साहित्य का सर्वेक्षण ( Review of Literature )
विगत अध्यायों में वर्णित अनुसंधान प्रक्रिया , अनुसंधान समस्या तथा अनुसंधान परिकल्पना सम्बन्धित विभिन्न सम्प्रत्ययों के अवलोकन से पाठकों को स्पष्ट हो गया होगा कि अनुसंधान एक ऐस बौद्धिक तथा सृजनात्मक प्रक्रिया है जो मानव जाति के द्वारा पूर्व में अर्जित ज्ञान तथा अनुभवों व आधारित होती है । यही कारण है कि मानव जाति द्वारा भूतकाल में किये गये प्रयासों के फलस्वरूप संकलित ज्ञान भण्डार का लाभ अनुसंधानकर्ता को अपने अनुसंधान कार्य में मिलता है । वस्तुतः किसी भी प्रस्तावित अध्ययन को पूर्व के अध्ययनों व अनुभवों से जोड़े बिना वर्तमान में कोई भी अनुसंधान कार्य करना सम्भव नहीं होता है । अनुसंधानकर्ता के लिए सन्दर्भ सामग्री की खोज व अध्ययन एक समय साध्य कार्य होने के बावजूद अत्यन्त लाभदायक होता है । पूर्व शान व अनुभवों के आधार पर अनुसंधान की योजना का निर्माण तथा क्रियान्वयन सम्भव हो पाता है । इसके लिए अनुसंधानकर्ता अपनी समस्या से सम्बन्धित उपलब्ध विभिन्न प्रकार के साहित्य का सम्यक दंग से अध्ययन - मनन करता है प्रस्तुत अध्याय में अनुसंधान कार्य में साहित्य के सर्वेक्षण सम्बन्धी चर्चा प्रस्तुत की जा रही है ।
सम्बन्धित साहित्य ( Related Literature )
निःसन्देह किसी भी नियोजित अनुसंधान कार्य का सबसे पहला तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य सम्बन्धित साहित्य का सर्वेक्षण करके किये जा रहे अनुसंधान कार्य की सैद्धान्तिक तथा व्यवहारिक पृष्ठभूमि तैयार करना है । सम्बन्धित साहित्य से तात्पर्य पुस्तकों , पत्र - पत्रिकाओं , विश्व - कोषों , प्रकाशित व अप्रकाशित अनुसंधान प्रबन्धों , पत्रों व विचार - विमर्शों , शब्दकोषों , अभिलेखों तथा अन्य सूचना स्रोतों पर उपलब्ध विविध प्रकार की सामग्री से होता है । इनके अध्ययन से अनुसंधानकर्ता को अपनी अनुसंधान समस्या के चयन , अनुसंधान परिकल्पना के निरूपण , अनुसंधान प्रारूप के विकास , कार्य विधियों के क्रियान्वयन एवं प्रापा निष्कर्षों की व्याख्या करने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है । अनुसंधान कार्य से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के साहित्य को निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है
( I ) पाठ्य - पुस्तकें ( Text Books )
( ii ) सन्दर्भ पुस्तकें ( Reference Books )
( iii ) विश्वकोष ( Encyclopedias )
( iv ) वार्षिकी पुस्तके ( Yearly Books )
( v ) प्रकाशित प्रबन्ध ( Published Theses
( vi ) अप्रकाशित प्रबन्ध ( Unpublished Theses )( vii ) सावधिक पत्रिकाएँ ( Periodicals )
( viii ) सारांश पुस्तिका ( Abstract Books )
( ix ) शब्दकोष ( Dictionaries )
( x ) निर्देशिका ( Directories )
( xi )प्रन्थ सूची ( Bibliographies )
( xii ) अभिसूचिकायें ( Index Lists )
( xiil ) जीवन वृतान्त ( Biographies )
( xiv ) कम्प्यूटर सामग्री ( Computer Materials )
( xv ) इन्टरनेट ( Internet )
( xvi ) सूक्ष्म फिल्म ( Micro Fiche )
( xvii ) कार्यालयी अभिलेख ( Official Documents )
( xvi ) लघु - पुस्तिकाएँ ( Monographs )
( xix ) समाचार - पत्र ( Newspapers )
( xx ) व्यक्तिक डायरी ( Personal Diary )
( xvi ) ऐतिहासिक सामग्री ( Historical Material )
अनुसंधानकर्ता अपने अनुसंधान क्षेत्र से सम्बन्धित उपरोक्त वर्णित सामग्री का चयन व अवलोकन करके विभिन्न प्रकार की सूचनाएं प्राप्त कर सकता है । वस्तुतः किसी भी अनुसंधानकर्ता के लिए अपनी समस्या से सम्बन्धित अद्यतन साहित्य का सम्यक अध्ययन - मनन करना अपरिहार्य होता है । अनुसंधान के लिए सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन करते समय प्रथम कार्य उस सामग्री को पहचानने ( Identify ) का है जिसका अध्ययन , मनन व समीक्षा किया जाना लाभप्रद होता है । सुविधा के लिए सूचना के स्रोतों को दो प्राथमिक स्रोत ( Primary Sources ) तथा द्वितीयक स्रोत ( Secondary Sources ) में बाँटा जा सकता है । प्राथमिक स्रोतों के अन्तर्गत पूर्व अनुसंधानकर्ताओं एवं अध्ययनकर्ताओं के द्वारा स्वयं प्रस्तुत सामग्री होती है । इसमें अनुसंधान प्रवन्ध , अनुसंधान लेख , पुस्तक आदि आती हैं । ऐसे लोत न केवल विस्तृत सूचना प्रदान करते है वरन् अधिक प्रमाणिक ( Authentic ) सूचनाएँ भी देते है । परन्तु इन स्वोतों की सामग्री का काफी विस्तृत होने के कारण इनको पढ़ने में अनुसंधानकर्ता को काफी समय व श्रम लगाना पड़ता है । द्वितीयक स्रोतों के अन्तर्गत किये जा चुके अनुसंधान कार्यों को दूसरे व्यक्तियों द्वारा संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने वाली सामग्री आती है । इसमें विश्वकोष , सन्दर्भ पुस्तकें , सार - संक्षेप आदि आते हैं । ऐसे स्रोत यद्यपि संक्षिप्त ( Concise ) सूचना प्रदान करते हैं परन्तु यह सूचना अपेक्षाकृत कुछ कम विश्वसनीय तथा प्रमाणिक होती है । परन्तु द्वितीयक स्रोतों का अध्ययन करने में कम समय व श्रम लगता है । यहाँ पर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़ा होता है कि अनुसंधानकर्ता के द्वारा किस स्रोत का प्रयोग करना वांछनीय होता है । इसके लिए कहा जा सकता है कि मुख्य स्रोत के अधिक विश्वसनीय होने के कारण उसका उपयोग अधिक वांछनीय होता है परन्तु मुख्य स्रोतों का चयन करने के लिए द्वितीयक स्रोतों का अध्ययन भी आवश्यक होता है ।
साहित्य सर्वेक्षण का महत्त्व ( Importance of Review of Literature )
अनुसंधान कार्यों में साहित्य सर्वेक्षण की समीक्षा करने की आवश्यकता , उपयोगिता तथा महत्त्व स्वयं सिद्ध है । अनुसंधान क्षेत्र से सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण के बिना अनुसंधानकर्ता का कार्य अन्धेरे हो में तीर चलाने के समान हो जाता है । साहित्य के सर्वेक्षण के द्वारा ही अनुसंधानकर्ता किसी क्षेत्र में क्या चुका है ? को उस क्षेत्र में क्या करना शेष है ? से अलग करके अपनी समस्या को सार्थक ( Significant ) , मौलिक ( Original ) तथा अद्वितीय ( Unique ) बनाता है एवं अनुसंधान की एक उपयुक्त रूपरेखा तैयार करने में मदद करता है । अनुसंधान में साहित्य सर्वेक्षण की आवश्यकता तथा महत्त्व के
बारे में विद्वानों ने अपने - अपने ढंग से विचार व्यक्त किये हैं । जहन इन्लू . बेस्ट के अनुसार " व्यावहारिक दृष्टि से समस्त मानत ज्ञान पुस्तकों तथा पुस्तकालयों में प्राप्त किया जा सकता है । अन्य जीवों , जिन्हें प्रत्येक पीढ़ी में नये सिरे से प्रारम्भ करना पड़ता है , से मित्र मान पूर्व में संगृहीत । के सभी क्षेत्रों में प्रगति को सम्भव बनाते हैं । " अभिलेखित ज्ञान से निर्माण करता है । शान के अथाह भण्डार में उसके सतत योगदान ही मानव प्रयासों के सभी क्षेत्रों में प्रगति को सम्भव बनाते है।
Practically all human knowledge can be found in books and libraries . Unlike other animals that must start a new with each generation , man builds upon the accumulated and recorded knowledge of the past . His constant adding in the vast store of ktowledge makes possible progress in all areas of human endeavour ' - John W. Bear
