भूमि
• प्रस्तावना ( Introduction )
पथ्वी का वह भाग है , जिस पर हम निवास करते हैं , पशु - पक्षी और सभी जीव - जन्त को जिस पर पेड़ - पौधे और वनस्पति उगते हैं , जिसके अन्दर अनेक पान वनस्पति उगते हैं , जिसके अन्दर अनेक प्राकृतिक संसाधन ( खनिज ) भरे है । यह परी पृथ्वी का 3 / 10 भाग है और इसे स्थलमण्डल ( Lithosnhere ) कहते है ।
सामान्यतया जिस ऊपरी पर्त पर हमारी दैनिक क्रियाएँ होती है वह भू - पटल कहलाता है और ही हम अपनी चर्चा का विषय भी मानते हैं , क्योंकि ऊपर से यही मालूम होता है कि यह सतही भाग ही हमारा सभी कुछ है , लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि यह भाग सभी क्रियाओं के अन्तिम परिणाम को ही प्रस्तुत करता है । अतः साधारण बोलने तथा समझने में हम भू - पटल को ही भूमि कह देते हैं । जबकि हमें अपने सभी कार्यों में स्थलमण्डल के लगभग सभी भागों की आवश्यकता होती है । पथ्वी के खनिज जो हमारी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं , भू - पटल के बहुत नीचे हैं । खेती जिस मिट्टी पर होती है और जिस पर अन्न पैदा होता है वह भी भू - पटल के नीचे ही है । भू - गर्भ जल और बड़े - बड़े पानी के भण्डारों ( महासागर , समुद्र , झीलें , नदियों आदि ) के नीचे के अन्तिम भाग भूमि से जा मिलते हैं । अतः व्यापक रूप में भूमि एक ठोस पिंड है जो अनेक चट्टानों से मिलकर बना है और जिसके ऊपरी भाग में अपेक्षाकृत कम कठोर भाग मिट्टी और अन्दर के भाग में खनिजों के संग्रह चट्टाने और अधिक तापमान के कारण पिघले पदार्थ हैं ।
पर्यावरण की दृष्टि से हमारी चर्चा इस पूरे भू - भाग से है और जब हम ' भूमि ' शब्द का प्रयोग करेंगे तो इन सब उपर्युक्त बातों को अपने ध्यान में रखकर ही बात करेंगे ।
मिट्टी वस्तुतः चट्टानों के टूटने - फूटने बनती है जो पृथ्वी की विभिन्न भौतिक , रासायनिक तथा जैविक क्रियाओं द्वारा होती है । अलग - अलग स्थानों पर अलग - अलग खनिज चूर्ण और नदियों के साथ लाई गई पहाड़ों के टूट - फूट और घिसे चूर से मिलकर बने पदार्थ जब मैदानी क्षेत्र में ता वह मिट्टी के नाम से जानी ता है । अलग - अलग स्थानों की मिट्टी को उनके लग - अलग नाम से ही पुकारते हैं । इनमें ही रंगों एकत्रित होते हैं तो वह मिट्टी कना निर्माण में आने वाले घटकों के आधार पर आधार पर भूरी मिट्टी , काली मिट्टी पीली मिट्टी ; मा अथवा खनिजों के आधार पर क्षारीय मिट्टी , पालक मिट्टी , बनावट के आधार पर चिकना रक्षारीय मि मिट्टी , बाल मिट्टी , भूरभूरी मिट्टी , दुमद होती है और अलग - अलग प्रकार स मिट्टी , दुमट मिट्टी आदि वर्गीकरण किये गये हैं जो अलग - अलग गुण लिए लग - अलग प्रकार की उपज के लिए उपयोग में आती हैं ।
नोट:-
भूमि एवं मृदा
( Land and Soil )
भूमि पृथ्वी की सतह के पानी रहित ठोस भाग को , जिस पर किसी भी कार्य का निष्पादन किया जा सकता है , कहते हैं । जब कि मिट्टी ( मृदा ) भूमि की वह ऊपरी सतह है जिसमें खनिज व अन्य ऑर्गेनिक पदार्थ मिले होते हैं और जिस पर पेड़ पौधे उग सकते हैं या उगाये जा सकते हैं ।
