिसे   प्रकृतिवादी   आत्माभिव्यक्ति   संज्ञा   देते   हैं।   सामाजिक    स्व    को   अर्थ   क्रियावादी   महत्व   देता   है ,  इसमें   व्यक्ति   सामाजिक   हित   की   परिकल्पना   करता   है      सामाजिक   कल्याण   हेतु   व्यक्तिगत   स्वार्थों   का   परित्याग   कर   देता   है।   बौद्धिक   अनुभूति   के   स्तर   पर   व्यक्ति   विवेक   द्वारा    स्व    की   अनुभूति   करता   है      सामाजिक   नैतिकता   से   ऊपर   उठकर   सद् - असद्   में   भेद   कर   सकता   है   और   उसका   आचरण   चिन्तन   तथा   विश्वास   विवेकपूर्ण   हो   जाता   है।   आध्यात्मिक    स्व    स्वानुभूति   का   सर्वोच्च   स्तर   है ,  जहां   व्यक्ति   गुणों   को   अपने   व्यक्तित्व   में   अंगीकृत   सहज   प्रक्रिया   द्वारा   ही   कर   लेता   है      अपने   अंदर   विश्वात्मा   का   तादाम्य   करने   लगता   है।   इस   विश्वात्मा   को   हम   तीन   रूपों   में   अभिव्यक्त   करते   हैं -  सत्य ,  शिवं      सुन्दर   आदर्शवादी   जब   आत्मानुभूति   के   लिए   शिक्षा   देने   की   बात   करते   हैं ,  तो   उनका   एक   ही   लक्ष्य   होता   है , ‘ अपने   आपको   पहचानो ’’
    आध्यात्मिक   मूल्यों   का   विकास - आदर्शवादी   विचारधारा   भौतिक   जगत   की   अपेक्षाकृत   आध्यात्मिक   जगत   को   महत्वपूर्ण   मानती   है।   अतः   शिक्षा   के   उद्देश्यों   में   भी   बालक   के   आध्यात्मिक   विकास   को   महत्व   देते   हैं।   यह   मनुष्य   को   एक   नैतिक   प्राणी   के   रूप   में   अवलोकित   करते   हैं      शिक्षा   का   उद्देश्य   चरित्र   निर्माण   को   मानते   हैं।   वह    सत्यं   शिवं   सुन्दरं   के   मूल्यों   का   विकास   करते   हुए   इस   बात   की   भी   चर्चा   करते   हैं   कि   शिक्षा   का   प्रमुख   उद्देश्य   बालक   में   आध्यात्मिक   दृष्टि   से   विकास   करना
    बालक   के   व्यक्तित्व   का   उन्नयन -  बोगोस्लोवस्की   के   अनुसार -  हमारा   उद्देश्य   छात्रों   को   इस   योग्य   बनाना   है   कि   वे   सम्पन्न   तथा   सारयुक्त   जीवन   बिता   सकें   ,  सर्वागीण   तथा   रंगीन   व्यक्तित्व   का   निर्माण   कर   सकें ,  सुखी   रहने   के   उल्लास   का   उपभोग   कर   सकें।   यदि   तकलीफ   आये   तो   गरिमा   एवं   लाभ   के   साथ   उनका   सामना   कर   सकें   तथा   इस   उच्च   जीवन   को   जीने   में   दूसरे   लोगों   की   सहायता   कर   सकें।   व्यक्तित्व   के   उन्नयन   की   चर्चा   करते   हुए   प्लेटो      रॉस   भी   यह   मानते   है   कि   शिक्षा   के   द्वारा   मानव   व्यक्तित्व   को   पूर्णता   प्राप्त   की   जानी   चाहिए   और   साथ   ही   उसके   व्यक्तित्व   का   उन्नयन   होना   चाहिए। 
