हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा
हिंदी साहित्य में व्यवस्थित लेखन की परम्परा का प्रवर्तन उन्नीसवीं शती से ही आरंभ हुआ। इससे पूर्व के ग्रंथों को 'इतिहास' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। पूर्ववर्ती ग्रंथ विभिन्न कवियों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आंशिक रूप से प्रभाव डालते हैं। ऐसी प्रारम्भिक कृतियों में चौरासी वैष्णवन की वार्ता दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता भक्तमाल, कविनाला व कालिदास हजारा आदि प्रमुख हैं। इन संग्रहों में काल क्रमिक विवेचन न होने के कारण इनको साहित्य इतिहास वर्ग में स्थान नहीं दिया जा सकता। (हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा)
हिंदी में इतिहास लेखन की परम्परा के विकास में फ्रेंच विद्वान गार्सा द-तासी ने (इस्त्वार द ला लिनटरेत्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी) का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। इन्होंने हिन्दुषी हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास लिखा जिसमें हिंदी और उर्दू के विभिन्न 738 कवियों को वर्ण क्रमानुसार स्थान मिला। इसमें 72 हिंदी के कवि सम्मिलित किए गये थे। इस ग्रंथ का सर्वाधिक महत्व है कि यह हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का प्रथम प्रयास है। इस कृति में हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के कवियों को सम्मिलित किया गया है। डॉ. नगेन्द्र ने इसके विषय में कहा है कि 'कवियों को कालक्रम के स्थान पर अंग्रेजी वर्णक्रम में प्रस्तुत करना, काल विभाजन, युगीन प्रवृत्तियों का अभाव और हिंदी उर्दू कवियों को घुला मिला देना त्रुटिपूर्ण है।" अनेक न्यूनताओं के होते हुए भी इतिहास लेखन की परम्परा के प्रवर्तक के रूप में तासी को गौरव प्राप्त है।"
हिंदी साहित्योतिहास लेखक की परम्परा में शिवसिंह सेंगर का नाम विशिष्टता के साथ लिया जाता है। उनका ग्रंथ शिवसिंह सेंगर कृत 'शिवसिंह सरोज' (1965) है। इस ग्रंथ में 998 कवियों का विवरण दिया गया है। शिवसिंह सेंगर ने प्रस्तुत ग्रंथ की रचना के लिए हिंदी और संस्कृति के अनेक ग्रंथों की सहायता ली थी। शिवसिंह सरोज के विषय में कहा जा सकता है कि यह हिंदी का ऐसा पहला ग्रंथ है जो परवर्ती साहित्येतिहास लेखन का आधार ग्रंथ बना।
जार्ज इब्राहिम ग्रियर्सन ने द मार्डन वर्नाक्यूलर लिट्रेचर ऑफ हिंदुस्तान नामक इतिहास ग्रंथ की रचना की, जिसका प्रकाशन सन् 1888 ई. में हुआ। यह ग्रंथ नाम से इतिहास न होते हुए भी सही अर्थ में हिंदी साहित्य का पहला इतिहास माना जा सकता है शिवसिंह सरोज पर आधारित होकर भी ग्रियर्सन ने यथास्थान कवियों तथा उनके रचना-काल से सम्बन्धित नई सूचनाएँ प्रस्तुत की हैं। उन्होंने सामग्री को यथासम्भव कालक्रमानुसार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है इतिहास में कवियों को अंक देने वाली प्रणाली ग्रियर्सन की ही देन है। सोलहवीं सत्रहवी शताब्दी के काव्य को 'स्वर्णयुग' की संज्ञा देने वाले इतिहासकार ग्रियर्सन ही हैं। आचार्य शुक्ल ने इसी ग्रंथ के आधार पर अपने इतिहास ग्रंथ की रचना की है। इस ग्रंथ में प्रत्येक खण्डकाल विशेष के सूचक हैं जिनमें चारण काव्य, धार्मिक काव्य, प्रेम काव्य आदि का आभार होता है।(हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा)