मिट्टी की अम्लीयता अथवा क्षारीयता का मान , जिसकी पैदावार और उत्पादन में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है , उसके pH से किया जाता है । भूमिका होती है ।
अम्लीयता < 7 , उदासीन = 7 और क्षारीयता > 7
अलग - अलग प्रकार की मिट्टी में अलग - अलग गुणधर्म होते हैं और वे अलग - अलग प्रका हेतु उपयोगी होती हैं । पानी की कितनी मात्रा कौनसी मिट्टी सोख लेती है उससे भी सम्बन्ध है , लेकिन यह आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है कि ऊपरी सत्तर ( 15 सेमी ) मिट्टी में उन लवणों की अधिकता रहती है जिन पर उपज निर्भर करती ।
ऊपरी सतह ( top soil layer ) बहुत बारीक होती है और अनेक वर्षों में इसका निर्माण यही सभी प्रकार की उपज के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है । इसकी निर्माण प्रक्रिया बडीजनि अवधि में सम्पन्न होती है । ऊपर की सतह की एक इंच ( 2 . 5 सेमी ) मिट्टी के बनने में सा से अधिक वर्ष लग जाते हैं जो प्रकृति के प्रकोप से अथवा हमारे त्रुटिपूर्ण कार्यों से अथवा ठीक न करने पर मिनटों में ही नष्ट हो जाती है । इसी कारण देश में अनाज उत्पादन में कमी अपने लोगों के जीने का सहारा अन्य देशों पर निर्भर हो जाता है , जिसका वे अनेक प्रकार है । हमारे मूल्यवान खनिज एवं अन्य वस्तुओं को कम मूल्य पर लेकर वह निरन्तर समटिश जाते हैं और हमारे ही बलबूते पर अधिक सुख - सुविधाओं का भी उपयोग करते है ।
भूमि इस प्रकार एक ऐसा केन्द्र बिन्दु है जो यदि सुरक्षित है तो न वह हमारे अच्छे का के ही काम आता है , बल्कि हमारे पेट भरने के लिए अन्न व अन्य उपजें , पीने के लिए - प्रकृति संतुलन के लिए घने वृक्ष सभी कुछ उपलब्ध कराता है , उनका आधार बनता है । यह है कि विश्व की कुल भूमि का 2 . 5 प्रतिशत ( एक चालीसवी ) भाग ही भारत में भूमि है और की 167 प्रतिशत आबादी ( 102 करोड़ लगभग ) इस पर रहती है । यही ही नहीं बल्कि विश्व की से अधिक से और गायों तथा बकरियों का सातवा हिस्सा भारत महा अतः भूमि की उपयोगिता भारत में केवल अन्न उपजाने में ही नहीं बल्कि इन पशुओं के लिए चारा जुटाने के लिए भी है । कि अन्न उपजाने की विवशता ने चरागाहों पर कृषि कार्य करना प्रारम्भ कराया है । उसका असर यह हुआ है कि मवेशी जंगलों की ओर बढ़े हैं । जंगलों की कमी ने प्राकृतिक सम्पदा की कमी के साथ - साथ । पर्यावरण असन्तुलन को भी जन्म दिया है । ।
• भूमि के प्रकार ( Kinds of Land )
भूमि का उसके उपलब्ध प्रकार तथा उसके उपभोग के आधार पर हम निम्न वर्गीकरण करते है ।
1 . सामान्य भूमि ( Natural Land ) : यह भूमि भाग वह है जिस पर हमारी कृषि होती है और तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं को जिस पर उत्पन्न किया जाता है । यह भूमि हमारे जीवन का आधार है . उपयोगी है और देश की धरोहर है । इसकी मिट्टी अत्यन्त मूल्यवान है जिसकी सुरक्षा आवश्यया । इसी भूमि पर अनेक प्रकार के पेड़ - पौधे , वनस्पति उगते हैं और घने जंगल भा इसा मू हात हा नवानतम आकड़ा के अनुसार भारत में भू - भाग के 25 प्रतिशत क्षेत्र में कृषि होती है जो भूमि के अन्तर्गत आती है ।
