प्रश्न 3 . प्रबन्धन कौशल को परिभाषित कीजिए । नेतत्व के विभिन्न सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए

प्रबन्धन कौशल को परिभाषित कीजिए । नेतत्व के विभिन्न सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए ।

प्रबन्धन का अर्थ व परिभाषा - प्रबन्धन एक जटिल एवं व्यापक प्रत्यय है । व्यक्तियों के समूह अर्थात् संगठन को निर्देशित , समन्वित एवं एकीकृत करने के लिए प्रबन्धन की आवश्यकता होती है । प्रबन्धन का अर्थ होता है - संगठन में व्यक्तियों से कार्य कराना । अंग्रेजी में प्रबन्धन को मैनेजमैण्ट कहते हैं । अर्थात् व्यक्तियों से व्यवस्थित विधि से कार्य करने की कला को मैनेजमेन्ट कहा जाता है । प्रबन्धन के अर्थ को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है – एक  संगठन में कार्यरत व्यक्तियों के प्रयासों से निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए नियोजन निर्देशन एवं समन्वित करने को प्रबन्धन कहते हैं ।
अतः प्रबन्धन व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो किसी संगठन के संचालन में उत्तरदायित्वों को स्वीकार करते हैं वे संगठन की योजना , व्यवस्था , निर्देशन एवं नियन्त्रण द्वारा सभी आवश्यक क्रियायें करते हैं । प्रबन्धन कोई कार्य स्वयं नहीं करता बल्कि वह दूसरों को संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने एवं समन्वय स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है ।
प्रबन्धन समस्त कार्यकर्ताओं , आर्थिक परिस्थितियों , कार्य विधियों तथा बाजार को एक साथ समन्वित करता है । इन सभी संसाधनों के माध्यम से वह संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति करता है । जैसे - उच्च बिक्री , अधिकतम लाभ , व्यापार विस्तार आदि । अतः प्रबन्धन लोगों एवं अन्य संगठनात्मक संसाधनों के माध्यम से कार्य करके लक्ष्यों की प्राप्ति की प्रक्रिया है ।
प्रबन्धन का सामान्य अर्थ नियोजन , संगठन , व्यक्ति नियुक्तिकरण , निर्देशन एवं व्यक्तियों के प्रयासों के नियंत्रण की विशिष्ट प्रक्रिया है । प्रबन्धन की कुछ परिभाषायें निम्न प्रकार है
( 1 ) एफ . डब्ल्यू . टेलर के अनुसार - " प्रबन्धन यह जानने की कला है कि आप व्यक्तियों से वास्तव में क्या कार्य लेना चाहते हैं फिर यह देखना कि वे उसको सबसे मितव्ययी तथा उत्तम ढंग से किस प्रकार पूरा करते हैं । "
( 2 ) हेरोल्ड कन्ट्ज के अनुसार - " प्रबन्धन औपचारिक रूप से संगठित्त दलों में व्यक्तियों के द्वारा व उनके साथ मिलकर कार्य करने की कला है । " 

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( 3 ) हेनरी फियोल के अनुसार - " प्रबन्धन का अर्थ पूर्वानुमान लगाने , योजना बनाने , संगठन करने , निर्देशन करने , समन्वय करने तथा अन्य कार्यों का नियन्त्रण करने से है । " ।
( 4 ) पीटर ड्रकर के अनुसार - " प्रबन्धन एक बहुउद्देशीय संस्था है जिसके अन्तर्गत कारोबार का प्रबन्धन , प्रबन्धकों का प्रबन्ध तथा कार्यकर्ताओं के कार्य का प्रबन्धन होता है । "
( 5 ) जार्ज आर . टेरी के अनुसार - " प्रबन्धन एक विशेष प्रक्रिया है जिसमें नियोजन , संगठन , उत्प्रेरणा एवं नियंत्रण शामिल होते हैं । सभी क्रियाओं में कला एवं विज्ञान दोनों का ही प्रयोग होता है और इनका अपने इसी क्रम में निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अनुसरण किया जाता है ।
नेतृत्व के सिद्धान्त