    अनेकता   में   एकता   के   दर्शन -  आदर्शवाद   इस   विचारधारा   का   समर्थन   करते   हुए   इस   बात   पर   बल   देता   है   कि   शिक्षा   का   उद्देश्य   बालक   को   इस   दृष्टि   से   समर्थ   बनाना   होना   चाहिए   कि   वह   संसार   में   विद्यमान   भिन्न - भिन्न   बातों   को   एकता   के   सूत्र   में   बाँध   सके   अर्थात्   बालक   के   अंदर   यह   समझ   उत्पन्न   करनी   चाहिए   कि   वह   इस   संसार   के   संचालन   करने   वाली   एक   परम   सत्ता   है   जो   ईश्वर   के   नाम   से   जानी   जाती   है   और   यह   ईश्वर   की   सत्ता   जगत   के   सभी   प्राणियों   का   संचालन   करती   है।   इस   ईश्वरीय   सत्ता   की   अनुभूति   कराना   ही   शिक्षा   का   लक्ष्य   होना   चाहिए।   इसकी   अनुभूति   होने   पर   ही   व्यक्ति   इस   संसार   के   साथ   तादात्म्य   स्थापित   कर   सकता   है      व्यक्तित्व   को   पूर्णता   प्रदान   कर   सकता   है। 
    सभ्यता   एवं   संस्कृति   का   विकास -  आदर्शवाद   यह   मानता   है   कि   व्यक्ति   जिस   समाज   का   सदस्य   है ,  उस   समाज   की   संस्कृति   से   उसका   परिचय   होना   परम   आवश्यक   है।   साथ   ही   बालक   यदि   समाज   को   जीवित   रखना   चाहता   है   तो   उसे   समाज   की   धरोहर   के   रूप   में   जो   सभ्यता      संस्कृति   प्राप्त   होती   है ,  उसकी   भी   रक्षा   करनी   चाहिए।   सभ्यता      संस्कृति   तो   वह   आधार   प्रस्तुत   करती   है   जिसके   द्वारा   समाज   का   विकास   संभव   होता   है।   आदर्शवाद   व्यक्ति   की   अपेक्षा   समाज   को   महत्व   देता   है।   इसी   कारण   वह   शिक्षा   का   उद्देश्य   सभ्यता      संस्कृति   का   विकास   करना   मानते   हैं।   रस्क   का   विचार   है   कि   ‘‘ सांस्कृतिक   वातावरण   मानव   का   स्वरचित   वातावरण   है   अथवा   यह   मनुष्य   की   सृजनात्मक   क्रिया   का   परिणाम   है   जिसकी   रक्षा      विकास   करना   शिक्षा   का   उद्देश्य   होना   चाहिए।
    वस्तु   की   अपेक्षा   विचारों   का   महत्व -  आदर्शवाद   यह   मानता   है   कि   इस   संसार   में   पदार्थ   नाशवान   है      विचार   अमर।   विचार   सत्य ,  वास्तविक      अपरिवर्तनशील   है।   विचार   ही   मनुष्य   को   ज्ञान   प्रदान   करने   का   माध्यम   है।   यह   संसार   मनुष्य   के   विचारों   में   ही   निहित   होता   है।   वह   यह   मानते   हैं   कि   यह   जगत   यंत्रवत्   नहीं   है।   चूंकि   इस   जगत   में   विद्यमान   वस्तुओं   का   जन्म   मानसिक   प्रक्रियाओं   के   फलस्वरूप   ही   होता   है।   इनका   विचार   है   कि    यह   विश्व   विचार   के   समान   है ,  यंत्रवत्   नहीं।  ( Universe is like a thought than a Machine )
    जड़   प्रकृति   की   अपेक्षा   मनुष्य   का   महत्व -  आदर्शवादी   मनुष्य   का   स्थान   ईश्वर   से   थोड़ा   ही   नीचा   मानते   है।  ( Man is little lower than angels )  इनका   विचार   है   कि   मनुष्य   इतना   सक्षम   होता   है   कि   वह   आध्यात्मिक   जगत   का   अनुभव   कर   सके      ईश्वर   से   अपना   तादात्म्य   स्थापित   कर   सके   या   उसकी   अनुभूति   कर   सके।   इस   कारण   वह   जड़   प्रकृति   से   बहुत   महत्वपूर्ण   है।   वह   यह   भी   मानते   हैं   कि   मनुष्य   बुद्धिपूर्ण      विवेकपूर्ण   प्राणी   है   और   बुद्धि   ही   मनुष्य   के   विभिन्न   प्रकार   के   क्रियाकलापों   का   आधार   बनती   है ,  जिससे   मानव   अपने   आपको   पशुवत्   गुणों   से   ऊँचा   उठा   लेता

