फल परिरक्षण (कृषि विज्ञान कक्षा 7 के लिए )

इकाई - 7 
फल परिरक्षण 


फल तथा फल पदार्थों के खराब होने के कारण 
बोतल तथा डिब्बों को जीवाणु रहित बनामा तथा उनके मुँह बन्द करना 
रासायनिक परिरक्षकों का प्रयोग करना 
नींबू का स्क्वैश बनाना 
फलों का मुरब्बा एवं टमाटर का सॉस तैयार करना 


 फल परिरक्षण 
         फल तथा सब्जियों का रक्षात्मक आहार के रूप में विशेष महत्त्व है । इसे हम संरक्षात्मक खाद्य के नाम से भी जानते हैं । फलों तथा सब्जियों में जल की अधिक मात्रा होने के कारण इन्हें ताजा रूप में अधिक दिनों तक नहीं रखा जा सकता है । इनसे कोई उत्पाद जैसे - अचार , मुरब्बा , जैम , जेली , मार्मलेड , सॉस , केचप , फल रस , आदि बनाकर अधिक दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है । फल तथा सब्जियों से विभिन्न उत्पाद बनाकर अधिक दिनों तक सुरक्षित रखने की विधि को ' फल परिरक्षण ' कहते हैं । 



फल तथा फल पदार्थ खराब होने के कारण 
             रोटी , अचार , मुरब्बा में कुछ दिन बाद या वर्षा ऋतु में रूई के फाहे जैसी सफेद , भूरी , नीली , काले रंग की संरचना दिखाई देती है जिसके कारण इसका स्वाद खराब हो जाता है । यदि हमें इनके खराब होने के कारण के बारे में जानकारी हो जाय तो इससे बचाव किया जा सकता है । फल तथा फल से बने उत्पाद के खराब होने के मुख्य कारक हैं - कवक या फफूंद , खमीर , जीवाणु ( बैक्टिीरिया ) एवं एन्जाइम । 


कवक वा फफूंद 
       फल , सब्जी , डबलरोटी , मुरब्बा , अचार आदि में वर्षा के दिनों में काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं । इसके अलावा सफेद भूरे रूई के फाहे जैसी संरचना देखने में आती है । इसी को ' कवक ' के नाम से जानते हैं । ये कवक फल तथा इनसे बने उत्पाद को खराब कर देते हैं । इससे फल तथा फल पदार्थों का रंग भी बदल जाता है । फफूंद के बीजाणु हवा में फैले रहते हैं जिससे हर खाद्य पदार्थ पर यह आसानी से पहुँच जाता है । यदि किसी पदार्थ के थोडे से हिस्से में फफूंद लग गया हो तो उसे निकाल कर ठीक किया जा सकता है । लेकिन फफूंद का पूरा प्रभाव हो जाने पर फल तथा फल पदार्थ पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं अचार , मुरब्बा को कभी - कभी धूप में रखने से बचाव किया जा सकता है । यदि निर्मित पदार्थ को 30 मिनट तक 71°C ताप पर गर्म किया जाय तो इन्हें नष्ट किया जा सकता है । 



खमीर ( Yeast ) 
    यह भी फफूंद की श्रेणी में आता है जो एक कोशिका वाला सूक्ष्म जीव है । इसकी कोशिकायें अण्डाकार या गोलाकार होती हैं । खमीर के कारण फल एवं खाद्य पदार्थों का स्वाद तथा रंग बदल जाता है । खमीर मीठी चीजों पर बड़ी आसानी से लग जाती है लेकिन जिन चीजों में चीनी की मात्रा 68प्रतिशत से अधिक होती है उनमें खमीर का प्रभाव नहीं होता है । खमीर की वृद्धि के लिए ऑक्सीजन तथा जल आवश्यक है । खमीर को आधे घण्टे तक 71 . 4°C पर गर्म करके नष्ट किया जा सकता है । इसका प्रभाव पेय पदार्थों पर अधिक होता 
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एन्जाइम ( Enzymes ) द्वारा
        फलों तथा उनसे निर्मित पदार्थों के खराब होने में एन्जाइम की अहम् भूमिका होती है । एन्जाइम जटिल रचना वाले जैविक उत्प्रेरक होते हैं और प्रत्येक जीवित वस्तु में उपस्थित रहते हैं । फलों में रंग परिवर्तन एन्जाइम के कारण ही होता है । यदि आम के फलों को तोड़कर कुछ समय के लिए रख दिया जाय तो वे पक जाते हैं । उनका रंग गहरा पीला तथा भूरा पड़ जाता है । यदि आप सेब को चाकू से काटकर थोड़ी देर रख दें तो उसका रंग भूरा पड़ जाता है । ऐसा एन्जाइम के कारण होता है । एन्जाइम के इस रंग परिवर्तन की क्रिया के साथ - साथ ही फल तथा फल पदार्थों के स्वाद एवं सुगन्ध आदि में भी अन्तर आ जाता है और धीरे - धीरे ये नष्ट होने लगते हैं । यदि इन्हें 700 - 80° से . पर 20 - 30 मिनट तक रखा जाय तो एन्ज़ाइम निष्क्रिय हो जाते हैं । 




