सल्तनतकालीन संस्कृति
"तेरहवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में दिल्ली सल्तनत की स्थापना को भारत के सांस्कृतिक जा सकता है । शासन प्रबन्ना , विज्ञान , साहित्य और स्थापत्य कला दृष्टिकोण था । दूसरी ओर भारतीयों के भी अपने धर्म , शासन प्रवंध साहित्य विज्ञान तथा स्थापित्य को लेकर अपने निश्चित विचार थे।इन दोनों के मिलान ने एक मिलीजुली संस्कृति का विकास किया । "सल्तनतकालीन प्रशासन
दिल्ली सल्तनत का प्रारम्भ 1206 ई0 में तथा अन्त 1526 ३० न म1206 ई0 में तथा अन्त 1526 ई0 में हुआ । इस प्रकार भारत में सुल्तानों किया । सल्तनत काल में राल्तान का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण था । सारी राजनैतिक , कानूनी और सैनिक सत्ता उसी में निहित थी । वह राज्य की सुरक्षा आर व्यवस्था काला था । इस तरह वह प्रशासन के लिए भी जिम्मेदार था । सल्तान ही सेना का प्रधान होता था । कानून आर याच की व्यवस्था करना भी उसी का दायित्व था । इस कार्य के लिए वह न्यायाधीशों की नियुक्ति करता था । उसका किसी भी पदाधिकारी के अन्याय के खिलाफ उससे सीधे अपील की जा सकती थी । न्याय करना शासक का महत्त्वपूर्ण दायित्व था ।केन्द्रीय शासन
केन्द्रीय शासन में सुल्तान का पद महत्वपूर्ण होता था । सुल्तान ही सेना का सबसे बड़ा अधिकारी होता । था । युद्ध और सन्धि के सम्बन्ध में वही निर्णय लेता था । न्याय में भी उसी का निर्णय अन्तिम होता था । सुल्तान अपनी मदद के लिये मंत्रियों की नियुक्ति करते थे । मंत्रियों का पदासीन रहना या न रहना सुल्तान की इच्छा पर निर्भर करता था । मंत्रियों की संख्या , उनके अधिकार और कर्तव्य समय - समय पर जुल्तान परिवर्तित करते रहते थे ।प्रान्तीय शासन
समस्त देश अनेक प्रान्तों में विभक्त था । पहले इन्हें ' इक्ता और बाद में ' विलायत ' कहा गया । प्रत्येक उन्त का अधिकारी गवर्नर होता था , जो ' इक्तादार और बाद में मुक्ति या ' वली कहलाता था । उसे सुल्तान युक्त करता था । वह सुल्तान के प्रति उत्तरदायी होता था । वह प्रान्त में कानून व्यवस्था बनाए रखता था । से सैन्य एवं प्रशासनिक योग्यता के आधार पर नियुक्त किया जाता था । उसके अधीन घुडसवार , फौजी दस्ते । या पैदल सैनिक रहते थे । वह आपराधिक मामलों के विवादों में न्यायाधीश का कार्य करता था । वह कर यह में सहायता प्रदान करता था ।प्रान्तों में काजी एवं सद्र भी नियुक्त किए जाते थे । प्रायः एक ही व्यक्ति को दोनों पद दिए जाते थे । जी के रूप में वे दीवानी मामलों में न्याय करते थे तथा सद्र के रूप में धार्मिक अनुदानों के मक का कार्य करते थे । प्रान्तों के नीचे जिले ( जिन्हें " सरकार कहते थे तथा इसके नीचे उपसम्भागीय क्षेत्र होते थे जिन्हें ' शिक कहते थे । जिले के अधिकारी को प्रमुख शिकदार तथा शिक के अधिकारी को शिकदार कहते थे । ये दोनों अधिकारी अपनी - अपनी इकाइयों में मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भमिका निभाते थे तथा राजस्व वसूली में सैन्य सहायता प्रदान करते । थे । प्रत्येक शिक में एक भू - राजस्व अधिकारी होता था जिसे आमिल कहते थे । शिक में फोतदार , कोषाध्यक्ष का कार्य करता था ।
स्थानीय शासन