डब्लू . आर . बोर्ग ने साहित्य सर्वेक्षण की आवस्यकता तथा महत्व की चर्चा करते हुए कहा है कि , " किसी भी क्षेत्रका साहित्य उस आधारशिला की रचना करता है जिस पर समस्त भावी कार्य किया जाता है । यदि सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण द्वारा हम ज्ञान की इस आधारशिला को इह नहीं कर लेते है हमारा कार्य सतही व नवसिखुआ होने की सम्भावना है एवं प्रायः मूर्त में किसी अन्य के द्वारा अच्छे अंग से किये कार्य को दोहराना रहता है ।
" The literature in any field forms the foundation upon which all future work will be built . If we fail to build this foundation of knowledge provided by the literature our work in likely to be shallow and naive and will often duplicate work that has already been done better by some one else . ' - W. R. Borg
साहित्य के महत्व को स्पष्ट करते हुए सी.बी. गुढ ने कहा है कि , " प्रकाशित साहित्य के अपार भण्डार की कुंजियाँ अर्थपूर्ण समस्याओं तथा विश्लेषणीय परिकल्पनाओं के स्रोत का द्वार खोल सकती है एवं समस्या के परिभाषीकरण , अध्ययन विधि के चयन की पृष्ठभूमि व परिणामों की व्याख्या के लिए तुलनात्मक प्रदलों में सहायक अभिगमन प्रदान करती है । रचनात्मक व मौलिक होने के लिए चिन्तन के अभिप्रेरक के रूप में विस्तृत व गम्भीर अध्ययन करना आवश्यक है ।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि सम्बन्धित साहित्य का तात्पर्य अनुसंधान प्रबन्ध में एक अध्याय को जोड़ देने अथवा अन्यसूची को बढ़ाने तक सीमित नहीं रहता है वरन् अनुसंधान के.औचित्य को स्पष्ट करने , रूपरेखा को बनाने एवं प्रदत्तों के संकलन व व्याख्या में महत्वपूर्ण सहायता करना है । वस्तुतः अनुसंधान के प्रत्येक स्तर पर यह अत्यन्त सहायक होता है । प्रायः देखा गया है कि अनेक अनुसंधानकर्ता अपने अनुसंधान कार्य से सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण व समीक्षा को गम्भीरता से नहीं लेते हैं । वस्तुतः अनुसंधान से सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण व समीक्षा को परिशिष्टात्मक ( Appendage ) अथवा बीले - डीले बंग से सम्बन्धित पूरक ( Loosely related Supplement ) के रूप में नहीं रखा जाना चाहिए । वरन् इसे सम्पूर्ण अनुसंधान कार्य का एक ऐसा अभिन्न अंग ( Integral Part ) होना चाहिए जो अनुसंधानकर्ता द्वारा अच्छी तरह से आत्मसात व परिलक्षित हो । सम्बन्धित साहित्य के महत्व को निम्न ढंग से सूचीबद्ध किया जा सकता है
( i ) यह सम्बन्धित अध्ययन क्षेत्र में किये जा चुके कार्य की जानकारी प्रदान करके अपेक्षित अनुसंधान कार्य को रेखांकित करता है ।
(ii ) यह चयनित समस्या की सार्थकता , आवश्यकता तथा महत्त्व को स्पष्ट करता है एवं अपेक्षित परिणामों के निहितार्थों को इंगित करता है ।
( iii ) यह सम्बन्धित सम्प्रत्ययों , अभिधारणाओं व सिद्धान्तों आदि को स्पष्ट करके अनुसंधान के लिए सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि प्रदान करता है ।
( iv ) यह समस्या के सीमांकन करने , पारिभाषीकरण करने , परिकल्पना के निरूपण तथा अनुसंधान अभिकल्प के निर्माण में सहायक होता है ।
( ४ ) यह क्या हो चुका है ? को क्या करना शेष है ? से अलग करके पूर्व में सम्पन्न अनुसंधान मार्यों की पुनरावृत्ति से बचाते हुए उपयोगी समस्याओं को सामने लाता है ।
