स्थानीय क्षेत्र के किसी पारिस्थितिका तंत्र का विवरण ( BEd 2nd year )

स्थानीय क्षेत्र के किसी पारिस्थितिका तंत्र का विवरण 3
 ( Description of any Eco - system Type of the Local Area ) 

पारिस्थितिकी तन्त्र

 मानव , पशु , पक्षी और जीव जगत के सभी प्राणी अपने समुदाय में रहते हैं । समुदाय में विभिन्न प्रकार की जा . . यों , बोलियों , खान - पान , रूचि और विचार वाले जीव निवास करते हैं । सभी जीवधारी एक दूसरे को प्रभावित करते हैं । समुदाय के प्राणियों और पर्यावरण के मध्य क्रिया - कलाप होते रहते हैं । इस अन्तः क्रिया को पारिस्थितिकी तंत्र या ' ईको - सिस्टम ' कहते हैं । पारिस्थितिकी तंत्र में असन्तुलन की स्थिति तब उत्पन्न हुई जबसे भौतिकवादी मानव ने अपने स्वार्थ साधन के लिए प्रकृति का अन्धाधुन्ध , अनवरत दोहन शुरू कर दिया तभी से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई है । इससे जीवन के लिए खतरा उत्पन्न हो गया ।



शाब्दिक रूप से इकोलॉजी का अर्थ ' जीवों का उनके वासस्थान ' का अध्ययन है । सरल भाषा से इसे प्रकृति भी कहा जा सकता है क्योंकि प्रकृति में जैविक और अजैविक घटकों का योग होता है । इस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र जीवित प्राणियों और उनके पर्यावरण के योग से बनता है । पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न समुदाय आपस में तथा अपने भौतिक वातावरण से ऊर्जा , द्रव्य , आदि का आदान - प्रदान करते रहते हैं । इस पारस्परिक आदान - प्रदान के अभाव में पृथ्वी पर सजीव प्राणियों तथा वनस्पति का जीवन असम्भव है । तालाब , जंगल , गाँव , शहर आदि पारिस्थितिक तंत्र के उदाहरण हैं । पारिस्थितिकी तंत्र में जीव अपने आस - पास के पदार्थों को ग्रहण करके अपने शरीर की वृद्धि करते हैं और कार्बनिक पदार्थों का निर्माण करते हैं , यह कार्बनिक पदार्थ पुनः खण्डित होकर अकार्बनिक पदार्थों में बदल जाते हैं । इस प्रकार प्रकृति में विभिन्न प्रकार के पदार्थों का चक्रीकरण चलता रहता है ।
     पारिस्थितिक विज्ञान का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसे समग्र रूप से समझ पाना कठिन है । अतः इसे क्षेत्रीय आधार पर ही समझना चाहिए । जैसे — किसी क्षेत्र में जैव अनुकूलन , मृदा की प्रकृति , भोजन की श्रृंखला के सम्बन्ध , जीव कटिबन्ध तथा विभिन्न जीवाष्मों के अन्तर्गत होने वाले अनुक्रमणों का ज्ञान प्राप्त करना पारिस्थितिकी का अध्ययन क्षेत्र है । पारिस्थितिकी के क्षेत्र को समझने के लिए जीवों तथा पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों को जानना आवश्यक है ।

