सामाजिक वानिकी [ SOCIAL FORESTRY ] BEd, UPTET, CTET की परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण।
प्रस्तावना ( Introduction )
वन ( Forests ) हमारे जीवन आश्रयदाता हैं । यह कितने लाभदायक हैं और इनके बिना इस की कही जाने वाली धरती पर कैसे रह पायेंगे , इसका विवरण और विश्लेषण हमने पिछले अध्याय किया है । इनकी वृद्धि ( Growth ) , प्रबन्धन ( Management ) और रख - रखाव ( Maintenance ) का जिस किसी भी तरीके से किया जाता है उसे वानिकी ( Forestry ) नाम दिया गया है । अतः निकी वक्षारोपण सम्बन्धी सभी कार्यकलापों की एक व्यवस्था है ( Forestry is the methodology of management of forest planting and maintenance ) |
केवल सविधा और आम व्यक्ति के समझने के लिये इसके अनेक क्षेत्र सम्बन्धी नाम दे दिये गये हैं
1 . स्थान विशेष सम्बन्धी ( Relating to Places )
( i ) ग्रामीण वानिकी ( Rural Forestry ) : ग्राम समाज की भूमि तथा गाँव के अन्दर निवासियों के भूखण्डों पर वृक्षारोपण ।
( ii ) नगरीय वानिकी ( Urban Forestry ) : शहरी क्षेत्र में वनों के विकास , विस्तार और व्यवस्था सम्बन्धी कार्य ।
2 . कार्य की दृष्टि से ( Pertaining to Field )
( i ) कृषि वानिकी ( Agriculural Forestry ) : फसलों के उत्पादन के क्षेत्र में ।
( ii ) उद्यान वानिकी ( Horticultural Forestry ) : फल और फूलों के क्षेत्र में ।
3 . स्वामित्व के प्रकार से ( Relating to Ownership )
( i ) राजकीय स्वामित्व ( Government Ownership ) : भूमि जो राज्य सरकारों के अधीन है ।
( ii ) जमीदारी प्रथा ( Jamidari System ) : जिसका मालिकाना हक किसी विशेष व्यक्ति के अधीन रहता है ।
( iii ) गाव के अधीन ( Attached to the Villages ) इनमें विशेषकर ' गोचर भूमि होती है जहाँ चराई का काम स्वतंत्र और निर्भीकता से किया जाता रहा है । मन्दिर के अहाते की भूमि भी अणी में आती है जिसकी देखभाल खासतौर पर मन्दिर का पुजारी ही करता है । इस भूमि पर गांव के लोगों का समूहिक हक होता है ।
4 . संभागित्व के प्रकार से ( As per Participation )
• वैयक्तिक ( Individual )
• शामिलाती ( Joint )
• सामूहिक ( Collective )
. राजकीय व्यवस्था ( Governmental Management ) ament ) अयी तथा कही भी व्यवस्थाओं में गांव उचित स्थान नहीं सदस्यों के साथ Bण कृषि व्यवस्थ करते रहे हैं । को जिन्हें पूर्व से ही सामान तो पारिश्रमिक रूप सर अतः उनका न तो गांव सहा " कन इन सभी व्यवस्थाओं में गांव के निर्धन लोग पराश्रयी तथा अन्य उस श्रेणी के व्यक्तियों पूर्व से ही सामाजिक व्यवस्था में उचित स्थान नहीं मिल पाया , कहीं भी जुड़े नहीं हैं । वह रामक रूप से ही जीवन भर अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ गुजारा करते रहे हा " नता गाव से ही कोई अति निकट का जुड़ाव है और न ही ग्रामीण कृषि व्य वस्था से ।