 बैक्टीरिया ( Bacteria ) द्वारा 
          बैक्टीरिया एक कोशिका वाले अत्यन्त छोटे जीव होते हैं जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखा जा सकता है । इनका जनन बहुत तेजी से कोशिका विभाजन के द्वारा होता है । ये कई आकार के होते हैं । अधिकाँश जीवाणु क्लोरोफिल रहित होते हैं । अत : इन्हें अपना जीवन - यापन अन्य पदार्थों पर करना पड़ता है । यही कारण है कि फल तथा फल पदार्थों पर इन जीवाणुओं का आक्रमण हो जाने के कुछ समय बाद वे सड़ने लगते हैं । अधिकांश जीवाणुओं को 100° से . ताप पर अम्लीय माध्यम में 30 मिनट तक गर्म करके नष्ट किया जा सकता है । ठण्डक से जीवाणु नष्ट नहीं होते बल्कि इससे उनकी बढ़ोत्तरी में रुकावट हो जाती है । बर्फ में जमाये गये पदार्थों में भी जीवाणु मौजूद रहते हैं लेकिन ये प्रसुप्ता अवस्था में रहते हैं जिसके फलस्वरूप फल पदार्थ खराब नहीं होते ।


बोतल तथा डिब्बों को जीवाणु रहित करना तथा उनके मुँह बन्द करना 
फल तथा उनसे निर्मित पदार्थों को खराब होने से बचाने के लिए इन्हें बोतल एवं डिब्बों में बन्द करके रखा जाता है । इन फल एवं फल पदार्थों को बोतल एवं डिब्बों में रखने से पूर्व इन्हें जीवाण रहित करना अनिवार्य है । इनमें निम्नलिखित क्रियायें की जाती हैं 

1 . निर्जीवीकरण - 
डिच्चों तथा फलों को उबलते हुए पानी में 10 मिनट तक गर्म किया जाता है । इससे इनके अन्दर तथा बाहर के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं ।

 2 . बोतल तथा डिब्बों को वायु रहित करना 
      डिब्बों तथा बोतलों को बन्द करने से पहले उन्हें वायु रहित करना आवश्यक है । वायु रहित करने के लिए उन्हें गर्म पानी के भगौने में इस प्रकार रखते हैं कि इनका चौथाई भाग गर्म पानी में डूबा रहे । इस गर्म पानी में इसको इतना गर्म करते हैं कि इनके बीच का तापक्रम 80 " - 85° से . हो जाय । यह तापक्रम खौलते पानी में लगभग 10 मिनट में आ जाता है । वायु रहित कर लेने के बाद डिब्बों तथा बोतलों को तुरन्त मशीन द्वारा बन्द कर देना चाहिए । इस बात का ध्यान रखना चाहिए की बन्द करते समय डिब्बे का तापक्रम कम से कम 70 से . होना चाहिए ।


 रासायनिक परिरक्षकों का प्रयोग करना 
           फलों और सब्जियों से निर्मित पदार्थों को कवक , फफूंद , एंजाइम एवं जीवाणु आदि के प्रभाव से बचाने के लिए निम्नलिखित परिरक्षक उपयोग में लाये जाने हैं । 
1 . पोटैशियम मेटाबाईसल्फाइट 
2 . सोडियम बेन्जोएट 
3 . सोडियम मेटाबाईसल्फेट 

