लीची का फल प्रकृति में ठण्डा व तर होता है । लीची का फल सेवन करने से हृदय तथा मस्तिष्क को बल मिलता है । यह प्यास को भी शान्त करता है । भारी होने के कारण एक साथ इसे अधिक नहीं खाना चाहिये । इसके ताजे फल खाये जाते हैं । फल मई से जुलाई तक मिलते हैं । इसकी खेती उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में की जाती है । इसके फल ग्रीष्म ऋत में पौधों में लदे रहते हैं।
भूमि
पर्याप्त गहराई की भूमि जिसमें जल निकास का उत्तम प्रबन्ध हो , उपयुक्त होती है । इसके लिये मृत्तिका दोमट भूमि सर्वोत्तम है । दोमट भूमि में भी अच्छी उपज मिलती है । मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होना चाहिये ।
प्रबर्धन
1 . बीज बोकर , 2 . दाब कलम लगाकर , 3 . भेंट कलम लगाकर , 4 . मुकुलन द्वारा , 5 . गूटी द्वारा
इन विधियों में गूटी लगाना सर्वोत्तम विधि है । बीज द्वारा बोकर उगाये गये पौधों में फल देर से मिलते हैं । गूटी बरसात के आरम्भ ( जून ) में तैयार की जाती है । उचित मोटाई की शाखा लेकर इसके निचले भाग से लगभग 2 . 5 सेमी लम्बाई में छिलका हटा देते हैं फिर इसे नम मॉस - पास से ढककर ऊपर से कसकर बाँध देते हैं । इससे श्वसन की क्रिया जारी रहती है पर वाष्पीकरण रूक जाता है ।
2 माह बाद जड़ें पूर्ण रूप से निकलने के बाद शाखा को पेड़ से काटकर अलग कर लेते हैं और छायादार स्थान में गमले में लगाकर रख देते हैं । इन पर से कुछ पत्तियों को तोड़ देने से इनके मरने का अन्देशा कम हो जाता है । एक साल बाद ये लगाने योग्य हो जाते हैं । गूटी जुलाई में बाँधी जाती है और सितम्बर में काटकर गमले में लगाकर नर्सरी में रख दिया जाता है ।
पौधे रोपने का समय और ढंग
लीची के पौधे वर्षा ऋतु में खेत में रोपे जाते हैं । सिंचाई की सुविधा होने पर फरवरी - मार्च में भी खेत में रोपा जा सकता है । लीची के पौधे रोपने के लिए अप्रैल - मई में खेत में 10X10 मीटर की दूरी पर 1 मीटर व्यास से । मीटर गहरे गड्ढे खोद लेना चाहिये और इन्हें जून तक खुला रखना चाहिये । मिट्टी और गड्ढे धूप में भली प्रकार तप जाते हैं । वर्षा होने के उपरान्त जुलाई के प्रारम्भ में इन गड्ढों में 15 किग्रा गोबर की खाद , 2 किग्रा . चूना , 250 ग्राम एल्ड्रिन चूर्ण , 10 किग्रा . लीची के बाग की मिट्टी में मिलाकर गड्ढों में भर देते हैं । अगस्त में इन गड्ढों के बीचोबीच पौधा रोपकर उनके चारों तरफ थाला बना देना चाहिये ।
खाद और उर्वरक
लीची के उत्पादन के लिये खाद और उर्वरक का बहुत महत्व है इसका प्रयोग निम्न प्रकार करना चाहिये ।
गोबर की खाद , फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा दिसम्बर के अन्त में देनी चाहिये । नाइट्रोजन की 1 / 2 मात्रा फरवरी में तथा 1 / 2 मात्रा अप्रैल में देनी चाहिये । इसके अलावा 2 . 5 किग्रा जिंक सल्फेट के साथ 1 . 2 किग्रा . बुझा चूना , 450 ली पानी घोलकर पौधों में छिड़काव करना चाहिये ।
उन्नत किस्में
अगेती जातियाँ
देहरादून , रोज सेन्टेड , अर्ली लार्ज रेड ।
मध्यम प्रजातियाँ
शाही , गुलाब , चायना , सहारनपुर प्याजी ।
पछेती प्रजातियाँ
गोला , कलकतिया , रामनगर , लेट सीडलेस , इलायची ।
रोग नियन्त्रण
चूर्णी फफूंदी इस रोग का प्रकोप होने पर फूलों तथा नई पत्तियों पर फफूंदी की सफेद धूल दिखायी देती है । इसकी रोकथाम के लिये केराथेन का 0 . 06 घोल छिड़कना चाहिये ।
सिंचाई तथा जल निकास
पौधों में फूल आने से पूर्व और उसके बाद फल लगने तक 2 - 3 सिचाइयाँ करनी चाहिये । दिसम्बर से मई तक इसमें सिंचाई करना आवश्यक है ।
निराई - गुड़ाई
इसमें सिंचाई के बाद निराई - गुड़ाई करना चाहिये । खेत को खरपतवार से मुक्त करना चाहिये ।
काट - छाँट
पौधों के बड़ा हो जाने पर उनमें कटाई - छंटाई करना आवश्यक नहीं होता । इसलिये प्रारम्भ में काट - छाँट करना चाहिये ।
फल तोड़ना
फलों के साथ 20 - 25 सेमी . की टहनियाँ भी लोड़ ली जाती हैं
उपज
100 से 200 क्विंटल / हेक्टेयर ।
कीट नियन्त्रण
माइट यह पत्तियों के निचले भाग से रस चूसता है । पत्तियाँ सिकुड़ कर गिर जाती हैं ।
इसकी रोकथाम के लिये फेनकिल नामक दवा का 0 . 15 घोल का छिड़काव करना चाहिये ।