सन् 1952 के भारत के आंकड़े बताते है कि उस समय 329mh भूमि पर 75mh ( 22 . 79 % ) वन क्षेत्र थे जबकि राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार 33 % वन क्षेत्र ( 110mh ) अपेक्षित थे । तो कितना भारी अन्तराल वनों की स्थिति में स्पष्ट रूप से दृष्टिगत रहा है । यह 75mh वन क्षेत्र भी निरन्तर सिकुड़ रहा है ( विशेषतः खाद्यान्न उपजाने के लिये कृषि क्षेत्र में वृद्धि तथा अनेक प्रकार की इन्डस्ट्रीज , आवागमन के साधन , सड़कें और विकार कार्य के कारण वनों का कटना ) । सन 2004 में वन क्षेत्र अब 67 . 83mh पर ही हैं । जो कुल भूमि का 20 . 64 % होता है । इन आंकड़ों की व्यावहारिकता पर भी विश्वास कम हो रहा है । Sensory Remote System से जब 10 - 12 % वनों की बात की जानकारी की बात मिले तो देश का भविष्य अधर में झूलने लगता है । 110mh - 67 . 83mh = 42 . 17mh = 4 , 217 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में वन कैसे लगें ? इस विचार ने नई योजनाओं को बनाने की राह की ओर इंगित किया है । देश के वनों की नवीनतम स्थिति के लिये ' वन ' के अध्याय को देखें । _ देश के सभी ग्रामीण क्षेत्र के उन लोगों को जिन पर वस्तुत : काम नहीं है और देश का इतना वनहीन क्षेत्र जिसकी कोई ठोस साज संवार अथवा व्यवस्था नहीं है , को यदि सामूहिक रूप से किसी प्रकार जोड़ दिया जाय तो समस्या का समाधान सम्भव है । यहीं से “ सामुदायिक वानिकी ' Community Forestry ) की विचारधारा उठी है , जिसे बाद में “ सामाजिक वानिकी ( Social Forestry ) का नाम दिया गया है । वस्तुत यह विचार 1970 के आसपास का रहा है ।
सामाजिक वानिकी ( Social Forestry )
"सामाजिक वानिकी देश के निरन्तर नष्ट हो रहे वनों की स्थिति सुधारने और अधिक से | भ भाग पर वृक्षारोपण करने के लिये राष्ट्रीय कार आयोग ( National Commission on Agriculture : 1976 ) द्वारा अभिशंसित वह कार्यक्रम है जिससे ग्रामीण भारत की सामाजिक , आर्थिक और सांस्कृतिक स्थितियों में सम्पूर्ण परिवर्तन लाया जा सके । सन् 2003 के आंकड़ों के अनुसार भारत के भू भाग पर केवल 20 . 64 प्रतिशत क्षेत्र में वन हैं जो 0 . 06 हेक्टेयर पनि मनष्य के हिसाब से हैं । विशेषज्ञों के अनुसार 33 प्रतिशत वन क्षेत्र आवश्यक हैं , जिनसे वृक्षों का प्रति व्यक्ति क्षेत्र 0 . 11 हेक्टेयर होता है । सामाजिक वानिकी के मुख्य उद्देश्य , ( 1 ) राज कीय वन क्षेत्रों को छोड़कर शेष सभी वृक्ष लगाये जा सकने वाले भू भाग पर वृक्षारोपण , ( 2 ) नष्ट हुये वन क्षेत्रों को सुधारना और ( 3 ) वायु क्षारण से कृषि उपज की रक्षा करना है । इस कार्यक्रम में आम जनता की भागीदारी , सहयोग और साझेदारी प्रमुख हैं , अतः इसे ' जनता का , जनता द्वारा और जनता के लिये कार्यक्रम ' भी कहा जाता है । इसी सहभागिता के आधार पर इसे ' सामुदायिक वानिकी ' भी कहा जाता है । हमारे देश में इस कार्यक्रम का शुभारम्भ भारत सरकार की गजट विज्ञप्ति के बाद 1 जून , 1990 से ही हुआ । सर्वप्रथम गुजरात राज्य से प्रारम्भ होकर फिर शनैः - शनैः कुछ अन्य प्रदेशों में भी चलाया गया । | इस कार्यक्रम को , ( 1 ) विश्व बैंक तथा ( 2 ) कनाडा , स्वीडन और अमेरिका की विकास एजेन्सियों से वित्तीय सहायता मिली । प्रारम्भ में चार प्रकार । कार्यक्रम , ( 1 ) नष्ट हये वनों का सुधार ( Reforest तः of Degraded Forests ) , ( 2 ) कृषि वानिकी ( Far Forestry ) , ( 3 ) विस्तार वानिकी ( Extension For restry ) , ( 4 ) विकृत स्थानों को उपयोगी बनाना ( Ke creation Forestry ) , इस योजना में चलाय T ICE Farm ना में चलाये गये ।"
सामाजिक वानिकी ( Social Forestry )