1 . पोटैशियम मेटाबाईसल्काइट
       इसको संक्षेप में ( के एम एस ) के नाम से जाना जाता है । यह एक रवेदार गन्धक लवण है । यह अम्लीय और क्षारीय माध्यम से प्रभावित नहीं होता है । फलों के रस में उपस्थित सिट्रिक अम्ल के प्रभाव से पोटैशियम मेटाबाईसल्फाइट , सल्फर डाईऑक्साइड और पोटैशियम साइट्रेट के रूप में परिवर्तित हो जाता है । सल्फर डाई ऑक्साइड पानी से मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती है जो परिरक्षक का कार्य करती है । 

2 . सोडियम बेन्जोएट  
      सोडियम बेन्जोएट एक स्वाद और गन्ध रहित चूर्ण होता है । इसकी परिरक्षण क्षमता इसमें उपस्थित बेन्जोइक अम्ल के कारण होती है । सोडियम बेन्जोएट की जल में घुलनशीलता , बेन्जोइक अम्ल की अपेक्षा कई गुना अधिक होती है इसलिए सोडियम बेन्जोएट का प्रयोग अधिक किया जाता है । यह मुख्यत : फफूंद और खमीर की वृद्धि को रोकता है । बेन्जोइक अम्ल सूक्ष्म जीवों की श्वसन क्रिया पर प्रभाव डालती है जिसके परिणाम स्वरूप ग्लूकोस का ऑक्सीकरण रुक जाता है । बेन्जोइक अम्ल के फलस्वरूप सूक्ष्म जीवों में ऑक्सीजन का उपयोग अधिक हो जाता है । सोडियम बेन्जोएट फलों के रस की ऊपरी सतह पर होने वाली खराबियों को रोकने में सक्षम होता है ।


 3 - सोडियम मेटाबाईसल्फेट 
        यह रवेदार होता है एवं इसके रवे छोटे होते हैं । 10किग्रा शर्बत में इसकी 5 ग्राम मात्रा मिलायी जाती है । पोटैशियम पेटाबाईसल्फाइट की तरह ही इसका प्रयोग रंगीन शर्बतों में नहीं करते हैं क्योंकि यह शर्बत को रंगहीन कर देता है । इस परिरक्षक का प्रयोग प्रायः कम किया जाता है । 


नींबू का स्क्वैश बनाना 
     गर्मी के दिनों में पेय पदार्थ के रूप में हम स्क्वै श का उपयोग करते हैं । यह सन्तरा और नींबू , आम , ग्रेफूट जामुन , बेल , लीची , फालसा , तरबूज इत्यादि फलों से तैयार किया जाता है । गर्मी में इसके सेवन से मन प्रसन्न हो जाता है । 

स्क्वैश निम्नलिखित प्रकार से बनाया जाता है

  फलों का चुनाव 
       करना नींबू का स्क्वैश बनाने के लिए ताजे फल लेने चाहिए । फल छाँटने के बाद उन्हें ताजे पानी से धोना चाहिए । फल अच्छी तरह पके हों । कच्चे , फफूंद ग्रस्त या सड़े - गले फल नहीं लेने चाहिए ।

 रस निकालना
       नींबू का स्क्वैश बनाने के लिए इनके छिलके उतार लेना चाहिए । इसके बाद जूस निकालने वाले जूसर से जूस निकालना चाहिए और स्टेनलेस स्टील की छलनी से छान लेना चाहिए । 

प्रयुक्त होने वाली सामग्री - 
          
        नींबू का रस - 1 लीटर 
        पानी          -2 लीटर 
        चीनी.        - 2 किग्रा 
        सिट्रिक अम्ल - आवश्यकता पड़ने पर  ( 10ग्राम )
        पोटैशियम मेटाबाईसल्फाइट - 3


 ग्राम बनाने की विधि
        सर्वप्रथम स्टेनलेस स्टील के एक बड़े भगौने में । लीटर पानी डालते हैं फिर उसमें चीनी डाल कर चूल्हे , या स्टोव पर गर्म करते हैं । बीच - बीच में रस को चलाते रहते हैं । एक उबाल आने के पश्चात जूस को चूल्हे से उतार लेते हैं । चाशनी ठण्डी होने पर नींबू का रस तथा पोटैशियम मेटाबाईसल्फाइट को मिला दिया जाता है । परिरक्षक पहले थोड़े पानी में घोल लेते हैं तब जूस में मिलाते हैं । अब स्क्वै श तैयार हो गया । इसके बाद इसे बोतल या जार में ऊपर से 3 सेमी जगह छोड़कर भरते हैं । उपरोक्त सामग्री से 750 मिली स्क्वैश तैयार हो जाता है तत्पश्चात इसे बोतलों में ढक्कन लगाकर सील कर देते हैं । 


