इकाई - 5 सामान्य फसलें
खरीफ - ज्वार , बाजरा , भिण्डी
रबी - चना , मटर , आलू ,
जायद - लौकी , बैगन ।
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ज्वार की उन्नत खेती
ज्वार खरीफ की मुख्य फसलों में से एक है । इस फसल की खेती अनाज तथा चारे दोनों के लिए हमारे देश में बड़े पैमाने पर होती है । ज्वार का हरा चारा चरी के नाम से प्रसिद्ध है । यह अत्यन्त पौष्टिक होता है । करबी का प्रयोग सूखे चारे के रूप में किया जाता है । भारत में ज्वार की खेती लगभग सभी प्रदेशों में की जाती है परन्तु कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्वार की खेती विस्तृत रूप से की जाती है । ज्वार के आटे से स्टार्च व एल्कोहल भी तैयार किया जाता है । । हमारे प्रदेश के झाँसी मण्डल में ज्वार की खेती सबसे अधिक होती है । कानपुर , मथुरा , हरदोई , फतेहपुर , रायबरेली आदि जिलों में भी इसकी खेती की जाती है ।
मिट्टी
बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए उत्तम होती है । जल निकास की अच्छी व्यवस्था होने पर ज्वार की खेती अन्य भूमि पर भी की जा सकती है ।
खेत की तैयारी
एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के पश्चात् दो जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके अन्तिम जताई के समय खेत में पाटा लगाकर भूमि तैयार की जाती है ।
खाद तथा उर्वरक
उर्वरक की मात्रा मिट्टी की जाँच के अनुसार निर्धारित की जाती है । सामान्यत : चारे के लिए गोबर की खाद 150 200 कन्तल प्रति हेक्टेयर तथा दाने के लिए 100 - 150 कुन्तल प्रति हेक्टेयर वर्षा होने के पहले खेत में मिला देनी चाहिए खाद के अभाव में उर्वरकों का प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से करते हैं -
नाइट्रोजन - 100 किग्रा प्रति हेक्टेयर
फॉस्फोरस - 60 किग्रा प्रति हेक्टेयर
पोटाश - 40 किग्रा प्रति हेक्टेयर
नाइटोजन की आधी मात्रा बवाई के समय व आधी मात्रा बुवाई के 40 - 50 दिन बाद खड़ी फसल में देना चाहि फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही दे देना चाहिए ।
प्रजातियाँ
ज्वार की अनेक देशी एवं उन्नतशील प्रजातियाँ प्रचलित हैं । झाँसी मण्डल में देवला प्रजाति तथा कानपुर के आस - पास एक दनियाँ और दो दनियाँ प्रजातियाँ अधिक प्रचलित हैं ।
उत्तर प्रदेश में ज्वार की निम्नलिखित किस्में प्रचलित हैं . .
बुवाई का समय -
उपर्युक्त किस्मों की बुवाई के लिए जुलाई का दूसरा सप्ताह सबसे उपयुक्त होता है । इससे पहले बुवाई करने से फसल के फूलने के समय , वर्षा के कारण अधिकांश पराग धुल जाता है और दाने अच्छे नहीं पड़ते । चारे की फसल की बुवाई पलेवा करके जून के आरम्भ में कर दी जाती है ।
बीज की मात्रा -
दाने के लिए 12 - 15 किग्रा प्रति हेक्टेयर तथा चारे के लिए 40 - 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज का आवश्यकता होती है । बोने से पहले बीज को अच्छी तरह उपचारित कर लेना चाहिए ।
बोने की विधि -
दाने के लिए बुवाई कतारों में की जाती है । कतार से कतार की दरी 45 सेमी तथा पौधे से पीध का पूरा 15 - 20 सेमी होनी चाहिए । बीज की गहराई 4 - 5 सेमी होनी चाहिए । चारे के लिए ज्वार छिटका विधि स जाता है । इसमें उर्द , मूंग , लोबिया आदि मिश्रित कर देने से चारा अधिक पौष्टिक हो जाता है ।
सिंचाई तथा जल निकास -
वैसे तो यह खरीफ की फसल है । वर्षा होती रहती है लेकिन आवश्यकता पड़ना सिंचाई भी करनी चाहिए । बालियाँ निकलते समय तथा दाना भरते समय खेत में नमी की कमी नहीं है । चाहिए । वर्षा अधिक होने पर जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए ।
निराई - गडाई -
वाने की फसल में बुवाई के तीन सप्ताह बाद एक निराई कर देनी चाहिए जिससे खरपतवार नष्ट हो जाय । रासायनिक विधि से खरपतवार नियन्त्रण के लिए एट्राजीन 1 . 5 किग्रा 600 - 800 लीटर पाना घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 2 - 3 दिन के अन्दर छिडक देना चाहिए ।
फसल सुरक्षा
कीट नियंत्रण -
ज्वार की फसल को कीडों से बडी हानि होती है । अंकरण के ठीक 4 - 5 दिन बाद एक लीटर मदालस्टापस 25 इसी को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करने से प्ररोह मक्खी तथा तनाबंधक कीट नष्ट हो जाते हैं अथवा 10 % फोरेट प्रेन्यूल 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय कूड़ों में मिला देना चाहिए अथवा मोनोक्रोटोफास 36 ईसी के , । लीटर कीटनाशक को 800 - 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।
रोग नियंत्रण -
अनावृत कण्डुवा ज्वार का प्रमुख रोग है । जिससे ज्वार के दाने काले चूर्ण में बदल जाते हैं । इसके नियन्त्रण के लिए कार्बेन्डाजिम अथवा कार्बाक्सीन के 2 . 5 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से शोधित कर बोना चाहिए ।
कटाई - मड़ाई -
दाने की फसल 110 - 115 दिन में पककर तैयार हो जाती है । दानों के पक जाने पर फसल काट लेनी चाहिये । उसके बाद बालियों को सूखी फसल से काट कर अलग कर लेते हैं । मड़ाई सामान्यत : बैलों से ही की जाती है । आधुनिक समय में ज्वार की मड़ाई श्रेसर से होने लगी है जिससे समय की बचत हो जाती है । चारे की फसल लगभग 2 माह बाद पशुओं को खिलाने के योग्य हो जाती है ।
उपज -
उपर्युक्त विधि से पैदा की गयी फसल से लगभग 30 - 40 क प्रति हेक्टेयर दाने की उपज होती है । सूखे चारे की उपज 100 - 110 कु प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाती है । ज्वार की बालियाँ जब अधपके दाने की होती हैं , तब उसे भून कर खाने में बड़ी स्वादिष्ट और लाभदायक होती हैं ।
