पाठ्यचर्या और यथार्थवाद

पाठ्यचर्या और यथार्थवाद
( Curriculum and Realism )

सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया का केन्द्र बिन्दु या आधारभूत माध्यम के विविध विषय है जो कक्षा में जाते हैं । प्रत्येक विषय के अपने आन्तरिक मूल्य और सामाजिक मूल्य होते हैं । इसीलिए सभी विषय एक ही कोटि में नहीं रख सकते । शिक्षा के निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप इन असंख्य विषयों में से चयन करना पड़ता है । यथार्थट दृष्टिकोण के अनुसार , इस सम्बन्ध में यह आधारभूत मान्यता है कि पाठ्य - विषय विविध और विस्तृत चाहिए । छात्र को अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार इसमें से चयन का अधिकार होना चाहिए । इस सम्बन्ध में यथार्थवादी दर्शन की अन्य मान्यताएँ निम्न प्रकार हैं
( 1 ) छात्र को सर्वाधिक उपयोगी विषय ही पढ़ाने चाहिए ।
( 2 ) सर्वाधिक उपयोगी विषयों के चयन का काम बालों पर ही नहीं छोड़ना चाहिए . इस कार्य शिक्षक और माता - पिता का उचित मार्ग - दर्शन मिलना चाहिए ।
( 3 ) चयन किये गये विषयों में परस्पर सम्बन्ध हों ।
( 4 ) सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप ही विषयों का चयन होना चाहिए । पढ़ने से कोई लाभ नहीं है ।
( 5 ) ज्ञान - ज्ञान के लिए या कला - कला के लिए जैसी मान्यताएँ निरर्थक है , उपयोगिता - हीन विषय पढ़ने से कोई लाभ नही है। 
( 6 ) आधुनिक भाषाएँ हो पढ़ायी जानी चाहिए ।
( 7 )' स्वान्तः सुखाय ' साहित्य का अध्यापन नहीं करना चाहिए ।
( 8 ) कला , संगीत आदि ललित कलाओं का वास्तविक जीवन के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है , अतः इसका कोई महत्व नहीं है ।
 ( 9 ) विज्ञान का शिक्षण अनिवार्य होना चाहिए क्योंकि विज्ञान यथार्थ - जगत का परिचय देता है ।
( 10 ) पाठ्यक्रम व्यापक होना चाहिए ।
( 11 ) क्रिया प्रधान पाठ्यक्रम हो ।
( 12 ) व्यक्तिगत विभिन्नता को ध्यान में रखा जाना चाहिए ।
इस प्रकार यथार्थवादी विचारक अपने पाठ्यक्रम के अन्तर्गत व्यावसायिक विषयों एवं विज्ञान को मण्य , भूगोल , कानून , राजनीति को गौण एवं साहित्य कला , संगीत को निम्नवत् स्थान देते है । परन्तु वह मानभाषा में प्रमुख स्थान देते हैं क्योंकि वह बालक के विकास की आधारशिला है ।
शिक्षण - विधि और यथार्थवाद ( Tenching Methods and Realism )
 यथार्थवाद बालक को सामाजिक प्राणी बनाना चाहता है ताकि वह सामाजिक परिस्थितियों को समझकर व्यावहारिक जीवन को सफल बना सके । यह स्वाभाविक होगा कि शिक्षा को इन यथार्थवादी उद्देश्यों के अनुरूप ही पाठ्य - विषयों का चयन हो और मूल्यांकन की विधि भी इसके अनुरूप ही हो । निश्चय ही पथार्थवादी मूल्यांकन में काल्पनिक , अवास्तविक , निरर्थक , उपयोगिता विहीन , प्रभाववादी परीक्षण के उपकरणों का कोई महत्व नहीं है । ऐसे प्रश्न पत्रों का इसमें कोई स्थान नहीं है जो केवल ज्ञान , ज्ञान के लिए के सिद्धान्त पर पूछे जाते हैं । काल्पनिक , अविश्वसनीय और अवैध प्रश्नों को पूछना इसमें निषिद्ध है । तथ्यपूर्ण , यथार्थ जीवन और समाज से सम्बन्धित वस्तुनिष्ठ ज्ञान का मापन ही यथार्थवादी मूल्यांकन में ग्रहणीय है ।
शिक्षक और यथार्थवाद ( Tencher and Renlism )
यथार्थवाद दर्शन के अनुसार , शिक्षक का अपना एक विशेष चरित्र , दृष्टिकोण और लक्ष्य होता है । यथार्थवाद शिक्षकों के प्रशिक्षण पर विशेष बल देता है । शिक्षक अपनी कला में निपुण होता है और उसे यह ज्ञात होता है कि किस समय क्या और कितना पढ़ाना है ? ज्ञान और अनुभव के प्रति उसकी एक विशिष्ट धारणा होती है ।