2 . नमभूमि ( Wetlands ) : पानी के बड़े स्रोतों के आस - पास की मिट्टी कभी इतना पा लेता ह कि भूमि दलदली हो जाती है और वह कृषि तथा किसी अन्य कार्य के उपयोग रह जाता हा इसे नमभूमि कहते है । वहाँ मकान या तो बन ही नहीं पाते हैं , और बनी से बने होते है तो उनमें सीलन रहती है और पानी की बहतायतता से प्रभावित रहत ह । । भारत में इस प्रकार की भूमि उन कृत्रिम नहरों के कारण हुई है जिनमें वर्षपर्यन्त पानामा जिनसे पानी रिस - रिस कर पास की भूमि में पहुँचता रहता है । निःसन्देह अधिक अन्न उमा किये गये पानी पहुंचाने के प्रयास ने एक राष्ट्रीय स्तर की समस्या को जन्म दिया है । जो बहुत चिंता का
किया जा रहा है कि एक तरफ तो निरन्तर पानी के स्रोतों से रिस को किसी प्रकार रोका जाये तथा वहीं दूसरी ओर स्रोतों के किनारे - किनारे घना वृक्षायण जो ऐसे पानी को अपने आप में समाहित कर सके ।
इसके विपरीत राष्ट्रीय स्तर पर नम भूमि को उपयोग की दृष्टि से हितकर माना है क्या भारत में लाखा लागा का भाजन ( मछली पकड़ने , शिकार करने झींगा संवर्धन आदि ) तथा पशु उपलब्धता आश्वस्त करते है । नम भूमि या पक्षियों , सरीसपो , मछलियों तथा अन्य प्राणा पालन भी करते है जो अत्यधिक आर्थिक और जीव - सौन्दर्यपरक महत्त्व के हैं । साथ ही बाढ़ानयन्त्रण विफर रिचार्जिग जल गुणवत्ता का नियमन करने , एक्वाकल्चर तथा मुर्गावियों के प्रजनन स्थान देत सम्भावित स्थाना के रूप में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है । प्रदूषण उपशमन हेतु भी नम भूम यात्रा का अपना महत्त्व है ।
उपर्युक्त महत्त्व को देखते हुए राष्ट्रीय नम भूमि प्रबन्ध समिति ने देश में प्राथमिकता के आधार । पर 22 नमभूमि क्षेत्रों का चयन किया है . जिन पर कार्य हो रहा है । विवरण अन्य अध्याय 6 की सारणी 10 में दिया है । भारत ने नमभूमि के बारे में एक रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किये है , जिनक अन्तर्गत - ( 1 ) चिल्का ( उड़ीसा ) . ( 2 ) केवलादेव घना ( राजस्थान ) , ( 3 ) हरिके ( पंजाब ) . . ( 4 ) लोकटक मणिपुर ) , ( 5 ) साभर ( राजस्थान ) तथा ( 6 ) वूलर ( जम्मू एण्ड कश्मीर ) नम - भूमि क्षेत्रों को राष्ट्रीय महत्त्व का माना है ।
3 . बंजर भूमि ( Wastelands ) : जो स्थान या तो एकदम चहानी हैं और जहाँ मिट्टी बिल्कुल नहीं है अथवा वह स्थान जहों की ऊपरी मिट्टी ( top soil ) प्राकृतिक प्रकोप या सुरक्षित न रख सकने की मनुष्य की त्रुटिपूर्ण क्रियाओं से बह गई हो , वह किसी भी प्रकार की उपज के योग्य नहीं रह जाते । पानी के साधनों का भी अभाव होता है । यह बंजर भमि क्षेत्र ( wasteland area ) कहलाते है । वाय से , पानी से तथा अन्य क्रियाओं से सामान्य भूमि का बंजर भूमि क्षेत्र में परिवर्तित होने का क्रम हमारे देश का दुर्भाग्य रहा है तथा इसी से अनेक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हुई है ।
राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड ( National Wasteland Development Board ) का गठन हुआ है जो बंजर भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तन करने अथवा इस भूमि का और कोई अपेक्षाकृत अच्छा उपयोग हो सके , इस हेतु प्रयत्नशील है । इस बोर्ड के मुख्य उद्देश्य हैं
1 . वनरोपण गतिविधियों में अधिक तेजी लाना ,
2 . वनरोपण कार्यक्रम को लोगों , विशेषकर किसानों तथा भूमिहीनों तक ले जाना और इसमें महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि करना ,
3 . अन्य सरकारी तथा गैर - सरकारी एजेन्सियों का अधिक - से - अधिक सहयोग प्राप्त करना ,
4 . इंधन की लकड़ी तथा चारे के विकास पर अधिक बल देना , और
5 . संस्थागत समर्थन प्राप्त करने के तौर तरीके ढूँढना ।
इस क्रम में भारत सरकार ने विभिन्न राज्यों को निर्देश दिये हैं कि वे न्यूनतम निर्धारित प्रतिशत भूमि क्षेत्र को इस योजना के तहत पेड़ - पौधे , वनस्पति अथवा अन्य किसी - न - किसी उपज के कार्य हेतु योजना बनाकर उनकी क्रियान्वित करें , जिनका विवरण निम्न प्रकार है
राजस्थान , मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र :- 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से अधिक
- देहली , उत्तर प्रदेश , गुजरात , कर्नाटक , आन्ध्र प्रदेश , दादरा हवेली ( डामन एवं ड्यू सहित ) :-5 से 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र
जम्मू - कश्मीर , हिमाचल प्रदेश , पंजाब , हरियाणा , गोवा , केरल , तमिलनाडु , उड़ीसा , पश्चिमी बंगाल , बिहार , असम , सिक्किम , मेघालय , त्रिपुरा , मिजोरम , मणिपुर , नागालैण्ड और अरुणाचल 5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से कम
इस हेतु अनेक कार्यक्रम योजना बजट ( Plan Budget ) के तहत शुरू किये गये हैं जिनमें 50 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक भारत सरकार द्वारा अनुदान स्वीकृत किया जाता है । । ( अधिक विस्तृत विवरण अगले अध्याय पर्यावरणीय समस्याएँ ( प्राकृतिक ) में देखें ।
4 . रेगिस्तानी भूमि ( Desert Landy : ये मोटी बालू वाले क्षेत्र होते है जिनमें गि होते हैं और उनमें पानी को सोखने की क्षमता कम अथवा नहा हाहाता हा अतः उन । त इन बोत्री नहीं होती । दूसरे यह पानी के अभाव से भी ग्रस्त होते है । साथ ही पास में जंगलों कारण भी वातावरण में आर्द्रता नहीं समेट पाते और इस कारण वर्षा से भी वंचित ये क्षेत्र सीधे - सीधे रेगिस्तान ही हो जाते हैं । भारत का थार रेगिस्तान ऐसा ही क्षेत्र है । हेक्टेयर ) में पंजाब , राजस्थान और गुजरात में फैला है । अधिक पशु - चराई . पानी की और वायु द्वारा भूमि क्षरण ने इसे मरुस्थल बना दिया है और यह निरन्तर बढ़ रहा की सारणी 23 . 7 को देखें )
5 . कच्छ वनस्पति वाली भूमि ( Mangroves Land ) : यह भूमि सामान्यतया महार तथा मुहानों की सीमा में होती है । इस भूमि की विशेषता यह है कि यहाँ की मिट्टी करने की शक्ति होती है । अतः इसी कारण इस प्रकार की भूमि मुख्यत : उष्णकटिका उष्णकटिबन्धीय अन्तःज्वारीय क्षेत्रों में होती है । यहाँ उत्पन्न वनस्पतियों जिन्हें ' का नाम से बोलते है समद तटों को स्थिर रखती है और समुद्र द्वारा कटाव को मेरा कच्छ वनस्पतियों कुल 6 , 740 वर्ग किलोमीटर लम्बी तट रेखा पर पाई जाती है जो कच्छ बनस्पति क्षेत्र का लगभग 7 प्रतिशत है ।