प्रत्येक शिक को परगनों में बाँटा जाता था । गाँवों के समूह को परगना कहते थे । प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी । गाँव । का मुखिया मुकद्दम या चौधरी कहलाता था । वह समस्त ग्रामीण प्रशासन के लिए उत्तरदायी था । भू - राजस्व निर्धारण एवं वसूली के साथ राजस्व सम्बन्धी सभी कागजात वह रखता था । गाँव की सुरक्षा का कार्य गाँव के चौकीदार का होता था । गाँव के ये तीनों अधिकारी वंशानुगत होते थे । इन्हें वसूले गए भू - राजस्व का एक भाग प्राप्त होता था । गाँव का प्रशासन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होता था । इसीलिए मध्यकालीन भारत में ग्रामीण स्तर पर प्राचीन परम्पराएँ यथावत रहीं ।दिल्ली के सुल्तानों ने दिल्ली सल्तनत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया परन्तु इनके अधिकतर उत्तराधिकारियों के अयोग्य होने के कारण सल्तनत की शक्ति कम होती गई । सल्तनत के विभिन्न भागों में बहुत से इक्तादारों ने नए राज्य बना लिए । उत्तर भारत में सल्तनत के कुछ प्रान्त थे जो बाद में स्वतंत्र राज्य बन गए , जैसे - जौनपुर , बंगाल , मालवा , गुजरात , कश्मीर तथा मेवाड़ ।
सल्तनत कालीन समाज
सल्तनत काल के शुरुआती दौर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विचारों , रिवाजों एवं विश्वासों में भिन्नता होने से समाज में संघर्ष एवं टकराव की स्थिति पैदा होने लगी । तुर्को के आगमन ने उत्तर भारत में पर्दा - प्रथा को मजबूत किया । यह प्रथा समाज के ऊँचे तबकों की प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई । इसका स्त्रियों की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और वे घर में सिमटने लगीं ।बाह्य आडम्बर एवं धन - सम्पत्ति का प्रदर्शन समाज की विशेषता बन गई । इन सबसे समाज में तनाव । बढ़ने लगा , जिससे जीवन के नैतिक मूल्यों का हास होने लगा । लोग जीवन के यथार्थ से आँख चुराने लगे । किन्तु लोग बनावटी जीवन से थकने लगे । उन्हें एक ऐसे वातावरण की आवश्यकता हुई जिसमें सामाजिक जीवन के नैतिक मूल्यों को बचाया जा सके । इसी समय भक्तों और सूफी सन्तों का पदार्पण हुआ । इन्होंन लोगों में आपसी समझ पैदा करने की कोशिश की और सादा जीवन उच्च विचार ' पर बल दिया ।
भक्ति आन्दोलन राथा सूफी सन्त
तुर्क और अफगान जो अपने साथ धार्मिक विचार और संस्कृति लाए , उसका भा घास पर प्रभाव पड़ा । जालि प्रथा की कठोरता , ऊँच - नीच का भेद - भाव तथा बाहरी आज समाज में कुछ दोष आ गए । अत : सामाजिक कुरीतियों को दूर करने आर समाज लिए कुछ समाज सुधारकों ने जनता में परस्पर प्रेम तथा सद्भाव को यकान का रस्पर प्रेम तथा सदभाव को बढ़ाने का प्रयास किया । इन्होंने धाभिक कर्मकाण्डों की अपेक्षा भक्ति - भाव से ईश्वर की उपासना करने को श्रेष्ठ बताया । इस प्रकार की भावना को बल मिला सन्तों एवं समाज सुधारकों द्वारा चलाया गया इस प्रकार का ना आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।इन भक्त संतों में कबीर चैतन्य महाप्रभ गरुनानक , दाद , रवास , तुकाराम , रामानंद , बल्लगाना मीराबाई आदि प्रसिद्ध हैं ।
लोगों की साधारण भाषा में लिखे और गाए गए उनके गीत व दोहे ईश्वर के प्रति भक्ति - भाव से हैं । इनमें बहुत से ऐसे विचार हैं जिनको तब से लेकर अब तक लोग मानते आए हैं ।
कबीर -
काशी ( वाराणसी ) में एक जुलाहे . बनकर परिवार में कबीर का पालन - पोषण हुआ । कबीर निरंकार परमेश्वर में विश्वास रखते थे । कबीर की प्रमुख रचनाएँ थी - साखी , सबद , रमैनी ।मीराबाई -
