महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जीवन से गणित दिवस बनाने तक का अध्ययन
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एक महान व्यक्ति का व्यक्तित्व दो तरह से प्रभावकारी होता है जब वह जीवित होता है तब वह वर्तमान को अपने कार्य कलापों और गतिविधियों से परिवर्द्धित करता है और जब उसका देहान्त हो जाता है तब उसके विचार सुनहरे भविष्य का मार्गदर्शन करते हैं। आज हम ऐसे व्यक्ति की बात करते है, जिसने रात भर जाग जाग कर गणित के नए-नए सूत्र तैयार किये। जिन्होने विभिन्न शोधों को स्लेट पर लिखा और अधिकतर समय अनेक गणितीय समस्याओं को सुलझाने में लगाया। रात को स्लेट पर चॉक घिसने की आवाज के कारण परिवार के अन्य सदस्यों की नींद भी चौपट हो जाती थी, फिर भी आधी रात को सोते से जागकर स्लेट पर गणित के सूत्र लिखने का सिलसिला रुकने के बजाय और तेज होता गया। स्कूली शिक्षा पूरी न कर पाने के बावजूद भी वे दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शामिल हो गए दोस्तों आज बात हो रही है उस महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की, जिन्होने भारतीय गणित को नयी उचाइयां दी। क्या रामानुजन जैसा पैशन हम भी अपने अंदर पैदा कर सकते हैं? गणित के लिए रामानुजन के योगदान के सम्मान में उनके जन्मदिन को हर साल राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में विख्यात महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को श्रद्धांजलि देते हुए वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया था। इस महान गणितज्ञ को श्रद्धाजलि देने के लिए भारत सरकार ने उनके जन्मदिन, 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस और 2012 के पूरे वर्ष को राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इस प्रकार भारत में प्रत्येक वर्ष 22 दिसम्बर को महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की स्मृति में राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्रारंभिक शिक्षा व जीवन
गणित के जादूगर और भारतीय गणितीय प्रतिभा श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को को मद्रास और अब चेन्नई के छोटे से गांव इरोड नगर में हुआ था। पिता श्रीनिवास आयंगर कपड़े की फैक्ट्री में क्लर्क थे। रामानुजन का बचपन निर्धनता व कठिनाईयों में बीता। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद भी बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए वे सपरिवार कुंभकोणम शहर आ गए। रामानुजन की आरंभिक शिक्षा कुंभकोणम के प्राइमरी स्कूल में हुई। 1897 में रामानुजन ने स्कूल स्तर पर अपने जिले में अव्वल स्थान हासिल किया था। उसके बाद से वर्ष 1898 में उन्होंने टाउन हाई स्कूल में प्रवेश लिया और सभी विषयों में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए। वह अधिकतर विद्यालय में अपने दोस्तों से किताबें उधार लेकर पढ़ा करते थे। हाईस्कूल तक रामानुजन सभी विषयों में अच्छे थे। परन्तु गणित उनके लिए एक स्पेशल प्रोजेक्ट की तरह था, जो धीरे-धीरे जुनून की शक्ल ले रहा था। यहीं पर रामानुजन को जी. एस. कार की गणित पर लिखी पुस्तक पढ़ने का अवसर मिला। इसी पुस्तक से प्रभावित होकर उनकी रूचि गणित में बढ़ने लगी और उन्होंने गणित पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। सामान्य से दिखने वाले इस छात्र को दूसरे विषयों की कक्षा उबाऊ लगने लगी। गणित के अतिरिक्त अन्य विषयों में रुचि न होने के कारण वे कठिनाई से परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते, लेकिन गणित में वे 100 प्रतिशत अंक पाते थे।