भारत में शक्ति या ऊर्जा 
भारत में ऊर्जा के संसाधन निम्नलिखित है-

( i ) विद्युत ऊर्जा
           भारत में बिजली उत्पादन 1900 से प्रारम्भ हुआ है जबकि कर्नाटक राज्य में शिव - समुद्रम नामक स्थान पर पहला पन - बिजलीघर बनाया गया था । इसके बाद स्थान स्थान पर पन - बिजली व कोयले के बिजलीघर बनाएँ गये । लेकिन यह सभी शहरी क्षेत्रों तक सीमित । 1947 में उत्पादन क्षमता 19 लाख किलोवाट थी । पंचवर्षीय योजनाओं में विद्युत उत्पादन क्षमता एवं वास्तविक उत्पादन में काफी वृद्धि हुई है । प्रथम पंचवर्षीय योजना में देश 1300 मेगावाट विघुत का उत्पादन हुआ जो वर्ष 2000 के अन्त तक 1 , 13 , 000 मेगावाट को पार कर गया है और नौवीं योजना के लिए 40 , 245 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था । * भारत में विद्युत का प्रति व्यक्ति उत्पादन 157 किलोवाट वार्षिक है जो कि अन्य विकसित देशों की तुलना में काफी कम है - जैसे - अमेरिका में प्रति व्यक्ति वार्षिक उत्पादन 7 , 988 किलोवाट , ब्रिटेन में 4 , 462 किलोवाट व जापान में 3 , 476 किलोवाट है । . भारत में जल विद्युत तथा ताप विद्युत ऊर्जा प्राप्त होती है । आजकल हिमाचल प्रदेश , जम्मू व कश्मीर , कर्नाटक , केरल व मेघालय मुख्य रूप से जल विद्युत पर निर्भर है जबकि आन्ध्र , असम , हरियाणा , म . प्र . , महाराष्ट्र , उड़ीसा , पंजाब , राजस्थान , तमिलनाडु व उत्तर प्रदेश को जल विद्युत व कोयला से उत्पादित विद्युत दोनों पर निर्भर रहना पड़ता है । आज विद्युत ऊर्जा की स्थिति देश में सम्माननीय 
( ii ) कोयला -
             कोयला हमारे ऊर्जा के साधनों की रीढ़ की हड्डी माना जाता है । भारत में विद्युत की आवश्यकताएं काफी सीमा तक कोयले के इस्तेमाल से विद्युत तैयार करके ही पूरी की जा रही है । भारत में कई वर्षों तक कोयले का उत्पादन 10 करोड़ टन प्रतिवर्ष तक स्थिर बने रहने के बाद 1980 - 81 में कोयले का कुल उत्पादन 11 . 4 करोड़ टन थी जो बढ़कर 1999 - 2000 में लगभग 299 . 77 मिलियन टन हो गया । भारत की औद्योगिक नीति कोयले का उत्पादन बढ़ाने की है । नवीन सर्वेक्षणों के अनुसार कोयले के और भी कई भण्डार खोज निकाले गये हैं । सार्वजनिक क्षेत्र में कोयले का उत्पादन मुख्य रूप से कोल इण्डिया लि . अपनी सहायक कम्पनियों के माध्यम से करता है । कोल इण्डिया लि . की स्थापना 1975 में नियंत्रक कम्पनी के रूप में हुई है । कोकिंग कोयले की सफाई के लिये देश में 17 कारखाने हैं । कोयले उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद खनन और श्रमिक कल्याण में तेजी आई । कोयले उत्पादन की दृष्टि से भारत आत्मनिर्भर ही नहीं वरन् इसका निर्यात भी करता है ।
