भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग का एक अध्ययन

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग का एक अध्ययन

डॉ0 प्रफुल्ल कुमार, सहयोगी न जोअध्यक्ष - हिन्दी विभाग, जाह आर एस कॉलेज मोकामा, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय नोएडा।

मध्ययुगीन हिंदी साहित्य का पूर्व मध्य युग भक्ति परक रचनाओं की प्रधानता के कारण भक्ति काल कहा जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने इसकी समय सीमा संवत 1375 से 1700 तक माना है। इस काल में हिंदी काव्य का श्रेष्ठतम अंश उपलब्ध होता है। विशाल मानवता का काव्य इसी युग में देखा जाता है। गुणवत्ता और परिमाण दोनों दृष्टियों से निर्गुण और सगुण दोनों धाराओं से प्रवाहित होने वाला यह काव्य अत्यंत समृद्ध है। भक्ति कालीन साहित्य अपने पूर्ववर्ती एवं परवर्ती काल के साहित्य से निसंदेह उत्तम है । आधुनिक काल का व्यापक एवं वैविध्य पूर्ण साहित्य अनुभूति की गहनता एवं भाव प्रवाह की दृष्टि से भी भक्ति कालीन साहित्य के समकक्ष नहीं हो सकता। इसी विशेषता को देखते हुए विद्वानों ने "भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहा है। इसे भी पढे - सूरदास की भक्ति भावना का अध्ययन

आज से लगभग अर्ध शताब्दी पूर्व किस काल के लिए स्वर्ण युग शब्द का प्रयोग किया गया। उस समय वर्तमान युग का प्रचुर साहित्य उन विद्वानों के पास नहीं था, परंतु वर्तमान संपन्न साहित्य संपदा को ध्यान में रखकर भी यदि भक्ति काल के साहित्य का मूल्यांकन किया जाए तब भी यह अपनी कतिपय विशेषताओं के कारण हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग ही सिद्ध होता है।इसे भी पढे - सूरदास की भक्ति भावना का अध्ययन

भक्ति काल के साहित्य में निर्गुण उपासना एवं सगुन उपासक दोनों भक्तो रहस्यवादी यथार्थवादी एवं आदर्शवादी सभी विचारधारा के समर्थकों को अपने मनोनुकूल सामग्री यथार्थ रूप में प्राप्त हो जाते हैं यहीं इस काल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आकर्षण है। इस काल के काव्य जीवन सापेक्ष और जनता के अधिक निकट है। किसी अन्य कालखंड में काव्य को जनता के इतना निकट नहीं देखा जाता है। ब्रह्म का साधारणीकरण भी इसी काल में हुआ सर्वधर्म समभाव की प्रतिष्ठा के कारण जनजीवन में उदारता का उदय हुआ और धार्मिक संकीर्णता दब गई। कबीर आदि की समन्वयात्मक सुधारवादी दृष्टि जायसी आदि सूफियों की उदारता सूर मौरा रहीम, रसखान तक आते- आते व्यापक जीवन दृष्टि में बदल गई । यह व्यापक जीवन दृष्टि ने अकबर को हिंदू पति बनाया तो रसखान रहीम और ताज बीवी को कृष्ण प्रेम में दीवाना किया। बीरबल तथा मानसिंह को अकबर के लिए मर मिटने को प्रेरित किया । गोवध बंद करवा कर प्रेम का साम्राज्य स्थापित करा दिया । इस काल में भारत की चिरंतन समन्वयवादिता जितनी सफल हुई उतनी कभी नहीं । गुप्त काल के बाद फिर से इसी काल में साहित्यिक सांस्कृतिक राजनीतिक और धार्मिक जगत में अनेक महान प्रतिभाएं उत्पन्न हुई और हमारे जीवन दर्शन को अमर कर दिया। इससे हिंदू समाज की अक्षयता सिद्ध हो गई।(भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग)

डॉक्टर गुलाब राय ने भक्ति कालीन साहित्य की दो प्रवृत्तियां निश्चित की हैं- निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति । परंतु काव्य धारा तीन मार्गों से बहती हुई दिखती है
  1. निर्गुण संत काव्य, 
  2. निर्गुण प्रेमाख्यानक काव्य, 
  3. सगुण भक्ति काव्य ।