वर्तमान में इनकी गणित के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है विद्यालयी शिक्षा भी पूरी न कर पाने के बावजूद वे दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शामिल हो गए तो इसकी एक वजह थी गणित के प्रति उनका जुनून । दसवीं तक स्कूल में अच्छा परफॉर्म करने की वजह से उन्हें स्कॉलरशिप मिली. लेकिन अगले ही साल उसे वापस ले लिया गया। इसका कारण गणित के अलावा उनका बाकी सभी विषयों की अनदेखी करना था। वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। इस कारण बिना डिग्री लिए ही उन्हें औपचारिक अध्ययन छोड़ना पड़ा था। युवा होने पर घर की आर्थिक आवश्यकताओं की आपूर्ति हेतु रामानुजन ने क्लर्क की नौकरी की। जहां वह अक्सर खाली पन्नों पर गणित के प्रश्न हल किया करते थे, इसी दौरान वे इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी के गणितज्ञों के संपर्क में आए। एक दिन एक अँग्रेज की नजर इन पन्नों पर पड़ गई, जिसने निजी रूचि लेकर उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. हार्डी के पास भेजने का प्रबंध कर दिया। प्रो. हार्डी ने उनमें छिपी प्रतिमा को शीघ्र ही पहचान लिया, जिसके बाद उनकी ख्याति विश्व भर में फैल गयी। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। अपने एक विशेष शोध के कारण उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. की उपाधि भी मिली, लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन में ये ढल नहीं पाए। उनका स्वास्थ्य और खराब होता गया। स्वास्थ्य के साथ नहीं देने से डॉक्टरों की सलाह पर वे भारत लौटे। लेकिन बीमार हालात में ही उच्चस्तरीय शोध पत्र लिखते रहे। इस अथक परिश्रम के कारण रामानुजन अस्वस्थ रहने लगे और 26 अप्रैल, 1920 को मात्र 32 वर्ष की आयु में ही उनका भारत में निधन हो गया। लेकिन इस कम समय में भी वह गणित में ऐसा अध्याय छोड़ गए, जिसे भुला पाना मुश्किल है। रामानुजन का गणित के क्षेत्र में योगदान
श्रीनिवास रामानुजन की गणना आधुनिक भारत के उन गणितज्ञों में की जाती है जिन्होंने विश्व में नए ज्ञान को पाने और खोजने की पहल की। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। रामानुजन को गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिया। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारंपरिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहे है। यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित की मुख्य धारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। रामानुजन के स्वर्णिम योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी परिसर में अपनी शोध पताका फहराकर भारत को गौरवान्वित कराया। रामानुजन की असाधारण प्रतिभा ने पिछली सदी के दूसरे दशक में गणित की दुनिया को एक नया आयाम दिया। ऐसे प्रतिभावान तथा गूढ ज्ञान वाले पुरुष और महिलाओं का कभी कभार जन्म होता है। पाश्चात्य गणितज्ञ जी. एस. हार्डी ने श्रीनिवास रामानुजन को यूलर, गॉस, आर्किमिडीज तथा आईजैक न्यूटन जैसे दिग्गजों की समान श्रेणी में रखा था। रामानुजन ने गणित के ऐसे फार्मूले दिए जिसे आज गणित के साथ-साथ टेक्नोलॉजी में भी प्रयोग किया जाता है। रामानुजन के प्रमुख गणितीय कार्यों में एक है किसी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात करने के फार्मूले की खोज ।