    आदर्शवादी   विचारधारा   ने   मुख्यतया   शिक्षा   के   उद्देश्यों   की   चर्चा   की   है ,  परन्तु   इन्होंने   शिक्षा   के   अन्य   पक्षों   पर   भी   थोड़ा   प्रकाश   डाला   है ,  उनकी   उपेक्षा   नहीं   की   है।   अब   हम   इस   बात   की   चर्चा   करेंगे   कि   आदर्शवाद   ने   पाठ्यक्रम ,  पाठन   विधि ,  शिक्षक ,  अनुशासन   आदि   के   संबंध   में   क्या   विचार   दिये   है। 

    आदर्शवाद   और   पाठ्यक्रम

    अब   प्रश्न   उठता   है   कि   उपर्युक्त   उद्देश्यों   को   प्राप्त   करने   के   लिए   पाठ्यक्रम   किस   प्रकार   का   होना   चाहिए ?  छात्र   जिस   प्रकार   के   वातावरण   में   जन्म   लेता   है   उसी   प्रकार   के   वातावरण   में   रहने   का   आदी   हो   जाता   है।   यह   निश्चित   है   कि   हम   पाठ्यक्रम   की   योजना   बनाते   समय   इस   वातावरण   की   उपेक्षा   नहीं   कर   सकते।   संभव   है   कि   हम   पाठ्यक्रम   में   ऐसी   सूचनाओं   एवं   क्रियाओं   को   भी   स्थान   दें ,  जिन्हें   हम   पूर्णतः   सत्य   नहीं   मानते।   आदर्शवाद   भौतिक   जगत   को   अंतिम   सत्य   नहीं   मानता   किन्तु   सत्य   का   आभास   तो   मानता   ही   है।   सत्य   को   इसी   भौतिक   जगत   में   रहकर   एवं   भौतिक   वातावरण   के   सहयोग   से   ही   आदर्शवाद   चरम   सत्य   को   प्राप्त   करने   का   परामर्श   देता   है।   मनुष्य   का   आध्यात्मिक   वातावरण   अधिक   महत्वपूर्ण   होता   है   किन्तु   प्राकृतिक   वातावरण   की   उपेक्षा   नहीं   की   जा   सकती।   व्यक्ति   शरीर   और   मन   का   संयोग   है ,  जिसमें   मन   अधिक   महत्वपूर्ण   है।   किन्तु   यदि   शारीरिक   आवश्यकताओं   की   पूर्ति      की   गयी   तो   मानसिक   क्रिया   भी   दःसाध्य   हो   जायेगी।   व्यक्ति   आत्मानुभूति   की   ओर   तभी   आगे   बढ़   सकता   है ,  जबकि   उसने   शारीरिक   आवश्यकताओं   को   वश   में   कर   लिया   हो।   अतः   भौतिक   जगत   की   जानकारी   भी   आवश्यक   है। 
    छात्र   को   प्राकृतिक   वातावरण   का   ज्ञान   होना   चाहिए।   इसके   साथ   ही   आध्यात्मिक   वातावरण   पर   विशेष   दृष्टि   होनी   चाहिए।   आध्यात्मिक   वातावरण   में   व्यक्ति   के   बौद्धिक ,  सौन्दर्यानुभूति   संबंधी ,  नैतिक   एवं   धार्मिक   सभी   क्रिया - कलाप   आते   हैं।   उसका   ज्ञान ,  कला ,  नीति   तथा   धर्म   इसी   आध्यात्मिक   वातावरण   के   अंतर्गत   है।   समाज   की   प्राकृतिक   एवं   आध्यात्मिक   दोनों   प्रकार   की   आवश्यकताएं   है।   प्राकृतिक   वातावरण   से   मानव   समाज   प्रभावित   होता   रहता   है।   उसने   कला ,  धर्म   एवं   नीति   आदि   का   विकास   करके   आध्यात्मिक   वातावरण   का   सृजन   किया   है।   समाज   अपने   ज्ञान   को   स्थायी   बनाना   चाहता   है   कि   उसके   भावी   सदस्य   प्राकृतिक   विषयों   एवं   आध्यात्मिक   विषयों   का   ज्ञान   प्राप्त   करें।   वह   यह   नहीं   चाहता   कि   समाज   में   एक   प्रकार   के   ही   व्यक्ति   हों।   अतः   समाज   एवं   व्यक्ति   दोनों   की   दृष्टि   से   ही   पाठ्यक्रम   में   प्राकृतिक   एवं   आध्यात्मिक   वातावरण   के   ज्ञान   का   समावेश   होना   चाहिए।   व्यक्ति   आत्मानुभूति   भी   तभी   कर   सकता   है   जब   दोनों   प्रकार   की   आवश्यकता   की   पूर्ति   में      सचेष्ट   हो।

