नींबू वर्ग के खट्टे फलों में नींबू का प्रमुख स्थान है । इसमें विटामिन सी और अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं । नींबू से अचार , मामलेट और कैंडी भी तैयार की जाती है । नींबू की खेती का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके थोड़े बहुत फल साल भर मिलते रहते हैं ।
मिट्टी
नींबू के पौधे लगाने के लिये ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिये जिसमें कम से कम 4 - 5 फिट की गहराई तथा पथरीली सतह न हो । और उसमें पानी के निकास की समुचित व्यवस्था हो । इसके लिये दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है ।
उन्नत किस्में
उत्तर प्रदेश में नींबू की किस्में काफी अच्छी सिद्ध हुई हैं । यूरेका गोल , यूरेका लम्बा , पन्त लेमन - 1 , पन्त लेमन - 2 , बारह मासी लेमन , कागजी नींबू , इटालियन , बेदाना इत्यादि नींबू की प्रचलित किस्में हैं ।
प्रवर्धन
नींबू वर्गीय फल वृक्षों को बीज द्वारा अथवा वनस्पतिक प्रवर्धन विधियों द्वारा लगाया जा सकता है । जैसे कलम बाँधना , दाब लगाना , गूटी , भेंट कलम और चश्मा चढ़ाना इत्यादि ।
बीज द्वारा
बीजों को बसन्त ऋतु में बोना अच्छा रहता है । यदि फलों से बीज तुरन्त न निकाला गया हो तो उन्हें 24 घण्टे पानी में भिगोकर बोना चाहिये । बीजों को क्यारियों में 25 सेमी . की दूरी पर 2 . 5 सेमी गहराई पर बोना चाहिये । बोने के बाद बीजों को बालू से ढकने से मिट्टी में कड़ी पर्त नहीं बनने पाती । अंकुरण में बाधा नहीं पड़ती । बीज को भी थायराम से शोधित । करना चाहिये । नर्सरी में पौध दो वर्ष तक रखी जाती है । जब पौधे उचित आकार के हो जाये तो उन पर चश्मा चढ़ाया जा सकता |
वानस्पतिक भागों द्वारा
कलम
कलम के लिये स्वस्थ शाखा का चयन करना चाहिये । कलम का निचला हिस्सा गाँठ के नीचे से काटना चाहिये । कलम का 3 / 4 भाग भूमि में तथा 1 / 4 भाग बाहर रखना चाहिये । कलम लगाने का उपयुक्त समय मार्च - अप्रैल व जून जुलाई माह है ।
गूठी बाँधना
लाइम व मीठे नींबू का प्रवर्धन इस विधि से किया जा सकता है । इसका उपयुक्त समय फरवरी - मार्च व जून - जुलाई है ।
चश्मा चढ़ाना
यह इसके लिये सबसे अधिक प्रचलित विधि है । चश्मा चढ़ाने की काफी सफल विधि है । प्रवर्धन के लिये दो मूल वृन्तों पर कलिका चढ़ाने के समय कलिका के साथ लकड़ी का लगा रहना अधिक सफलदायक सिद्ध हुआ है । परन्तु परिपक्व डाली से लकड़ी रहित कलिका चढ़ाने पर अधिक सफलता मिलती है । इसका उचित समय मार्च - अप्रैल , अगस्त सितम्बर है ।
पौध लगाना
कलम बाँधने के एक वर्ष बाद कलमी पौधे खेत में रोपण योग्य हो जाते हैं । इन पौधों को मिट्टी की पिण्डी के साथ खोद लेना चाहिये । समतल तैयार खेत में 6 से 10 मीटर की दूरी पर 90X90X90 सेमी आकार के गड्ढे खोद लेना चाहिये । गड्ढों में पौधे लगाने के एक माह पूर्व ऊपर की मिट्टी में 50 किग्रा . गोबर की खाद 2 किग्रा . सुपर फॉस्फेट और 150ग्राम एल्ड्रिन धूल मिलाकर भर देना चाहिये । गड्ढा भरते समय मिट्टी को दबाकर भूमि को धरातल से 15 - 20 सेमी उठा हुआ रखते हैं । इसका उपयुक्त समय जुलाई माह है । सिंचाई की सुविधा होने पर रोपण मार्च - अप्रैल में किया जाता है । नींबू के बाग लगाने की वर्गाकार एवं आयताकार विधियाँ प्रचलित है ।