( vi ) यह अनुसंधान कार्य में प्रयुक्त किये जा सकने वाले सम्भावित तरीकों , उपकरणों व प्राविधियों आदि की जानकारी प्रदान करता है ।
( vi ) यह अनुसंधान कार्य की रूपरेखा को बनाने तथा विस्तृत कार्य योजना के निर्माण में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है ।
( vi ) यह अनुसंधान कार्य से प्राप्त परिणामों की व्याख्या करने एवं तदनुसार निष्कर्ष निकालकर नवीन ज्ञान के सृजन में सहायक होता है ।
( a ) यह सम्बन्धित अध्ययन क्षेत्र में भावी अध्ययनों के लिए नई व महत्त्वपूर्ण समस्याओं
( ७ ) यह अनुसंधान से प्राप्त होने वाले निष्कर्षों की व्यवहारिक उपयोगिता को रेखांकित करके अनुसंधान के महत्व को स्पष्ट करता है ।
( C ) यह अनुसंधानकर्ता को विभिन्न सोपानों पर सावधान रखते हुए अनजाने में हो सकने वाली तरह - तरह की त्रुटियाँ करने से बचाता है ।
( ii ) यह अनुसंधान कार्य को समय , श्रम व व्यय की दृष्टि से मितव्ययी बनाकर उसे अनुसंधानकर्ता के लिए व्यावहारिक तथा सम्भाव्य बनाता है ।
पुस्तकालय कौशल ( Library Skills )
सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण की एक आवश्यक पूर्व - शर्त अनुसंधानकर्ता को पुस्तकालय कौशल में निपुण होना है । पुस्तकालय कौशल के अभाव में अनुसंधानकर्ता अपने समय , श्रम व धन को अनावश्यक दौडधूप में नष्ट कर सकता है पुस्तकालय कौशल में निपुण व्यक्ति वांछित अध्ययन सामग्री की व्यवस्थित ढंग से खोज कर लेता है जिससे न तो महत्त्वपूर्ण सामग्री छूटती है और न ही अनावश्यक सामग्री के अध्ययन में समय व श्रम नष्ट होता है । इसके साथ - साथ अनुसंधानकर्ता की पहुँच नवीनतम साहित्य तक सरलता से हो जाती है । नियमित ढंग से पुस्तकालय सामग्री का अध्ययन करने के लिए निम्न बातें अत्यन्त महत्वपूर्ण होती हैं
1. पुस्तकालय एवं इसके नियमों का ज्ञान ( Knowledge of Library and its Rules ) L )
2. अपेक्षित सूचनाओं का निर्धारण ( Identifying the Desired Information ) Lthi )
3. सूचना स्रोतों को अंकित करना ( Listing the Sources of Information ) VM
4. आवश्यक शीर्षक ढूँढना ( Searching the Appropriate Headings )
5. अध्ययन सामग्री को चिन्हित करना ( Screening the Reading Material )
6. चयनित सामग्री का अध्ययन करना ( Reading of Selected Material )
7. सक्षिप्त लेख बनाना ( Taking of Short Notes )
सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण का कार्य एक श्रृंखलाबद्ध कार्य होता है जिसमें स्रोतों को टटोलना ,उपयोगी सूचनाएं चिन्हित करना , वांछित सूचनाओं का संलेखन करना एवं अनुसंधान कार्य में उनका
58 साहित्य का सर्वेकर उपयोग करना जैसे अनेक कार्य सम्मिलित रहते हैं । निःसन्देह चयनित सामग्री का अध्ययन करना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है एवं इस हेतु प्रत्येक अनुसंधानकर्ता का अपना एक तरीका हो सकता है । फिर भी अनुसंधान समस्या से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित पुस्तक , अध्याय , खण्ड , लेख , सार संक्षेप आदि को पहले सरसरी नजर ( Bird's Eye view ) से देखना उचित होता है । संक्षेपिका या सारांश के उपलब्ध होने पर पहले उसे ही पढ़ना चाहिए जिससे उसकी उपयोगिता को समझा जा सके अध्ययन सामग्री के दूत अध्ययन के समय दो बातें महत्त्वपूर्ण होती हैं । प्रथम , पठित सामग्री का प्रस्तावित अनुसंधान में कोई उपयोग है अथवा नहीं । द्वितीय , यदि उपयोग है तो किस प्रसंग में उसका उपयोग किया जा सकता है । वस्तुतः इस प्रकार के दूत