बाजरा की उन्नत खेती
बाजरा- वैज्ञानिक नाम "पेनिसिटम टाईफाॅइडिस"
यद्यपि इसका मूल अफ्रीका में माना गया है। भारत में इसे बाद में प्रस्तुत किया गया था।
भारत में इसे इसा पूर्व 2000 वर्ष से उगाये जाने के प्रमाण मिलते है।
बाजरा- वैज्ञानिक नाम "पेनिसिटम टाईफाॅइडिस"
वैज्ञानिक नाम: Pennisetum glaucum
वर्ग: Liliopsid
कुल: Poaceae
वंश: Pennisetum
रैंक: जाति
उच्च वर्गीकरण: फाउंटेनग्रास
भारत में इसे इसा पूर्व 2000 वर्ष से उगाये जाने के प्रमाण मिलते है।
उत्तर प्रदेश में बाजरा प्राय : जाड़ों में भोजन के लिए उपयोग की जाने वाली खरीफ की मुख्य फसल है । कुछ स्थानों पर बालियों को भूनकर दानों को खाते हैं । बाजरे की फसल का पशुओं के लिए हरे व सूखे चारे के रूप में भी उपयोग किया जाता है ।
हमारे देश में लगभग 1 . 12करोड़ हेक्टेयर भूमि पर बाजरे की खेती की जाती है जिससे लगभग 44 से 50 लाख मीट्रिक टन बाजरा उत्पन्न होता है ।
हमारे प्रदेश में लगभग 8 . 34 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर बाजरे की फसल उगायी जाती है । उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में बाजरे की सर्वाधिक खेती होती है । इसके अतिरिक्त आगरा , एटा , बदाय , इटावा , मथुरा , इलाहाबाद , मेरठ , मुरादाबाद आदि जिलों में भी बाजरे की खेती की जाती है ।
बाजरे की उन्नतशील प्रजातियाँ प्रजाति
भूमि -
बाजरे की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उत्तम होती है । इसके लिए अच्छे जल निकास वाली भूमि का होना आवश्यक है ।
खेत की तैयारी -
पहली जुताई मिट्टी पलट हल से एवं 2 - 3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत तैयार कर लेना चाहिए ।
उर्वरक -
अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए देशी प्रजाति हेतु भूमि में 40 किग्रा नाइट्रोजन , 30 किग्रा फॉस्फोरस तथा 30 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय कूड़ में डाल देना चाहिए । संकर जातियों के लिए 80 - 100 किग्रा नाइट्रोजन , 40 किग्रा फॉस्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से दिया जाता है । नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई पहले बेसल ड्रेसिंग और शेष नाइट्रोजन की आधी मात्रा टाप ड्रेसिंग के रूप में , फसल जब 25 - 30 दिन की हो जाए तब देनी चाहिए ।
बीज का उपचार -
अरगट रोग से ग्रसित दानों को 20 प्रतिशत नमक के घोल में डुबोकर निकालना चाहिये । इसके बाद 2 ग्रा कार्बेन्डाजिम से एक किग्रा बीज को उपचारित करके बोना चाहिए ।
बीज दर एवं बुवाई -
बाजरा की बुवाई हेतु 4 से 5 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज प्रयोग किया जाता है । पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी रखनी चाहिए । बीज की बुवाई 3 - 4 सेमी गहरे कैंड में हल के पीछे करनी चाहिए । बाजरे की बुवाई समान्यत : जुलाई के मध्य से अगस्त के मध्य तक करनी चाहिये ।
सिंचाई -
हमारे प्रदेश में बाजरे की फसल प्राय : असिंचित दशा में होती है लेकिन सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर इसमें लगभग दो तीन बार सिंचाई कर देनी चाहिए ।
निराई - गुड़ाई एवं खरपतवार नियन्त्रण -
दाने के लिए बोई गयी फसल की कम से कम दो तीन बारानराइ का आवश्यकता होती है । कानपुरी कल्टीवेटर चलाकर गड़ाई की जा सकती है । खरपतवार नष्ट करने के लिए एट्राजीन की । किग्रा मात्रा 700 - 800 लीटर पानी में घोलकर बोने के तुरन्त बाद प्रति हेक्टेयर छिड़काव कर देना चाहिए ।
कीट नियन्त्रण -
फसल को दीमक से बचाने के लिए फोरेट - 10 जी की 25 किग्रा . मात्रा बीज बोते समय कुंड में प्रयोग करते हैं । पौधों और पत्तियों को काटने वाले कीड़ों से बचाने के लिए 1 . 25 ली इण्डोसल्फान 35 ई सी का 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए । तना मक्खी से रोक थाम के लिए 15 किलोग्राम थिमेंट प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई से पूर्व खेत में मिला देना चाहिए ।
कण्डुवा रोग -
कण्डुवा रोग नियन्त्रण के लिए कार्बेन्डाजिम अथवा कार्बाक्सीन 2 . 5 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से बीज का उपचार करना चाहिये । यदि अरगट रोग का बाजरे में प्रकोप है तब इसके नियन्त्रण हेतु जिनेव 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 700 - 800 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए ।
कटाई एवं मड़ाई -
बाजरे की फसल लगभग तीन महीने में पककर तैयार हो जाती है । आमतौर पर खड़ी फसल में पौधों को झुकाकर बालियों को दरांती से काटकर खलिहानों में सूखने के लिए डाल देते हैं तथा सूखने पर बैलों से मड़ाई कर एवं ओसाकर दाने को अलग कर लिया जाता है । कभी - कभी खड़ी फसल को काटकर भी बालियों को अलग कर लिया जाता है ।
उपज -
इस प्रकार से की गयी खेती में संकर जातियों से 25 - 30 कुन्तल प्रति हेक्टेयर उपज होती है ।
भिण्डी की खेती
भिण्डी एक सब्जी है। इसका वृक्ष लगभग १ मीटर लम्बा होता है। बनारस में इसे 'राम तरोई' कहते हैं और छत्तीसगढ में इसे 'रामकलीय' कहते हैं। बंगला में स्वनाम ख्यात फलशाक, मराठी में 'भेंडी', गुजराती में 'भींडा', फारसी में 'वामिया' कहते हैं
भिण्डी एक सब्जी है। इसका वृक्ष लगभग १ मीटर लम्बा होता है। बनारस में इसे 'राम तरोई' कहते हैं और छत्तीसगढ में इसे 'रामकलीय' कहते हैं। बंगला में स्वनाम ख्यात फलशाक, मराठी में 'भेंडी', गुजराती में 'भींडा', फारसी में 'वामिया' कहते हैं