 नेतत्व का विकास कैसे होता है इस सम्बन्ध में अलग - अलग विद्वानों ने अलग - अलग सिद्धान्त रखे हैं । वर्तमान में नेतृत्व के विकास से सम्बन्धित निम्न सिद्धान्त देखने को मिलते हैं –
( 1 ) अयोग्यता में योग्यता का सिद्धान्त - इस सिद्धान्त की व्याख्या हम मनोविज्ञान के क्षतिपूर्ति के सिद्धान्त के आधार पर करते हैं कि मनुष्य जब किसी एक क्षेत्र में अयोग्यता रखता है . तो वह अपनी इस अयोग्यता की क्षतिपूर्ति स्वरूप अन्य क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करता है । इस सिद्धान्त के अनुसार कुछ व्यक्तियों में कुछ कमियाँ होती हैं फलतः वे अपनी कमियों की क्षतिपूर्ति हेत अन्य क्षेत्रों में उत्तम कार्य कर नेता बन जाते हैं । उदाहरण के लिए , अध्ययन में कमजोर छात्र अच्छा . खिलाड़ी बनकर टीम का नेता बन जाता है ।
( 2 ) संयोग का सिद्धान्त - इस सिद्धान्त के अनुसार कभी - कभी कोई व्यक्ति संयोग से ही नेता बन जाता है । किसी व्यक्ति को नेता बनने का संयोग तभी मिलता है जब उसके लिए निम्न तीन परिस्थितियों एक साथ उत्पन्न होती हैं –
( i ) व्यक्ति की श्रेष्ठ व्यक्तिगत योग्यता ।
( ii ) किसी प्रकार के संकट या समस्या का पैदा होना ।
( iii ) व्यक्ति को समस्या समाधान के लिए अपनी योग्यता प्रदर्शन के अवसर मिलना ।
( 3 ) विलक्षणता का सिद्धान्त - कुछ विद्वानों का मानना है कि नेतृत्व व्यक्ति की विलक्षण प्रतिभाओं का परिणाम है । इसके अनुसार कुछ व्यक्तियों में कुछ विशिष्ट योग्यताएँ तथा गुण होते हैं । जो दूसरों में नहीं होते हैं । वे अपने विशिष्ट गुणों के कारण समूह के अन्य सदस्यों को अपना अनुयायी बनाकर उसका नेता बन जाते हैं । इसे गण - सिद्धान्त भी कहते हैं ।
( 4 ) सन्तुलन का सिद्धान्त - इस सिद्धान्त के समर्थकों की मान्यता है कि नेतृत्व का विकास तभी होता है जब किसी व्यक्ति के समस्त या अधिकांश नेतृत्व गणों का सन्तुलित विकास होता है । यदि नेतृत्व गुणों का असन्तलित विकास होता है , अर्थात् कोई एक - दो गुण बहुत अधिक विकसित होते हैं तथा कुछ अन्य अपेक्षाकत उतने ही विकसित हो पाते हैं तो उस व्यक्ति का नेतृत्व संकट में पड़ जाता है । उदाहरणार्थ , यदि किसी नेता में शारीरिक शक्ति का बहुत अधिक विकास हो  जाये तो वह भले - बुरे की चिन्ता किये बिना भारतीय तथा अकरणीय कार्य कर बैठता है फलतः । उसका नेतृत्व खतरे में पड़ जाता है ।
( 5 ) समूह - प्रक्रिया सिद्धान्त - कुछ विद्वानों का विचार है कि नेतृत्व समूह - प्रक्रिया का परिणाम होता है । समूह के सदस्यों में परस्पर अन्तः क्रियाएँ , विचार - विमर्श तथा परामर्श होते रहते है । इन्हीं के आधार पर कोई व्यक्ति समस्त समह में से नेता उभरकर आता है । जो व्यक्ति समूह की त आवश्यकताओं तथा समस्याओं को तष्टि प्रदान कर देता है , समूह उसी को अपना नेता मान लेता ।
उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि नेता बनने के लिए प्रायः सभी सिद्धान्त ठीक लगते हैं । का कौन कैसे नेता बने यह पृथक - पृथक परिस्थितियों पर निर्भर करता है । वास्तविक रूप से नेता बनना । किसी एक रत्न या कारक पर निर्भर नहीं करता है , इसके लिए दो तत्व प्रमुख रूप से उत्तरदायी ने है - यक्ति के व्यक्तित्व सम्बन्धी गण तथा परिस्थितियाँ । इन्हें हम वंशानुगत कारक तथा वातावरणीर क भी कह सकते हैं । वंशानुगत कारकों से व्यक्तित्व गुणों का विकास होता है तथा वातावरणी क नेता बनने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ पैदा करते हैं । इन दोनों कारकों में अन्तःक्रिया . . णामस्वरूप ही कोई व्यक्ति नेता बन पाता है । यही कारण है कि पृथक - पृथक परिस्थितियों से यक् पृथक् गुण वाले व्यक्ति नेता बन जाते हैं । उदाहरण के लिए , हिटलर अपने देश में नेता बन गया , क्योंकि वहाँ परिस्थितियाँ उसके अनुकूल थीं , यदि हिटलर अमेरिका में जन्मा : होता तो कभी भी ने नहीं बन सकता था ।