    इस   दृष्टि   से   आदर्शवाद   शारीरिक   प्रशिक्षण   की   उपेक्षा   नहीं   कर   सकता।   शारीरिक   शिक्षा   भी   उसके   पाठ्यक्रम   में   होगी।   प्राकृतिक   वातावरण   की   जानकारी   प्राकृतिक   विज्ञानों   से   होती   है ,  अतः   भौतिकी ,  रसायनिकी ,  भूमिति ,  भूगोल ,  खगोल ,  भूगर्भ   विज्ञान ,  वनस्पतिशास्त्र ,  जीव - विज्ञान   आदि   विषयों   को   आदर्शवाद   तिलांजलि   नहीं   देता।   आध्यात्मिक   विकास   के   लिए   कला ,  साहित्य ,  नीतिशास्त्र ,  दर्शन ,  धर्म ,  मनोविज्ञान ,  संगीत   आदि   विषय   अधिक   महत्वपूर्ण   है।   इन   विषयों   के   अध्ययन   से   मानव   की   आत्मा   का   विकास   होता   है।   यदि   इन   विषयों   का   अध्ययन      किया   जाये   तो   व्यक्ति   प्राकृतिक   वातावरण   तक   ही   सीमित   रह   जायेगा। 

    आदर्शवाद   और   अनुशासन

    आदर्शवाद   में   अनुशासन   को   शिक्षा   के   लिय   महत्वपूर्ण   माना   गया   है।   आदर्शवादी   बालक   को   पूर्ण   स्वतंत्रता   देने   के   पक्ष   में   नहीं   है ,  जबकि   प्रकृतिवाद   पूर्ण   स्वतंत्रता   का   पक्षपाती   था।   सम्पूर्ण   शिक्षा   आदर्श   केन्द्रित   होती   है।   आदर्शवादी   शिक्षक   छात्रों   को   इस   बात   के   लिय   सचेत   करता   है   कि   स्वतंत्रता   की   अधिक   मात्रा   हानिकारक   होती   है।   प्रकतिवाद   का   नारा   है    स्वतंत्रता   और   आदर्शवाद   का   नारा   है    अनुशासन     अनुशासित   जीवन   से   ही   आध्यात्मिक   उपलब्धि   सम्भव   है।   किंतु   अनुशासन   बाहय   नियन्त्रण   द्वारा   संभव   नहीं   है ,  बल्कि   यह   स्वयं   पर   स्वेच्छा   से   लागू   किया   गया   प्राक्रतिक   नियंत्रण   है।   जिसे   अनुशासित   जीवन   के   लिए   आवश्यक   माना   गया।   आदर्शवाद   नैतिक   गुणों   के   विकास   का   समर्थन   करता   है।   नैतिक   गुणों   के   विकास   के   लिए   अनुशासन   आवश्यक   है।   नम्रता ,  ईमानदारी ,  समय   प्रबन्ध ,  आज्ञाकारिता   , निष्ठा   , सत्यवादिता   आदि   ऐसे   गुण   हैं।   जिनका   विकास   आवश्यक   है।   इनका   विकास   अनुशासनपूर्ण   वातावरण   में   ही   सम्भव   है।