जैक वैस्टोबी ( Jack Westoby ) ने नई दिल्ली ( भारत ) में 1968 में आयोजित Ninth Common - wealth Forestry Conference में इस नये नाम ' सामाजिक वानिकी ' का उल्लेख करते । हुये कहा था कि आज भारत जैसे विकासशील देश को ऐसे तंत्र ( System ) की आवश्यकता है जो यहाँ के निवासियों की मूल - भूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी कर सकता हो और उन्हें आर्थिक लाभ के साथ - साथ सहयोग , सहभागिता और अपनापन की ओर भी आकर्षित कर सकता हो । 1973 में National Commission on Agriculture ( राष्ट्रीय कृषि आयोग ने अपनी अन्तरिम रिपोर्ट में इस तथ्य को प्रस्तुत करते हुए लिखा था - " समुदाय की वानिकी सम्बन्धी क्रियाकलापों में सक्रिय साझेदारी ही सामाजिक वानिकी का आधार बन सकती है ( Involvement and participation of the community in forestry related activities are essential components of the social forestry . ) / इसी आधार पर सामाजिक वानिकी को उन्होंने निम्न प्रकार परिभाषित करने का प्रयास किया । था .|
• सामाजिक वानिकी के उद्देश्य ( Objectives of Social Forestry ) भारत देश जो कभी वन सम्पदा के सन्दर्भ में अत्यन्त समृद्ध रहा होगा ( जिसका वर्णन हमारे । पुराने ग्रंथों में मिलता है ) , उसकी स्थिति आज इतनी शोचनीय हो जायेगी इसकी कल्पना ही भयभीत कर देती है । वनों की कमी और बढ़ती जनसंख्या के अनुसार कृषि क्षेत्र में वृद्धि ने प्रकृति तंत्र को असहाय बना दिया है । आवास तथा अन्य विकास कार्य में लगी भूमि ने भी वनों का एक बड़ा भाग आत्मसात कर लिया है । देश के निवासी कछ आधुनिक सुविधाओं को प्राप्त कर अपने आप को गौरान्वित महसूस करते हैं , वहीं आम जनता , विशेषकर ग्रामों में रहने वाली , को न भरपेट भोजन है , न स्वच्छ आवास है । भोजन पकाने को ईंधन की कमी , पशुओं को चारे का अभाव और जीविका कर सकने की विवशता ने उन्हें लाचार और पंगु बना दिया है । बंधुआ मजदूरों की श्रेणी में पेट भरने के लिये पूरा परिवार जहाँ तहाँ कार्य करना उनकी मजबूरी है । इन्हीं समस्याओं के ने ही ' सामाजिक वानिकी को जन्म दिया है ।
राष्ट्रीय कषि आयोग ( National Commission on Agriculture ) ने अपनी 1976 की रिपोर्ट में सामाजिक वानिकी की परिधि में पुनः वनीकरण ( Reforestation ) , नष्ट हो रहेको उन्नयन ( Rehabilitation of Degraded Forests ) , कृषि वानिकी ( Farm Forestry ) और जिला वानिकी ( Extension Forestry ) को ग्रामीण क्षेत्र में पनपाने की और ध्यान केन्द्रित करते हुये बता था कि भारत के लिये यह प्रत्यय ( Concept ) बहुत नया नहीं है । यह वस्तुत : Royal Commission On Agriculture ( RCA ) जो भारत में 1928 में आयोजित हुआ था , की सिफारिशों की पुनरावलि मात्र है , जिसमें ग्रामीण लोगों की जलाऊ लकड़ी और पशुओं के चारे की आवश्यकता की पति रेत ' ग्रामीण वनों ( Village Forests ) की बात कही गई थी जिससे संरक्षित वनों को भी बचाया जा सके और निर्धन गाँव के लोगों की कठिनाइयों को भी दूर किया जा सके ।
राष्ट्रीय कृषि आयोग ( NCA ) ने सामाजिक वानिकी ने निम्न उद्देश्य प्रस्तावित किये थे -
1 . ग्रामीण क्षेत्र में जलाऊ लकडी की आपूर्ति तथा गोबर को खेत में खाद के रूप में प्रयोग करने हेतु बचाना ।