मिश्र बन्धुओं ने मिश्र बन्धु विनोद नामक पुस्तक में हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा यह ग्रंथ चार भागों में लिखा गया है। जिसके प्रथम तीन भाग सन् 1913 ई. में तथा चतुर्थ भाग सन् 1934 ई. में प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ में कुल 4592 कवियों की जीवनी तथा आलोचनाओं के विवरण संग्रहित किये गये। इस ग्रंथ की रचना का आधार काशी नागरी प्रचारिणी सभा की खोज रिपोर्ट थी कवियों के परिचयात्मक विवरण आचार्य शुक्ल ने इसी ग्रंथ से लिया है। समस्त परवर्ती इतिहाकारों ने इसी इतिहास ग्रंथ का आश्रय ग्रहण किया है। आचार्य शुक्ल- साहित्योतिहास लेखन की परम्परा में सर्वाधिक उल्लेखनीय नाम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का रहा है। उन्होंने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सुव्यवस्थित इतिहास लिखकर इतिहास लेखन की परम्परा में एक नये युग और नयी चेतना की शुरुआत की। आचार्य शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास नामक ग्रंथ पहले हिंदी शब्द सागर की भूमिका के रूप में लिखा गया था, और फिर 1929 ई. में परिमार्जन के साथ अलग पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल में रचनाकार- चयन की गहरी दृष्टि थी चयन प्रक्रिया का परिचय देते हुए उन्होंने मिश्र बन्धु विनोद के पाँच हजार कवियों में लगभग एक हजार प्रतिनिधि कवियों को ही अपने इतिहास में स्थान दिया है। वास्तव में आचार्य शुक्ल ने इतिहासकार की तथ्यपरक दृष्टि की अपेक्षा साहित्यलोचन की गहरी और
पारदर्शी दृष्टि को प्रमुखता दी। यही अदभुत मूल्यांकन की क्षमता ही उनके इतिहास की प्राण शक्ति का पूज है। शुक्ल जी ने जनता की चित्तवृत्ति के साथ-साथ साहित्य का सम्बन्ध जोड़ते हुए उसके क्रमिक विकास ओर परिवर्तन का आलेख प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त उसमें विशेषकवियों के काव्य-गुणों व उनके महत्व का भी सोदाहरण विवेचन किया है।
अनेक विशेषताओं के बाद भी शुक्ल के इतिहास में भी कतिपय भ्रान्तियाँ और कमियां दिखायी पड़ती है।
अत्यधिक शोधों से वीरगाथा काल के नामकरण सामग्री और प्रवृतियों के विषय में आचार्य शुक्ल की मान्यताएँ और धारणाएँ आधारहीन सिद्ध हो चुकी है. ऐसे ही और भी स्थलों पर कुछ कमियों देखी जा सकती है। फिर भी शुक्ल का साहित्येतिहास लेखन की परम्परा में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी का काम करता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने साहित्येतिहास के तीन महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है।(हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा)
1. हिंदी साहित्य की भूमिका संस्करण 1940 ई-
2. हिंदी साहित्य का आदिकाल 1952 ई..
3. हिंदी साहित्य उद्भव और विकास 1955 ई.