ये मेड़ता के राठौर राणा रतन सिंह की पुत्री थी। मीराबाई कृष्ण की उपासना में भजन गाया करती थी ।
गुरुनानक -
1469 ई0 में पंजाब के तलवंडी नामक स्थान में गुरुनानक का जन्म हुआ था । इन्होंने सिख धर्म धर्म चलाया तथा एकेश्वरवाद का उपदेश दिया ।चैतन्य महाप्रभु ने बाह्य आडम्बर तथा कर्मकाण्ड का
विरोध किया । रविदास ने लोगों को शिक्षा दी कि भक्ति से ही मनुष्य मोक्ष पा सकता है । रामानन्द ने शुद्ध आचरण एवं भक्ति पर विशेष बल दिया । दादू , तुकाराम जैसे सन्तों ने भी अपने विचार द्वारा भक्ति आंदोलन को
गति प्रदान की ।
भक्ति सन्तों ने लोगों के बीच यह भावना फैलाई थी कि ईश्वर को पाने के लिए सच्चे दिल से प्रेम करना ही एक मात्र तरीका है । उन्होंने आम लोगों की बोली में कई
सुन्दर गीतों की रचना की जिसे भक्त लोग मगन होकर गाते थे । वे ऊँच - नीच , जाति - पाति के खिलाफ थे । उनका मानना था कि सभी मनुष्य ईश्वर की नजर में समान है और हिन्दू तथा मुसलमान दोनों का एक ही ईश्वर है । ईश्वर को पाने का रास्ता भी एकसमान है । भक्ति संतों की तरह कई मुसलमान संत भी थे जो सही सन्त कहलाए । इन सूफी सन्तों में अजमरक ख्वाजा मर्डन की दिल्ली के हज़रत निजामुददीन औलिया , पंजाब के बाबा फरीद बहुत जाने माने सूफी संत थे ।
भक्त संतों और सूफी संतों के विचार आपस में बहत मिलते - जुलते थे सूफियों ने इस बात पर जोर दिया कि सच्चे दिल से अल्लाह को प्रेम करना और अपने बुरे कामों पर पश्चा करना अल्लाह को पाने का सही तरीका है । सूफी मत अनुयायी एक ईश्वर में विश्वास करते थे । शांति , अहिंसा सहिष्णुता एवं मानवता के प्रति प्रेम की भावना में भी उन अटूट विश्वास था । सूफी सन्तों से हिन्दू एवं मुसलमान दो ही अत्यधिक प्रभावित हुए ।
" लल्ला देव कश्मीर की विधवा ब्राह्मण औरत थीं । कई सूफी संत उसे अपना पीर या गुरु मानते थे । वह कहती थीं ' शिव सब जगह मौजूद हैं , सब में मौजूद हैं फिर हिन्दू और मुसलमान में फर्क मत करो । अगर तम समझदार हो तो अपने आप को समझो । यही ईश्वर की सही समझ है । "
साहित्य
सल्तनत काल में देश के बहुत से भागों में फारसी राजभाषा रही । अत : बहुत सी भारतीय भाषाओं पर फारसी का प्रभाव पड़ा और फारसी के बहुत से शब्द भारतीय भाषाओं में आ गए । सल्तनत काल में दिल्ली , अरबी व फारसी साहित्य के विद्वानों का केन्द्र बन गई थी । महमूद गजनवी के समय अलबरूनी और फिरदौसी नामक प्रसिद्ध विद्वान तथा कवि थे । मंगोलों के डर से मध्य एशिया के अनेक विद्वानों आर साहित्यकारों ने भागकर दिल्ली के सुल्तानों के दरबार में शरण ली थी । भारत में फारसी साहित्य का महान विद्वान अमार खुसरो था । उसने भारत के बारे में बहुत कुछ लिखा जिसर उसका भारत के प्रति प्रेम झलकता है ।मैंने भारत की प्रशंसा दो कारणों से की है । एक तो यह कि हिन्दुस्तान मेरी जन्मभूमि और हम सबका वतन है । वतन से प्यार करना एक अहम फर्ज है । . . . . . . हिन्दुस्तान स्वर्ग के समान है । इसकी आबोहवा खुरासान से बेहतर है । . . . . यह हरा - भरा है और साल भर फूलों से लदा रहता है । . . . . . . यहाँ के ब्राह्मण अरस्तू जैसे ज्ञानी हैं और विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सारे विद्वान हैं ।
अमीर खुसरो