भारत में इस क्षेत्र की भूमि के उत्पादन पर भी भारी जैव हस्तक्षेप है तथा का अंधाधुंध और बेरहमी से इसका शोषण हो रहा है । इस शोषण को रोकने तथा इस भूमि की क . के संरक्षण और प्रवन्ध के लिए भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय कक वनस्पति समिति Mangrove Committee ) गठित की है जिसके निम्न लक्ष्य रखे हैं
1 . प्राकृतिक पुनःउत्पादन ( National Regeneration ) ,
2 . नर्सरी बनाना ( Raising of Nurseries ) ,
3 . वनीकरण ( Afforestation ) , और
4 . शिक्षा एवं जागरूकता ( Education & Awareness ) |
भारत सरकार द्वारा राज्यवार चयनित कच्छ वनस्पति क्षेत्र (भूमि) की सूची प्रसारित की है । जो अध्याय 6 के सारणी 6 . 10 में दी गई है । ( पाठक अवलोकन करें )
• भूमि का अनुचित उपयोग अथवा दुरुपयोग ( Misuse or Improper Use of Land )
भारत के कुल भू - भाग का क्षेत्रफल 329 mh है । निरन्तर बढ़ती आबादी के अनुसार निश्चय है । प्रति व्यक्ति यह भू - भाग कम होता जा रहा है । आजादी से पूर्व 1941 में यह 1 . 03 h था जो 1951 में 0 - 911 , 1961 में 0 - 75h , 1971 में 0 - 605 , 1981 में 0 - 481 . 1991 में 0 - 39h , 1996 में 0 . 50 तथा अब 2002 के अन्त में 0 . 31h आ गया है । इसमें से वह भाग निकाल दें जो वन क्षेत्र का सुरक्षित है अथवा जो नमभूमि अथवा बंजर भूमि के हिस्से में हो गया है और फिर शेष सारा पर ( आवास के अलावा ) कृषि करें तो भी शायद यह देश के लिए काफी नहीं होगी , क्योकि या भूमि पर भी निरन्तर दबाव पड़ रहा है । अतः भूमि के उचित उपयोग की बात बहुत महत्वपूर्ण है ।
भूमि की उपलब्धता को हम एक और दृष्टि से भी देखें
1 . प्रति वर्ष लाखों हेक्टेयर भूमि से ऊपरी सतह ( top soil ) नदी तथा वषा का जल अथवा बाढ़ से बह जाती है ।
2 . जल और वायु से भूमि - क्षरण लगातार हो रहा है ।
3 . रासायनिक खादो तथा कीटाणुनाशक दवाइयों से अमि पटषित हो रही है ।
4 . मिट्टी का एक बहुत बड़ा भाग अन्य कार्यों में प्रयोग हो रहा है जैसे मकाना का के बनाने में मिट्टी का उपयोग ।
5 . मवेशी तथा अन्य जानवरों द्वारा चराने हेतु भूमि क्षेत्र में चरागाहों का विकास
6 . बढ़ती जनसंख्या के कारण सडक , विविध आवासीय कॉलोनियों , जनाहर पोस्ट ऑफिस अथवा अन्य विभागों हेतु भवन निर्माण ।
7 . सुविधा हेतु एअरपोर्ट , बस अड्डे अथवा अन्य संचार काया
8 . खनन कार्य हेतु पत्रों का वितरण आदि ।
अतः इस प्रकार भूमि क्षेत्र , जिसका कृषि हेत उपयोग हो सके , कम हो रहा है । और अनावश्यक भूमि उपभोग को बन्द करना पड़ेगा वहीं ऐसे उपाय भा - खाजा पभाग का बन्द करना पड़ेगा वहीं ऐसे उपाय भी खोजने होंगे जिससे कृषि योग्य भूमि में उपज का प्रतिशत बढ़ जाये ।
भूमि के नष्ट अथवा दूषित होने के कारण ( Causes of Destruction or Pollution of Land )