 ( iii ) खनिज तेल -
               भारत खनिज तेल उत्पादन के क्षेत्र में विकास की ओर बढ़ रहा है । भारत में तेल की खोज का काम 1886 में शुरू हुआ । प्रारम्भिक तल कुओं की खुदाई ऊपरी असम के विभिन्न स्थानों में की गई , जिनमें अलग - अलग मात्रा में सफलता मिली । 14 अगस्त , 1956 को तेल और प्राकृतिक गैस आयोग तथा 15 अक्टूबर , 1981 को आयल इण्डिया लिमिटेड की स्थापना के बाद से देश में तेल की खोज का काम नियोजित व समन्वित ढंग से होने लगा है । 1960 में गुजरात में अंकलेश्वर में तेल मिला , जो कि आयोग की पहली सफलता थी । इसके बाद 1961 में गुजरात में अलील उसी वर्ष असम में रूद्र सागर में और 1962 में गुजरात में तेल का पता चला । है । खनिज तेल क्षेत्र में भारत नये - नये स्थानों की खोज में प्रयासरत है जिससे देश को आत्मनिर्भर बनाया जा सके । भारत एवं अन्य के सहयोग से तेल सम्बन्धी सर्वेक्षण के द्वारा 11 और नये तेल क्षेत्रों की जानकारी मिली है जिससे खनिज तेल और प्राकृतिक गैस पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकेंगे । इनका प्रयोग ऊर्जा स्रोतों के रूप में होगा जिससे अर्थव्यवस्था के विकास के साथ - साथ पेट्रोलियम पदार्थों का विदेशों से आयात बहुत कम हो जायेगा ।  
( iv ) परमाणु शक्ति
        परमाणु शक्ति आधुनिक युग में कम ईंधन से बहुत अधिक ऊर्जा अण शक्ति विकास आ तथा 10 अगस्त की सरकार ने परमाणु ऊर्जा न की स्थापना की गई जिसका नाम य इस केन्द्र में 2000 वैज्ञानिक 167 बा . es . Indu उत्पन्न करने की शक्ति स्रोत है । हमारे देश में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात आ शरूआत 15 अप्रैल 1948 से हुई जबकि अणु शक्ति अधिनियम पारित हआ तथा 1948 को अणुशक्ति आयोग की स्थापना की गई । 1954 में केन्द्रीय सरकार ने पा विभाग स्थापित किया । 1954 में बाम्बे में परमाणु ऊर्जा संस्थान की स्थापना की गई जिस बदलकर भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र कर दिया गया । इस समय इस केन्द्र में 2000 एवं इन्जीनियर तथा 8000 कर्मचारी कार्य कर रहे हैं । इस केन्द्र में चार अनुसन्धान रियेकर - ( i ) अप्सरा , ( ii ) साइरस , ( iii ) जरलीना , व ( iv ) पूर्णिया आज भारत में पाँच परमाणु विद्युत केन्द्र कार्य कर रहे हैं जिनका ब्यौरा निम्न है
( क ) तारापुर केन्द्र - यह अमेरिका के सहयोग से निर्मित भारत का प्रथम परमाण विद्यान केन्द्र है । इसकी स्थापना बम्बई से 105 किलोमीटर उत्तर की ओर अरब सागर के तट पर बसे तारापुर गाँव में की गई है । इसकी उत्पादन क्षमता 400 मेगावाट है । इसमें 1969 से विद्यत शक्ति का उत्पादन होने लगा है ।