2 . ग्राम निवासियों की मवेशी के लिये चारे की आवश्यकता की पूर्ति करना ।
3 . ग्रामीण क्षेत्र में घरेलू , कुटीर उद्योग तथा वन आधारित लघु उद्योगों को चलाने हेतु कच्चे माल की आपूर्ति करना ।
4 . सामाजिक वानिकी गतिविधियों से निर्धन ग्रामीणों को जीविका उपार्जन हेतु रोजगार उपलब्ध कराना ।
5 . गाँवों में नष्ट हो रहे वन भूमि क्षेत्र पर ( 1 ) पुनर्वनीकरण , ( Reforestation ) , ( 2 ) पुनद्धार ( Rehabilitation ) और ( 3 ) पुनस्र्थापन ( Rerestoration ) करना ।
6 . राष्ट्रीय वन नीति ( 1951 ) की अभिशंसा के अनुरूप भूमि के 33 % भाग में वनों का लक्ष्य प्राप्त करना ।
7 . ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में मनोरंजन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना । और ।
8 . शहरी क्षेत्र के ध्वनि प्रदूषण को कम करना और शहरी परिदश्य में सुन्दरता का खि करना ।
• ' सामाजिक वानिकी ' का कार्य क्षेत्र ( Coverage and Scope of Social Forestry )
राष्ट्रीय कृषि आयोग ( NCA ) ने सामाजिक वानिकी को निम्न चार क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है ।
1 . नष्ट हो रहे वन क्षेत्रों में पुनर्वनीकरण ( Reforestation of Degraded Lands ) क्षेत्र हैं जो आबादी के आसपास के तो हैं , पर इन पर कोई ध्यान नहीं देने से निरन्तर हैं । छितराये वृक्ष , कटी - फटी झाड़ियों और चाहे - अनचाहे जंगली पैदावार के झुण्ड धिनाना उत्पन्न करते हैं । इन्हें वहीं सुधारात्मक उपचार की आवश्यकता है और यदि जरूरी हो । को रोपने का कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है ।
2 . कृषि वानिकी ( Farm Forestry ) : किसानों द्वारा अपने खेतों के अन्दर और बाहर की मेडों पर , आने - जाने के रास्तों पर और सामुदायिक क्षेत्र में वृक्षारोपण इस वानिकी म ही हवाओं के जोर कम करने तथा लगे हुये पहले पौधारोपण की सरक्षा ( Wind , Chalter Belts ) , रेल की पटरियों तथा सड़कों के साथ - साथ और किसी भी प्रकार से बंजर हुई भूमि पर वृक्षारोपण भी इसी श्रेणी में आता है । पंचायत घर , चिकित्सालय जाति में भी वृक्ष लगाने का कार्य कृषि वानिकी के अन्तर्गत होता है । ओर .
3. विस्तार वानिकी ( Extention Forestry ) : इसका क्षेत्र बहत व्यापक है । इसमें ( 1 ) नहरों के किनारे । , ( 2 ) रेल लाइन तथा सड़कों के दोनों ओर,( 3 ) उच्च वोल्टेज के बिजली के तार के नीचे बड़े बड़े जलाशयों की पाल और ( 4 ) जो भी भूमि भाग अनुपयोगी हो , वृक्ष लगाने के कार्य को सम्मिलित किया जाता है ।
4. मनोरंजक वानिकी ( Recreation Forestry ) : विकृत हुए वन क्षेत्रों को सुधारकर उन्हें उस नाना जो आम जनता का मनोरंजन भी कर सकें . जैसे - ( 1 ) बैठने के छायादार स्थान जाना ( 2 ) पिकनिक स्थलों का निमाण , ( 3 ) खेलने - कूदने , नोका बिहार , घड़सवारी स्थल आदि की व्यवस्था तथा ( 4 ) चिड़ियाघर और अजायबघरों का निर्माण आदि ।
एम सीताराम राव ने अपनी पुस्तक सोशल फोरेस्ट्री में सामाजिक वानिकी के अन्तर्गत कार्यों का विस्तृत विवरण निम्न प्रकार समेकित किया है
1 . खेतों पर यायु - अवरोधक ( Wind Breaks ) लगाना ।
2 . सुरक्षा पट्टियाँ ( Shelter Belts ) तैयार करना ।
3 . सडकों के दोनों ओर घनी और व्यापक वृक्षावली लगाना ।