निर्गुण संत काव्य- निर्गुण भक्ति में भगवान को अरूप अलख और निराकार माना गया है। इसी भक्ति में मूर्तियों की आवश्यकता नहीं होती है। 
इसके दो भेद जानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी माने गए हैं। ज्ञानाश्रयी धर्म के वाह्याडम्बरों की उपेक्षा करते हुए मात्र मानसिक पूजा पर बल दिया। प्रेमाश्रय शाखा हिंदुओं के एकेश्वरवाद के निकट है। ईश्वर को प्रेम पात्र के रूप में इस शाखा वाले देखे ज्ञानाश्रयी शाखा हिंदुओं की ओर से हिंदू मुस्लिम एकता स्थापित करने की इच्छा का फल थी । संत कवियों ने राम और रहीम की एकता स्थापित कर हिंदू मुसलमानों में व्याप्त विरोध भाव का दमन किया। कबीर, नानक दादू आदि इस धारा के मुख्य कवि हैं। प्रेम मार्गी शाखा मुस्लिम संतों और सूफियों की सद्भावना का परिणाम है। इन संतों ने हिंदू धर्म गाथाओं को लेकर काव्य रचना की और अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। जायसी इस धारा के प्रमुख कवि हैं।

मिथ्याडंबरों के प्रति जैसी अनास्था इस काल के संत कवियों ने व्यक्त की है वैसी ना तो पहले कभी कोई समाज सुधारक कर सका था और ना परवर्ती युग में ही किसी का वैसा साहस हो सका। इन संत कवियों की वाणी का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर पड़ा । इस युग में सत्य को प्रकट करने का और क्रांतिकारी विचारों के उद्बोधन का जो साहस संत कवि कबीर आदि में देखा जाता है वह कम आश्चर्य की बात नहीं है । आगे चलकर इन संतों की धारणाएं पंथ या मत में स्थान पा जाती हैं। कबीर पंथ नानक पंथ आदि इसके उदाहरण हैं। मानव समाज के सामूहिक कल्याण की धर्मनिरपेक्ष सतगुरु की वाणी संत काव्य परंपरा में निहित है। इस युग में व्यापक वैचारिक सक्रांति का जन्म हुआ। अवतारवाद, पूजा, सेवा, रोजा -नमाज मंदिर मस्जिदजिद तीर्थ व्रत आदि को नकारा गया और सत्य समता और सदाचार का आदर्श प्रस्तुत हुआ । इनकी कविताओं में सहज सामान्य जन भाषा अपनाई गई। इन कवियों ने काव्य शास्त्र का अध्ययन नहीं किया था परंतु इनकी भाषा इतनी लोकप्रिय हुई कि आज भी दैनिक जीवन में उनकी उक्तियों का प्रयोग व्यवहारिक भाषा में होती है।

निर्गुण प्रेमाख्यानक काव्य भक्ति काल को स्वर्णयुग बनाने में इस धारा के कवियों का योगदान भी किसी से कम नहीं है। इस काव्य की दो धाराएं मिलती हैं- आध्यात्मिक प्रेम अर्थात ईश्वरीय प्रेम के व्याख्याता तथा अलौकिक प्रेम के व्याख्याता । प्रथम धारा के कवि अधिक श्रेष्ठ हुए । आध्यात्मिक प्रेमाख्यानक काव्य परंपरा के प्रमुख कवि जायसी कुतुबन मज्झन आदि सूफी कवि और नंददास नारायण दास आदि हिंदू कवि हैं। गवाही तवई आदि दक्षिणी हिंदी के प्रसिद्ध कवि हुए।
"सूफी प्रेमाख्यानक परंपरा के कवि निर्गुणोपासक थे। वे अपने काव्य में यह बतलाते कि आत्मा परमात्मा की प्राप्ति के लिए व्याकुल रहती है। इस व्याकुलता में उसका एकमात्र संबल ईश्वर का प्रेम ही है । यह प्रिय वर्णन नायक नायिका के प्रेम वर्णन के समान ही काव्य में लगता है। कवियों ने अपने काव्य के माध्यम से हिंदू मुस्लिम संस्कृतियों के समन्वय का प्रयास किया है। काव्य के माध्यम से भावात्मक एकता का यह प्रयास हिंदी भक्ति साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है। भाव और भाषा के धरातल पर यह काव्य सर्वजन सुलभ और समृद्ध है। ईश्वर प्रेम के साथ मानवतावाद से परिपूर्ण यह काव्य समाज को आडंबर से मुक्त करने वाला है इसलिए यह काल स्वर्ण युग कहा गया है।(भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग)