आचार्य द्विवेदी हिंदी साहित्य की भूमिका से साहित्य इतिहास लेखन के लिए नई दृष्टि, नई सामग्री और नई व्याख्या मिलती है। आचार्य द्विवेदी ने साहित्य की विभिन्न रचना परम्पराओं उनकी शैलियों का विवरणात्मक और तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। संत काव्य की सुन्दर पृष्ठभूमि के साथ प्रेमाख्यान काव्य पर अनुसंधानात्मक कार्य करके तथ्य प्रतिपादन किया है। इनकी लेखनी से हिंदी साहित्य उदभव और विकास के अध्ययनकर्त्ताओं और परवर्ती लेखकों के लिए अपूर्व प्रेरणा स्वरूप है।
श्यामसुंदर दास का हिंदी भाषा और साहित्य भी उल्लेखनीय है। इसमें उन्होंने कवियों के विकास का कलाओं के विकास के परिपेक्ष्य में अध्ययन प्रस्तुत किया है. साथ ही ऐतिहासिक परिस्थितियों पर विशेष ध्यान दिया हैं।
डॉ. रामकुमार वर्मा हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (1938 ई.) की साहित्यिक इतिहास लेखन की योजना विस्तृत थी परन्तु वे उसे पूर्ण नहीं कर सके। उनका ग्रंथ भक्तियुग के इतिहास लेखन तक सीमित है। डॉ. सुमनराजे ने इसके महत्त्व और सीमा पर विचार करते हुए लिखा है : डॉ. वर्मा के इतिहास की सबसे बड़ी देन विपुल सामग्री का संचयन एवं संयोजन है। इस ग्रंथ के रचनाकाल तक जितनी सामग्री शोध के द्वारा प्रकाश में आयी थी, उस सबका उपयोग डॉ. वर्मा ने किया है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी के सौजन्य से हिंदी साहित्य का वृहत इतिहास प्रकाशित हुआ। यह विस्तृत इतिहास 16 खण्डों में विभक्त किया गया है। इसमें सबसे अधिक लेखकों को योगदान इसकी अपूर्व सफलता ने 100 से अधिक लेखकों और सम्पादकों की भूमिका में हिंदी साहित्य की विविध धाराओं परम्पराओं के विभिन्न सूत्रों का पूर्ण आकर्षण रूप से समायोजन किया गया है। डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त ने हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास सन् 1965 ई. में लिखा। उनके साहित्येतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने पाश्चात्य विचारकों और इतिहासकारों के विचारों का मंथन करके इतिहास प्रक्रिया का वैधानिक अध्ययन प्रस्तत किया है। YashRaj Online Education
साहित्यिक इतिहास लेखन में निम्नलिखित ग्रंथ उल्लेखनीय हैं
1. पं. रमाशंकर शुक्ल रसाल का हिंदी साहित्य का इतिहास 1931 ई.
2. श्री सूर्यकान्त शास्त्री का हिंदी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास 1932 ई.
3. डॉ. विश्वनाथत्रिपाठी का हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 1932 ई.
4. पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय का हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास 1934 ई..
5. डॉ. बच्चन सिंह द्वारा रचित हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास
6. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित हिंदी साहित्य'
7. डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय द्वारा रचित हिंदी साहित्य का इतिहास
हाल ही में दलित लेखन और नारी लेखन की परम्परा से जुड़े कुछ चिन्तकों ने साहित्येतिहास लेखन के क्षेत्र में भी काम किया है। डॉ. धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि, जयप्रकाश कर्दम तथा मोहनदास नैमिश्राय इत्यादि लेखकों ने दलित वेदना पीड़ा दलित दृष्टिकोण से इतिहास के कुछ प्रसंगों को उठाया है। वही नारी लेखन के दृष्टिकोण से डॉ. सुमन राजे ने हिंदी साहित्य का आधा इतिहास नामक पुस्तक में उन महिला लेखकों को प्राथमिकता दी है, जिन्हें सामान्यतः पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।" YashRaj Online Education
इस प्रकार हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा सतत् चलती रही है। पूर्णकालीन इतिहास ग्रन्थों से प्रेरणा लेते हुए नई मान्यताओं और मौलिकताओं के साथ नए इतिहास ग्रंथ सामने आते रहे हैं। हिंदी साहित्य के प्रारम्भिक इतिहास लेखक गार्सा-द-तासी से लेकर आज तक इस दिशा में क्रमिक विकास चलता रहा है। समय - समय पर नई दृष्टि, नई पद्धति और नए चिन्तन के आधार पर अनुकूल और संतोषजनक साहित्य इतिहास के तथ्यों का उद्घाटन होता रहा है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास की सुदृढ़ परम्परा सतत् प्रवाहित होती रही है।
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