उष्ण कटिबन्धीय पौधा है । इसकी खेती भारत में बहुत प्राचीन काल से होती आ रही है । इसकी पत्तियों का रस औषधियों में काम आता है तथा डण्ठल को कुचल कर गुड़ या शक्कर को साफ करने के लिये एक चिकना लसलसा घोल तैयार किया जाता है ।
मिट्टी
इसकी खेती हर प्रकार की भूमि में की जा सकती है लेकिन दोमट मिट्टी इसके लिये सर्वोत्तम होती है ।
खेत की तैयारी
एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करके दो या तीन बार हैरो या देशी हल से जुताई करके पाटा चला कर समतल भूमि तैयार की जाती है ।
खाद तथा उर्वरक
उर्वरक की मात्रा मिट्टी की जाँच के अनुसार निर्धारित की जाती है । जुताई के पूर्व लगभग 200 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला देना चाहिये ।
खाद के अभाव में उर्वरकों का प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से करते हैं ।
नाइट्रोजन - 80 किग्रा प्रति हेक्टेयर
फॉस्फोरस - 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर
पोटाश - 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर
नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के पहले एवं आधी मात्रा बुवाई के 35 - 40 दिन बाद प्रयोग करना चाहिए ।
प्रजातियाँ सामान्यत :
भिण्डी की अनेक किस्में पायी जाती हैं । लेकिन उन्नत किस्मों का विशेष महत्व है । यह रोग रोधी होती हैं । कुछ प्रमुख प्रजातियाँ निम्नलिखित हैं
1 . कल्यानपुर टा . 1 , 2 , 3 , 4 , 2 . पूसा सावनी , 3 . पूसा मखमली , 4 . पंजाब पद्मिनी , 5 . परभनी क्रान्ति , 6 . अर्का अनामिका
वर्षा कालीन बुवाई का समय
बोआई जून के दूसरे सप्ताह से जुलाई के मध्य तक की जाती है ।
बीज की मात्रा
वर्षा काल में 10 - 12 किग्रा0 बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है ।
ग्रीष्म कालीन बुवाई का समय
ग्रीष्म ऋतु में मध्य फरवरी से मार्च के दूसरे सप्ताह तक बोआई की जाती है ।
बीज की मात्रा -
ग्रीष्मकालीन फसल के लिये 18 - 20 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है ।
बोने की विधि :
बोने की बुवाई कतारों में की जाती है । ग्रीष्मकालीन ऋतु में कतार से कतार 30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी रखी जाती है । वर्षा ऋतु वाली फसल में कतार से कतार 60 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 45 सेमी रखनी चाहिये ।
बोआई एवं जल निकास
बोआई के बाद तुरन्त सिंचाई करनी चाहिये । ग्रीष्मकाल में सप्ताह में एक बार सिंचाई करना चाहिये । वर्षा ऋतु में यदि खेत में पानी भर जाये तो तुरन्त उसे निकाल देना चाहिये ।
निराई - गुड़ाई
पौधे की प्रारम्भिक अवस्था में दो - तीन बार निराई - गुड़ाई करनी चाहिये जिससे खपरपतवार नष्ट होकर फसल की वद्धि अच्छी हो सके । रासायनिक विधि से खरपतवार नियन्त्रण के लिये बोआई से पहले एक किग्रा - बेसालिन रसायन को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में छिड़काव करें ।
कीट नियन्त्रण हराला
यह 2 मिमी . लम्बा कीट है इससे पत्तियों पीली एवं पौधों की वद्धि रूक जाती है । डाइमेक्रान 25 ई . सी . की 1 . 5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिये ।
चित्तीदार सूंजी
यह भूरे या सफेद रंग की होती है । यह पौधे के सभी भागों में घुसकर उसे खाती है । 1 - 1 . 5 मिली . इण्डोसल्फान 35 ई . सी . को एक लीटर पानी के हिसाब से घोलकर छिड़काव करने से यह नष्ट हो जाती है ।
रोग नियन्त्रण पीला शिरा
मौजेक यह रोग वाइरस से फैलता है । इनमें पत्ती सिकुड़कर पीली हो जाती है । एक लीटर पानी में 1 . 5 मि . ली . साइपरमेथ्रिन मिलाकर छिड़काव करने से इस रोग की रोकथाम होती है । पत्तियों का धब्बा रोग यह फफूंदी से फैलता है । इसमें पत्तियाँ सिकुड़कर गिरने लगती हैं ।
इसके रोकथाम के लिये सुटोक्स के 0 . 2 घोल का छिड़काव करना चाहिये ।
उपज
ग्रीष्मकालीन फसल से औसतन 50 - 60 क्विंटल तथा वर्षाकालीन फसल से 80 - 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है ।
भण्डारण
भिण्डी को तोड़कर छायादार स्थान में फैलाकर रखना चाहिये ।
चना की खेती
हमारे देश में दलहनी फसलों में चने की फसल का पहला स्थान है । चने की फसल उगाने से भूमि की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है , क्योंकि इसके पौधों की जड़ों में वायुमण्डल की नाइट्रोजन को एकत्र करने वाले जीवाणु पाये जाते हैं । चने में औसतन 21 प्रोटीन पायी जाती है । चने से दाल , नमकीन तथा अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाये जाते हैं । सब्जी के रूप में छोला अति लोकप्रिय है । इसकी पत्तियों को साग के रूप में प्रयोग किया जाता है ।
क्षेत्रफल तथा उत्पादन
चने की खेती मध्य प्रदेश में सबसे अधिक की जाती है । उत्तर प्रदेश में बाँवा , हमीरपुर , झाँसी , चित्रकूट , जालौन , प्रयागराज , कानपुर आदि चना उत्पावन के अग्रणी जिले हैं ।
जलवायु
जलवायु चने की खेती के लिए शष्क एवं ठण्डी जलवाय आवश्यक होती है लेकिन फलियों एवं दानों के विकास के लिए तापमान सामान्य होना चाहिए । पाला से फसल का नुकसान होता है । कम वर्षा वाले क्षेत्र चने की खेती के लिए उपयुक्त होते हैं ।
मिट्टी
चना की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है किन्तु उचित जल - निकास वाली दोमट या भारी दोमट तथा परवा व मार भूमियाँ इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती हैं ।
खेत की तैयारी
