मृदा UPTET। By आलोक वर्मा

             मृदा


              तथ्य

शैलों के टूटने - फूटने तथा जीवावशेषों के सड़ने - गलने से निर्मित भू - पृष्ठ के ऊपरी भाग को मिट्टी कहते हैं । इसमें पौधों को उत्पन्न करने तथा पोषण करने की क्षमता पायी जाती है । यही कारण है कि मिट्टी मानव के । लिए अत्यधिक मूल्यवान है । मनुष्य की अधिकांश मूलभूत आवश्यकताएँ जैसे भोजन , वस्त्र , गृह आदि । प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी पर आधारित हैं । मानव सभ्यता की आधारशिला कृषि का सीधा सम्बन्ध मिट्टी से है । इसीलिए मिट्टी को मानव सभ्यता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । मिट्टी के निर्माण में मूल पदार्थ , जलवाय , धरातलीय दशाओं और प्राकृतिक वनस्पति का सर्वाधिक महत्त्व होता है । इन तत्त्वों की विभिन्नता के आधार पर विविध प्रकार की मिट्टियों का निर्माण होता है ।

  • मृदा का वर्गीकरण

भारत में विभिन्न प्रकार के उच्चावच , भू - आकृति , जलवायु परिमण्डल और वनस्पतियाँ पायी जाती है । इन विभिन्नताओं ने देश में अनेक प्रकार की मिट्टियों के विकास में योगदान दिया है ।

भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् ( ICAR ) ने भारतीय मृदाओं को उनकी प्रकृति और गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया है जो अमेरिका के कृषि विभाग ( USDA ) मृदा वर्गीकरण की पद्धति पर आधारित है । उत्पत्ति , रंग संयोजन तथा अवस्थिति के आधार पर भारत की मिट्रियों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है

( i ) जलोढ़ मिट्टी

जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदान और नदी घाटियों के विस्तृत भागों में पायी जाती है । ये मिट्टी देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 40 प्रतिशत भाग को ढके हुए है । इस मिट्टी में पोटाश की मात्रा अधिक और फॉस्फोरस की मात्रा कम पायी जाती है । पुरानी जलोढ़ मिट्टी को बाँगर और नवीन जलोढ़ मिट्टी को खादर कहते हैं ।

( ii ) काली मिट्टी

काली मिट्टी दक्कन के पठार के अधिकतर भाग पर पायी जाती है । इसमें महाराष्ट के कछ भाग , गुजरात , आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के कुछ भाग शामिल हैं । इस मिट्टी को ' रेगर ' तथा ' कपास वाली काली मिट्टी भा  कहा जाता है । रासायनिक दृष्टि से काली मिट्टी में चूने , लौह , मैग्नीशिया तथा ऐलमिना के तत्त्व काफी मात्रामा पाए जाते हैं ।

( iii ) लाल और पीली मिट्टी

लाल मदा का विकास दक्कन के पठार के पूर्वी तथा दक्षिणी भाग में कम वर्षा वाले उन क्षेत्रों में हुआ है । जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें पायी जाती हैं । पश्चिमी घाट के गिरिपद क्षेत्र की एक लम्बी पट्टी में लाल दुमटी मृदा पायी जाती है । पीली और लाल मिट्टी ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भागों और मध्य गंगा के मैदान के दक्षिण भागों में पायी जाती है ।

( iv ) लैटेराइट मिट्टी

लेटेराइट मिट्टी उच्च तापमान और भारी वर्षा के क्षेत्रों में विकसित होती है । ये मिट्टी उष्ण कटिबन्धीय वर्षा । के कारण हुए तीन निक्षालन का परिणाम है । इस मिट्टी में जैव पदार्थ , नाइट्रोजन , फॉस्फेट और काल्सियम का कमी होती है तथा लौह - ऑक्साइड और पोटाश की अधिकता होती है । यह मिट्टी कनाटक , केरल , तमिलनाडु , मध्य प्रदेश और असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पायी जाती है ।

( v ) शुष्क मिट्टी

शुष्क मिट्टी का रंग लाल से लेकर किशमिशी तक होता है । यह सामान्यतः संरचना से बलुई और प्रकृति से लवणीय है । इस मिट्टी में नाइट्रोजन अपर्याप्त मात्रा में और फॉस्फेट सामान्य मात्रा में होता है , जबकि जैव पदार्थ बहुत कम मात्रा में मिलते हैं ।

( vi ) लवण मिट्टी

इस मिट्टी को ऊसर मिट्टी भी कहते हैं । इसमें सोडियम , पोटैशियम और मैग्नीशियम का अनुपात अधिक होता है । यह अनुर्वर होती है और इसमें किसी भी प्रकार की वनस्पति नहीं उगती । यह मिट्टी पश्चिमी गुजरात , पूर्वी तट के डेल्टाओं और पश्चिम बंगाल के सुन्दर वन क्षेत्र में मिलती है ।

( vii ) पीटमय मिट्टी

यह मिट्टी भारी वर्षा और उच्च आर्द्रता से युक्त उन क्षेत्रों में पायी जाती है जहाँ वनस्पति की वृद्धि अच्छी हो । अत : इन क्षेत्रों में मृत जैव पदार्थ बड़ी मात्रा में इकटे हो जाते हैं जो मृदा को जीवांश और पर्याप्त मात्रा में जैव तत्त्व प्रदान करते हैं । इस मिट्टी में जैव पदार्थों की मात्रा 40 से 50 प्रतिशत तक होती है । यह मिट्टी बिहार के उत्तरी भाग और उत्तराखण्ड के दक्षिणी भाग में पायी जाती है ।