उदाहरण के लिए संख्या 5 के कुल विभाजनों की संख्या 7 है। इस प्रकार 5 4+1, 3+2, 3+11, 2+2+1, 2+1+1+1, 1+1+1+1+1। रामानुजन के फार्मूले से किसी भी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात की जा सकती है। उदाहरण के लिए संख्या 200 के कुल विभाजन होते है. 3972999029388, वर्तमान में भौतिक जगत की नयी थ्योरी सुपरस्ट्रिंग थ्योरी में इस फार्मूले का काफी उपयोग हुआ है। रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्रों जैसे संख्या सिद्धान्त, इलिप्टिक फलन, हाइपरज्योमैट्रिक श्रेणी इत्यादि में अनेक महत्त्वपूर्ण खोजें की। -
रामानुजन की स्मरण शक्ति गजब की थी। वे विलक्षण प्रतिमा के घनी और एक महान गणितज्ञ थे। अंकों के मित्र कहे जाने वाले श्रीनिवास रामानुजन के गणित पर लिखे लेख तत्कालीन समय की सर्वोत्तम विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित होते थे। ज्यादातर गणितज्ञ उनके सूत्रों से चकित तो थे, लेकिन वे उन्हें समझ नहीं पाते थे पर तत्कालीन विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी ने जैसे ही रामानुजन के कार्य को देखा, वे तुरंत उनकी प्रतिभा पहचान गए। यहां से रामानुजन के जीवन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होंने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे। एक बहुत ही प्रसिद्ध घटना है जब रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे तो डॉ. हार्डी उन्हें देखने आए डॉ. हार्डी जिस टैक्सी में आए थे उसका नंबर 1729 था और यह संख्या डॉ. हार्डी को अशुभ लगी। क्योंकि 1729 = 7 गुणा 13 गुणा 19 और इंग्लैण्ड के लोग 13 को एक अशुभ संख्या मानते हैं। परंतु रामानुजन ने कहा कि यह तो एक अद्भुत संख्या है यह यह सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो तरीके में व्यक्त कर सकते हैं।
1729 123+13
1729 103+93
भारतीय विद्वानों की अपनी प्रतिभा से गणित में नये युग का सूत्रपात हुआ तथा गणित की इसी शोध एवं साधना के बूते पर भारत गणित के क्षेत्र में विश्य का पथ प्रदर्शक एवं प्रेणता बना। रामानुजन का गणित के क्षेत्र में मुख्य योगदान निम्नांकित प्रकार से है।
• वर्ष 1903 में रामानुजन ने दसवीं की परीक्षा पास की और उसी साल घन (क्यूब) और चतुर्घात समीकरण ( दायक्वाड्रेटिक इक्वेशन) हल करने का सूत्र भी खोजा ।
• 1911 में 'सम प्रॉपर्टीज ऑफ बरनॉलीज नंबर्स शीर्षक से रामानुजन का पहला रिसर्च पेपर जर्नल ऑफ मैथमेटिक्स सोसायटी' में प्रकाशित हुआ। साल 1913 में तत्कालीन विख्यात गणितज्ञ एवं ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो प्रोफेसर हार्डी को रामानुजन ने पत्र लिखा। इसमें 120 प्रमेय और सूत्र शामिल थे प्रोफेसर हार्डी इस पत्र से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रामानुजन को कैम्ब्रिज आने का न्योता दिया।
•उनकी योग्यता को देखते हुए 28 फरवरी 1918 को रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना सदस्य बना कर सम्मानित किया और तो और, रॉयल सोसायटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है।
• रॉयल सोसायटी की सदस्यता के बाद वह ट्रिनिटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने।
• रामानुजन ने कैम्ब्रिज जाने से पहले, 1903 से 1914 के बीच गणित की करीब साढ़े तीन हजार प्रमेयों को लिखा। उनके इन तमाम योगदानों को बाद में टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च बॉम्बे' (वर्तमान में मुम्बई) ने प्रकाशित किया।
• रामानुजन की गणितीय प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 26 अप्रैल, 1920 को उनका निधन हो जाने के बाद भी उनके दिए हुए कई प्रमेय आज भी अनसुलझे हैं।
• उनके निधन के पश्चात् उनकी 5000 से अधिक प्रमेयों (थ्योरम्स) को छपवाया गया और उनमें से अधिकतर को कई दशक बाद तक सुलझाया नहीं जा सका। रामानुजन की गणित में की गई अदभुत खोजें आज के आधुनिक गणित और विज्ञान की आधारशीला बनी।