चने की खेती के लिए ज्यादा खेत की तैयारी की आवश्यकता नहीं पड़ती है । बल्कि ढेलेदार मिट्टी जिससे जड़ क्षेत्र में वायुसंचार अच्छा रहता है , इसकी बढ़वार के लिए उपयुक्त होती है । खेत की एक जुताई मिट्टी पलट हल से तथा एक से दो जुताईयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करने के बाद खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल कर देना चाहिए ।
खाद तथा उर्वरक
जीवाणुओं द्वारा भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण बढ़ाने के लिए बीज को बोने से पहले विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर लेना चाहिए । इसकी खेती के लिए सामान्यत : 15 - 20 किग्रा . नाइट्रोजन , 45 - 50 किग्रा . फास्फोरस तथा 20 किया . गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से कँड़ में बोते समय देना चाहिए ।
उन्नशील प्रजातियाँ
समय से बुवाई के लिए अवरोधी , राधे तथा आधार एवं देर से बुवाई के लिए उदय , पूसा - 372 तथा पन्त - जी - 186 प्रजातियाँ उपयुक्त होती हैं जबकि काबुली चने की उन्नतशील प्रजातियों में पूसा - 1003 शुभ्रा , उज्जवल एवं चमत्कार प्रमुख हैं ।
बुवाई का समय
चने की बुवाई हेतु अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा सबसे उपयुक्त होता है । सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है ।
बीज की मात्रा
चने की छोटी एवं सामान्य दाने वाली प्रजातियों के लिए 75 - 100 किग्रा . प्रति हेक्टेयर तथा बड़े दाने एवं काबुली चने की प्रजातियों के लिए 90 - 100 किग्रा . प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है ।
बीज उपचार
चने की फसल में बीज शोधन हेतु दो ग्राम थीरम के साथ | ग्राम कार्बोन्डाजिम का मिश्रण प्रति किग्रा . बीज की दर से प्रयोग करते हैं । इसके पश्चात् बीज को चने के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए । इसके लिए एक पैकेट ( 200 ग्राम ) कल्चर 10 किग्रा . बीज के लिए पर्याप्त होता है । राइजोबियम कल्चर का साफ पानी में घोल बनाकर 10 किग्रा बीज की दर से बीज के ऊपर छिड़क कर हल्के हाथ से इस प्रकार मिलाना चाहिए , जिससे बीज के ऊपर एक समान हल्की काली परत बन जाये । उपचारित बीज को पक्के फर्श या पॉलीथीन शीट पर पतली परत के रूप में 2 - 3 घण्टे तक फलान के बाद बोना चाहिए । उपचारित बीज को तेज धूप में नहीं सुखाना चाहिए ।
बोने की विधि
चने की बुवाई पंक्तियों में करना चाहिए । असिंचित क्षेत्रों में पंक्तियों की दूरी 30 सेमी तथा सिंचित क्षेत्रों में 45 सेमी रखनी चाहिए । बुवाई देशी हल या सीड ड्रिल से करते हैं ।
सिंचाई तथा जल निकास -
चने में पहली सिंचाई बुवाई के 45 से 60 दिन बाद ( फूल आने से पहले ) तथा दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय करना चाहिए । यदि जाड़े में शीतकालीन वर्षा हो जाय तो दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है । चने में फूल आने के समय सिंचाई नहीं करना चाहिए । खेत से अतिरिक्त पानी निकालने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए ।
खरपतवार नियंत्रण
बीज बोने के 20 - 25 दिन पर खेत में खड़े खरपतवारों को खुरपी से एक निराई कर निकाल देना चाहिए । खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए खेत में फसल बोने के 24 से 48 घण्टे पूर्व फ्लूक्लोरेलिन ( बासालिन ) रसायन की 2 . 2 लीटर मात्रा को 800 - 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रेयर से एक समान छिड़काव कर देना चाहिए । इसके पश्चात् खेत में एक समान बखर से या कल्टीवेटर से दवा को खेत में अच्छी प्रकार से मिला देना चाहिए ।
खुटाई या शीर्ष कर्तन
फसल की 15 से 20 सेमी ऊंचाई होने पर उसके शीर्ष भाग को दो - तीन पत्तियों सहित तोड़ देते हैं । जिससे पौधे में शाखाएँ अधिक निकलती हैं और फूल एवं फलियाँ अधिक बनती हैं ।
कीट फसल
सुरक्षा नियंत्रण
सुरक्षा नियंत्रण
चने की फसल को अनेक कीट हानि पहुंचाते हैं । इनमें कटुआ , सेमी लूपर तथा फलीबेधक प्रमुख हैं । कटुआ कीट की सूंडियाँ रात में पौधों को जमीन की सतह से काट देती हैं और सेमी लूपर की हरे रंग की इंडियाँ पत्तियों , कलियों , फूलों एवं फलियों को नुकसान पहुंचाती हैं । चने की फलीबेधक कीट की सूड़ियाँ फलियों में छेद कर दानों को खा जाती हैं । उपरोक्त कीटों के नियंत्रण के लिए गर्मी की जुताई एवं समय से बुवाई करना चाहिए तथा 50 - 60 बड़े पर्चर प्रति हेक्टेयर खेत में लगाना चाहिए । कीटों का अधिक प्रकोप होने पर क्विनालफॉस 25 ईसी रसायन की 2 लीटर मात्रा को 800 - 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर देना चाहिए ।
रोग नियन्त्रण
चने की फसल में मुख्य रूप से जड़ सड़न एवं उकठा नामक रोग लगते हैं । जड़ सड़न प्राय : पौध की प्रारम्भिक अवस्था में लगता है और पौधे सूख जाते हैं । जबकि उकठारोग फसल की किसी भी अवस्था में लग सकता है । उकठा रोग से पूरा पौधा पीला पड़कर सूख जाता है । जड़ - सड़न रोग के नियन्त्रण के लिए फसल को अक्टूबर के स्थान पर नवम्बर में बुवाई करना चाहिए । जबकि उकठा रोग के नियन्त्रण के लिए बीज को देर से बुवाई करना चाहिए । खेत की गर्मी की जुताई करने से और उस खेत में 3 - 4 वर्ष तक चने की फसल न बोने से रोगकारी जीव मर जाते हैं और उकठा का प्रभाव काफी कम हो जाता है ।
मटर की खेती
मटर एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है । इसका प्रयोग सब्जी एवं दाल के रूप में किया जाता है । सब्जी वाली मटर के ताजे हरे दानों से अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं और इन ताजे हरे दानों का प्रयोग डिब्बा बन्दी करके उस समय भी किया जाता है , जब बाजार में ताजी मटर उपलब्ध नहीं हो पाती है । मटर के दानों को सुखाकर चाट के रूप में प्रयोग किया जाता है । मटर के सूखे दानों में औसतन 22 प्रोटीन पाई जाती है । दाल वाली फसल होने के कारण इसकी जड़ें मृदा में नाइट्रोजन एकत्रित करती है ।