फलों का मुरब्बा
        बनाना मुरब्बा बनाने के लिए फल को समूचा या बड़े - बड़े टुकड़ों में काटकर चीनी के गाढ़े घोल में इतना पकाया जाता है । कि उसम कम से कम 70 प्रतिशत चीनी की मात्रा समान रूप से समा जाय । आम आँवला . सेब , बेल तथा करोंदा आदि फलों से मुरब्बा तैयार किया जाता है ।

 मुरब्बा बनाने की विधियाँ 
      मुरब्बा बनाने से पहले निम्नलिखित क्रियाएँ क्रमवार करते हैं -
 1 . फलों का चुनाव 2 . फलों को तैयार करना 3 . फलों को गोदना 4 . फलों को नमक चूने अथवा फिटकरी के घोल में भिगोना , 5 . ब्लान्चिंग 6 . चाशनी तैयार करना 7 . फलों को चाशनी में डालना 


1 . फलों का चुनाव
      मुरब्बा बनाने के लिए बेल को छोड़कर ठीक तरह से पके हुये फल ही प्रयोग में लाने चाहिए ।

 2 . फलों को तैयार
       करना फलों को छाँटने के बाद साफ पानी में अच्छी प्रकार धो लेना चाहिए । 

3 . फलों को गोदना 
       मुरब्बा बनाने में फलों को गोदना एक महत्वपूर्ण क्रिया होती है । धोने के बाद फलों की गोदाई करते हैं जिससे फलों के अन्दर चीनी की चाशनी पूरी तरह मिल सके । यदि फलों की गोदाई अच्छी प्रकार नहीं होगी तो मुरब्बा ठीक नहीं बनेगा । 

4 . फलों को नमक ,चूने अथवा फिटकरी के घोल में भिगोना
      फलों को अच्छी प्रकार से गोदने के बाद 2 प्रतिशत नमक , चूने अथवा फिटकरी के घोल में कुछ समय के लिए रखा जाता है । ऐसा करने से फलों का खट्टापन या कसैलापन काफी कम हो जाता है । नमक के घोल में कड़े फल मुलायम हो जाते हैं और चूने तथा फिटकरी के घोल में मुलायम फल कड़े हो जाते हैं । 

5 . ब्लान्चिंग
      निर्धारित समय तक फलों को उपर्युक्त घोल में भिगाने के बाद साफ पानी से धो लिया जाता है । इसके बाद फलों को किसी साफ कपड़े में रखकर 5 - 15 मिनट तक उबलते हुये पानी में डुबोया जाता है । 

6 . चाशनी तैयार करना 
      आवश्यक चीनी की मात्रा तथा पानी को स्टेनलेस स्टील या एल्युमीनियम के भगोने में उबाला जाता है पानी में उबाल आने के बाद चीनी मिलानी चाहिये । जैसे ही दूसरा उबाल आ जाय , साइट्रिक अम्ल डालकर चाशनी को साफ कर लेना चाहिये । 

7 . फलों को चाशनी में डालना 
       जब चाशनी तैयार हो जाती है तब फलों को उसमें डाल देते हैं तथा उतारकर नीचे रख लेते हैं जिससे फल चाशनी को सोख ले । यदि चाशनी गाढ़ी नहीं हुयी है तो फलों को पुन : उबालते हैं , इससे उसमें चीनी की मात्रा 70 प्रतिशत से अधिक हो जाती है । अब इसे साफ , सूखे तथा चौड़े मुंह वाले काँच के जार में भर कर रख दिया जाता है । यहाँ पर हम लोग आँवले का मुरब्बा बनाने के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे । 