( ख ) राणाप्रताप सागर परमाणु केन्द्र - चम्बल नदी पर राणाप्रताप सागर बाँध के पास रावतभाटा नामक स्थान पर कनाडा के सहायोग से यह परमाणु केन्द्र बनाया गया है । इस केन्द्र में दो - दो लाख किलोवाट के दो रियेक्टर यूनिट हैं ।


( ग ) कलपक्कम परमाणु शक्ति केन्द्र - यह देश का तीसरा परमाण विद्युत केन्द्र है जो मद्रास से 60 कि . मी . दूर कलपक्कम नामक स्थान पर बनाया गया है । इसमें दो रियेक्टर हैं जिनकी क्षमता 235 - 235 मेगावाट है । इसकी दोनों इकाइयों ने कार्य करना प्रारम्भ कर दिया है । इसकी क्षमता 220 मेगावाट है ।


( घ ) नरोरा परमाणु शक्ति केन्द्र - गंगा नदी के बायें किनारे नरोरा नामक स्थान पर इस परमाणु शक्ति केन्द्र की स्थापना की गई है । यह केन्द्र स्वदेशी तकनीक पर आधारित है इसमें भी दो रियेक्टर हैं जिनमें से प्रत्येक की क्षमता 235 मेगावाट है ।


( च ) काकड़ा पार परमाणु ऊर्जा केन्द्र - यह भारत का पाँचवा परमाणु केन्द्र है जिसका स्थापना का कार्य चल रहा है । यहाँ पर दो विद्युत उत्पादन इकाइयाँ स्थापित की जायेंगी । इसमन एक ने 3 सितम्बर 1992 से विद्युत उत्पादन प्रारम्भ कर दिया है ।

    भारत में भी पवन ऊर्जा के विकास की पर्याप्त सम्भावना है एवं इसमें विकास का प्रयास किया जा रहा है । भारत में पवन ऊर्जा के उपयोग पर संगठित अनसन्धान कार्य सन् 195 प्रारम्भ किया गया । इसकी प्रारम्भिक संरचना अत्यन्त जटिल हाने के साथ - साथ छोटे किसान पहँच के बाहर थी । बाद में डच संस्था ' टूल ' ने भारतीय संस्थान ' ऑरगेनाइजेशन ऑफ द पुअर ' के सहयोग से पवन चक्की का निर्माण स्थानीय उपलब्ध सामग्री से परियोजना के कारखा कसम्हीकला ( गाजीपुर 3 . 5 ) में किया गया । यह पवन चक्की मूल रूप से कम वाय वेग ( 9 किना प्रति घंटा ) के क्षेत्रों के लिए सर्वथा उपयुक्त है ।

        भारत में पवन प्रवाह को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि यहाँ लगभग 20 , 000 मेगावाट तक बिजली पवन ऊर्जा से प्राप्त की जा सकता हा भारत में अभी तक 2000 से अधिक पवन चक्कियाँ लगाई जा चुकी है , जिनसे खेती की सिंचाई एवं पीने के लिए पानी प्राप्त होता है । गजरात , तामिलनाडु , उड़ीसा एवं महाराष्ट्र में छः मेगावाट क्षमता वाली छः पवन फार्म योजनाएं । कार्य कर रही है . जिससे लगभग 5 , 00 , 000 यूनिट बिजली का उत्पादन किया जा रहा और अब तक दो करोड़ यूनिट से भी अधिक बिजली उत्पन्न की जा युकी है । आन्ध्र प्रदेश , कर्नाटक , मध्य प्रदेश एवं गोवा में 900 किलोवाट के औसतन आकार वाले यूनिटों पर आधारित दो मेगावाट पूर्ण क्षमता वाली परियोजनाएँ प्रारम्भ की जा चुकी हैं ।
 सौर ऊर्जा - 
        देश में सौर ऊर्जा की असीमित सम्भावनाएं हैं । इस दिशा में विभिन्न प्रयोग शालाओं में कार्य हो रहा है । सौर ऊर्जा के उपयोग का सरल एवं साधारण उपाय इसे सौर ताप ऊर्जा में परिवर्तित करना है । इस क्षेत्र में बढ़ी संख्या में इसका व्यावसायिक स्तर पर उपयोग किया जा रहा . खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहाँ निम्न दर्जे की ताप ऊर्जा की आवश्यकता है । इनमें खाना पकाना , पानी गर्म करना , खारे पानी को साफ करना , स्थान गरम करना , फसल सुखाना आदि शामिल है । घरेल और औद्योगिक उपयोग के लिए सौर ऊर्जा पर आधारित पानी गरम करने की प्रणाली , पानी के खारेपन को दूर करने की प्रणाली , वातानुकूल आदि कार्यों के लिए 1 . 23 लाख वर्ग मीटर ऊर्जा संग्रहण क्षेत्र में लगी सौर प्रणालियों और उपकरणों से वर्ष भर में 350 लाख किलोवाट ऊर्जा बचाने या पैदा करने में मदद मिली ।