क्षेत्रफल एवं उत्पादन क्षेत्र
उत्तर प्रदेश में मटर की खेती बड़े क्षेत्रफल पर होती है । आगरा मण्डल में इसकी खेती सर्वाधिक क्षेत्र पर की जाती है ।
जलवायु
मटर के लिए शुष्क एवं ठण्डी जलवायु अधिक उपयुक्त होती है किन्तु पाले से इस फसल को अधिक नुकसान होता है ।
मिट्टी
मटर की अच्छी फसल लेने हेतु उचित जल - निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है ।
खेत की तैयारी
अच्छी फसल लेने के लिए एक जुताई मिट्टी पलट हल से तथा दो से तीन जुताइयाँ कल्टीलेटर या हैरो से करके खेत में पाटा लगाकर समतल एवं ढेले रहित कर लेना चाहिए ।
खाद एवं उर्वरक
संतुलित पोषक तत्वों को प्रदान करने के लिए खेत का मृदा परीक्षण करना आवश्यक है । मृदा परीक्षण न करा पाने की दशा में खेत में बुवाई से पहले 60 - 80 कुन्तल सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना चाहिए ।
बुवाई के समय ही खेत में 20 किग्रा . नाइट्रोजन , 60 किग्रा . फास्फोरस तथा 40 किग्रा . पोटाश एवं 20 किग्रा गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से बीज के नीचे फॅड में डालना चाहिए । अधिक उपज वाली बौनी प्रजातियों में बोने के समय 20 किग्रा . नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त देना चाहिए ।
उन्नतशील प्रजातियाँ
मटर की उन्नत प्रजातियों में रचना , इन्द्र , अपर्णा , शिखा , जय , अमन , सपना , प्रकाश , पूसा , प्रभात , पन्तमटर - 5 मालवीय मटर - 2 एवं मालवीय मटर - 15 तथा विकास आदि प्रमुख हैं ।
बुवाई का समय
मटर की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर का चूसरा पखवाड़ा होता है किन्तु इसे 15 नवम्बर तक बोया जा सकता है ।
बीज की मात्रा
लम्बे पौधों वाली प्रजातियों की 80 - 100 किग्रा तथा बौनी प्रजातियों की 125 किग्रा . बीज प्रति हेक्टेयर की दर स आवश्यक होती है ।
बीज उपचार
बीज जनित रोगों से बचाव के लिए 2 ग्राम थीरम एवं । ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा . बीज अथवा 4 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति किग्रा . बीज की दर से शोधित करते हैं । तत्पश्चात बीज को मटर के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से । पैकेट ( 200 ग्राम ) प्रति 10 किग्रा बीज की दर से उपचारित कर छाया में सुखाने के बाद बोया जाता है ।
बोने की विधि
उपचारित बीज को हल के पीछे फॅड में या पन्तनगर जीरों टिल ड्रिल द्वारा बुवाई की जाती है । लम्बी प्रजातियों की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी तथा बौनी प्रजातियों की 20 सेमी एवं गहराई 4 - 5 सेमी रखते हैं ।
सिंचाई एवं जल
निकास फसल में फूल आने के समय खेत में उचित नमी होना अनिवार्य है । इस समय यदि खेत में नमी की कमी हो तो सिंचाई करना आवश्यक होता है ।
दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय करनी चाहिए । मटर खेत में अधिक नमी को सह नहीं पाती इसीलिए खेत में आवश्यकता से अधिक पानी को जल - निकास नाली द्वारा बाहर निकाल देना चाहिए ।
निराई - गुड़ाई
फसल के प्रारम्भ में बुवाई के 40 - 45 दिनों तक खेत में खर - पतवार नहीं होना चाहिए अन्यथा फसल की पैदावार घट जाती है । इसके लिए बीज बोने के 30 - 35 दिन पर खुरपी द्वारा एक निराई कर खरपतवारों तथा अवांछित पौधों को खेत से निकाल देना चाहिए ।
फसल सुरक्षा
कीट नियन्त्रण
तने की मक्खी , पत्ती सुंरगक तथा फली बेधक मटर के मुख्य कीट हैं । फली बेधक कीट की हरी झंडियाँ मटर की फलियों में छेद करके अन्दर ही अन्दर फली के दानों को खा जाती हैं । उपरोक्त कीटों के प्रभावी नियन्त्रण के लिए फसल की समय से बुवाई करना चाहिए । फलीबेधक कीट को नियन्त्रित करने के लिए मोनोक्रोटोफास 36 एस . एल . की । लीटर मात्रा या क्विनालफास 25 ई . सी . की 2 लीटर मात्रा को 500 - 600 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करना चाहिए ।
रोग नियन्त्रण
मटर की फसल में मुख्य रूप से बुकनी या चूणिल आसिता रोग तथा मृदोमिल आसिता रोग लगते हैं । बकनी या चर्णिल आसिता रोग लगने पर पत्तियों पर सफेद रंग के फफूंद का चूर्ण या पाउडर जमा हो जाता है । जो बाद में भरे रंग काहो जाता है । मृदरोमिल आसिता में पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले धब्बे तथा निचली सतह पर रूई जैसे सफेद रंग की फफैट दिखाई देती है जिससे बाद में पत्तियाँ सूख जाती हैं ।
उपरोक्त रोगों के नियन्त्रण के लिए रोग रोधी प्रजातियों की समय से बुवाई करना चाहिए तथा उस खेत में 2 - 3 वर्षों तक मटर की बुवाई नहीं करनी चाहिए । बुकनी या चूर्णिल आसिता रोग लगने पर गंधक 80 का घुलनशील चूर्ण की 2 किग्रा . तथा मृदुरोमिल आसिता रोग लगने पर मैकोजेब - 75 डब्ल्यू . पी . की 2 किग्रा मात्रा को 500 - 600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए ।
कटाई , मड़ाई तथा भण्डारण
हरी मटर की फली की तुड़ाई 10 - 12 दिनों के अन्तर पर 3 - 4 बार करते हैं । जबकि दाल वाली फसल मार्च के अन्त में पककर तैयार हो जाती है , जिसकी कटाई एक बार में कर ली जाती है । मड़ाई बैलों या थ्रेसर द्वारा की जा सकती है । हरी मटर के दानों का भण्डारण डिब्बाबन्दी के रूप में शीतगृह में तथा सूखे दानों को भण्डारगृह में रखा जाता है ।
उपज
उन्नत विधि से खेती करने पर हरी फलियों की उपज औसतन 60 - 70 कु . प्रति हेक्टेयर तथा दानों की उपज 25 - 30 कु . प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है ।
