कक्ष प्रबन्धन का अर्थ
जॉनसन एवं
यूक्स का विचार
- कक्षाकक्ष
प्रबन्धन " एक संगठनात्मक कार्य प्रणाली , जिसमें विविध प्रकार के वातावरण में कार्य
किये जाते हैं जिनके परिणामस्वरूप मन में कुछ विशेष मूल्य विकसित होते हैं जैसे कि मनुष्यों
के लिए आदर , व्यक्तिगत
निष्ठा , आत्म - निर्देशन ,
सामहिक संयोजन इत्यादि । "अवधारणात्मक अर्थ - अवधारणात्मक दृष्टिकोण से कक्षाका प्रबन्धन को देखने में , व्यति प्रबन्धन के प्रति हाल के कुछ उपागम पहचानता है जैसे कि उद्देश्यों द्वारा प्रबन्धन , व्यवहार सुधार ( सकारात्मक और नकारात्मक पुनर्बलन ) , कार्य व्यवहार सम्बन्धी विश्लेषण और आकस्मिकता प्रबन्धन ।
कक्षाकक्ष प्रबन्धन के अर्थों में अध्यापक विभिन्न कार्य करते हैं जैसे कि योजना बनाना , व्यवस्था करना , समन्वित करना , निर्देशित करना , नियन्त्रित करना और व्यवहार का आदान - प्रदान करना ।
क्रियात्मक अर्थ - अध्यापक - छात्र सम्बन्ध के माध्यम से अधिगम को प्रेरित करने के लिए कक्षाकक्ष में क्रियाओं और कार्यकलापों की व्यवस्था का प्रबन्धन किया जाता है । कक्षाकक्ष की क्रियाओं का प्रबन्धन करने के लिए अध्यापक और छात्र मूलभूत घटक होते हैं ।
व्यवहारात्मक अर्थों में कक्षाकक्ष प्रबन्धन की परिभाषा - कक्षाकक्ष प्रबन्धन के आयामों को ध्यान में रखते हुए इसके अर्थ को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है
( 1 ) भौतिक आयाम या वातावरण - कक्षाकक्ष शैक्षिक संस्थान की कार्यात्मक इकाई है । संस्था का संस्थापक या प्रबन्धक स्थान - स्थल के सम्बन्ध में निर्णय लेता है और भवन , मैदान तथा । कक्षाकक्षों की रूपरेखा तैयार करता है । बैठने की व्यवस्था , प्रकाश और वायु की व्यवस्था , श्यामपट्ट और अन्य सुविधाएँ कक्षाकक्ष प्रबन्धन के लिए महत्वपूर्ण विषय होती है । प्रबन्धन के रूप में अध्यापक को कक्षाकक्ष के भौतिक वातावरण की इन सुविधाओं की जाँच करनी होती है जिन्हें अधिगम के लिए अनुकूल होना चाहिए ।
( 2 ) मनोवैज्ञानिक आयाम - अभिप्रेरणा अधिगम का हृदय होती है । जहाँ अभिप्रेरणा होगी वहाँ अधिगम होगा । अभिप्रेरणा के अभाव में अधिगम अर्जित नहीं किया जा सकता है । अध्यापक शाब्दिक और गैर - शाब्दिक ढंग से अपने छात्रों को अभिप्रेरित करता है । उसके द्वारा वांछनीय व्यवहार का पुनर्बलन किया जाता है । वह छात्रों की आकांक्षा का स्तर ऊपर उठाता है । कक्षाकक्ष प्रबन्धन में अध्यापक के सम्मिलन से छात्रों की सहभागिता को प्रोत्साहन मिलता है । छात्रों की सहभागिता और अधिगम में मनोवैज्ञानिक आयाम की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है ।
( 3 ) सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम - कक्षाकक्ष संस्था तथा समाज का लघु रूप होता । है । कक्षाकक्ष के वांछनीय सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण के माध्यम से उसमें नये समाज को आकार प्रदान किया जाता है । कक्षाकक्ष प्रबन्धन में सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण का सम्बन्ध शामिल होता है जो निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता . अध्यापक और छात्र सम्बन्ध , छावा म सम्बन्ध , ( iii ) अध्यापकों में सम्बन्धी अध्यापक एवं संस्थान के मुखिया के मध्य