    विभाग ने हरियाणा में गवाल पहाड़ी में 50 किलोवाट के सौर ऊर्जा संयंत्र की स्थापना की जिससे बिजली बनती है और फल , हरी सब्जियाँ और दूध के संरक्षण आदि के लिए बनाये गये 10 टन की क्षमता वाले कोल्ड स्टोरेज को ऊर्जा प्राप्त होती है । 
ऊर्जा संकट 
भारत में सरकारी और गैर - सरकारी स्रोतों में जो सांख्यिकीय आँकड़े एवं सूचनाएँ उपलब्ध हैं । वह इस बात को सिद्ध करती हैं कि भारत में कृषि और औद्योगिक विकास के लिए जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है , उसकी तुलना में ऊर्जा का उत्पादन , वितरण एवं उपलब्धि बहुत कम है । यह परिस्थिति उस अवस्था में जबकि योजनाकाल में विभिन्न प्रकार के ऊर्जा शक्ति के निर्माण में उच्च प्राथमिकता दी गई है तथा बहुत बड़े आकार में पूँजी निवेश किया गया है । इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि ऊर्जा के क्षेत्र में आन्तरिक प्रयासों से अतिरिक्त बहत बड़े आकार में विदेशी सहयोग एवं ऋण भी प्राप्त किये गये हैं । इन प्रयासों को ऊर्जा का उत्पादन और वितरण पर्याप्त रूप से हुआ है किन्तु देश में बढ़ती हुई आबादी के साथ आवश्यकता को देखते हुए ऊर्जा की खपत बहुत कम है और दूसरी तरफ देश में निरन्तर ऊर्जा संकट छाता जा रहा है ।


ऊर्जा संकट के कारण - विगत कुछ वर्षों से देश में ऊर्जा संकट काफी तेजी से फैलता जा रहा है । देश में ऊर्जा की माँग निरन्तर बढ़ती जा रही है तथा ऊर्जा के लगभग सभी साधन खाली होते जा रहे हैं । जनसंख्या वृद्धि तथा औद्योगीकरण के कारण , ऊर्जा की मांग में एकदम से वृद्धि हुई है जबकि ऊर्जा के परम्परागत साधन अर्थात खनिज तेल , लकड़ी का कोयला , विद्युत आदि समाप्त होने की स्थिति में है । ऊर्जा संकट के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिाखत ह

( i ) पेट्रोलियम का बढ़ता उपयोग - कोयले की तुलना में खनिज तेल से ऊर्जा का सृजन करना अधिक सुगम होता है । विगत वर्षों में खनिज तेल के उपयोग में निरन्तर वृद्धि हुई है । रेलवे शजना का डाजलीकरण , खनिज तेल पर आधारित उर्वरक के कारखाने , सड़क परिवहन के विभिन्न साधना म पट्राल का उपयोग खनिज तेल के उपयोग में वृद्धि का सूचकहा

(ii ) कायल का अभाव - देश में कोयले के भण्डार काफी हो गये हैं , कोयला ऊर्जा का एक प्रमुख नात है जो लगभग समाप्त होने की स्थिति में है । देश में ऊर्जा संकट की स्थिति निर्मित करने में कोयले का महत्वपूर्ण हाथ है ।

( iii ) जल विद्यत के लक्ष्यों का पाप्त न होना - देश में ऊर्जा का सबसे विशाल तथा गम साधन जल विद्यत है लेकिन कभी जलाणयों में जल का स्तर नीचा होना और कभी तकनीकी कारण जल विद्युत की सजन क्षमता के निर्धारित लक्ष्य प्राप्त नहीं किये जा सके । देश में ऊर्जा संकट का यह भी एक महत्वपूर्ण कारण है ।