आलू की उन्नत
खेती परिचय तथा क्षेत्र रबी की फसलों में आलू एक महत्त्वपूर्ण फसल है । सब्जी के रूप में आलू का प्रयोग सर्वाधिक प्रचलित है । इसमें मण्ड ( स्टाच ) के अतिरिक्त प्रोटीन तथा विटामिन पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं ।
मिट्टी
आलू की खेती लगभग सभी प्रकार की मुलायम मिट्टी में की जाती है परन्तु अच्छे जल निकास वाली बलुई - दोमट मिट्टी जिसका pH मान 6 से 7 के बीच हो सर्वोत्तम रहती है । अधिक नमी से सड़ाव का रोग लग जाता है ।
खेत की तैयारी
खरीफ में चरी या मक्का की फसल लेने के बाद आलू बोया जाता है । अधिक उपज के लिए खेत को अधिक से अधिक भुरभुरा बनाया जाता है । इसके लिए मिट्टी पलट हल से 1 - 2 जुताई करने के बाद 3 - 4 बार देशी हल से जुताई करनी चाहिए । यदि खेत में नमी की कमी हो तो जुताई के पहले पलेवा कर लेना चाहिए । पलेवा के समय ही 20 ई . सी . का गामा वी . एच . सी ( लिण्डेन ) 3 - 4 लीटर पानी में मिलाकर मिट्टी में मिला देना चाहिए ।
खाद तथा उर्वरक
कम समय में अधिक उपज के कारण आलू की फसल को खाद तथा उर्वरकों की अधिक आवश्यकता होती है । सामान्यत : प्रति हेक्टेयर 100 - 150 किग्रा नाइट्रोजन , 80 - 100 किग्रा फॉस्फोरस तथा 80 - 150 किग्रा पोटाश की आवश्यकता होती है इसके लिए 250 - 300 कन्तल गोबर की खाद सितम्बर के प्रारम्भ में खेत में फैलाकर जुताई कर दी चाहिए ।
उन्नत प्रजातियाँ
क ) मैदानी भागों के लिए अगेती फसलें कुफरी चन्द्रमुखी , कुफरी अलंकार , कुफरी अशोका तथा कुफरी ज्योति । यह किस्में 80 से 90 दिन में तैयार हो जाती हैं ।
दीर्घकालीन प्रजातियाँ
कुफरी बहार , कुफरी बादशाह , कुफरी आनन्द , कुफरी चिपसोना , कुफरी सिन्दूरी ( सी . 140 ) कुफरी चमत्कार , कुफरी देवा 3804 ।
ये प्रजातियाँ लगभग 120 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं ।
ख ) पहाड़ी क्षेत्रों के लिए कुफरी ज्योति , कुफरी जीवन , कुफरी शीतमान तथा कुफरी कुन्दन उत्तम किस्में मानी जाती हैं ।
बुवाई का समय
पहाड़ों पर सामान्यत : आलू की फसल गर्मी प्रारम्भ होने पर बोयी जाती है । मार्च से प्रारम्भ होकर मई तक चलती है । मैदानी क्षेत्रों में आलू की फसल 25 सितम्बर से 15 नवम्बर तक बोयी जाती है ।
बीज की मात्रा तथा उपचार
बीज की मात्रा पंक्तियों की दूरी तथा बीज के आकार पर निर्भर करती है । 2 . 5 सेमी व्यास या 50 ग्राम वजन के बीज की मात्रा 20 - 25 कुन्तल प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है । समूचे तथा कटे हुए दोनों प्रकार के बीजों का प्रयोग किया जाता है । काटते समय ही इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक टुकड़े में कम से कम 2 या 3 आँखें हों और उसका वजन 50 ग्राम हो । काटने के बाद 0 . 3 % बोरिक एसिड के घोल ( 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में ) बनाकर 30 मिनट तक डुबाने के बाद सुखा लेना चाहिए । बीज को डाईथेन एम - 45 से भी उपचारित कर सकते हैं । उपचारित करने के 10 - 20 घण्टे बाद बीज बोना चाहिए ।
बुवाई की विधि
आलू की बुवाई प्राय : दो विधियों से की जाती है ।
1 . चौरस क्यारियों में चौरस क्यारियों में बीज 3 - 4 सेमी गहरा बोया जाता है । जब आलू जमकर बढ़ने लगता है तो 10 सेमी ऊँची मेंड़ बना दी जाती है ।
2 . मैंडों पर इस विधि में खेत में मेंड़ बनाकर उस पर लगभग 5 - 7 सेमी नीचे आलू बो दिया जाता है । कतार से कतार की दूरी 45 - 50 सेमी तथा बीज से बीज की दूरी 15 - 20 सेमी रखी जाती है ।
सिंचाई
पहली सिंचाई आलू बोने के लगभग 20 - 25 दिन बाद करनी चाहिए । भारी मिट्टी में 3 - 4 सिंचाई तथा हल्की मिट्टी में 5 - 6 सिंचाई पर्याप्त मानी जाती है । आलू की फसल में हल्की सिंचाई करनी चाहिए ।
निराई - गुड़ाई
आलू की फसल की निराई के पश्चात् पौधों पर मिट्टी - चढ़ा देनी चाहिए बुवाई के लगभग 30 - 35 दिन बाद मिट्टी चढ़ाई जाय ।
फसल सुरक्षा
क ) रोगों की रोकथाम
आलू की फसल में अगेती झुलसा , पछेती झुलसा , ब्लैक स्कार्फ , वार्ट , कोढ़ , तथा पत्ती मोड़क बीमारियाँ लगती हैं । इससे बचने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए ।
1 . अगेती तथा पछेती झुलसा दो किग्रा 0 . 2 % डाईथेनजेड - 78 या डाईथेन एम 45 का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर रोगों के लक्षण दिखाई पड़ते ही छिड़काव कर देना चाहिए । आवश्यकतानुसार इसे 15 दिन के अन्तर पर दोहरा देना चाहिए ।
2 . ब्लैक स्कार्फ आलू के बीज को एगलाल - 3 के 0 . 5 प्रतिशत घोल में 10 मिनट तक डुबोकर बोना चाहिए ।
3 . वाइरस ( विषाणु ) इसके बचाव के लिए केवल प्रमाणित बीज का प्रयोग करना चाहिए । रोग ग्रस्त पौधों को कन्द सहित उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए । मेटासिस्टाक्स 25 ई . सी . की । लीटर मात्रा को 750 - 1000 लीटर पानी में घोलकर 2 - 3 छिड़काव करना चाहिए ।
ख ) कीड़ों की रोकथाम फुदका , माहू , सूड़ी व छेदक के लिये एक लीटर मेटासिस्टाक्स 25 ई . सी . को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर 3 - 3 सप्ताह के अन्तर से छिड़काव करते रहना चाहिए । दीमक , कटआ , व सफेद संडी के नियन्त्रण हेतु सिंचाई के समय 20 ई . सी . क्लोरोपायरीफॉस की 2 - 3 लीटर प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए ।
खुदाई
कुफरी चन्द्रमुखी , कुफरी अलंकार , कुफरी ज्योति की खुदाई बोने के 90 दिन के बाद प्रारम्भ की जाती है । कुफरी चमत्कार , कुफरी सिन्दूरी तथा कुफरी देवा को 115 - 120 दिन में खोदते हैं ।