अध्ययन से अनुसंधानकर्ता को अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी सामग्री की जानकारी मिल जाती है जिसे गम्भीरता से पढ़कर संक्षेप में प्रलेखन किया जाता है । प्रलेखन का यह कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है जिसे पूर्णरूपेण व्यवस्थित , व संकेतबद्ध बंग में किया जाना चाहिए । अन्त में संग्रहीत सामग्री का यथावश्यक उपयोग किया जाता है । सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण की समीक्षा से प्राप्त विभिन्न सूचनाएं अनुसंधान के प्रत्येक सोपान पर मददगार होती है । चाहे समस्या का चयन व पारिभाषीकरण हो , अथवा परिकल्पना की रचना हो अथवा अनुसंधान अभिकल्प का निर्माण हो अथवा परिणामों की व्याख्या हो , सभी स्तरों पर साहित्य के सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है ।
सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण के दौरान संग्रहित सामग्री को अनुसंधान प्रतिवेदन में कैसे तदा कह सम्मिलित किया जाये , यह भी एक विचारणीय प्रश्न है जिस पर दो विभिन्न मत दृष्टिगोचर होते हैं । अनुसंधान के कुछ परम्परावादी विशेषज्ञों का मानना है कि अनुसंधान प्रतिवेदन का एक अध्याय केवल सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण के लिए रखा जाना चाहिए । अधिकांश अनुसंधान प्रतिवेदनों में ऐसा है देखने को मिलता है एवं प्रायः अध्याय दो के रूप में सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण को प्रस्तुत किया जाता है । इसके विपरीत नवीन विचारधारा के कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के पृथक अध्याय की जरूरत नहीं है वरन् जिस - जिस अध्याय या खण्डों में सन्दर्भो के रूप में पठन - सामग्री की जरूरत होती है वहाँ उसका उल्लेख किया जाना चाहिए । अर्थात् अनुसंधान समस्या की पृष्ठभूमि , परिकल्पना के तर्काचार , अनुसंधान अभिकल्प सम्बन्धी निर्णयों तथा परिणामों की पुष्टि आदि के समय सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण से प्राप्त विभिन्न सूचनाएँ समाहित की जा सकती हैं । वस्तुतः इस सम्बन्ध में किसी स्पष्ट व सर्वमान्य धारणा का बनना असम्भव - सा है । निःसन्देह सम्बन्धित साहित्य का एक व्यापक , विस्तृत व सारगर्भित सर्वेक्षण करना अनुसंधानकर्ता के ज्ञान की गहनता तथा विद्वता का द्योतक होता है । मात्र सन्दर्भो के रूप में इसे समग्रता के साथ प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है । यही कारण है कि अधिकांश विद्वान अनुसंधान प्रबन्ध में एक अलग अध्याय के रूप में सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण को प्रस्तुत करने का प्रायः आग्रह किया जाता है ।
संक्षिप्त लेख प्रलेखन ( Note Taking )
सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण तथा समीक्षा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष टीप बनाना या संक्षिप्त लेख तैयार करना होता है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अनुसंधानकर्ता को पढ़े गये अध्ययन सामग्री के महत्त्वपूर्ण व आवश्यक अंशों को इस प्रकार से अभिलेखित करना होता है कि उनका अनुसंधान के नियोजन व प्रलेखन में सहज ढंग से उपयोग किया जा सकें । सावधानीपूर्वक तैयार की गयी टी अनुसंधान कार्य में महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान करती है । उचित ढंग से टीपों को तैयार न करने पर पढ़ा गया अधिकांश साहित्य शीघ्र ही विस्मृत हो जाता है अथवा अर्थहीन हो जाता है । यही कारण है