यथार्थवाद के अनुसार , शिक्षक की परिकल्पना की विशेषताएँ निम्नलिखित होनी चाहिए शिक्षक का विज्ञान में अटूट विश्वास होता है । ( 2 ) प्रत्येक वस्त को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करता है । ( 3 ) कल्पना की अपेक्षा वस्तुनिष्ठ और उपयोगी ज्ञान को वह पसन्द करता है । ( क ) वह सच्चा अन्वेषक होता है । वैज्ञानिक विधि द्वारा अन्येधित ज्ञान पर ही वह विश्वास करता है । ( 5 ) वह यह मानता है कि विश्व के सभी तत्वों को कोई भी पूरी तरह से नहीं जान सकता , अत : वह तत्त्व विशेष की विशेषता पर बल देता है । ( 6 ) यथार्थवादी शिक्षक अपने छात्रों की आवश्यकताओं , रुचियों औच्चिाओं से परिचित होता है और उनकी परिपुष्टि वैज्ञानिक ढंग से करता है । अपने सो पावर अपनी व्यक्तिगत मान्यताएँ नहीं थोपता । वह तटस्थ भाव से वस्तु का यथार्थ विवेचन करता है । ( 8 ) यथार्थवादी शिक्षक बाल - मनोविज्ञान और किशोर - मनोविज्ञान से परिचित होता है । इसलिए वह पाठ को सरस और आकर्षक विधि से पढ़ाता है ।
छात्र और यथार्थवाद ( Student and Realism )
पथार्थवाद के अनुसार , सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया में छात्र का सर्वाधिक महत्त्व है । यथार्थवाद के असार . बालक यथार्थ इकाई जो अनेक भावनाआश्च्छाओं और शक्तियों से परिप शक्तिया से परिपूर्ण है । शिक्षा मतका आदर होना चाहिए । वैज्ञानिक विधियों से इन शक्तियों के यथोचित विकास में सहयोग चाहिए । यह सहयोग इसलिए भी आवश्यक है कि छात्र स्वतन्त्र नहीं छोड़ा जा सकता । उसे शिक्षक का माग - दर्शन मिलना चाहिए । इस प्रकार यथार्थवाद के अनुसार छात्र की कुछ विशेषताएं होती हैं जो इस प्रकार हैं - छात्र विवेक से ही सौखकर यथार्थ के निकट पहुँचने की चेष्टा करता है । बुद्धिही सीखने में उसकी सहायता करती है । ( 2 ) अत्र अपनी बुद्धि के विकास के लिए अधिक - से - अधिक स्वतन्त्रता चाहता है । ( 3 ) तयों के आधार पर वह आगे बढ़ता है । इसमें वह कोरी कल्पना का सहारा नहीं लेता है । ( 4 ) वह सिद्धानों की अपेक्षा वास्तविक ज्ञान और उपयोगी व्यवहारों पर अधिक विश्वास करता है । ( B ) यथार्थवाद के अनुसार मात्र देवता नहीं है । वह मात्र मनुष्य है , सामाजिक प्राणी है । अत : सामाजिक सामंजस्य उसके ज्ञान और व्यवहार का विशेष गुण होना चाहिए ।
अनुशासन और यथार्थवाद ( Discipline and Realism )
 विद्यालय के सुचारु संचालन के लिए अनुशासन अनिवार्य आवश्यकता है इसलिए अनुशासन के प्रति अधिकारियों , शिक्षकों और खत्रों के दृष्टिकोण का काफी महत्त्व होता है । शिक्षा के विभिन्न दर्शन इस दृष्टिकोण को अपने - अपने ढंग से प्रभावित करते हैं । यथार्थवाद के अनुसार अधिकारियों और शिक्षकों का कर्तव्य है कि विद्यालय और कर्तव्य पालन का वातावरण बनाये रखें । इसके लिए अनुशासन के नियमों का पालन करते रहें । अनुशासन क्या है ? यथार्थवाद के अनुसार वस्तुनिष्ठ परिस्थितियों और वातावरण के प्रति सामंजस्य तथा समायोजन हो अनुशासन है । इसलिए छात्र अपने चारों ओर के वातावरण के अनुकूल अपने को दाल सकें और कार्य करने में अवधान केन्द्रित कर सकें । इसके लिए अनुशासन आवश्यक है । यथार्थवाद के अनुसार बालक में वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण उत्पन्न करता है , ताकि वह अपनी भावनाओं और वासनाओं पर विजय प्राप्त कर सके . अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ सके . इसके लिए भी अनुशासनात्मक भावना आवश्यक है । अनुशासित छात्र वह जो जगत की कठोरता से संसार की यातना में दुनिया की कठिनाइयों से और विश्व में व्याप्त अभावों से दरनहीं भागता । यथार्थवाद पलायनवादका सदा डटकर विरोध करता रहा है और दुनिया की कटोर यथार्थता का सामना करने को प्रेरणा देता रहा है । इस प्रकार यथार्थवाद छात्रों में कठिनाइयों से विचलन होने स्थान पर धैर्य , सहिष्णु और अनुशासित चरित्र पैदा करता है । इस प्रकार यथार्थवाद प्रभावात्मक व मुक्तयात्मक अनुशासन के समन्चित रूप का समर्थक है । वह सामाजिक नियमों के अनुसार अनुशासन स्थापित करना चाहते हैं |