( iv ) अणु शक्ति के विकास की मंद गति - यह सच है कि देश में अणु शक्ति के विकास के लिए आवश्यक खनिजों के यथेष्ट भण्डार उपलब्ध हैं , लेकिन ऊर्जा के लिये अभी तक इस शक्ति का बहुत कम उपयोग हो पाया है । अणु शक्ति के विकास के लिए डॉ . भाभा ने जो विशिष्ट योजना तैयार की थी वह उनकी असामयिक मृत्यु के कारण उतनी शीघ्रता से क्रियान्वित न की जा सकी । आणविक शक्ति केन्द्रों की स्थापना के लिये बहुत अधिक विदेशी विनिमय की आवश्यकता होती है । अपर्याप्त विदेशी विनिमय साधन अणु शक्ति के विकास में बाधक है । 
ऊर्जा संकट से निपटने के उपाय
         देश में ऊर्जा संकट काफी तेजी से फैलता जा रहा है । ऊर्जा की माँग आर्थिक एवं गैर आर्थिक क्षेत्रों में निरन्तर बढ़ती जा रही है तथा ऊर्जा की पूर्ति करने वाले परम्परागत साधन लगभग समाप्त होने की स्थिति में हैं । यह एक समस्याजनक स्थिति है । इस गम्भीर समस्या का प्रभावशाली तरीके से उचित समाधान बहुत आवश्यक है । ऊर्जा की बढ़ती हुई माँग को कम करना सम्भव नहीं है । अतः । - आवश्यकता इस बात की है उपलब्ध ऊर्जा साधनों को मितव्ययिता के साथ उपभोग किया जाये तथा नये - नये ऊर्जा साधनों की खोज की जाएँ । ऊर्जा संकट के समाधान के लिये कुछ महत्वपूर्ण सुझाव निम्नलिखित हैं

 ( i ) तरल ईधन का मितव्ययी उपभोग - पेट्रालियम तथा मिट्टी के तेल आदि तरल ईधन की खपत में वृद्धि मुख्यतः दो क्षेत्रों में हुई है — प्रथम रेल तथा सड़क यातायात में तथा द्वितीय घरेलू उपयोग में । विद्युत क्षमता का सृजन करके तरल ईधन के उपयोग में कमी की जा सकती है , इसके अलावा तरल ईधन का मितव्ययिता से उपयोग करके भी ऊर्जा संकट को काफी कम किया जा सकता है ।

( ii ) खनिज तेल एवं गैस की खोज - ऊर्जा संकट को कम करने के लिए खनिज तेल के भण्डारों एवं प्राकृतिक गैस की खोज की जानी चाहिये क्योंकि खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है । वर्तमान तकनीक की सहायता से कोयले का द्रवीकरण करके कच्चे पेट्रोलियम के उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है । औद्योगिक एवं घरेलू गैस के रूप में कोयला गैस का उपयोग भी बढ़ाया जा सकता है ।


 ( iii ) खनिज तेल के स्थान पर कोयले का उपयोग - संचालन शक्ति के सृजन में खनिज तेल के स्थान पर कोयले का उपयोग करके भी खनिज तेल की खपत में कमी की जा सकती है लेकिन इससे पूर्व कोयले के उत्पादन में वृद्धि की जानी आवश्यक है क्योंकि कोयले के भण्डार | लगभग समाप्त होने की स्थिति में है ।

( iv ) जल विद्युत ऊर्जा का विस्तार - जल विद्यत ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है । जल । विद्युत शक्ति का विस्तार करके ऊर्जा की पूर्ति में वृद्धि की जा सकती है । केन्द्रीय जल एवं शक्ति आयोग के मतानुसार भारत में 410 लाख किलोवाट ही जल विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता विद्यमान है , लेकिन इस समय केवल 70 लाख किलोवाट ही जल विद्युत उत्पन्न होती है । जल विद्युत शक्ति की क्षमता में वृद्धि करके ऊर्जा पूर्ति को बढ़ाया जा सकता है ।

( v ) ज्वार शक्ति एवं सूर्य शक्ति के प्रयोग में वृद्धि - ज्वार शक्ति एवं सूर्य शक्ति का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में करके प्राकतिक ऊर्जा का सदपयोग किया जा सकता है । नाम मात्र का लागत पर उपलब्ध हो जाती है अतः आविष्कारों द्वारा इनका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में करके न केवल ऊ में बचत की जा सकती है वरन् ऊर्जा स्रोत में भी वृद्धि की जा सकती है ।