4. गाँवों में सामूहिक स्थानों तथा बंजर भूमि पर वृक्षारोपण ।
5 . रेल लाइनों के दोनों ओर तथा नहरों के किनारों पर वक्षारोपण ।
6 . बड़े - बड़े कार्यों पर वृक्षों के झुण्ड ( Clusters ) के प्रकार से वृक्षारोपण ।
7 . गाँवों के आस - पास तथा राज्य मार्गों पर यात्रियों के विश्राम स्थल बनाने हेतु वृक्षारोपण ।
8 . सिंचाई के लिए बनाये गये तालाब तथा बाँधों के पास घना वृक्षारोपण ।
9 . दलदली भूमि को सुखा कर उसे उपयोग में लाने हेतु वृक्षारोपण ।
10 . नदियों और झरनों के सहारे - सहारे वृक्षारोपण ।
11 . भूमि क्षरण की सम्भावना वाले क्षेत्रों में वृक्षारोपण ।
12 . भूमि संरक्षण उपाय हेतु वृक्षारोपण ।
13 . पर्यावरण सन्तुलन व स्वच्छ बनाने हेतु नगरों के प्रमुख स्थानों पर वृक्षारोपण ।
14 . सिंचाई योजनाओं के कमाण्ड एरिया में वृक्षारोपण । इनके अतिरिक्त भी अनेक स्थान हो सकते हैं जहाँ वृक्षारोपण किया जाना सम्भव है , उसे इस सूची में जोड़ लें ।
• सामाजिक वानिकी कार्यक्रम में भागीदारी
( Participation in Social Forestry Programme )
यह हमने पूर्व में इगित किया है कि ' सामाजिक वानिकी का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण निर्धनों के जावन को शोचनीय स्थिति से उठाकर उन्नत रूप में लाना है । अतः उनकी सक्रिय भागीदारी तो इस कार्यक्रम में आवश्यक रूप में होगी ही . पर इस कार्यक्रम से किन - किन लोगों , संस्थानों और विभागों का जोड़ने से प्रायोजना की सफलता को निश्चित और निर्वाध गति मिल सकेगी , उस हेतु एक सूची प्रस्तावित है -
1 . भूमिहीन एवं साधनहीन व्यक्ति ( पुरुष और महिलायें ) जिनकी वृक्षारोपण में कार्य में रुचि
2 . छोटे किसान जिन्हें अपने खेतों की मेढों तथा घरों के पिछवाड़े में वृक्ष लगाने हों ।
3 . बड़े किसान जिन्हें अपने खेतों के किसी भाग में वृक्षारोपण करना हो ।
4 . पंचायतें जिन्हें गाँव के सामुदायिक भूमि भाग पर वृक्ष लगाने हो ।
5 . विद्यार्थी एवं अध्यापक जिन्हें शिक्षण संस्थाओं में वृक्षारोपण कार्य करना हो ।
6 . औद्योगिक घराने जिन्हें अपने - अपने उद्योग स्थलों पर ध्वनि प्रदूषण को कम करने अथवा बाहरी वातावरण को सुन्दर बनाने हेतु वृक्षावलियों लगानी हो ।
7 . सेना की छावनियों में सुन्दर परिदृश्य बनाने हेतु वृक्षारोपण करना हो ।
8 . राज्य विभाग जिन्हें अपने - अपने कार्यालयों के अहातों में सुन्दरता बढ़ाने हेतु वृक्षारोपण करना हो ।
9 . रेल विभाग जिन्हें प्लेटफार्म रेल लाइनों के दोनों ओर और कर्मचारियों के आयाम पर वृक्ष लगाने हों ।
10 . ग्राम पंचायतें अपने गांव के पर्यावरण को स्वच्छ बनाने हेतु वृक्षारोपण करती हों ।
11 . वन विभाग जिन्हें राज - मार्गो , नहरों , जलाशयों आदि पर वृक्षारोपण करना हो ।
12 . स्वयंसेवी संस्थाएं और उनके सहयोगी जो वृक्षारोपण कार्य सम्पन्न कराने में अग्रसर रहते हैं।
इन सभी का सहयोग ' सामाजिक वानिकी ' प्रायोजना को प्रश्रय देगा , ऐसा विश्वास सकता है ।
सामाजिक वानिकी ' कार्यक्रम की उपयोगिता ( Utility of Social Forestry Programme )