    आदर्शवाद   व   शिक्षक

    जेण्टील   का   कथन   है   कि    अध्यापक   सही   चरित्र   का   आध्यात्मिक   प्रतीक   है।   आदर्शवादी   विचारक   शिक्षक   को   उस   अनुपम   स्थिति   में   रखते   हैं ,  जिसमें   शिक्षण   प्रक्रिया   का   कोई   अन्य   अंश   नहीं   रखा   जा   सकता।   आदर्शवादी   दार्शनिक   शिक्षक   में   जिन   गुणों   की   परिकल्पना   करते   हैं ,  उनकी   चर्चा   बटलर   ने   इस   प्रकार   की   है
    1. शिक्षक   बालक   के   लिए   सत्ता   का   साकार   रूप   होता   है।
    2. अध्यापक   को   छात्रों   की   व्यक्तिगत ,  सामाजिक      आर्थिक   विशेषताओं   का   ज्ञाता   होना   चाहिए।
    3. शिक्षक   को   अध्यापन   कला   का   पूर्ण   ज्ञान   होना   चाहिए      उसमें   व्यवसायिक   कुशलता   होनी   चाहिए।
    4. अध्यापक   का   व्यक्तित्व   प्रभावशाली   होना   चाहिए ,  जिससे   वह   छात्रों   को   अपनी   ओर   आकर्षित   कर   सके।
    5. अध्यापक   एक   दार्शनिक ,  मित्र      पथ - प्रदर्शक   के   रूप   में   होना   चाहिए। 
    6. अध्यापक   का   व्यक्तित्व   अच्छे   गुणों   से   परिपूर्ण   होना   चाहिए ,  जिससे   प्रत्यक्ष   या   अप्रत्यक्ष   रूप   में   वह   छात्रों   को   सद्गुणों   के   ढाँचे   में   ढाल   सके। 
    7. छात्रों   के   व्यक्तित्व   को   पूर्णता   प्रदान   करना   अध्यापक   के   जीवन   का   परम   लक्ष्य   होना   चाहिए।
    8. शिक्षक   को   अपने   विषय   का   पूर्ण   एवं   सही   ज्ञान   होना   चाहिए। 
    9. अध्यापक   में   स्व - अध्ययन   का   गुण   होना   चाहिए ,  जिससे   वह   निरन्तर   नवीन   ज्ञान   की   ओर   उन्मुख   हो   सके। 
    10. अध्यापक   को   प्रजातंत्र   की   सुरक्षा   रखने   का   प्रयास   करना   चाहिए।

    प्रसिद्ध   शिक्षाशास्त्री   फ्राबेल   ने   कहा   है   कि   बालक   एक   पौधे   के   समान   है   और   अध्यापक   एक   माली   के   सदृश ,  जो   पौधे   को   आवश्यकतानुसार   सींचकर ,  खाद   आदि   डालकर   तथा   काट - छांटकर   सुव्यवस्थित   रूप   में   पनपाता   है ,  जिससे   वह   एक   सुन्दर   और   मनमोहक   वृक्ष   बन   सके।   शिक्षक   के   महत्व   के   संबंध   में   रॉस   ने   भी   कहा   है -  प्रकृतिवादी   तो   जंगली   गुलाब   से   संतुष्ट   हो   सकता   है ,  किन्तु   आदर्शवादी   तो   एक   सुन्दर      सुविकसित   गुलाब   की   परिकल्पना   करता   है।   यह   दार्शनिक   विचारधारा   यह   मानकर   चलती   है   कि   बालक   के   विकास   हेतु   उपर्युक्त   सामाजिक   वातावरण   एवं   शिक्षक   का   सही   मार्गदर्शन   आवश्यक   है। 