सगुण भक्ति काव्य- रूप, गुण, शील, सौंदर्य की मूर्ति ईश्वर को अपने निकट देख पाने की लालसा भक्तों की सहज इच्छा है और इस इच्छा की पूर्ति सगुण भक्ति काव्य में ही पहली बार हुई । मध्ययुगीन हिंदू जनता में सगुण भक्ति काव्य ने अद्भुत और अभूतपूर्व विशेष रूप से ईश्वर विश्वास पैदा किया। इस काल के काव्य ने हिंदू जाति को अवसाद कुंठा, निराशा और दैन्य भावना से मुक्त किया।इसे भी पढे - सूरदास की भक्ति भावना का अध्ययन

सगुण भक्ति के भी दो उपभेद हैं- कृष्ण भक्ति और राम भक्ति कृष्ण भक्ति के अंतर्गत भगवान कृष्ण को ही सर्वशक्तिमान माना गया है। स्वामी वल्लभाचार्य तथा उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने हिंदी भक्त कवियों को इस ओर प्रेरित प्रोत्साहित का अष्टछाप के कवियों सूरदास, नंददास और परमानंद दास ने अपनी अद्भुत प्रतिभा द्वारा अप्रतिम काव्य रचना की। उन्होंने मनुष्य की रागिनी वृत्ति को परिष्कृत करने के लिए अपने कार्यों में सुंदर और समृद्ध भाव संपदा प्रस्तुत की । सूरदास इनमें विशेष उल्लेखनीय है इसकी भक्ति का आधार पुष्टि अर्थात भगवत कृपा है। भगवत कृपा के सहारे ही मनुष्य अपने दुख से मुक्ति प्राप्त कर सकता है । अनुग्रह और प्रपति का मार्ग मानव का सबसे बड़ा संबल है जिसे खोज निकालने का श्रेय इन्हीं कृष्ण भक्त कवियों को है। इनके अतिरिक्त रसखान विद्यापति आदि ने भी कृष्ण संबंधित रचनाएं की वैष्णव कृष्ण भक्त कवियों ने सांप्रदायिक स्तर पर कृष्ण भक्ति का विविध रूपों में पल्लवन किया । वल्लभ संप्रदाय निंबार्क संप्रदाय आदि अनेक संप्रदाय का प्रवर्तन हुआ। जिनके शताधिक कवियों ने राधा कृष्ण की विविध लीलाओं का मनोहारी शैली में वर्णन किया। यह इन कवियों की महत्वपूर्ण देन है।(भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग)

राम भक्ति काव्य के अंतर्गत राम को आदर्श पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित कर के माता-पिता, पिता-पुत्र, पति -पत्नी स्वामी सेवक आदि पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों का वर्णन किया गया है हिंदी में राम काव्य के प्रथम कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। इनके पूर्व के कवियों भगवानदास और चाणक्य का पता बाद में चला परंतु वह संदिग्ध है। लोग मर्यादा की स्थापना के लिए तुलसीदास की रामचरितमानस से उत्तम ग्रंथ हिंदी में न तो पहले लिखा गया था। और ना इसके बाद ही लिखा गया। तुलसी ने अपने ग्रंथों के माध्यम से शैव वैष्णव शाक्त संप्रदायों के भीतरी वैमनस्य को दूर करने का जो संयत एवं स्वस्थ प्रयास किया वैसा हिंदी साहित्य के इतिहास में कभी नहीं हुआ।