संख्या- सिद्धान्त पर रामानुजन के अदभुत कार्य के लिए उन्हें संख्याओं का जादूगर माना जाता है। रामानुजन संख्या उस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं, जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग द्वारा निरूपित किया जा सकता है। अपने महान गणितीय अवदान के लिए रामानुजन को गणितज्ञों का गणितज्ञ भी कहा जाता है।
सारांश
अक्सर बच्चे गणित से जी चुराते हैं, इसलिए वे इससे दूर भागने लगते हैं और नतीजन वे गणित में कमजोर हो जाते हैं। शोधकर्ताओं की मानें तो शारीरिक फिटनेस बच्चों को गणित समझने में सहायक होती है गणित का सीधा संबंध तर्कशक्ति और सोचने की क्षमता से होता है। गणित में बुद्धि को कुशाग्र बनाने के लिए आधारभूत गणित (बेसिक मैथ्स) जरुर पढ़नी चाहिए।
गणित में सबसे पहले आसान सवाल हल करने चाहिए, इससे गणित में रुचि पैदा होगी। बच्चे को हर सूत्र (फॉर्मूले) की एप्लीकेशन आनी चाहिए फॉर्मूला कैसे डेराइव हुआ और उसका अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) कैसे करना है, इसका भी अच्छी तरह ध्यान रखा जाना चाहिये। अध्याय के अनुसार फॉर्मूले अच्छी तरह याद कर लें एक बार समझ में नहीं आने पर निराश होने की अपेक्षा किसी जानकार की मदद से इसको हल कर लेना चाहिए।
•रटने से किसी भी विषय की समझ विकसित नहीं होती है। गणित भी रटने से नहीं, बल्कि बार-बार अभ्यास से आता है। यह कार चलाने जैसा अनुभव ही है, आप जितना चलाएंगे, अपने अनुभवों से उतना ही आप निखरते चले जाएंगे।
•दैनिक जीवन से जुड़े सवालों पर ध्यान दिया जाना चाहिये। गति और शुद्धता (स्पीड एंड एक्यूरेसी) के लिए ज्यादा से ज्यादा अभ्यास (प्रैक्टिस) किया जाना चाहिये।
•पहले से निश्चित समय (फिक्स्ट टाइम) में पेपर हल (सॉल्व कर अभ्यास करें। केवल सूत्र रटने की प्रवृत्ति से बचना चाहिये। किसी भी प्रमेय या फॉर्मूले को माइड मैप बनाकर याद किया जाना - चाहिये।
•मैथ्स की मिस्ट्री इजीनियरिंग या फिर अन्य परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र कुछ ऐप्स की हेल्प ले सकते हैं। ये ऐप्स मैथ्स की पेचीदा प्रॉब्लम्स को भी आसानी से सॉल्व कर देते हैं। मैथमेटिकल समस्याओं को हल करने के लिए फोटोमैथ हेल्पफुल ऐप है। इस ऐप का बेसिक वर्जन आईओएस और एंड्रॉयड यूजर्स के लिए फ्री है, लेकिन प्रो वर्जन पेड हैं।
भारत की गणित के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी और गौरवशाली परंपरा है जिसे प्रोत्साहित करने और बढ़ाने की जरूरत है। आज जीवन के हर क्षेत्र में रच बस चुके गणित को उन गणित साधकों की भावना के अनुरूप ज्यादा व्यावहारिक बनाने का संकल्प लेते हुए हमें इस अभियान को जारी रखने का प्रण लेना है। गणित के क्षेत्र में अभी भी ऐसी प्रतिमाएं हैं, जिनका सही तरीके से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों को इस समस्या के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। महान गणितज्ञ का यह कथन आज भी प्रासंगिक बना हुआ है कि हमारे जीवन की कोई भी ऐसी धारा नहीं है, जिसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गणित का योगदान न हो। आशा और विश्वास है कि रामानुजन जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी चमक जरुर बिखेरेंगे, लेकिन हमें ऐसी प्रतिभाओं को भी उत्साहित।करना चाहिए जो गणित के क्षेत्र में मेधावी हो अतः उस महान गणितज्ञ को सच्ची श्रद्धाजलि तभी सार्थक होगी जब हम यह वचन लें कि उनके दिखाये रास्ते पर चल कर देश की भावी पीढ़ी को गणित में सशक्त कर देश को अग्रणी बनाने में अपना योगदान दे सकें।
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