( viii ) वन मिट्टी

यह मिट्टी पर्याप्त वर्षा वन वाले क्षेत्रों में मिलती है । इस मिट्टी का निर्माण पर्वतीय पर्यावरण में होता है । पर्यावरण में परिवर्तन के साथ मिट्टी का गठन और संरचना बदलती रहती है । घाटियों में यह दुमटी और पांशु होती है तथा ऊपरी ढालों पर यह मोटे कण वाली होती है ।

  • मृदा अवकर्षण

मुख्य रूप से मृदा अवकर्षण को मृदा की उर्वरता के हास के रूप में परिभाषित किया जाता है । इसमें मृदा का पोषण स्तर गिर जाता है तथा अपरदन और दुरुपयोग के कारण मृदा की गहराई कम हो जाती है । भारत में मृदा संसाधनों के क्षय का मुख्य कारक मृदा अवकर्षण है ।

  • मृदा अपरदन

अपरदनकारी शक्तियों द्वारा धरातल की मिट्टियों का कटाव या बहाव मृदा अपरदन कहलाता है । भारत में मृदा अपरदन की गम्भीर समस्या देखने को मिलती है । वर्षा ऋतु में नदियों के जल के साथ हजारों टन मिट्टी समद्र में बह जाती है । उल्लेखनीय है कि मृदा की एक इंच मोटी परत को विकसित होने में लगभग 500 साल लगते हैं , जबकि उनके नष्ट होने में बहुत कम समय लगता है । मृदा अपरदन के कारण भामि । की पैदावार घट जाती है जिसका सीधा प्रभाव मनुष्य के जीवन स्तर पर पड़ता है ।

  • ( क ) मृदा अपरदन के प्रमुख कारण निम्नलिखित है

( i ) निर्वनीकरण

( ii ) अनियन्त्रित पशुचारण

( iii ) अवैज्ञानिक कृषि कार्य

( iv ) वर्षा का स्वभाव

( v ) भूमि का ढाल

( vi ) पवन वेग

( vii ) मिट्टी की प्रकृति

  • ( ख ) मृदा अपरदन के प्रकार निम्नलिखित हैं

( i ) जल द्वारा - मृदा अपरदन -

1 . परत अपरदन

2 . नलिका अपरदन

( ii ) पवन द्वारा मृदा अपरदन -

1 . परत अपरदन

2 . नलिका अपरदन

( iii ) हिम द्वारा मृदा अपरदन ।

  • मृदा संरक्षण

अपरदन , जल - जमाव और खारापन मिट्टी की भीषण समस्याएँ हैं । इन समस्याओं से मिट्टी को सुरक्षित । करना आवश्यक है । मृदा संरक्षण का तात्पर्य ऐसे सभी उपायों से है , जिनसे मिट्टी तथा उसकी उर्वरा शक्ति सुरक्षित होती है । इन उपायों को दो भागों में बाँटा जा सकता है

1 . लघु उपाय — इसके अन्तर्गत ऐसे उपायों को सम्मिलित किया जाता है , जिनका उपयोग मिट्टी की सुरक्षा के लिए स्थानीय या व्यक्तिगत तौर पर किया जाता है । वन रोपण , समोच्च खेती , सीढ़ीदार खेती , फसल चक्र प्रणाली का अभिकरण आदि उपाय इसके अन्तर्गत आते हैं ।

2 . वृहत् उपाय — इसके अन्तर्गत मिट्टी संरक्षण के ऐसे उपाय आते हैं , जो राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के द्वारा चलाए जाते हैं । बाढ़ की रोकथाम , ऊसर भूमि सुधार , वन - रोपण , खड्ड , बीहड़ भूमि सुधार , स्थानान्तरणशील कृषि प्रमुख उपाय हैं । महत्त्वपूर्ण शब्दावली

1 . ह्यूमस - मृदा में पाए जाने वाले जीव - जन्तुओं व वनस्पति का गला - सड़ा अंश जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है ।

2 . शुष्क कृषि - किसी अर्द्ध - शुष्क क्षेत्र में बगैर सिंचाई के कृषि करना ।

3 . निक्षालन - आर्द्र प्रदेशों में वह प्रक्रिया जिसके द्वारा जैव तथा खनिज लवण , जैसे घुलनशील पदार्थ , मिटी की ऊपरी परत से , वर्षा के जल के स्राव के साथ निचली परत में प

4 . pH वैल्यू - यह मृदा की अम्लीयता और क्षारीयता के निर्धारण का एक माप होता है । यदि किसी मिट्टी का pH 7 से कम होता है तो उसे अम्लीय मिट्टी तथा 7 से अधिक होने पर क्षारीय मिट्टी कहते हैं । अम्लीय तथा क्षारीय दोनों प्रकार की मिट्टियाँ फसलों के लिए अनुपयुक्त होती हैं । अम्लीय मिट्टी में चूना डालकर और क्षारीय मिट्टी में जिप्सम डालकर इनका धीरे - धीरे उपचार किया जा सकता है ।

5 . मृदा - भूपटल की सबसे ऊपरी परत , जो पेड़ - पौधों की उत्पत्ति में सहायक है ।

6 . खादर – प्रतिवर्ष बाढ़ द्वारा निर्मित नवीन जलोढ़ मिट्टी ।

7 . बाँगर - पुराने अवसादों से निर्मित मिट्टी ।

8 . रेह - क्षारीय मिट्टी या क्षारीय भूमि को हिन्दी में रेह कहा जाता है ।


                                 By Alok Verma