इस समय साहित्य के नाम पर यशोगान और धार्मिक पुस्तकों की ही रचना हुई । इस श्रेणी म नाह का बीसल देव रासो तथा खमानरासो उल्लेखनीय है । अगीर खुसरो ने हिन्दी में भी पद रचना की थी ।
भक्ति आन्दोलन के सन्तों जैसे कबीर गोरखनाथ आदि ने ईश्वर स्तुति में गीतों की रचना की थी । इस काल में सुप्रसिद्ध प्रमाख्यान तथा ऐतिहासिक महाकाव्य पदमावत की रचना महाकवि मलिक मुहम्मद जायसा ने की ।
स्थापत्य कला
ईरानी व तुर्क कारीगर जब भारत आए तो अपने साथ इमारत बनाने की एक नई विधि भी लाए । सल्तनतकालीन इमारतों की तीन खास बातें थीं - मेहराब , गुम्बद और मीनारें जो उनकी सभी इमारतों में देखी जा सकती । कुछ इमारतों में कुरान की आयतें भी लिखी गयीं हैं ।मिली - जुली शैलियाँ
ईरानी व तुर्क कारीगरों से ये बातें भारत के कारीगरों ने सीखीं । भारत के कारीगरों के हुनर ईरानी व तुर्क कारीगरों ने सीखे । मंदिरों में मेहराब व गुम्बद बनने लगे और कई मस्जिदों में पत्थर पर पत्थर रखकर तराशे हुए खम्भे बनने लगे ।आपके आस - पास भी कुछ मंदिर व मस्जिद होगें क्या उनमें ऐसी कुछ विशेषताएँ आपको देखने को मिलती हैं ? इनकी सूची बनाइए ।
चित्रकला और संगीत
सल्तनत काल में बारीक और छोटे - छोटे चित्र बनाए जाते थे । कलाकारों को दरबार में आश्रय मिला था । कभी - कभी वे पुस्तक में वर्णित घटनाओं के चित्र बनाते थे ।भारतीय संगीत पर फारस और अरब की संगीत शैली का प्रभाव पड़ा । सितार , सारंगी और तबला जैसे वाद्य यंत्रों की लोकप्रियता बढ़ गई । कुछ सूफी सन्तो ने संगीत में विशेष रुचि दिखाई । उनका पिता था कि भक्ति संगीत भी ईश्वर के निकट पहुँचने का एक रास्ता हा इससे संगीत के नए रूपों जैसे कव्वाली को लोकप्रिय होने में बड़ी सहायता मिली ।
मध्यकालीन समय में सर्वोत्तम तलवारें वाराणसी ( बनारस ) और सौराष्ट्र में बनती थीं । उसके बाद लाहौर , सियालकोट , मुल्तान गुजरात तथा गोलकुण्डा के प्रान्त
भी इसके लिए मशहूर हुए । राजस्थान एवं गुजरात में निर्मित जमधार , छूरे , धनुष तथा तीरों की बड़ी माँग थी ।
सियालकोट तथा मेवाड़ की तोड़ेदार बन्दुक सर्वोत्तम होती थी । तोड़ेदार बन्दूकों के अलावा लोहे का उपयोग सब प्रकार के कवच , ढाल , हथियार , बन्दूक तथा तोप के गोले आदि में होता था ।
चिकित्सा एवं खगोल शास्त्र
सल्तनत काल में आयुर्विज्ञान तथा खगोल विद्या जैसे कुछ विषयों में अनुसंधान हेतु सुल्तानों अमीरों का संरक्षण प्राप्त था । वे इन कार्यों के लिए प्रोत्साहन देते थे ।
बरनी ने अपनी तारीख - ए - फिरोजशाही में चिकित्सकों और खगोल शास्त्रियों की एक लम् तालिका प्रस्तुत की है । मौलाना बदरुददीन , मौलाना सदरुद्दीन तथा अजीमुददीन मध्यकालीन युग के प्रसि चिकित्सक थे । गच्छेन्द्र प्रसिद्ध वैद्य थे और जोग मशहूर शल्य चिकित्सक थे । मध्यकाल में ऐसे प्रमाण मिल हैं , जिनसे पता चलता है कि देश में अनेक जर्राह या शल्य चिकित्सक थे । वे केवल शल्य चिकित ( ऑपरेशन ) ही नहीं करते थे , बल्कि कृत्रिम अंग भी बनाकर लगा सकते थे । वे काटकर पथरी निकाल दा थे । मोतियाबिन्द को समाप्त कर डालते थे ।
कृषि
देश की आबादी में ज्यादातर लोग किसान थे । वे कड़ी मेहनत करते थे । देश के विभिन्न भागों में आए दिन अकाल पड़ने और युद्ध होने से किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था । उस समा । किसानों का जीवन स्तर ऊँचा नहीं था । गाँव के अधिकारी कभी - कभी अपने पद का दुरुपयोग करते थे और साधारण किसानों को अपने हिस्से की भी मालगुजारी ( राजस्व ) अदा करने के लिए मजबूर करते थे ।