भूमिका का ठीक से उपयोग न हो पाने के कई कारणों को मोटेतीर से दो विन्दुओं में विभाजित किया जा सकता है । जिस पर विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे , वे हैं
( अ ) भूमि - धारण तथा ( ब ) भूमि - प्रदूषण ।
( अ ) भूमि - क्षरण ( Soil Erosion ) भूमि - क्षरण एक ऐसा अभिशाप है जिसके द्वारा चाहे - अनचाहे जाने - अनजाने जाने कितनी भूमि यूं ही नष्ट हो जाती है । पिछले 100 से 200 वर्षों की अवधि में बनी मिट्टी की ऊपरी सतह ( top soil ) कुछ ही दिनों में तेज वर्षा अथवा आँधी और तफान से बह जाती है अथवा उड जाती है । मिट्टा नष्ट तो बहुत कम समय में ही हो जाती है , जबकि उसके बनने में बहुत समय लगता है । अतः मिट्टी की रक्षा करना बहुत आवश्यक और महत्वपूर्ण है । यह भूमि - क्षरण जल और हवा दोनों से होता है
1 . जल द्वारा भूमि - क्षरण ( Soil Erosion by Water ) : जहाँ वनस्पति क्षेत्र विरल तथा अपर्याप्त होता है और जहाँ आस - पास भी सघन पेड नहीं होते वहाँ की भमि की मिट्टी की सतह धीमे - धीमे क्षय होती जाती है और उसका आभास भी नहीं हो पाता । वर्षा की बूंदों से भूमि की मिट्टी पर कटाव होता है और वर्षा जल के बहने के साथ ही मिट्टी भी बह जाती है । यदि तेज वर्षा होती है तो यह कटाव और भूमि क्षय और शीघ्र तथा अधिक होता है ।
इससे बचाव के कई उपाय हो सकते हैं , जिनमें - ( 1 ) भूमि की जुताई पानी की निकास व्यवस्था के लम्बवत करने से मिट्टी का कटाव और भूमि - क्षरण कम हो जाता है , ( 2 ) खेतों व भूमि के आस - पास घने वृक्ष लगाये जायें क्योंकि वर्षा की तेज बूंदों को वक्ष अपने ऊपर लेकर बँदों की तेजी को कम करता है तथा फिर पानी को मिट्टी में से धीमे - धीमे जाने देता है और ( 3 ) खेतों अथवा भूमि भाग के ऊपरी हिस्सों में , जहाँ से वर्षा के पानी की आवक है . छोटे - छोटे एनीकट बनाये जायें , इससे पानी उस ऐनीकट में रुक जाये तथा फिर उसे अपनी सुविधा से धीमे - धीमें कम गति से काम में ले सकें ।
2 . वायु द्वारा भूमि - क्षरण ( Soil Erosion by Wind ) : वायु के तेज प्रवाह से भी भूमि - क्षरण होता है । वाय अपने साथ मिट्टी के छोटे - छोटे कणों को भूमि से उठाकर बहुत दूर ले जाती है तथा वहाँ से पुनः वायु वेग के साथ यह मिट्टी कण एक तूफान के रूप में बहुत दूर उड़ जाते हैं और पिछले भूमि भाग को यूँ ही छोड़ जाते हैं ।
इसके बचाव के लिए भी जिन तरीकों को सुझाया गया है उनमें से - ( 1 ) वायु की दिशा के विपरीत खेतों की रक्षा करना तथा ( 2 ) वायु की नमता बनाये रखना , जिससे मिट्टी सहज ही उडने न पाये प्रमुख हैं ।
अतः यह उचित है कि दोनों ही प्रकार के भूमि - क्षरण के कारणों से मिट्टी के क्षय को रोकने के लिए निम्न दो बातों का अपनाना आवश्यक है
( i )पानी के बहाव अथवा वायु के प्रवाह के विरुद्ध रक्षा पेटियों ( Shelter Belts ) की व्यवस्था करना , तथा
( ii ) खेतों के आस - पास सघन वृक्षावली लगाना । इससे काफी सीमा तक भूमि क्षय रुक सकता है ।
( ब ) भूमि प्रदूषण ( Soil Pollution )
भूमि के भौतिक , रासायनिक या जैविक गणों में ऐसा कोई भी अवांछित परिवर्तन नि मनुष्य तथा अन्य जीवों पर पडे या जिससे भमि की प्राकृतिक गुणवत्ता तथा उपयोगिता नष्ट कहलाता है । इसे और ध्यान से देखें