आँवले का मुरब्बा बनाना 
आँवले का मुरब्बा बनाने के लिए प्राय : बड़े किस्म वाले आँवले की प्रजाति का चुनाव किया जाता हैं क्योंकि बड़े औवले रेशे कम होते हैं । इसके लिए सर्वप्रथम विले के फलों को अच्छी तरह धोकर उनको स्टेनलेस स्टील के काँटों या लकड़ी के कांटों द्वारा अच्छी तरह गोदा जाता है । तत्पश्चात 2 प्रतिशत फिटकरी का घोल बनाकर उबाल लेते हैं एवं इस उबलते हए घोल में आँवले को 5 - 10 मिनट तक पका लेते हैं । इसके बाद एक किग्रा आँवले के लिए डेढ़ किया की दर से चीनी लेते हैं । एक भगोने में पहले चीनी की तह बिछाते हैं और इसके ऊपर एक तह आँवले की लगा दी जाती है । इस प्रकार आवश्यकतानसार फल तथा चीनी की तह लगाते हैं । ऑवले को चीनी की तहों के बीच चौबीस घण्टों तक रख देते हैं । 
दसरे दिन अधिकांश चीनी पिघल जायेगी । अब आंवले को चीनी के घोल से निकाल कर घोल की चाशनी तैयार कर लेते हैं । इस चाशनी में आँवले को चौबीस घण्टों तक के लिए छोड़ दिया जाता है । तीसरे दिन फिर आँवले को निकालकर चाशनी को इतना पकाते हैं कि उसमें चीनी की मात्रा 70 प्रतिशत हो जाय । ऐसी अवस्था में आँवले को गरम चाशनी में डाल देते हैं । लगभग 20 - 25 दिन में मुरब्बा खाने के योग्य हो जाता है ।


 गाजर का मुरब्बा बनाना
        गाजर का मुरब्बा बनाने के लिए अच्छी , दाग रहित , नारंगी रंग की गाजरों का चुनाव किया जाता है । उनकी पेंदी काट दी जाती है , फिर खौलते पानी में थोड़ी देर के लिए डाल दिया जाता है जिससे गाजर नरम हो जाती है । एक किग्रा मुरब्बा बनाने के लिए एक किग्रा चीनी एक लीटर पानी में घोल कर उबालने के लिए आग पर रख देते हैं । जब इसमें उबाल आ जाय तो इसे सिट्रिक अम्ल से साफ कर लेते हैं । इसके बाद फिर आग पर चढ़ा देते हैं और उसमें गाजर डाल देते हैं । गाजर डालकर इतना पकाते हैं कि रस गाढ़ा हो जाय और उसमें चीनी की मात्रा 70 प्रतिशत तक हो जाय । ठंडा होने पर उसे गाजर के साथ बोतलों में भरकर रख लिया जाता है । चाशनी में गाजर को लगभग एक घण्टे तक ही पकाना चाहिए ।


 टमाटर का सॉस बनाना
 सॉस बनाने की सामग्री
 लौंग.                        0 . 5 ग्राम
जावित्री.                     चुटकी भर 
नमक बड़ी इलायची.     1 ग्राम
ऐसीटिक अम्ल             3 चाय के चम्मच भर 
सोडियम बेन्जोएट.       850 मिलीग्राम 
टमाटर का रंग इच्छानुसार
टमाटर का रस             1 लीटर
चीनी.                        100 ग्राम
अदरक                       10 ग्राम 
प्याज                          15 ग्राम 
लहसुन                        3 ग्राम 
जीरा                           1 ग्राम 
काली मिर्च                    1ग्राम 
दाल चीनी                      1 . 5 ग्राम 
लाल मिर्च.                      1 ग्राम

 बनाने की विधि 
इसके लिए स्वच्छ तथा गहरे लाल रंग के टमाटर लेते हैं । इन्हें अच्छी तरह से धोकर स्टेनलेस स्टील के चाकू से चार टुकड़ों में काट कर टुकड़ों को एल्युमिनियम के भगोने में पकाते हैं । अच्छी तरह से गल जाने पर इन्हें स्टील की छलनी में रगड़कर रस निकाल लिया जाता है । रस को एल्युमिनियम के भगौने में पकने के लिए छोड़ देते हैं । अब कुल चीनी का 1 / 3 भाग रस में मिला कर बारीक कटे लहसुन , प्याज , अदरक व उपर्युक्त मसालों को कपड़े की पोटली में बाँधकर पकते हुये रस में डाल देते हैं । इसे बड़े चम्मच से हिलाते रहते हैं । लगभग एक तिहाई रस रहने पर बची हुयी चीनी एवं नमक डालकर 8 - 10 मिनट तक फिर पकाते हैं । इसके बाद एसिटिक अम्ल डालते हैं और सोडियम बेंजोएट को थोड़े से पानी में घोलकर मिला देते हैं । अब आवश्यकतानुसार रंग मिलाकर तैयार केचप को साफ बोतलों में गरम - गरम भर देते हैं । बोतलों को सूखे व ठण्डे भण्डारों में रख दिया जाता है ।