नेता के सामान्य गुण - एक प्रभावी नेता में कौन - कौन से गुण होने चाहिए , इस सम्बन्ध में भी विद्वानों ने गुणों की अलग - अलग संख्या बताई है । जैसे आलपोर्ट ने 18 तथा बरनार्ड ने 28 गुणों की सूची दी है । इसी प्रकार और भी अनेक विद्वानों ने इनकी संख्या पृथक - पृथक बताई है । इन सभी का यदि विश्लेषण करें तो निम्नलिखित गुण उभरकर आते हैं –
( 1 ) शारीरिक गुण - एक प्रभावी नेता में कुछ शारीरिक गुणों का होना वांछनीय है । वह । देखने में भद्दा न लगे , शरीर की ऊँचाई , समूह के सदस्यों से बहुत अधिक कम या ज्यादा न हो , उसका वजन सन्तुलित हो , वह न बहुत दुबला हो और न बहुत मोटा । उसमें स्फूर्ति , उत्साह तथा जोश हो । जिस नेता में स्फूर्ति उत्साह तथा जोश नहीं होता है वह समूह का सही प्रकार से नेतृत्व नहीं कर पाता है ।
( 2 ) बद्धि - नेता में उच्च बौद्धिक योग्यताएं होनी चाहिए । बुद्धि के आधार पर वह समूह की विभिन्न समस्याओं का समाधान कर सकता है , समूह के लिए उद्देश्य तथा नीतियाँ निर्धारित कर सकता है । बेव तथा हीलिंगवर्थ आदि ने नेता के लिए उच्च बौद्धिक क्षमताओं का होना अनिवार्य बताया है ।
( 3 ) उद्दीपकता - नेता में स्फूर्ति , प्रसन्नता , स्पष्टता , तत्परता तथा समय की पाबन्दी जैसे गुणों का होना नितान्त अनिवार्य है । कोई भी समूह ऐसे व्यक्ति को नेता पद पर पसन्द नहीं करता है जो आलसी , निस्तेज , ढीला - ढाला , लापरवाह तथा हमेशा दुःखी रहने वाला हो ।
( 4 ) दरदर्शिता - नेता ऐसा हो जो दूर की सोच , भविष्य की सोचे वर्तमान का सामना करे । तथा भतकाल से सीखे । यदि नेता में दूरदर्शिता का अभाव है तो वह अपने अनयायियों के भावी कल्याण की योजना नहीं बना सकता है । उसमें इतनी योग्यता हो कि वह कारण - प्रभावों में सम्बन्ध स्थापित कर सके ।
( 5 ) आत्म - विश्वास - नेता में आत्म - विश्वास होना चाहिए । जिस नेता में आत्म - विश्वास होता है वह उचित निर्णय ले सकता है । आत्म - विश्वास के अभाव में वह निर्णय लेने में संकोच होगा । जो नेता अपने आप पर विश्वास नहीं करता वह दूसरों पर क्या विश्वास करेगा तथा दूसरे भी उस पर क्या विश्वास करेंगे ।
( 6 ) संकल्प - शक्ति - प्रत्येक नेता के सामने कभी न कभी कठिन समस्याएँ आ जाती हैं जिनके विषय में उसे कठोर निर्णय लेने होते हैं । नेता में जब तक दृढ़ - इच्छा शक्ति नहीं है , तब तक वह इन गम्भीर समस्याओं से लड़ नहीं सकता है । कठोर समय में भी साहस के साथ बिना विचलित हुए जो नेता कार्य करता है वही अपने अनुयायियों का आदर्श बन पाता है । नेता में आत्म - संयम , उत्तरदायित्व वहन करने की क्षमता तथा संकल्प - शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है ।
( 7 ) सामाजिकता - नेता में सामाजिकता का गुण भी होना चाहिए । यदि नेता में सामाजिकता नहीं है तो वह दूसरे सदस्यों से सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता है । सामाजिकता के अभाव में वह न तो सामाजिक - सम्बन्धों को समझ पायेगा और न सामाजिक क्रिया - प्रतिक्रियाओं को ही समझ पायेगा । सामाजिकता स्थायी नेतृत्व के लिए भी आवश्यक है ।
( 8 ) लोचशीलता - नेता में लोचशीलता हो । वह ऐसा हो जो बदली हुई परिस्थितियों के साथ ही साथ अपने आप को बदल ले । यदि नेता लकीर का फकीर बना रहता है , सामयिक परिवर्तनों के साथ बदलता नहीं , नये विचारों को अपनाता नहीं वह अपने समूह को उन्नति की ओर नहीं ले जा सकता है । अपरिवर्तनशील नेता को वैसे भी पग - पग पर कठिनाई आती हैं । नेता में लोचशीलता का होना अत्यंत आवश्यक है । उसमें प्रत्येक नई समस्या पर नये दृष्टिकोण से विचार करने की क्षमता हो । यदि वह प्रत्येक समस्या को एक ही विधि से हल करना चाहता है तो यह उसकी भूल होगी ।
उपरोक्त गुणों के अलावा नेता में उच्च कल्पना - शक्ति , अच्छी स्मृति , मृदुभाषी , व्यवहारिकता जैसे अन्य गुणों का होना भी उपयोगी रहता है ।

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