यह तो स्पष्ट ही है कि अन्ततोगत्वा सामाजिक वानिकी कार्यक्रम है तो वनारोपण कार्यक्रम ही , अतः जो भी लाभ वृक्षों के सघन होने से हो सकते हैं वह तो इस प्रायोजना से मिलेंगे ही , लेकिन जो वृक्षारोपण विशेष स्थानों पर किये जाने का इस कार्यक्रम में उल्लेख है उनसे सम्बन्धित अच्छे परिणामों की भी इस कार्यक्रम से आशा कर सकते हैं । एक सूची के अनुसार कार्यक्रम की उपयोगिता को निम्न बिन्दुओं में रखा जा सकता है - ( 1 ) पर्यावरण में सुधार . ( 2 ) प्रदूषण में कमी ( 3 ) जनसाधारण की मूलभूत आवश्यकताओं . इंधन , लकड़ी , खाद एवं अन्य वस्तुएँ आदि की पूर्ति , ( 4 ) उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति , ( 5 ) पक्षियों के लिए आवास अथवा आश्रय , ( 6 ) वायु के तेज तूफानों से बचाव , ( 7 ) आर्द्रता का संरक्षण , ( 8 ) भूमि क्षरण पर रोक , ( 9 ) बंजर और बेकार भूमि का उपयोग , ( 10 ) रोजगार की सम्भावनाएँ , ( 11 ) ध्वनि प्रदूषण पर नियन्त्रण , ( 12 ) आमोद - प्रमोद स्थलों का विकास , ( 13 ) राष्ट्रीय वनों पर दबाव से राहत , ( 14 ) ग्रामीण अंचल में आत्म - निर्भरता ( 15 ) वर्षा की मात्रा में सुधार ( 16 ) वायु - प्रदूषण नियन्त्रण और ( 17 ) बाढ़ तथा सूखे की कमी ।
• पौधों के रोपण के स्थान ( Places of Planting of Saplings )
पौधे कहाँ - कहाँ लगाये जायें इस हेतु कुछ स्थान विशेषों पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है । ऐसी ही एक सूची प्रस्तावित है
1 . गाँव में ( In Villages ) : घर का बाड़ा , करें तथा जलाशय के पास , देवालय - मान्द गुरुद्वारा , शमशान - कब्रिस्तान , खेत - खलिहान - मेड़ , पंचायतघर - चौपाल , स्कूल , औषधालय . मकानों के बाहर , सड़क को जोड़ने वाले रास्ते , खेल के मैदान आदि ।
2 . शहरों में ( In Urban Area ) : घरों के अहाते . सड़कों के सहारे , नदी - तालाब पाल , रेल और बस के प्लेटफार्म - अहाते तथा उन्हें जोड़ने वाले रास्ते , प्राधान मन्दिर - मस्जिद , शमशान - कब्रिस्तान , ऐतिहासिक किले . महल समाधि स्थल , गिरण बंगले , चिकित्सालय , विभिन्न कार्यालय , स्कूल - कॉलेज - छात्रावास , कचहरी , बैक - अप डिस्ट्रिक्ट कलेक्टरेट , तहसील , बच्चों के पिकनिक स्पोट्स , खेल के मैदान , सड़कें , रेल लाइनों के दोनों ओर , धर्मशालाएँ , उच्च वोल्टेज के तारों के नीच
3 . खेतों के बाहर व अन्दर ( Outside and Inside of Farm Fields ) विशेषतः तीन बातों को ध्यान में रखकर करना होता है ।
( i ) हवाओं के तेज वेग को रोकने हेतु : जिन्हें ' वायु अवरोधक ' ( Wind Breaks ) के नाम से कहते हैं । पौधों की कई कतारें और गहन झाड़ियों तेज हवाओं की गति के लम्बवत रूप में लगाने से पहले से लगे वृक्ष तथा कृषि को बचा लेते हैं । बहुत सघन वृक्ष इस इस कार्य हेतु चुने जाते है ।
( ii ) हवाओं की तेजी से भूमि की नमी को कम कर देने अथवा पूर्णत ' सुरक्षा पट्टियों ( Shelter Belts ) का प्रावधान किया जाता है । कई - कई वृक्षा की समकोणीय रूप में लगाकर वायु के वेग में कमी कर दी जाती है जिससे रोपे हुये पौधे अपेक्षाकृत ठीक से रह पाते हैं ।
( iii ) जलाऊ ईधन , चारा तथा इमारती लकड़ी के वृक्ष खेतों के अन्दर लगाये जाते है । यह गई है कि गांव के 10 % कम - से - कम भूमि पर इस तरह के वृक्ष लगे . जिससे कार्य वालों को कई कठिनाइयों से निजात मिले और अच्छा रोजगार मिलता रहे ।