उपज
मैदानी क्षेत्रों में आलू 325 - 400 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 200 - 250 कुन्तल प्रति हेक्टेयर पैदा होता है ।
लौकी की खेती
लौकी भारत की एक प्रमुख सब्जी है । सब्जी के अतिरिक्त इसका उपयोग मिठाई , हलवा , रायता व औषधि बनाने में किया जाता है ।
जलवायु
लौकी के लिए गर्म तथा आई जलवाय की आवश्यकता होती है किन्तु पाले से इसे बहुत नुकसान होता है । अधिक वर्षा एवं बादल वाले दिनों में कीड़ों एवं बीमारियों का प्रकोप अधिक होता है ।
मिट्टी
इसे विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है लेकिन उचित जल धारण क्षमता वाली जीवाशयुक्त हल्की दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है ।
खेत की तैयारी
खेत की पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करने के बाद 3 - 4 जुताइयाँ कल्टीवेटर से करके खेत को समतल कर लेना चाहिए ।
खाद तथा उर्वरक
20 से 25 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय ही मिला देना चाहिए । खेत की मिट्टी की जाँच न करा पाने की दशा में 60 किग्रा नाइट्रोजन , 30 किग्रा फास्फोरस , तथा 30 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में देना चाहिए । नाइट्रोजन की आधी तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय तथा नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा पौधे की जड़ के चारों ओर दो बार में देना चाहिए ।
उन्नतशील प्रजातियाँ
अ . लम्बे फल वाली प्रजातियाँ
पूसा समर प्रालिफिक लाँग , पूसा नवीन , कल्यानपुर हरी लंबी , आजाद हरित , आजाद नूतन आदि ।
ब , गोल वाली प्रजालियाँ
पूसा प्रोलिफिक राउण्ड , पूसा सन्देश , पूसा मंजरी आदि ।
स . संकर प्रजालियाँ
पूसा मेघदूत , आजाद संकर - 1 , पूसा मंजरी , पूसा संकर - 3 आदि ।
बुवाई का समय
ग्रीष्मकालीन फसल के लिए जनवरी - मार्च तथा वर्षाकालीन फलस के लिए जून - जुलाई का महीना सर्वोत्तम होता है ।
बीज की मात्रा
एक हेक्टेयर की बुवाई के लिए 4 - 5 किग्रा . बीज पर्याप्त होता है । एक स्थान पर 3 - 5 सेमी गहराई पर दो बीज बोना चाहिए ।
बोने की दूरी
पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1 . 5 से 2 . 5 मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 1 . 0 मीटर रखते हैं ।
सिंचाई
ग्रीष्मकालीन फसल में 4 - 5 दिन के अन्तर पर तथा वर्षाकालीन फसल में वर्षा न होने पर ही आवश्यकता पड़ती है जबकि जाड़े में 10 - 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी पड़ती है ।
निराई - गुड़ाई
लौकी की फसल के साथ अनेक प्रकार के खरपतवार उग आते हैं । अत : इनके नियंत्रण के लिए ग्रीष्मकालीन फसल में 2 3 बार तथा वर्षाकालीन फसल में 3 - 4 बार निराई करनी चाहिए ।
फसल सुरक्षा
कीट नियंत्रण
लौकी में मुख्य रूप से रेड पम्पकिन बीटिल एवं फल की मक्खी का प्रकोप होता है । रेड पम्पकिन बीटिल मुख्य रूप से पत्तियों को खाता है तथा पत्तियों में छेद बना देता है । कभी - कभी यह फलों को भी खाता है जिससे पौधे सूख जाते हैं । फल मक्खी लौकी के फलों में प्रवेश कर अन्दर अण्डे देती है तथा अण्डों से निकली सूड़ियाँ फल को खाती हैं तथा फल सड़ने लगता है । उपरोक्त कीटों के नियन्त्रण के लिए रोगार अथवा डाइमेथोएट की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 10 दिनों के अन्तराल से छिड़काव करना चाहिए ।
रोग नियन्त्रण
बुकनी या चूर्णिल फफूंदी तथा मृदुरोमिल आसिता लौकी के प्रमुख रोग हैं । चूर्णिल फफूंदी रोग में पत्तियों एवं तनों पर सफेद खुरदरा एवं गोलाकार जाल सा दिखाई देता है जिससे पौधे की वृद्धि रूक जाती है । मृदुरोमिल आसिता रोग में पत्तियों की निचली सतह पर धब्बे बन जाते हैं जो ऊपर से पीले या भूरे रंग के दिखाई देते हैं । चूर्णिल फफूंदी रोग के नियन्त्रण के लिए सल्फेक्स की 3 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए । मृदुरोमिल आसिता के नियन्त्रण के लिए 2 ग्राम / मैन्कोजेब प्रति लीटर पानी की दर से 10 - 15 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिए । इसके अलावा रोगी पौधे को शरू में ही उखाड़कर जला देना चाहिए तथा उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए । फलों के पूर्ण विकसित होने पर किन्तु कोमल अवस्था में ही
तोड़ाई
किसी तेज चाकू द्वारा पौधे से अलग कर देना चाहिए ।
उपज
उन्नतशील प्रजातियों की उपज औसतन 150 - 200 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तथा संकर प्रजातियों की उपज 400 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है ।
बैंगन की खेती
बैंगन की खेती हमारे देश में आदि काल से होती आ रही है । इसको विभिन्न प्रकार की जलवायु में सफलतापूर्वक उत्पन्न किया जा सकता है । एक वर्ष में बैंगन की 3 फसलें ली जा सकती हैं । कम खर्च तथा अधिक आमदनी के लिये किसानों को बैंगन की खेती करनी चाहिये ।
मिट्टी
बलुई दोमट भूमि इसकी खेती के लिये सर्वोत्तम है । दोमट भूमि में भी बैंगन अच्छी उपज देता है ।
खेत की तैयारी
मिट्टी पलट हल द्वारा गहरी जुताई करने के बाद खेत को 5 - 6 जुताइयाँ देशी हल से करके , तैयार कर लेना चाहिये ।
खाद एवं उर्वरक
लगभग 200 - 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद खेत की प्रारम्भिक तैयारी के समय खेत में मिलाना चाहिये । इसके अतिरिक्त 100 कि . ग्रा . नत्रजन - 50 कि . ग्रा फॉस्फोरस एवं 50 कि . ग्रा . पोटाश प्रति हेक्टेयर डालना चाहिये । नत्रजन की आधी मात्रा , फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा आखिरी जोताई के समय खेत में मिला देना चाहिये । नत्रजन की शेष मात्रा को 2 बार में , रोपाई के एक माह तथा 2 माह बाद दे देना चाहिये ।