( 4 ) नतिक आयाम - कक्षाकक्ष प्रधान का नैतिक आयाम छात्रों की भावनाओं , अभिलिया और नैतिक पहलू से सम्बन्धित है । अध्यापक कसा का नेता और अपने छात्रों के लिए आदर्श होता है । उसे अध्यापक की तरह दिखना और व्यवहार करना चाहिए । उसे कक्षाका का माहता आचरण का पालन करना चाहिए जो नैतिक होना चाहिए ।
कक्षाकक्ष प्रबन्धन के सिद्धान्त
कक्षाकक्ष प्रबन्धन के सिद्धान्त सामान्य और विशिष्ट दोनों हैं
1 ) कक्षाकक्ष प्रबन्धन के सामान्य सिद्धान्त - सामान्य सिद्धान्तों को योजनाबद्ध ढंग से सीखा और उनका प्रयोग किया जा सकता है । सामान्य सिद्धान्तों का प्रयोग विभिन्न स्थितियों में किया जा सकता है । ये उन समस्याओं से निपटने के लिए अध्यापक को सशक्त आधार प्रदान करते है जिनके लिए विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता होती है । सामान्य सिद्धान्त निम्नलिखित पूर्व - धारणाओं के रूप में हैं –
( i ) आत्म - नियन्त्रण - अध्यापक का लक्ष्य न केवल बाहरी नियंत्रण का प्रयोग करना होता है बल्कि आन्तरिक आत्म - नियन्त्रण को भी विकसित करना होता है ।
( ii ) समझ और स्वीकृति - जब छात्र कक्षाकक्ष के नियमों को समझते हैं और उन्हें स्वीकार करते हैं तो उनके द्वारा इनका पालन किये जाने की सम्भावना अधिक रहती है ।
( iii ) मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त - अपनी रुचियों , रुझानों और योग्यताओं के अनुसार अर्थपूर्ण कार्य में लगे हुए छात्रों की अनुशासन सम्बन्धी समस्या कम होती है ।
( iv ) उत्पादक कार्य - प्रबन्धन द्वारा केवल नियन्त्रण पर बल दिये जाने की अपेक्षा उत्पादक कार्य में व्यतीत किये गये छात्रों के समय को अधिकतम करने की ओर अपना ध्यान लगाया जाना चाहिए ।
( 2 ) कक्षाकक्ष प्रबन्धन के विशिष्ट सिद्धान्त - कक्षाकक्ष प्रबन्धन के विशिष्ट सिद्धान्त निम्नलिखित पूर्व धारणाओं के रूप में है –
1.
नियोजन
- स्वतन्य
क्रियाओं तथा संगठित पाठों का नियोजन किया जाना चाहिए ।
2.
प्रोत्साहन -
प्रयास और संकेतों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और उपयुक्त व्यवहार को पुनर्बलन
प्रदान किया जाना चाहिए ।
3.
जिम्मेदारी -
छात्रों को स्वतन्त्र
रूप से जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए ।
4.
न्यूनतम बाधा -
बाधा और विलम्ब
न्यूनतम होना चाहिए ।
5.
स्पष्ट नियम -
जब आवश्यकता हो तो स्पष्ट नियम स्थापित किये जाने चाहिए ।
6.
परस्कार - यह
निश्चित करने के लिए कि छात्रों को जानकारी हो कि क्या करना है और इसे करने के लिए
वे अभिप्रेरित
हों , वांछनीय व्यवहार का
निश्चित रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए और ऐसे व्यवहार को पुरस्कृत किया
जाना चाहिए ।
7.
अच्छा वातावरण -
कक्षा में
अच्छा वातावरण स्थापित किया जाना
चाहिए और समय एवं प्रयास को अधिकतम किया जाना चाहिए ।