    आदर्शवाद   एवं   बालक

    आदर्शवाद   में   बालक   को   शिक्षण   प्रक्रिया   का   मुख्य   बिन्दु   नहीं   माना   जाता।   उनके   अनुसार   शिक्षण   प्रक्रिया   में   भावों ,  विचारों      आदर्शों   का   महत्वपूर्ण   स्थान   है   और   इनको   प्रदान   करने   के   माध्यम   के   रूप   में   वह   अध्यापक   को   महत्वपूर्ण   स्थान   देते   है      बालक   को   गौण।   वह   छात्रों   को   एक   आध्यात्मिक   प्राणी   मानते   है।   वह   यह   स्वीकार   करते   हैं   कि   आध्यात्मिक   सत्ता   भी   होती   है।   वे   मन   को   शरीर   से   अधिक   महत्व   देते   हैं।   हॉर्न   ने   इस   संबंध   में   कहा   है , “ विद्यार्थी   एक   परिमित   व्यक्ति   है   किन्तु   उचित   शिक्षा   मिलने   पर   वह   परम   पुरूष   के   रूप   में   विकसित   होता   है।   उसकी   मूल   उत्पत्ति   दैविक   है ,  स्वतंत्रता   उसका   स्वभाव   है   और   अमरत्व   की   प्राप्ति   उसका   लक्ष्य   है।

    सारांश

    आदर्शवादी   शिक्षा   को   पवित्र   कार्य   मानता   है।   शिक्षार्थी   का   व्यक्तित्व   उसके   लिए   महान   है।   अतः   वह   छात्र   के   व्यक्तित्व   का   पूर्ण   विकास   करना   चाहता   है।   यह   विकास   सही   दिशा   में   होना   चाहिए।   विकास   की   दिशा   ऐसी   हो   कि   बालक   आत्मानुभूति   की   ओर   बढ़   सके   और   ‘‘ सत्यम्   शिवम्   सुन्दरम्   का   दर्शन   कर   सके।   विश्व   में   इससे   बढ़कर      तो   कोई   लक्ष्य   हो   सकता   है ,     ही   इससे   बढ़कर   कोई   उपलब्धि   हो   सकती   है।   आदर्शवादी   परम - सत्य   में   विश्वास   करता   है।   वह   परम - सत्य   लक्ष्यों   का   लक्ष्य   है ,  विभिन्न   सत्यों   का   आधार ,  सुन्दरों   में   सौन्दर्य   का   मूल   तथा   साक्षात्   शिवम्   है।   जीवन   की   पूर्णता   उसी   दिशा   में   चलने   में   है।   अतः   हम   यह   कह   सकते   हैं   कि   आदर्शवाद   ने   शिक्षा   की   दिशा   निश्चित   करने   में   शिक्षाशास्त्रियों   का   मार्ग - दर्शन   किया   है।   शिक्षा   के   उद्देश्य   निश्चित   करते   समय   हम   कभी - कभी   दर   दृष्टि   से   काम   नहीं   लेते।   आदर्शवाद   हमें   इस   खतरे   से   सावधान   करता   है।   आदर्शवाद   ने   आत्मानुभूति   जैसा   शिक्षा   का   उद्देश्य   देकर ,  अनेकता   में   एकता   कीअंतर्दृष्टि   प्रदान   करके   एवं   ‘‘ सत्यम्   शिवम्   सुन्दरम्  की   प्राप्ति   की   दूर - दृष्टि   देकर   शिक्षा   का   बड़ा   उपकार   किया   है।

    संदर्भ   ग्रन्थ   सूची

    1. पाण्डे  ( डॉ )  रामशकल ,  उदीयमान   भारतीय   समाज   में   शिक्षक ,  अग्रवाल   प्रकाशन ,  आगरा। 
    2. सक्सेना  ( डॉ )  सरोज ,  शिक्षा   के   दार्शनिक      सामाजिक   आधार ,  साहित्य   प्रकाशन ,  आगरा। 
    3. मित्तल   एम . एल .( 2008)  उदीयमान   भारतीय   समाज   में   शिक्षक ,  इण्टरनेशनल   पब्लिशिंग   हाउस , मेरठ। 
    4. शर्मा   रामनाथ      शर्मा   राजेन्द्र   कुमार  ( 2006)  शैक्षिक   समाजशास्त्र ,  एटलांटिक   पब्लिशर्स   एण्ड   डिस्ट्रीब्यूटर्स। 

    5. सलैक्स  ( डॉ )  शीलू   मैरी  ( 2008)  शिक्षक   के   सामाजिक   एवं   दार्शनिक   परिप्रेक्षय ,  रजत   प्रकाशन ,  नई   दिल्ली।

    6. डॉ. लक्ष्मीलाल के. ओड़, 2019, शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि, प्रकाशन- राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी जयपुर