4. उद्योग परिसरों में ( In Industrial Area ) : यहाँ वृक्ष विशेषतः दो लक्ष्यों को लेकर लगाये - ( 1 ) परिसर को सुन्दर बनाना और ( 2 ) परिसर को ही ध्वनि प्रदूषण से मुक्त रखना । वैसे कछवक्ष विषैली गैसों को भी सोख लेते हैं ।
5. विभिन्न कार्यालयों में ( In Different Offices ) : कार्यालय परिसर को सुन्दर व आकर्षक बनाने के लिये सजावटी पौधे , फल - फूल वाले वृक्ष लगाये जाने का चलन है ।
6 . अन्य स्थानो पर ( At Other Places ) : अन्य स्थानों पर भी ऐसे वृक्षों का रोपण किया जाना उचित रहता है , जो शीघ्र उग भी आवें और अधिक - से - अधिक छाया और शीतलता दें ।
• पौधों का चयन Selection of Species )
यह सहज कार्य नहीं है क्योंकि भिन्न - भिन्न स्थानों की आवश्यकताएं भिन्न - भिन्न है , और कौन - सा वक्षा उन अपेक्षाओं को पूरी कर सकेगा यह केवल विशेषज्ञ ही बता सकता है । विशेषज्ञों के आधार पर एक ऐसी सूची यहाँ समेकित है
1 . वायु अवरोधक ( Wind Breaks ) हेतु जाल , करंज , नीम , इमली , शीशम , फालसा , जामुन , आम , सहजना , काजू थूहर , रामबांस . कनेर , निर्गुनी आदि ।
2 . सुरक्षा पट्टियों ( Shelter Belts ) हेतु - सीताफल , फालसा , यूक्लेप्टिस , सरु , अमरूद , अनार , बेर , बास , सुबबूल , बाका आदि ।
3 . लकड़ी के लिये ( For Wood Lots ) : जामुन , बास , शीशम , नीम , बबूल , करंज , अरीठा , रामबांस , यूक्लेप्टिस , झाल . सागवान आदि ।
4 . जलाशयों की पाल पर ( On Canal Banks ) : जामुन , शीशम , महुवा , नीम , आम , बबूल . अर्जुन , इमली , बहेडा , यूक्लेप्टिस , करंज , बांस , पीपल , बड़ ।
5 . रेल लाइनों के दोनों ओर ( On Both Sides of Rail Lines ) : रामबांस , मूंज , सागवान , जामुन , यूक्लेप्टिस , बबूल , ढाक , सिरस , आदि ।
6 . सड़कों के दोनों ओर ( On Both sides of Roads ) : शीशम , आम , बबूल . अर्जुन , सिरस , नाम , पीपल , कदम , बरगद , कनकचम्या , जामुन , गुलमोहर , अमलतास , आदि ।
7 . दफ्तरों और विभागों के अहातों में ( In Premises of offices and Departments ) गुलमोहर , सिरस , बोगनविलिया . कनेर , कचनार , बरगद , अशोक , आम , जेकरेण्डा . केसिया , सिल्वर औक अमलतास ।
8 . दलदली स्थानों पर ( On Swampy Areas ) : यूक्लेप्टिस , जामुन , करंज , नीम , बरगद , बबूल , बांस , जाल ।
9. चारे के लिये ( For Fodder ) : खेजड़ी , बेर , बबूल , सुबबूल . अरडू सहजना , पीपल आदि ।
10 . जलाऊ लकड़ी के लिये ( For Fuel Wood ) : बबूल , सुबबूल , धौक , खेजड़ी , जगलजलेबी , पुरल , इजरायली शीशम , सिरस , सागवान आदि ।
11 . समुद्री तट क्षेत्र के लिये ( For Coastal Areas ) : सरु , काजू , आकाशमुनि , नारियल , सफेदा , विलायती बबूल आदि ।
12 . नम भूमि स्थलों के लिये ( For Wetlands Places ) : आकाशमुनि , बबूल , सफेदा , ल . काजी , विलायती बबूल , जामुन , अर्जुन आदि ।
. सामाजिक वानिकी की आलोचना
( Criticism of Social Forestry )
सामाजिक वानिकी की कार्यप्रणाली , उद्देश्य व निर्धारित लक्ष्य परम्परागत वानिकी से सर्वथा भिन्न है । . अतः स्पष्ट है कि उसका प्रबन्धन और कार्य करने के तरीक भिन्न होंगे । वन अधिकारियों को पूर्ण जानकारी से अवगत नहीं कराने से जहाँ इस कार्यक्रम को कई असफलताएं मिली है , वहीं संभागी किसान अथवा सामाजिक वानिकी में लगे रोजगारी कर्मचारी और मजदूर अपने लालच सेे रोकने में भी सफल नहीं हो सके हैं । पूरी सफलता न मिल पाने के कारण इस योजना की अनेक स्तर पर आलोचना हुई है । उनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है -