उन्नत किस्में
बैंगन की उन्नत किस्मों को फलों के आकार के अनुसार 2 भागों में बाँटते हैं -
1 . लम्बा बैगन
2 . गोल बैगन
लम्बे फलों वाली प्रमुख प्रचलित किस्में - पूसा पर्पिल लाँग , पूसा अनमोल , पूसा क्रान्ति , पूसा सम्राट , पूसा पर्पिल क्लस्टर , इत्यादि गोल फलों वाली प्रमुख प्रचलित किस्में पूसा पर्पिल राउण्ड , पन्त ऋतुराज , टाइप - 3 , पंजाब , बहार आदि ।
बैंगन की संकर किस्में पन्त संकर बैंगन - 1 , पूसा हाइब्रिड - 1 , पूसा हाइब्रिड - 6 , नरेन्द्र देव हाइब्रिड - 1 , नरेन्द्र देव हाइब्रिड - 6 बीज और बोआई जाड़े की
बीज और बुबाई-
फसल के लिये जून - जुलाई में बीज बोये जाते हैं और रोपाई जुलाई - अगस्त में की जाती है ।
गर्मी वाली फसल के लिए अक्टबर , नवम्बर में नर्सरी में बीज बोये जाते हैं और पौध की रोपाई नवम्बर , से दिसम्बर के अन्त में की जाती है ।
बरसात की फसल के लिए मार्च में नर्सरी में बीज बोये जाते हैं और अप्रैल मई में पौध की रोपाई की जाती है ।
बीज की मात्रा
बीज को नर्सरी में बोकर पौध तैयार करते हैं । एक हेक्टेयर खेत के लिये लगभग 400 से 500 ग्राम बीज की पौध पर्याप्त रहती है ।
पौध तैयार करना
एक हेक्टेयर की रोपाई करने के लिये लगभग 90 - 100 वर्ग मीटर क्षेत्र में बीज बोना चाहिये ।
पौधशाला को 4 - 5 बार गुड़ाई करके मिट्टी को अच्छी प्रकार भुरभुरी बना लेते हैं तत्पश्चात् 15 - 20 से . मी . ऊँची व 1 . 25 मीटर चौड़ी तथा आवश्यकतानुसार लम्बी नर्सरी बना लेते हैं । दो नर्सरी के बीच में 30 सेमी . चौड़ी नाली बनाते हैं इनका प्रयोग जल निकास के लिये किया जाता है । इसके लिये 2 . 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज शोधन करते हैं । इसे थीरम या सेरेसान से शोधित करते हैं । ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में पौध 4 सप्ताह में तथा शरद ऋतु में 6 - 8 सप्ताह में रोपने योग्य हो जाती पौध रोपाई पौधशाला से पौध निकालने के लिये 2 - 3 दिन पहले हल्की सिंचाई कर देनी चाहिये ।
पौध रोपण
तैयार खेत में लाइनों में शाम के समय या बादल वाले दिन करना चाहिये । लम्बे बैंगन की किस्मों में लाइन से लाइन की दूरी 60 सेमी तथा पौध से पौध की दूरी 60 सेमी रखते हैं । गोल बैगन की किस्मों में लाइन से लाइन की दूरी 75 सेमी . तथा पौध से पौध की दूरी 60 सेमी . रखते हैं । तत्पश्चात् हल्की सिंचाई करनी चाहिये । पूसा अनमोल ( संकर ) , पंजाब बहार जैसी अधिक उपज देने वाली किस्म 90 60 सेमी की दूरी पर प्रत्यारोपित करना चाहिये ।
सिंचाई एवं जल निकास
सिंचाई भूमि की किस्म एवं वातावरण पर निर्भर करती है । आमतौर पर गर्मियों में 7 - 8 दिन के अन्तर पर और सर्दियों में 12 - 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करते हैं । आवश्यकता से अधिक जल को अविलम्ब बाहर निकालना चाहिये अन्यथा पौधों के मर जाने का भय रहता है ।
निराई - गुड़ाई
रोपने के 50 - 60 दिन तक खेत को खरपतवार रहित रखना चाहिये । इसके लिये 2 - 3 निराइयों की आवश्यकता होती है । वर्षाकालीन फसल में 3 - 4 निराइयों की आवश्यकता होती है ।
फसल सुरक्षा कीट नियन्त्रणा
शाखा तथा फल बेधक
इस कीट की सूंडी बढ़ी हुई शाखाओं में छेद करके अन्दर के भाग को खाती हैं । शाखायें मर जाती हैं , पौध मुरझा जाती हैं । फल आने पर फलों में छेद करके खाते हैं जिससे फल सब्जी योग्य नहीं रह जाते हैं । समसीडीन नामक दवा की 150 मिली . मात्रा को 100 लीटर पानी में घोलकर 12 - 15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करते हैं । फलों को छिड़काव के 7 - 8 दिन बाद तुड़ाई करना चाहिए ।
जैसिड ( हरा तेला )
ये हरे रंग के छोटे - छोटे कीट होते हैं जो पत्तियों के निचले भाग में पाये जाते हैं । पत्तियों का रस चूसने के कारण पत्तियाँ मुड़ जाती हैं ।
लाल माइट
यह एक छोटा सा कीट होता है जो पत्तियों का रस चूसकर उन्हें कमजोर बना देता है । पत्तियों पीली पड़कर गिरने लगती हैं । हरा तेला तथा लाल माइट की रोकथाम के लिये साइपरमेथिन दवा का 0 . 15 का घोल छिड़का जाता है ।
रोग नियन्त्रण
आई पतन
यह रोग पौधशाला में उगे पौधों में लगता है । इससे पौधे भूमि स्तर पर ही गलने लगते हैं । नर्सरी में पौधों का मुरझाना और सूख जाना इस बीमारी का मुख्य लक्षण है ।
रोकथाम
बीज कैप्टान या थीरम नामक फफूंदी नाशक दवा से 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिये । बीज बोने के 10 - 15 दिन बाद नर्सरी में कैप्टान या थीरम 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिये ।
फल सड़न या फोमास्सिम अंगमारी
इस रोग में पत्तियों पर छोटे - छोटे गोल भूरे धब्बे बन जाते हैं । रोगी पत्तियों पीली पड़कर सूख जाती हैं । फल सड़कर जमीन में गिर जाते हैं ।
रोकथाम
नर्सरी में थीरम या कैप्टान का 0 . 2 घोल बनाकर 7 - 8 दिन के अन्तर पर छिड़काव करना चाहिये । स्वस्थ व प्रमाणित बीज बोना चाहिये ।
फलों की तुड़ाई
फल बढ़ जाने पर तथा रंग आ जाने पर उन्हें तोडना चाहिये । फल तोड़ने में देर होने पर फलों का रंग फीका पड़ जाता है और बीज कड़े हो जाते हैं । बैंगन का फल लगने के लगभग 8 - 10 दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाता है ।
उपज
बैंगन की औसत उपज 200 - 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा संकर किस्मों की उपज 350 - 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है ।