यथार्थवाद और भारतीय शिक्षा ( tealism and Indian Education )
भारतीय शिक्षा पर एक दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि यथार्थवाद यहाँ पर उपेक्षित नहीं रहा है । अतीत भारत की शिक्षा के विषय में प्राय : यह कह दिया जाता है कि उस समय वहाँ की शिक्षा पूर्ण रूपेण पार्मिक एवं आदर्शात्मक थी और उसका यथार्थ जगत में कोई सम्बन्ध नहीं था । किन्तु यह आलोचना हमारी अल्पज्ञता की द्योतक है । प्राचीन भारत में जहाँ पर कर्मकण्ड , यज्ञ विधान आदि की शिक्षा दी जाती | बो - वहाँ पर आयुर्वेद एवं धनुर्वेद जैसे व्यावसायिक विषयों की भी शिक्षा दी जाती थी - एक ओर ब्रह्मचारी - ब्राह्मण , आरण्यक , उपनिषद जैसे दार्शनिक ग्रन्यों का पारायण करते थे तो दूसरी ओर वे अपने परिश्रम से आश्रम के आस - पास की भूमि को ' शस्य - श्यामला ' बना देते थे , मों एवं गायों की देख - रेश करके पशु - पालन का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करते थे तथा नीचे तेल में परछाई देख कर ऊपर लटकती है । मछली की आँख वेधते थे । इससे पता चलता है कि प्राचीन ऋषि व्यावहारिक विषयों की ओर सजग थे ।
 शिक्षण विधि में भी यथार्थवाद का पुट था । यहाँ पर निगमन और आगमन दोनों प्रकार के तर्क - प्रणाली प्रचलित थी , प्रमाणों में प्रत्यय प्रमाण को महत्त्वपूर्ण माना गया था और ज्ञानेन्द्रियों की महत । स्वीकार की गयी थी ।
वर्तमान भारत की शिक्षा में भी हम यथार्थवाद का पुट पाते हैं । यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा । कि अन्य देशों की भांति भारतीय शिक्षा में भी यथार्थवादी विचारधारा का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है । आज अधिकतर भारतीय विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था । समय की मांग को देखते हुए एवं समाज की यथार्थ आवश्यकताओं की अनुभूति करते हुए ये विश्वविद्यालय  कानून , चिकित्सा , इन्जीनियरिंग , शिक्षण , कृषि आदि की उच्च शिक्षा प्रदान करता है । विश्वग्राला से बगल कृषि के लिए ही अलग खुले है । - माध्यामिक शिक्षा के क्षेत्र कृषि , विज्ञान , याणिज्य आदि विषयों की और मवि बदी है । बिहान पदों का ध्यान आकृष्ट किया है ।
आज माध्यामिक विद्यालयों में एक कक्षा में जितना रहित्यिक विवों को लेते हैं , कम से याम सरोदुगने अत्र विज्ञान विषय का प्रभावन करत है । बहुउदेशीय विद्यालयों की स्थापना यथार्थवादी शिक्षा के मार्ग में प्रभावशाली कदम है । ये विद्यालय प्रों को समाजोपयोगी बनाने का प्रयत्न करत है और समात्र की आवश्यकताओं के अनुरूप अपने को बहुधनी बना लिया है ।
आज भारतीय विद्यालयों का पाठ्यक्रम यथार्थवादी दृष्टिकोण से बनाया जाता है । विषयों की अधिकता एवं निर्वाचन को क्षेत्र का विस्तार इस बात के द्योतक है । शिक्षण विधि में भी वैज्ञानिक पद्धति यअनुमरण किया जाना अच्छा समझा जाता है । भारतीय महाविद्यालयों में अनुसन्मान हो रहे हैं , उसमें भी वस्तुनिष्ठता का सर्वाधिक ध्यान रखा जाता है ।
शोधकर्ता अपने व्यक्तिगत विचारों को अलग ही रखने का प्रयत्न करता है । इस प्रकार वर्तमान भारतीय शिक्षा पर यथार्थवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा है और शिक्षकों तथा शिक्षाशाखिनि शिक्षा को समाज के लिए उपयोगी बनाने का भरसक प्रपल किया है । इस दिशा में कछ सफलता भी मिली है । किन्तु भारतीय शिक्षक पचानवाद की सीमा से परिचित है और इसीलिए वह अवार्थवाद की सीमा से बाहर जाना पसन्द करता है ।