1 . वानिकी प्रोग्राम से उपलब्ध होने वाले ईधन , चारे और सामान्य लकड़ी ग्रामीण निर्धन व्यक्ति को नहीं हो पाई अपितु सामग्री को पैसे के ला सिलसिला चल पड़ा ।
2 . आम आदमी का प्रायोजना से संभागित्व बहुत कम रहा ; अधिक लोग जल
3 . वृक्ष प्रजाति का चयन विरोधाभास में ही रहा ।
4 . प्रायोजना से अधिक लाभ सम्पन्न लोगों को ही मिला , वास्तविक कार्यक्रम से लाभ पहुँचना था वस्तुतः पीछे धकेल दिये गये ।
5 . वन उपज को उठाने और उसे बाहर ले जाने में शासकीय कठिनाइयों ने की ; अतः बहुत लोग विमुख हो गये ।
6 . संलग्न विविध स्तर के अधिकारियों के तालमेल में कमी का नुकसान प्रायो उठाना पड़ा । अनेक कार्य बीच में ही अटक गये ।
7 . बाजार भाव की स्थिति संतुलित न होने के कारण सभागियों को उतना लाभ नहीं पाया जितनी अपेक्षा थी ; निराशा हाथ लगी ।
8 . तकनीकी अधिकारियों के अभाव के कारण उपलब्धि कम रही ; मार्गदर्शन का भी अभाव रहा ।
इन सबसे यही निष्कर्ष निकलता है कि योजना चाहे कितनी अच्छी रही हो . उसका क्रियान्वयन समुचित तरीके से नहीं हो सका । पूरी प्रायोजना ही आलोचना का शिकार बनी ।
• सामाजिक वानिकी कार्यक्रम में सुधार के लिये सुझाव ( Suggestions for Improvement in Management of Social Forestry Pro gramme )
राष्ट्रस्तर पर चलाई जा रही ' सामाजिक वानिकी प्रायोजना की सफलता में कहीं रुकावट न रहे इस हेतु कुछ सूझाव यहाँ दिये जा रहे है
1. सामाजिक वानिकी ' ( Social Forestry ) का नाम बदल कर ' राष्ट्रीय वानका ( National Forestry ) रख दिया जाय ।
2 . पूरे देश की आवश्यकता , मांग और सप्लाई के आधार पर सर्वे कराके योजना का । व्यावहारिक रूप से पुनः बनाया जावे ।
3 . प्रायोजना में स्थानीय लोगों के संभागित्व पर परा ध्यान दिया जाय , जिसस - अपनापन जुड़े ।
4 . वृक्ष प्रजाति के चयन में विरोधाभास को स्थान न मिले । विशेषज्ञ सामूहिक रूप " मिलकर हर दृष्टि से देखकर प्रजाति की स्वीकृति देवें ।
5 . राज्य सरकार और ग्राम पंचायतों में अच्छा तालमेल हो ।
6 . तकनीकी तथा वित्तीय समस्या रुकावट का कारण न बने ।
7 . प्रति छमाई उपलब्धि को प्रसारित किया जाय और आर्थिक हिस्सेदारा का से बैंक के मार्फत वितरण हो ।
8 . जिले स्तर पर ग्रामीण बाजार लगाये जायें जहाँ माल की खली बिक्री हो कोई स्थान न हो ।
9 . चारा , घरेल काम की लकडी , जलाऊ ईधन की आवश्यकता की नियमित पूस ग्रामीणों की समस्या न रहे ।
निःसन्देह सामाजिक वानिकी एक जन उपयोगी और सामाजिक क्रान्ति का काय देश की बहमुखी प्रगति सम्भव है । इसके अतिरिक्त परे देश में विगत वर्षों में वन - क्षा को पेड़ों के बाहुल्य से पूरा करने में भी सहायक है , लेकिन इसमें सरकारी प्रशासन की काय यक हिस्सेदारी का नियमित रूप की खुली बिक्री हो । विचौलियों का किता की नियमित पूर्ति हो । यह कार्यक्रम है , जिससे - क्षेत्रों में हुई क्षति की कार्यकुशलता .
जनता की संक्रिय भागीदारी और सामाजिक दृष्टिकोण में लोगो का सामूहिक परिवर्तन सभी का योगदान समयानुकूल आवश्यक है ।
Author
आलोक वर्मा ( कृषि परास्नातक )
शस्य विज्ञान, बीएड