( vi ) गोबर गैस संयंत्रों का विस्तार नये - नये गोबर गैस संयंत्रों की स्थापना करक ऊजा की
पूर्ति बढाई जा सकती है । गोबर गैस ककिंग गैस का सबसे अच्छा विकल् / है इसका उपयोग न केवल खाना पकाने वरन् प्रकाश आदि के लिये भी किया जा सकता है ।

( vii ) मानव शक्ति एवं पश शक्ति का उपयोग - मानव शक्ति एवं पशु शक्ति का अधिकतम उपयोग करके भी ऊर्जा की बचत की जा सकती है ।

( viii ) विद्युत उत्पादन के नये तरीके - भताप से ऊर्जा लेकर तथा समुद्र के पानी के तापान्तर से भी विद्युत उत्पन्न की जा सकती है । इस प्रकार से उत्पन्न विद्युत क्षमता ऊर्जा संकट के समाधान में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करेगी इस बात की पूर्ण सम्भावना है ।

( ix ) वनों से प्राप्त ऊर्जा साधन वनों से प्राप्त लकड़ी के ईधन के रूप में सदुपयोग करके खनिज तेल , प्राकृतिक गैस , कोयला आदि ऊर्जा साधनों की बहुत अधिक बचत की जा सकती है ।

( x ) ऊर्जा उत्पादन की नवीन सम्भावनाएँ — ऊर्जा के नवीनतम स्रोतों के रूप में गन्ना , सीरा , अनाज आदि कृषिगत उपज या इनसे प्राप्त मद्यसारिक जैविक द्रव्य अनेक सम्भावनाओं से भरी है । बायोमास आधारित एथनोल पेटोलियम पदार्थों का प्रतिस्थापन हो सकता है । अमेरिका तथा डेनमार्क में इन विधियों से ऊर्जा उत्पादन की सम्भावनाओं पर सफलतापूर्वक कार्य हो रहा है । ऊर्जा के नवीनतम स्रोत के रूप में हाइडोजन ऊर्जा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है । यह द्रव्य ईधन का स्थान ले सकता है तथा भविष्य में ऑटोमोबाइल तथा वायुयानों के लिए एक अच्छा ईधन सिद्ध हो सकता है । इस दिशा में भारत में शोध कार्य प्रगति पर है । 

पारिस्थितिकी अध्ययन का क्षेत्र 

पारिस्थितिकी विज्ञान में समस्त जीवधारियों , उनके विभिन्न पर्यावरणों और पर्यावरण के साथ उनके सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है । पर्यावरण में रहने वाले जीव - जन्तुओं प्राणियों तथा पादपों में विविधता होती है तथा उनकी पर्यावरणीय परिस्थितियाँ भी अलग - अलग प्रकार की और परिवर्तनशील होती है , इस प्रकार परिस्थितिकी का क्षेत्र काफी विस्तृत है ।
पारिस्थितिकी विज्ञान का कार्य क्षेत्र उन सामान्य सिद्धान्तों का निरूपण करना है जिनके अन्तर्गत प्राकृतिक समुदाय तथा उसके घटक संचालित होते है ।
जीव - जन्त , प्राणी तथा प्राकृतिक वनस्पतियाँ विभिन्न परिस्थितियों के साथ अनुकूलन करने का प्रयास करती हैं । जीवन के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त करना , पोषक तत्वों का शोषण करना , विपरीत मौसम में परोपजीवी होना , रोग के कारकों से बचना , अपने को विनाश से बचाना तथा प्रजनन द्वारा अपनी पीढ़ी का प्रसार और रक्षण करना , इन सभी बातों को परिस्थितिकी अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है ।