काव्य शिल्प की दृष्टि से भक्ति काल का कार्य अत्यंत संपन्न है कवियों की मूल प्रेरणा स्रोत भक्ति भाव होते हुए भी कुछ संत कवियों को छोड़कर सभी उच्च कोटि के कवि। इन्होंने काव्यशास्त्र के अपने सम्यक ज्ञान का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। इन कवियों ने रीतिकालीन कवियों के समान छंद और अलंकार का भले ही ध्यान नहीं रखा परंतु वह छंद अलंकार से वंचित भी नहीं रहे । शायद ही कोई अलंकार हो जिसका यह प्रयोग नहीं किए हों। तुलसी और सूर ने तो प्रस्तुत विधान का सौंदर्य निखार दिया है। काव्य और संगीत का समन्वित समीकरण यदि कहीं अपने आकर्षण के रूप में दिखाई देता है तो भक्तिकालीन काव्य में लय, ताल, स्वर यति गति आदि की साधना के बाल पद शैली में इन कवियों ने जो कुछ भी रचा वह परवर्ती कवियों के लिए अनुकरणीय बन गया। इस युग की रचनाओं में काव्य एवं संगीत का सुंदर समन्वय देखा जा सकता है सौंदर्य विधायक सभी तत्व इस युग के काव्य में भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। रस रीति ध्वनि वक्रोक्ति अलंकार आदि का सहयोग रीतिकालीन काव्य से भी अधिक हुआ है। इसी काल में भक्ति भावना को संप्रदाय या मत पंथ से संपर्क रखते हुए काव्य रचना करने वाले श्रेष्ठ कवि रहीम रसखान सेनापति और कवयित्री मीरा भी उत्पन्न हुए। रहीम ने आदर्श व्यवहार नीति विषयक रचनाएं लिखी रसखान का कृष्ण और ब्रज के प्रति प्रेम हिंदी साहित्य में अप्रतिम है। सेनापति का शुद्ध आलंबन का प्रकृति वर्णन इतना सुंदर एवं संस्कृत है कि रीतिकाल में भी नहीं मिल सकता है। मीरा का कृष्ण प्रेम या कृष्ण भक्ति समर्पित व्यक्तित्व की सुन्दरतम झांकी सिद्ध हुई है। भक्ति काल का अवलोकन करके मध्यकालीन भारतीय संस्कृति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। भारतीय धर्म दर्शन संस्कृति सलाहकार व्यवहार आदि का सुदृढ एवं सुंदर कलेवर इस युग के कार्यों में सुरक्षित है। समन्वयवादी चेतना के विकास की विराट चेष्टा इन्हीं कार्यों में देखी जाती है । इस प्रकार भारत की चिरंतन समन्वयवादिता की सफलता हो या धर्म के बाह्याडम्बरों की उपेक्षा, सत्य को प्रकट करने की प्रबल तत्परता हो या लोग मर्यादा की स्थापना, ईश्वर के प्रति स्वक्ष प्रेम प्रतिष्ठा हो या ब्रह्म का साधारणीकरण सभी दृश्यों से भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग सिद्ध होता है।

कला के लिए नहीं बल्कि जीवन को परिष्कृत करने के लिए है कला की सार्थकता मानव मन की पीड़ा दूर करने उसमें सविद्या भरकर उसे प्रसन्न, संपन्न और सुखी बनाने में है इसी भक्तिकाल में साहित्य कला की यह विराट चेष्टा हिंदी साहित्य के अन्य युगों की अपेक्षा कई गुना अधिक महान देखी जाती है। इस संदर्भ में डॉक्टर श्यामसुंदर दास के विचार भी द्रष्टव्य है जिस युग में कबीर, जायसी, तुलसी, सूर जैसे प्रसिद्ध कवियों और महात्माओं की दिव्य वाणी उनके अंतर: करणो सेनिकलकर देश के कोने-कोने में फैली थी उसे साहित्य के इतिहास में सामान्यता अक्ति युग कहते हैं, निश्चित ही वह साहित्य का स्वर्ण युग था।" आगे वे लिखते हैं हिंदी काव्य में से यदि वैष्णव कवियों को निकाल दिया जाए तो जो बचेगा वह इतना हल्का होगा कि हम उसपर किसी प्रकार का गर्व गर्व न कर सकेंगे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि समूचे भारतीय इतिहास में अपने ढंग का अकेला साहित्य है इसी का नाम भक्ति साहित्य है यह एक नई दुनिया है।

भाव पक्ष एवं कला पक्ष भाषा काव्य रूप की दृष्टि से नाटक, कहानी, उपन्यास आदि को लेकर आधुनिक काल अधिक उत्कृष्ट है इस दृष्टि से भक्तिकाल अन्य सभी कालू की अपेक्षा सर्वोत्कृष्ट है अतः निसंदेह यह स्वर्ण युगया होता है किंतु गद्य और पद्य दोनों की उच्चता गहनता और व्यापकता की दृष्टि से आधुनिक काल आगे है फिर भी अनुभूति की गहनता और भाव प्रबलता की दृष्टि से यह भक्ति काल से आगे नहीं निकलता है। आदिकाल और रीतिकाल तो भक्तिकाल की प्रतिद्वंद्विता में बिल्कुल ही नहीं ठहरते हैं।(भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग)

स्रोत- डॉ0 प्रफुल्ल कुमार, सहयोगी न जोअध्यक्ष - हिन्दी विभाग, जाह आर एस कॉलेज मोकामा, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय नोएडा।

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