थाला बनाना
प्रत्येक पौधे के चारों ओर थाला बनाना चाहिये । पौध बढ़ने पर हर साल उसी हिसाब से पौध की चौड़ाई में थालों का आकार भी बढ़ाते रहना चाहिए । इससे सिंचाई करने पर पानी सीधे तने के सम्पर्क में नहीं आता । समय - समय पर थालों की निराई - गुड़ाई करने पर खरपतवार नहीं पनप पाते ।
खाद और उर्वरक
हर साल दिसम्बर में प्रत्येक पौधे के थाले में 20 किग्रा . गोबर की सड़ी खाद डालना चाहिये । पौधे की उम्र के अनुसार निम्न मात्रा में उर्वरक देना चाहिए ।
कम्पोस्ट या गोबर की खाद दिसम्बर से जनवरी के महीने में दी जाती है । यूरिया को 3 बराबर भाग में बाँटकर प्रथम भाग फरवरी , द्वितीय भाग जन और तीसरा भाग सितम्बर में ( एक वर्ष में ) देना चाहिये ।
सिंचाई
जब मिट्टी सूखने लगे सिंचाई कर देना चाहिये । आवश्यकता से अधिक पानी को क्यारी से बाहर निकाल देना चाहिये ।
छंटाई
रोगी व घनी शाखाओं को काटते रहना चाहिये । जब पौधा 3 - 4 वर्ष का हो जाय तो कटाई - छंटाई कर देना चाहिये ।
फलों की तुड़ाई
नींबू का पौधा साल भर फल देता रहता है । पूर्ण रूप से पके हये फलों को तोड़ना चाहिये ।
उपज
पकने पर फलों का रंग पीला पड़ने लगता है । एक वर्ष में प्रति पौधा 400 - 600 फल मिलते हैं । औसतन 200 - 250 क्विंटल / हेक्टेयर उपज मिलती है ।
फसल सुरक्षा
कीट नियन्त्रण
पत्तियों पर छेद करने वाली सूूूडी
इस कीट की तितली छोटी चमकदार होती है । मादा तितली प्रायः पत्तियों की निचली सतह पर और कभा पर एक - एक करके अण्डे देती हैं । इन अण्डों से 2 से 10 दिन के भीतर सँदियाँ निकल आती हैं और पत्तिया का सतह पर छेद बनाकर खाती रहती हैं ।
रोकथाम
सँडी लगी हुई पत्तियों को तोड़कर जला देना चाहिये । 0 . 2 इन्दोमा कर जला दना चाहिये । 0 . 2 इन्डोसल्फान 35 ई . सी . का छिड़काव करना चाहिये ।
सफेद मक्खी
मक्खी । मिमी . लम्बी और कोमल होती है । रंग पीला . आँखें लाल , पंख चमकदार तथा उन पर सफेद पाउडर सा फैला रहता है ।
रोकथाम
कीट लगी हुई पत्तियों को तोड़कर जला देते हैं । 0 . 2 इन्डोसल्फान 35 ईसी का छिड़काव करते हैं ।
छिलका खाने वाली झंडी
सूड़ियाँ प्रारम्भ में तने की छाल खुरचती हैं और तने में घुसकर खाती हैं ।
रोकथाम
पेट्रोल या इन्डोसल्फान दवा में रूई भिगोकर छेद के भीतर डाल देते हैं ।
रोग नियन्त्रण
रिट्रल बैंकर
इससे पत्तियाँ , टहनियाँ , काँटे तथा फल प्रभावित होते हैं । पहले हल्का पीला दाग बाद में भूरा और बनावट में फल खुरदरा हो जाता है । यह नर्सरी में एवं बड़े पेड़ों में लगता है ।
रोकथाम
वर्षा के पहले ब्लाइराक्स 50 का 0 . 3 का घोल 15 - 20 दिन के अन्तर पर छिड़काव करना चाहिये ।
गमोसित
प्रभावित पेड़ों में मुख्य तने के निचले भाग और कभी - कभी प्रमुख जड़ों से गोंद जैसा पदार्थ निकलने लगता है । पेड़ बहुत कमजोर हो जाता है ।
रोकथाम



