मानदंड क्या है

मानदंड

समाज अपने सदस्यों के लिए कुछ निश्चित प्रकार के आदर्शआचरण या व्यवहार निर्धारित करता हैजिनका पालन करना उसके सदस्यों से अपेक्षित होता है। समाजशास्त्रीय भाषा में इन्हें मानदंड कहा जाता है। 

 

मानदंडों का अनुकरण कराने के लिए दंड व्यवस्था भी होती है। जोकि मानदंडों की गंभीरता के आधार पर तय होती है। यह सामाजिक रूप से निंदा करनाशारीरिक दंड या कानूनी प्रकिया जैसे रूपों में पाया जाता है। 

 

 

मानदंड के प्रकार

मानदंड दो प्रकार के होते हैं-

1.     निर्देशात्मक मानदंड

2.     निषेधात्मक मानदंड

 

जिस मानदंड से हमारा आचरण निर्देशित होता हैउसे निर्देशात्मक मानदंड कहा जाता है। 

 

जिस मानदंड से हमारा आचरण निर्देशित होता हैउसे निर्देशात्मक मानदंड कहा जाता है और जो मानदंड हमें किसी आचरण को करने की इजाजत नहीं देता हैउसे निषेधात्मक मानदंड कहा जाता है। 

 

जैसे प्रत्येक आधुनिक समाज यह अपेक्षा रखता है कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी को नग्न नहीं घूमना चाहिए।  यह एक निषेधात्मक मानदंड का उदाहरण है।  लेकिन समाज यदि यह मानता है कि लोगों को अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए तो यह निर्देशात्मक मानदंड ह६ 

 

दूसरे शब्दों में समाज जो नहीं करने की इजाजत देता हैउसे निषेधात्मक मानदंड कहा जाता है। और जो लोग व्यवहार समाज अपने सदस्यों को खास ढंग से सम्पादन करने की अपेक्षा रखता हैउसे निर्देशात्मक मानदंड कहा जाता है। 

 

निर्देशात्मक एवं निषेधात्मक मानदंड में क्या फर्क हैइसे लेस्ली ने बहुत ही स्पष्ट ढंग से रखा है- निर्देशात्मक मानदंड निर्देश देता ह जो लोगों को करना चाहिए और निषेधात्मक मानदंड लोगों को यह निर्देश देता है कि लोगों को क्या नहीं करना चाहिए।

 

सामुदायिक मानदंड

समाज में कुछ वैसे भी मानदंड होते हैंजो सार्वभौम होते हैं। समाज के हर एक सदस्य को उस मानदंड के अनुसार आचरण करना होता है। वैसे आदर्श या मानदंड को सामुदायिक मानदंड कहा जाता है। दूसरी तरफ समाज में कुछ एेसे भी मानदंड होते हैंजो समाज के विभिन्न उपखण्डों के स्तर पर पाए जाते हैं। उसे बीयरस्टेट ने सहचारी मानदंड कहा है। 

 जैसे भारतीय समाज में अपने गुरुजनों को प्रणाम करना सामुदायिक मानदंड कहा जाता है। क्योंकि ये सब पर लागू होता है। वहीं जनेऊ धारण करना सहचारी मानदंड माना जाता है क्योंकि कई जातियों के लिए यह समान रूप से आवश्यक नहीं है।

 

यह यह बात ध्यान में रखने लायक है कि जो आज सामुदायिक मानदंड हैवह कल सहचारी मानदंड भी हो सकता है। उसी तरह जो आज सहचारी मानदंड हैवह कल सामुदायिक मानदंड भी हो सकता है। कभी एेसा भी होता है कि सामुदायिक मानदंड एवं सहचारी मानदंड समय के साथ समाप्त भी हो जाते हैं और उसकी जगह कोई नया सामुदायिक मानदंड एवं सहचारी मानदंड स्थापित हो जाता है।

 

कुछ समाजशास्त्रियों ने मानदंड को एक अन्य प्रकार से वर्गीकृत किया है जैसे वास्तविक मानदंड एवं नैतिक मानदंड

 

जैसे यदि हम कहें कि अहिंसा परम धर्म हैझूठ नहीं बोलना चाहिए या हमें पूरी ईमानदारी से काम करना चाहिएतो इसे नैतिक मानदंड कहा जाएगा। लेकिन हम व्यवहार में कुछ और ही करते हैं। क्रोध में हम थोड़ा हिंसक हो जाते हैंअपने किसी खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए झूठ भी बोल लेते हैं या कभी हम अपने कार्य में पूरी निष्ठा नहीं रखते हैं। समाज एेसे नैतिक विचलनों को सहन करता है कर्ता को इसके लिए कोई विशेष दंड नहीं दिया जाता है। यह भी एक किस्म का मानदंड। इस प्रकार वास्तविक जीवन के आचरण को हम वास्तविक मानदंड कहते हैं। कुछ समाजशास्त्रियों ने इसे स्टेटिस्टिकल्स नॉर्म्स भी कहा है। 

 

बीयरस्टेट ने मानदंड को 14 भागों में बांटा है

 

कानूनअधिनियमनियमनियमनप्रथा,  लोकाचारलोकरीतिनिषेधफैशनसंस्कार,  कर्मकाण्ड,  समारोहपरंपराशिष्टाचार

 

इन 14 प्रकार के मानदंडों को उन्होंने फिर तीन भागों में विभाजित कर दिया है। लोकाचारलोकरीतिकानून।

 

लोकरीति सामाजिक व्यवहार एवं आचरण की सामान्य विधियों को कहा जाता हैजैसे वस्त्र पहनने की शैलीअभिवादन करने के तरीके । कभी कभी हम अभिवादन के क्रम में नमस्कार की जगह हेलो से काम चला लेते हैं। धोती की बजाय पैंट-शर्ट या कुर्ता-पायजामा भी पहन लेते हैं। प्रकार लोकरीति अनिवार्य कार्यविधि नहीं होती।

लोकाचार भी आचरण की विधियां हैंलेकिन लोकाचार का पालन करना समाज के सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य होता है। लोकाचार  की अवहेलना करने वाले लोगों को समाज कुुछ न कुछ दण्ड अवश्य देता हैजैसे जाति से निष्कासन करना आदि।

 

लोकरीतियों और लोकाचार से हटकर कानून लिखित प्रावधान के रूप में होते हैंजो सामाजिक मूल्यों एवं मान्यताओं को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। विभिन्न प्राधिकारियों को इसका पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी भी सौंपी जाती है। जरूरत पडऩे पर न्यायपालिका इसका विश्लेषण करती है।