पपीता की खेती

पपीता की खेती 

पपीता एक वर्ष बाद फल देने लगता है और तीन वर्ष तक अच्छी फसल देता है । यह आम आदि के छोटे बागों के बीच बीच में उगाया जा सकता है । यह विटामिन ए , बी , सी व कार्बोहाइड्रेट , खनिज लवणों का अच्छा स्रोत है । दूध से निकाला गया पदार्थ पपेन माँस गलाने के काम में आता है । 

मिट्टी
 बलई दोमट या दोमट भूमि इसके लिये उपयुक्त होती है । इस फसल के लिये सिंचाई व पानी के निकास की अच्छी सविधा होनी चाहिये ।


प्रवर्धन 
यह मुख्यत : बीज द्वारा तैयार किया जाता है । पौध तैयार करने के लिये 10 - 15 सेमी . ऊंची और 1 . 5 मीटर चौड़ी क्यारियाँ बनानी चाहिये । लम्बाई आवश्यकतानुसार रखी जा सकती है । रोपाई के 2 माह पूर्व बोआई कर दना चाहिय । बीज को थायाराम ( 2 ग्राम दवा प्रति किग्रा बीज ) से शोधित कर देना चाहिये । 15 सेमी की दूरी या पंक्तियाँ बनाकर 1 . 5 सेमी की गहराई पर बीजों की बुआई करते हैं । 400 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है । 10 दिन बाद बीजों का अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है । जब पौधे 8 10 सेमी . के हो जायें तो उन्हें 0 . 5 किग्रा . क्षमता वाले छेद किये हये पोलीथीन के थैलों में खाद व मिट्टी का मिश्रण मिलाकर लगा है।

रोपाई का समय 
वर्षा ऋतु के आरम्भ में - जून - जुलाई । 
वर्षा ऋतु के अन्त में - सितम्बर - अक्टूबर । 
बसन्त ऋतु - फरवरी - मार्च । 
पपीता की जून - जुलाई में रोपाई करना सर्वोत्तम है । 

रोपाई का तरीका 
50x50x50 सेमी . आकार के गड्ढे 2x2 मीटर की दूरी पर जून में खोद लेना चाहिये । प्रत्येक गड्ढे में 20 किग्रा . गोबर की खाद 1 . 25 किग्रा एवं हड्डी का चूरा समान मात्रा में मिट्टी में मिलाना चाहिये । रोपने के लिये 20 - 25 सेमी . ऊँचे पौधे होना चाहिये । हर गड्ढे में 30 सेमी . की दूरी पर 2 पौधे लगाना चाहिये । 

खाद तथा उर्वरक 
प्रति वर्ष प्रति पेड़ 2 टोकरी गोबर की खाद तथा 250 ग्राम नत्रजन , 250 ग्राम फॉस्फोरस तथा 500 ग्राम पोटाश को 2 महीने के अन्तर पर 6 बार में देना उत्तम रहता है । 

उन्नत किस्में - 
कोयम्बटूर - 1 , कोयम्बटूर - 2 , वाशिंगटन , कुर्ग हनीड्यू , पूसा जाइण्ट , पूसा ड्वार्फ , पूसा डेलीसस । 

सिंचाई 
सर्दियों में 10 - 15 दिन बाद गर्मियों में 6 - 7 दिन बाद सिंचाई करना चाहिये ।

निराई - गुड़ाई 
उत्तम फसल लेने के लिये निराई - गुड़ाई करके क्यारियों को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिये । 

फलों की तुड़ाई
 फलों पर पीलापन आने के बाद उन्हें तोड़ना चाहिये । फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिये फलों को बोरों में या कागज में लपेट कर रखने से 3 - 4 दिन में कल पक जाते हैं ।

 पैदावार 
एक पौधे से 25 - 100 तक फल प्राप्त होते हैं । एक हेक्टेअर में 250 से 350 क्विंटल पैदावार प्राप्त होती है ।

फसल सुरक्षा 
रोग नियन्त्रण 

लीफ कल 
इसको पर्ण कुन्चन या मोजैक रोग भी कहते हैं । पत्तियाँ छोटी झरीदार व विकत हो जाती हैं । इसमें पौध की पत्तिया , चितकबरी व आकार में छोटी तथा उस पर हरे रंग के फफोले पड़ जाते हैं ।

 रोकथाम
 पौधों पर 0 . 15 साइपरमेथ्रिन के घोल का 10 - 15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करना चाहिये । रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिये । 

तना तथा जड़ विगलन 
स्तम्भ आधार पर सड़ने के कारण पौधा मुरझा जाता है । पपीते की पौध का आईविगलन ( डैम्पिंग ऑफ ) भी मुख्यत : इस रोग के कवक द्वारा ही होता है । 

रोकथाम 
रोगी पौधों को उखाड़कर जलाना या जमीन में दबाना चाहिये । क्यारियों की मिट्टी में केप्टान 0 . 2 घोल बीज के अंकुरण से पूर्व व अंकुरण के समय डालना चाहिये । बीज को 2 ग्राम थायराम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिये । 

कीट नियन्त्रण 

रेड स्पाइडर माइट
 इस कीट का आक्रमण पत्तियों व फलों पर होता है । यह कीट पत्तियों का रस चूसता है । पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं । 

रोकथाम
 प्रभावित पौधों पर साइपरमेथ्रिन 0 . 15 का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये ।