पाठ - 1 यूरोपीय शक्तियों का भारत में आगमन
फैक्ट्री ( कोठी ) - फैक्ट्री शब्द का प्रयोग व्यापारिक केंद्रों में स्थापित कार्यालय अथवा कोठी से है । फैक्टर शब्द का अर्थ एजेंट है । कंपनी की और से कार्य करने वाले व्यापारी ( एजेंट ) जिस कोठी में कार्य करते थे उसे फैक्ट्री । कहा जाता था । यूरोपियों की बस्तियों के लिये भी सैनिक रखे जाते थे । कोठियों की रक्षा किलों की तरह होती । थी और इन किलों की सुरक्षा के लिये यूरोपीय व्यापारियों के सशस्त्र सैनिक तैनात रहते थे ।
व्यापारिक मार्ग
प्राचीन काल से ही भारत का विदेशों से संपर्क रहा है । 6यीं शताब्दी से भारत से व्यापार करने के लिए यूरोपीय शक्तियों ने भारत आना प्रारम्भ किया जिसमें पुर्तगाली , उच , फ्रांसीसी और ब्रिटिश प्रमुख थी । भारत और यूरोप के मध्य व्यापार जल और थल द्वारा होता था । इन मार्गों की संख्या तीन थी । प्रथम मार्ग फारस की खाड़ी से होता हआ समुद्री मार्ग था । इस मार्ग से इराक , तुर्की , येनिस और जिनेवा से व्यापार होता था । दूसरा मार्ग लाल सागर से अलेक्जेंडरिया का था जहाँ से समुद्र द्वारा वेनिस और जिनेवा को जाया जाता था तीसरा मार्ग मध्य एशिया से मिस और फिर यूरोप के लिए था ।
इस प्रकार से यूरोप के सभी क्षेत्रों में भारत की वस्तुओं के वितरण के लिए वेनिस और जिनेवा प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे । इटली ने भारत की प्रमुख वस्तुओं के व्यापार पर अपना एकाधिकार जमाए रखने के लिए । यूरोप की शक्तियों की व्यापार में हिस्सेदारी को रोक दिया ।
पंद्रहवीं शताब्दी ( 1453 ई० ) में कुस्तुनतुनियाँ पर तुर्को ने अपना अधिकार कर लिया । अब तुर्को ने यूरोप और भारत के मध्य पुराने सभी संचार के माध्यमों को बंद कर दिया । कुस्तुननियाँ नगर व्यापार मार्ग का मुख्य द्वार था । अतः व्यापार के लिए यूरोप के व्यापारियों को कुस्तुनतुनियाँ नगर पार करना ही पड़ता था । लेकिन तुर्को द्वारा मार्ग पर कब्जा होने के कारण यूरोप और भारत के मध्य व्यापार को बहुत धक्का लगा ।
समुद्री मार्ग की खोज
अब यूरोपवासियों ने व्यापार के लिए नये समुद्री मार्ग की खोज करना आरम्भ कर दिया । इन जगहों की खोज मात्र सम्भावनाओं के आधार पर थी , इसलिए कुछ नाविकों ने यूरोप के उभरते राज्यों के महत्वाकांक्षी राजाओं व रानियों को धन , धर्म और ध्वज के सपने दिखाये ।
धन - राज्य की आमदनी के लिए खजाना इकट्ठा करना - कीमती घातु सोना , चाँदी आदि व मसालों के फायदेमंद व्यापार से कर एकत्रित करने की संभावना थी ।
धर्म ईसाई धर्म का दूर - दराज इलाकों में प्रचार करना ।
ध्वज - यूरोप के राष्ट्रों का झण्डा ' दूर - दूर के उपनिवेशों पर फहराए जिससे उनका साम्राज्य बढ़ेगा ।
यूरोप के राजाओं ने इन नाविकों की समुदी यात्राओं का खर्चा वहन किया ।
इनके नाविकों ने कुतुबनुमा की सहायता से रास्तों की खोज में लम्बी समुद्री यात्राएँ की । कुतुबनुना के द्वारा दिशाओं का ज्ञान होता है ।
भारत की खोज में निकले स्पेन निवासी कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की तथा पुर्तगाल निवासी वास्कोडिगामा अपनी लम्बी जलयात्रा के दौरान आफ्रीका के दक्षिणी छोर से होते हुए भारत के पश्चिमी समुद्र तट के कालीकट बंदरगाह ( 1498ई0 ) पर पहुँच गया । अब पुर्तगालियों को हिंद महासागर होते हुए पूर्वी द्वीप समूह का नया जलमार्ग मिल गया । अब यूरोप और भारत के मध्य व्यापार पुनः आरम्भ हो गए ।
यूरोपीय व्यापार
पुर्तगालियों ने हिन्द महासागर के माध्यम से होने वाले व्यापार पर अपना अधिकार कर लिया । वे सोना - चाँदी लाते और हमारे देश से सूती - रेशमी कपड़े और विभिन्न मसाले ले जाते थे और बहुत मुनाफा कमाते थे । पुर्तगाल की मजबूत नौसेना के कारण हिंद महासागर से कोई दूसरा देश पुर्तगाल की इजाजत के बिना अपना जहाज नहीं ले जा सकता था । वास्कोडिगामा के भारत पहुँचने के बाद एक - एक करके । हॉलैण्ड , फ्रांस और इंग्लैण्ड के व्यापारी भारत आने लगे ।
भारत में यूरोपीय व्यापारियों की होड़
व्यापार के लिए धन , लम्बी यात्रा करने वाले जहाज तथा नाविक तीनों साधनों का बहुत ही महत्त्व था । इन साधनों को प्राप्त करने के लिए कुछ अमीर यूरोपीय व्यापारियों में सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत ( 1600 - 1670ई० ) के बीच व्यापारिक कंपनियों स्थापित की । व्यापारिक कंपनियों का अर्थ है व्यापार में कई लोगों की हिस्सेदारी ( शेयर ) होती थी । सभी हिस्सेदार व्यापार में अपनी - अपनी पूँजी लगाते थे । लगायी गयी पूंजी के अनुपात में व्यापार से प्राप्त मुनाफे को आपस में बाँट लेते थे । हॉलैण्ड में डच ईस्ट इण्डिया कंपनी , इंग्लैण्ड में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी बनी और फ्रांस में फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कंपनी बनी । आज भी निजी कंपनियों इसी
प्रकार पूँजी इकट्ठा करती हैं ।
भारत में सबसे पहले पुर्तगाली व्यापार करने आए । उन्होंने पश्चिमी समुद्र तट पर गोवा , दमन दीव में अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किये । विदेशी कंपनियों के इन व्यापारिक केंद्रों को कोठी ( फैक्ट्री ) कहा जाता था ।
वास्कोडिगामा के भारत पहुंचने के बाद एक - एक करके हॉलैण्ड , इंग्लैण्ड और फ्रांस के व्यापारी जल के रास्ते भारत आने लगे । इस समय तक हिंदुस्तान के तो किसी भी शासक ने नौसेना तैयार करने की बात सोची तक नहीं ।
हॉलैण्ड निवासियों ने , जो डच कहलाते हैं . कालीकट , कोचीन , नागापट्टनम लथा चिनसरा में । व्यापारिक केन्द्र खोले । फ्रांसीसियों ने मछलीपट्टम , पाण्डिचेरी , चन्द्रनगर , माही स्थानों में अपने व्यापार के मुख्य केंद्र बनाए । अंग्रेजो ने अपने को केवल समुद्र तट तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि सूरत , कैम्बे अहमदाबाद , आगरा , भडोच , पटना , कासिम बाजार स्थानों पर व्यापारिक केंद्र बनाए ।
भारत में , यूरोप के सभी देशों के व्यापारी , पुर्तगालियों के हाथ से व्यापार छीनने की होड में लगे रहते थे । उनकी कोशिश रहती थी कि वे भारत में कम से कम कीमत देकर सामान खरीद सकें . फिर वे इस सामान । को यूरोप में अधिक से अधिक दाम पर बेच कर खूब मुनाफा कमा सकें । उन्होंने पाया कि सूरत , मसूलीपटनम ( मछलीपट्टम ) जैसे बड़े अंदरगाहों पर जो सामान व्यापारियों द्वारा बिकने लाया जाता है , वह महँगा मिलता है । इसलिए यूरोप के व्यापारी गाँव - गाँव में अपना आदमी या एजेंट भेज कर सीधे कारीगरों से माल खरीदने की कोशिश में रहते ताकि सस्ता माल मिले ।