व्यापार व उद्योग
मुस्लिम विजय ने देश के उद्योग तथा वाणिज्य व्यापार में बाधा नहीं डाली । गाँव तथा शहरों में कारीगर । एवं शिल्पियों ने अपने पुराने पेशे को बरकरार रखा था । उनके औजार भी वही थे । कछ विशेष प्रकार के नए । काम करने वाले कारीगर वर्ग भी उत्पन्न हुए , जैसे बर्तन पर कलई करने वाले घोड़े की नाल व रकाब बनान वाले , कागज़ बनाने वाले आदि । इसके अतिरिक्त कई शाही कारखाने भी थे , जो फारस देश की तकनीक के अनुसार दिल्ली के सुल्ताना द्वारा स्थापित किए गए थे । इन कारखानों में राज्य , राजपरिवार तथा दरबारी लोगों की जरूरत की चीजें बनाई जाती थीं ।मुद्रा के क्षेत्र में भी सुधार हुए । सुल्तानों ने चाँदी के टके और ताँबे के जीतल नामक मुद्राएँ चलाई । इसी के साथ व्यापार का विकास शुरू हुआ जिससे शहर और शहरी जीवन का और विकास हआ । बंगाल । और गुजरात के शहर अपने उत्तम कपड़ों और सोने तथा चाँदी के काम के लिए प्रसिद्ध थे । बंगाल का सोनार । गाँव और ढाका कच्चे रेशम और मलमल के लिए विख्यात थे ।
वस्त्र निर्माण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन 13वीं - 14वीं शताब्दी में मसलमानों टा में लाए चरखे द्वारा हआ । चरखे का चलन आरम्भ होने से कपड़ के उत्पादन में बहत सधार या सागर और फारस की खाड़ी के आस - पास के देशों के साथ होने वाले व्यापार में भारतीय कपडे की धाका पहले ही जम चुकी थी । पेड़ - पौधों और खनिज स्रोतों से प्राप्त विभिन्न रंगों से रंगाई का कार्य किया जाता था । उस काल में भारतीय कपड़े चीन को भी निर्यात किए जाते थे ।
इस काल में अन्तरराष्ट्रीय व्यापार जल और थल दोनों मार्गो से किया जाता था । भारत कुछ वस्तुओं का निर्यात करता था । इसमें चर्म व धातु से बनी वस्तुएँ तथा फारसी डिजाइन आधारित गलीचे प्रमुख थे । भारत पश्चिमी एशिया से उच्च कोटि के कुछ कपड़े ( साटन आदि ) , काँच के बर्तन , बहुमूल्य धातुएँ , घोड़े तथा चीन से कच्चा रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन आयात करता था ।
यातायात
दिल्ली सल्तनत के सुदृढ़ होने से यातायात एवं संचार का विकास हुआ । उस समय आधुनिक वैज्ञानिक देते उपकरणों का ज्ञान नहीं था । लोग परिवहन के साधनों के रूप में कुलियों , जानवरों तथा चक्के वाली गाड़ियों का प्रयोग करते थे । परम्परागत बैलगाड़ी का इस्तेमाल उन दिनों खूब होता था । बैलों पर काठी के स्थान पर गदे रखकर माल ढोया जाता था । सवारी के लिए घोडे , टटू , खच्चर और कभी कभी गधों , ऊँटों का इस्तेमाल भी किया जाता था । नदियों में नावों तथा सागर में पाल वाले जलयानों का उपयोग किया जाता था ।शब्दावली
सूफी - ईश्वर की भक्ति उपासना में व्यक्तिगत प्रेम - भावना पर अधिक बल देने वाले मुसलमान संत ।पीर - सूफी सम्प्रदाय के धर्म उपदेश ।
जर्राह - शल्य चिकित्सक ( चीर - फाड़ करने वाला डॉक्टर या सर्जन ) ।
जीतल - सल्तनत काल में प्रचलित ताँबे का सिक्का ।
आयात - बाहर के देशों में बनी वस्तुओं को अपने देश में मँगाना ।
निर्यात - अपने देश में बनी वस्तुओं को दूसरे देशों में भेजना ।
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