इसके अन्तर्गत सभी विज्ञानों का अध्ययन किया जाता है । जैसे — पारिस्थितिक कारकों का विवेचन करते समय मौसम विज्ञान , भूगर्भ , रसायन एवं भौतिक विज्ञान का ज्ञान होना चाहिए । समाज विज्ञान , मानवशास्त्र , अर्थशास्त्र , धर्म , कानून तथा सांस्कृतिक बातों की जानकारी अपेक्षित है । इस प्रकार पारिस्थितिक विज्ञान का अध्ययन क्षेत्र विभिन्न विज्ञानों को सह सम्बन्ध या अन्तर । अनशासनात्मक अध्ययन है । इसके अध्ययन क्षेत्र की सीमाओं का निर्धारण करना सम्भव नहीं है । इसके अन्तर्गत पारिस्थितिकी के सभी उप - विभागों को सम्मिलित किया जाता है जैसे 1 . पादप पारिस्थितिकी । 2 . प्राणि पारिस्थितिकी । 3 . जैव पारिस्थितिकी । 4 . पर्यावरण 8 . उत्पादन पारिस्थितिकी । पारिस्थितिकी । 5 . समष्टि पारिस्थितिकी । 6 . समुदाय पारिस्थितिकी । 7 . भौगोलिक पारिस्थितिकी ।


 पारिस्थितिकी तन्त्र की उपयोगिता 
पारिस्थितिकी तन्त्र की उपयोगिता इस प्रकार है

( i ) पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए , सम्पूर्ण पर्यावरण तथा उसके विभिन्न घटकों एवं उसमें उपस्थित प्राकृतिक तत्त्वों तथा पारिस्थितिक विज्ञान का अध्ययन आवश्यक होता है ।

 ( ii ) मौसम , कृषि , एवं संरक्षण वैज्ञानिकों द्वारा की जाने वाली भविष्यवाणियाँ पारिसित सिद्धान्तों के ज्ञान के अभाव में प्रायः गलत हो जाया करती हैं । समुचित पारिस्थितिक ज्ञान मध ही , कोई भविष्यवाणी करना सम्भव है ।

( iii ) विशिष्ट परिवेश को समझने के लिए उससे जुड़े घटको जैसे समुद्र , अन्तःस्थलीय मह वन , मदा . मौसम को समझने में पारिस्थितिकी का अध्ययन सहायक है ।

( iv ) बढ़े हये पर्यावरण प्रदूषण के संरक्षण के उपाया का खोजना आवश्यक है । पर्यावर संरक्षण के लिए पारिस्थितिकी का ज्ञान सहायक होता है ।

( V ) कृषि विज्ञान , वन विज्ञान , मत्स्य विज्ञान , नाशक - जीव नियंत्रण क्षेत्रों में पारिस्थितिक क विज्ञान के प्रयोग देखने को मिलते हैं ।

( vi ) पारिस्थितिकी ज्ञान से व्यक्ति में जागरूकता आती है ।

( vii ) ' मनुष्य अपनी पारिस्थितियों का दास नहीं वरन् निर्माता है । ' मानव ने आदिकाल से पर्यावरण पर परिवर्तनकारी प्रभाव डालें हैं । पारिस्थितिकी तंत्र की अनभिज्ञता के कारण वे परिवर्तन प्रायः विनाशकारी सिद्ध हुये हैं । विनाश को समझने , उस पर अंकुश लगाने के लिए पारिस्थितिक का ज्ञान आवश्यक होता है ।

( viii ) मनुष्य दूसरे जीव जन्तुओं पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर हैं । इसके साथ समायोजन रखना । विवशता है । समायोजन न होने पर प्राकृतिक असन्तुलन की स्थिति हो जाती है । आधुनिक समय में उत्पन्न - पर्यावरण समस्या का कारण प्रकृति और मानव के मध्य कुसमायोजन है , इसीलिए मानव कष्ट भाग रही । है । अतः पर्यावरण को यदि सन्तुलित रखना है तो पारिस्थितिकी का ज्ञान आवश्यक है ।