समय के साथ पुर्तगाली नौसेना और किलों की ताकत अंग्रेज , डच और फ्रांसीसियों से कई मुकाबलों के कारण कमजोर पड़ गई । कुछ समय तक किसी एक का भारत के व्यापार पर अधिकार नहीं जम सका ।
विदेशी कंपनियों ने व्यापार में लाभ के लिए साम , दाम , वण्ण व भेद के तरीके अपनाए ।
1. उन्होने बादशाहों व राजाओं के पास अपने - अपने प्रतिनिधि या दूत भेजे और भारत में खुलकर व्यापार करने की इजाजत मांगी । अगुम्नति प्राप्त करने के लिए ये खुशामद भी किया करते थे फलस्वरूप राजाओं ने अधिकार पत्र फरमान जारी किए ।
2. व्यापारियों के दूतों ने कुछ करों को न देने की छूट मांगी ।
3. इसके बदले में उन्होंने बादशाहों व राजाओं को नवीन वस्तुएं भेंट की ।
मुगल बादशाह जहाँगीर के दरबार में कोप्टन हॉकिन्स ( 1809ई . ) आने वाला प्रथम अंग्रेज राजदूत था । इसके बाद सर टामस रो ( 1615ई ) जहाँगीर के दरबार में आया जब उसने मुगल जहांगीर के दरबार की शान - शौकत देखी तो वह उससे बहत प्रभावित सुआ , उसने सम्राट को अंग्रेजी दस्ताने भेंट किये और इग्लेण्ड में । इस्तेमाल की जाने वाली बग्धी दी जिससे जहाँगीर प्रसन्न हुआ ।
उपरोक्त मानचित्र के आधार पर अंग्रेज . फ्रेंच , पुर्तगाल , डच के फैक्ट्रियों की सूची बनाओ ।
4. राजाओं के मन में यह आशा थी कि उनके राज्य का खजाना बढेगा तथा करों में छूट देने से उनके राज्य में ज्यादा व्यापार आकर्षित होगा , और राज्य खूब फलेगा - फूलेगा । इससे और अधिक कर मिलेगा ।
5. हिंदुस्तान के राजाओं के मन में यरोपीय व्यापारियों की तरफ से मिलने वाली धमकी का असर भी था । पुर्तगाली नौसेना का मुकाबला दूसरे यूरोपीय देशों की सशक्त नौ सेनाएं ही कर सकती थीं और । हिन्दुस्तान के जहाजों को पुर्तगालियों के खतरे से सुरक्षा की जरूरत थी ।
अंग्रेज फ्रांसीसी व डच कहते - ' व्यापार की छट दोगे तभी हम हिंदुस्तानी जहाजों की सुरक्षा की गारण्टी देंगे , नहीं तो मौका मिलने पर उन्हें लूटा व डुबोया जाएगा ।
इन नीतियों व स्थितियों का फायदा उठाकर युरोप के व्यापारियों ने हिंदुस्तान में व्यापार से खूब लाभ कमाया । उन्हें कई कर ( टैक्स ) न देने की छूट मिली । जमीन खरीद कर उन्होंने अपने गोदाम , घर , बंदरगाह और अपने - अपने किले भी बनाए ।
और भी जानिए
यूरोपियों द्वारा मसालों का प्रयोग स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि मॉस को सड़ने से बचाने के लिए भी किया जाता था , जिससे माँस कई महीनों तक सुरक्षित रह सके ।
* पुर्तगाल , इंग्लैण्ड , फ्रांस , हॉलैण्ड आदि यूरोपीय देशों का क्षेत्रफल , जनसंख्या व संसाधन भारत के एक प्रति उत्तर प्रदेश के क्षेत्रफल , जनसंख्या व संसाधनों की तुलना में कम है । ये देश भारत से हजारों किमी की दूरी पर है । इन सबके बावजूद ये यूरोपीय देश भारत पर अपना अधिपत्य स्थापित करने में सफल हुए ।
* जिस समय यूरोपीय देशों में तकनीकी विकास जैसे घड़ी , छपाई के लिए प्रेस , एवं बंदूक आदि बनाए जा रहे थे उस समय हमारे देश के शासक इनसे अनभिज्ञ व अपरिचित थे ।
* धनी व्यापारियों ने पैसा उधार देने के लिए बैंक की स्थापना की । इसके लिए वे शुल्क लेते थे जिसे व्याज कहते थे । लोग अपना धन बैंकों में सुरक्षित रखते थे । पहला बैंक इटलीवासियों का था । सत्रहवीं शताब्दी में लंदन तथा अमेस्टर्डम बैंक व्यवस्था वाले सबसे महत्त्वपूर्ण बने ।