1 . मिट्टी की अम्लीयता ( Soil Acidity ) - ये विकार आर्द्र क्षेत्रों की भूमियों में पाय आदता के कारण जब भूमि में हाइड्रोजन ( H2 ) आयन्स की आण्विक प्रगाढ़ता अधिक और ना ( HCl ) आयन्स अपेक्षाकृत कम होते हैं तो अम्लीय विकार उत्पन्न हो जाते है जिससे मिटी का पीएच . मान सदैव 7 से कम रहता है । इस विकार के कारण एल्युमिनियम , लोहा अधिक हान से पौधों के लिए विष का कार्य करते हैं तथा मैगनीज योगिक की मात्रा बढने से पो क्रिया रुक जाती है । मदा जीवाणओं की क्रियाशीलता भी मन्द होता है । फसलों मैग्नीशियम , मोल्बिडन , फॉस्फोरस कम मात्रा में उपलब्ध होता है जिसके फलस्वरूप फसल में गिरावट आ जाती है । भूमि में सिलिका तथा क्वार्ट्ज की अधिकता होने से तथा जैविक के अपघटन से , क्षारों के निक्षालन होने तथा निरन्तर अमोनियम सल्फेट जैसे उर्वरकों का प्रयो से भूमि में अम्लों की मात्रा बढ़ जाती है । इस विकार को सुधारने के लिए भूमि में चने का । क्षारीय उर्वरकों का प्रयोग , समुचित जल निकास व्यवस्था करके , पोटाशयुक्त खादों का प्रयोग तथा अम्ल सहिष्णु फसलें उगाकर आदि क्रियाओं द्वारा दूर किया जा सकता है ।
2 मिट्टी की क्षारीयता ( Soil Alkalinity ) - ये विकार शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में अमित वाष्पीकरण के कारण होता है । भूमि की ऊपरी सतह पर सोडियम , कैल्सियम , मैग्नीशियम , पोटामा के क्लोराइडस , कार्बोनेट्स , बाई - कार्बोनेट्स तथा कभी - कभी नाइट्रेट्स भी पाये जाते हैं जिनके कारण ।
ये विकार उत्पन्न होते हैं । इन मिट्टियों में हाइड्रोक्सिल आयन्स की सान्द्रता हाइड्रोजन आयन्स की अपेक्षाकृत अधिक होती है । इन मिट्टियों का पीएच . मान सदैव 7 से अधिक होता है । ये विकार भूमि में क्षारीय लवणों के वाष्पीकरण से , जल निकास का उचित प्रबन्ध न होने से नहरी जल से निरन्तर सिंचाई करने से , सोडियम नाइट्रेटस आदि उर्वरकों के निरन्तर प्रयोग से होता है ।
इस विकार का मिट्टी पर विषैला प्रभाव होता है । पौधे अधिक मात्रा में सोडियम की मात्रा को अवशोषित करते हैं जिससे पौधों की वृद्धि तथा विकास नहीं होता है तथा भूमि की भौतिक , रासायनिक , जैविक सलों को कैल्सियम , स्वरूप फसल उत्पादन तथा जैविक पदार्थों सर्वरकों का प्रयोग करने दशा बिगड जाती है । इससे फसल उत्पादन न्यूनतम ही प्राप्त होती है । इस विकार को दूर करने हेतु लवणों को खुरचकर , निक्षालन कर तथा बहाकर आदि क्रियाओं द्वारा हटाया जा सकता है तथा जिप्सम का प्रयोग , जैविक खादों का अधिक प्रयोग एवं क्षार सहिष्णु । फसलें उगाकर भी क्षारीय विकार दूर किया जा सकता है ।
