सल्तनत का विघटन इतिहास 5

सल्तनत का विघटन


"फिरोज तुगलक के उत्तराधिकारी अत्यधिक अयोग्य और शक्तिहीन थे । उन्होंने अपना अधिकांश समय मनोविनोद तथा पारस्परिक संघर्ष में ही लगाया । परिणामस्वरूप प्रान्तीय गवर्नरों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया । सल्तनत का बचा - खचा वैभव दिल्ली में 1398 ई0 में हुए तैमूर के आक्रमण से समाप्त हो गया ।"


तैमूर का आक्रमण

          सन् 1398 में उत्तर भारत पर फिर मध्य एशिया की सेनाओं का आक्रमण हुआ । तुर्क सरदार तैमूर ने जिसे तैमूरलंग भी कहा जाता है , अपनी विशाल सेना लेकर भारत पर आक्रमण कर दिया । आक्रमण का उद्देश्य केवल उत्तर भारत पर आक्रमण करना और लूट का माल लेकर मध्य एशिया लौट जाना था । तैमूर के सैनिकों ने दिल्ली में प्रवेश किया । उन्होंने नगर को लूटा और नगर निवासियों की हत्या की । जब उन्होंने पर्याप्त मात्रा में धन लूट लिया तब वे समरकंद लौट गए । अपनी राजधानी समरकंद जाते समय तैमूर ने खिज खौँ को पंजाब का गवर्नर ( शासक ) नियुक्त किया ।


  सैय्यद वंश ( 1414 ई० से 1451 ई० )

          तैमूर लग अन्तिम तुगलक शासक नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद खिज खाँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और सैय्यद वंश की नींव डाली । खिज खाँ ने सुल्तान की उपाधि धारण न कर , रैयत - ए - आला उपाधि धारण की । वह जीवन भर तैमूर के वंशजों  का वफादार बना रहा और उन्हें राजस्व तथा उपहार भेजता रहा ।



लोदी वंश ( 1451 ई0 - 1526 ई0 )

         दिल्ली सलतनत का अन्तिम राजवंश लोदी वंश था । 1451 ई0 दिल्ली के अमीरों ने सरहिन्द के सूबेदार बहलोल लोदी को आमंत्रित कर दिल्ली के सिंहासन पर बैठा दिया । लोदी शासक तुर्क न होकर ' अफगान थे ।


बहलोल लोदी ( 1461 ई0 - 1489 ई० )

          बहलोल लोदी ने सल्तनत को संगठित करने का प्रयत्न किया । उसने जौनपर पर आक्रमण कर शर्की शासको को पराजित कर अपने अधीन कर लिया ।



सिकंदर लोदी ( सन् 1489 ई0 से 1517 ई0 )

     बहलोल लोदी के बाद उसका पुत्र निजाम खाँ सुल्तान सि 1504 ई० में अपनी राजधानी दिल्ली से हटा कर नये नगर में स प्रसिद्ध हुआ । सिकन्दर लोदी की साहित्य के प्रति विशेष रुचि थी फारसी में अनुवाद हुआ । जिनमें एक आयुर्वेदिक ग्रन्थ का नाम फरहम गुलरुखि उपनाम से कविता लिखता था । उसने राज्य की आर्थिक नियंत्रित किया एवं राजस्व बढाने के लिए भमि नाप के आधार पर भू - राजस लिए पैमाना गज - ए - सिकन्दरी चलाया जो 30 इंच का होता था ।



इब्राहिम लोदी ( सन् 1517 ई० से 1526 ई० )

सिकन्दर लोदी के बाद उसका पुत्र इब्राहिम लोदी सिंहासन । अफगान सरदारों के मध्य संघर्ष प्रारम्भ हो गया । अफगान सरदार सुल्तान नहीं थे । उन्होंने इब्राहिम लोदी के खिलाफ षडयन्त्र प्रारम्भ कर दिया । इसा प्र सरदारा का मदद से काबुल के शासक बाबर ने इब्राहिम लोदी को पानीपत क मदान जाम खा सुल्तान सिकन्दर शाह नाम से सिंहासन पर बठा । कर नये नगर में स्थापित किया । जो बाद में आगरा नामात त विशेष रुचि थी । उसके शासन काल में कई ग्रन्थों का थ का नाम फरहंगे सिकन्दरी रखा । वह स्वयं भी । उसने राज्य की आर्थिक दशा सुधारने के लिए वस्तुओं का मूल्य नकालिए भमि नाप के आधार पर भ - राजस्व निर्धारित किया । उसन उसका पुत्र इब्राहिम लोदी सिंहासन पर बैठा इनके समय में सुल्तान तथा प्रारम्भ हो गया । अफगान सरदार सुल्तान की शक्तिशाली स्थिति से प्रसन्न खिलाफ षड़यन्त्र प्रारम्भ कर दिया । इसी प्रकार षडयन्त्रकारी अफगान क शासक बाबर ने इब्राहिम लोदी को पानीपत के मैदान में 1526 ई0 में पराजित किया । इस युद्ध में इब्राहिम लोदी मारा गया और भारत में लोदी वंश के साथ हादल्लास अन्त हो गया ।



दिल्ली सल्तनत के पतन के कारण

  • दिल्ली सल्तनत में उत्तराधिकार के नियम का अभाव था । शासक की मृत्यु हो जाने के बाद राजपरिवार में सत्ता के लिए संघर्ष प्रारम्भ हो जाता । इस प्रकार के आपसी संघर्ष ने आपसी विश्वास की भावना को कम कर दिया , जो आगे चलकर सल्तनत के पतन का कारण बना ।
  • अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली सल्तनत को सुदूर दक्षिण तक पहुँचाया दिल्ली से अत्यधिक दूरी होने के कारण इन पर नियंत्रण रखना सम्भव नहीं था ।
  • तैमूर के आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत की शक्ति को कमजोर कर दिया जिससे अधीनस्थ राज्य स्वतन्त्र होने लगे ।


वंश

सैय्यद वंश         1414ई० से 1451ई०
लोदी वंश           1451ई0 से 1526ई०
बहलोल लोदी     1451ई0 से 1489ई०
सिकन्दर लोदी    1489ई0 से 1517ईo
इब्राहिम लोदी    1517ई0 से 1526ई०



समय रेखा :-

सल्तनत काल

गुलाम वंश       1200 ईo से 1290 ईo
खिलजी वंश    1290 ईo से 1320 ईo
तुगलक वंश     1320 ईo से 1412 ईo
सैय्यद वंश       1414 ईo से 1451 ईo
लोधी वंश       1451 ईo से 1526 ईo
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