3 . रासायनिक और कीटनाशक दवाओं का भूमि पर प्रभाव ( Effect of Pesticides and Chemical Fertilizers ) - आज उत्पादन बढ़ाने के लिए खेतों में रासायनिक खादों , कीटनाशक , शाकनाशी एवं कवकनाशक रसायनों का प्रयोग दिन - प्रतिदिन बढ़ रहा है जिससे भूमि में हानिकारक तत्त्वों की मात्रा बढ़ने से भूमि प्रदूषित हो रही है । उदाहरण के लिए अमोनियम सल्फेट उवरका खेतों में लगातार प्रयोग करने से भूमि में अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है । इसी प्रकार सोडियम नाई । से क्षारीय विकार पैदा हो रहा है । कीटों को नष्ट करने के लिए डी . डी . टी . . बी . एच . सी . जस कि हानिकारक विर्षों का अधिक मात्रा में प्रयोग किये जाने से भूमि में इन रसायनों का अंश कई तक रहता है जिससे मृदा प्रदूषित होने के साथ - साथ इन विर्षों का अंश अनाजों में आने सन में नये - नये रोग व बीमारियों फैल रही है जो मानव समाज के लिए अभिशाप हैं ।
भारत सरकार द्वारा अनाजों , शाकों आदि में डी . डी . टी . व बी . एच . सी . जैसे रसायनों का नहीं करने की सिफारिश की गई है ।
रासायनिक उर्वरको , कीटनाशक रसायनों का निरन्तर अधिक मात्रा में यदि प्रयोग किया । रहा तो मृदा प्रदूषण के कारण मृदा उत्पादन शक्ति का हास तो होता ही रहेगा साथ ही साथ प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता रहेगा । उत्पादन बढाने के लिए रासायनिक उर्वरका ,कीटनाशक रसायनों का प्रयोग कम करके इनके स्थान पर जैविक खाद भ - परिष्करण / यांत्रिक क्रियाआ को प्राथमिकता देनी होगी तभी हम भूमि प्रदूषण से मानव स्वास्थ्य को सुरक्षित रख सकत ह । ।
बिगड़ी भूमि के पुनः सुधारने अथवा कृषि योग्य बनाने हेतु उपाय ( Ways to Improve or Reclaim the Spoiled Land )
भूमि क्षरण द्वारा कृषि योग्य भूमि के बचाव के उपाय पहले दिये हैं , लेकिन जो भूमि प्रदूषण से दूषित हो गई है अथवा खनन कार्य जैसी गतिविधि से नष्ट हो गई है , उसे पुन : कैसे प्राप्त कर ? यह एक जटिल प्रश्न है । विशेषज्ञों ने इस हेतु सुझाव दिये हैं कि उन्हें पहले कृत्रिम प्रकार से मिट्टी खाद के आवरण से युक्त कर इस रूप में लावें कि उस भमि पर कोई चीज उगने की सम्भावना बने । और फिर उनमें पहले भूमि सुधारने वाली फसलों को लगायें - तब आगे और अन्य वृक्ष , झाड़ियों आदि लगावें । इन्हें तब कृषि कार्य , सघन वृक्षावली , पानी संग्रह केन्द्र अथवा आमोद - प्रमोद स्थल के रूप में उपयोग में लिया जा सकता है । जो स्थान खनन से इतने खराब हो गये हों कि जगह ऊबड़ - खाबड़ हो गयी हो तो वहाँ का लेण्डस्केप तैयार कराकर उसमें स्विमिंग पूल , खेलने के स्थान व बाग - बगीचे आदि लगाये जा सकते हैं ।
एक बात की ओर और ध्यान दिया जा सकता है कि आज जब भी कोई विशेष आवास , बाँध , स्टेडियम अथवा मनोरंजन स्थल के निर्माण की बात हुई या नई - नई कॉलोनियों के विकास की योजना बनीं तब आवश्यकता के अनुसार कहीं से भी भूमि का आवंटन सुविधा की दृष्टि से कर लिया जाता है । क्यों न इस खराब भूमि को उस कार्य हेतु उपयोग में लावें ? जिससे दोनों ही समस्याओं का समाधान एक साथ सम्भव है ।
भूमि बहुत महत्त्वपूर्ण साधन है । इसके उचित उपयोग से हम आर्थिक रूप से सम्पन्न भी हो सकते हैं और विपरीत में असह्य स्थिति में भी आ सकते हैं । प्रत्येक मनुष्य के योगदान से ही देश की भावी स्थिति की अच्छी सम्भावनाएँ बन सकती हैं । कहते हैं - अच्छी भूमि - अच्छा अन्न । अच्छा अन्न - अच्छा मन ।