कि अनुसंधानकर्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह सम्बन्धित साहित्य का सर्वेक्षण करते समय सावधानी व सुनियोजित बंग से संक्षेपात्मक टीपें तैयार करें । निःसन्देह साहित्य सर्वेक्षण व समीक्षा में अनुसंधानकर्त के भाषायी कौशल की भी अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । इसके लिए न केवल उसे उस भाषा का अच्छा जानकार होना चाहिए जिसमें विवेचित सामग्री प्रस्तुत की गई है वरन् उस भाषा के एक - दो अच्छे चार बंग से प्रयुक्त किया जाता है शब्दकोष भी अपने पास रखने चाहिए । प्रायः किसी भी अनुसंधान प्रतिवेदन में सम्बन्धित साहित्य निम्न न उद्धरण ( Quotation ) Hii ) सारांश ( Summary ) i ) भावानुवाद ( Paraphrase ) A ) मूल्यांकन ( Evaluation ) प्रस्तुत किया जाता है एवं इसे उद्धरण चिन्ह ( ) के द्वारा इंगित किया जाता है । उद्धरण के रूप में उद्धरण के अन्तर्गत किसी लेखक या अनुसंधानकर्ता के द्वारा प्रयुक्त शब्दों व वाक्यों को यथावत किसी भी सामग्री को प्रस्तुत करते समय अनुसंधानकर्ता को अत्यन्त सावधानी व यथार्थता बरतने की उरूरत होती है । साथ ही उद्धरित सामग्री का पृष्ठ संख्या सहित पूर्ण सन्दर्भ दिया जाता है एक - दो वाक्यों से अधिक के उद्धरणों को यथासम्भव प्रयोग में नहीं लाना चाहिए । वस्तुतः दीर्घ उद्धरणों के प्रयोग से साहित्य - चोरी ( Plagiarism ) के आरोप की सम्भावना रहती है । इसलिए केवल लघु उद्धरणों को उद्धरण चिन्हों से घेरकर ही प्रयुक्त करना चाहिए । अनुसंधान प्रतिवेदन में उद्धरणों की अधिकता को अच्छा नहीं समझा जाता है । भावानुवाद के रूप में अनुसंधानकर्ता दूसरों के कार्यों को अपनी भाषा - शैली व शब्दों में इस प्रकार से प्रस्तुत करता है कि वह अनुसंधान कार्य की पृष्ठभूमि तैयार करने में सहायक सिद्ध हो सके । अनुसंधानकर्ता किसी लेख या कार्य को संक्षेप में प्रस्तुत करता है तो उसे सारांश कहते हैं । इसमें लेख कार्य की सभी महत्त्वपूर्ण बातों को संक्षिप्त में समाहित किया जाता है । मूल्यांकन वस्तुतः किसी लेख , कार्य , अनुसंधान , प्रबन्ध आदि के बारे में अनुसंधानकर्ता की स्वयं की प्रतिक्रियायें होती हैं जो या तो उसकी सहमति व असहमति को इंगित करती हैं , अथवा अनुसंधानकर्ता की दृष्टि से उसके स्पष्टीकरण को प्रस्तुत करती है । मूल्यांकन प्रकार के संक्षिप्त लेख बनाते समय अनुसंधानकर्ता को सुदैव ही आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए । वस्तुतः टीप या संक्षिप्त लेख बनाना एक अत्यन्त सुजनात्मक व महत्त्वपूर्ण कार्य है जिसमें अनुसंधानकर्ता के चिन्तन की प्रक्रिया भी अनवरत चलती रहती है । अनुसंधानकर्ता सम्बन्धित साहित्य की समीक्षा के लिए इन चारों प्रकार का उपयोग अपनी आवश्यकतानुसार कर सकता है । टीप प्रलेखन के लिए अनुसंधानकर्ता 4 - x6 * के कार्ड का प्रयोग कर सकता है । कार्यों के प्रयोग से सम्बन्धित साहित्य को आवश्यकतानुसार व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने में सहायता मिलती है । टीप बनाते समय सर्वप्रथम अनुसंधानकर्ता को सन्दर्भित सोत की समस्त सूचनाएँ अंकित कर लेनी चाहिए एवं तदुपरान्त वास्तविक टीप संलेखन का कार्य करना चाहिए । यदि सम्भव हो के अनुसंधानकर्ता को सामग्री के प्राप्त करने का स्रोत अर्थात् पुस्तकालय का नाम व काल नम्बर भी लिख लेना चाहिए जिससे आवश्यकता होने पर उस सामग्री को शीघ्रता से तलाश किया जा सके । यहां व इंगित करना आवश्यक होगा कि विभिन्न संस्थाओं , विश्वविद्यालयों तथा पत्रिकाओं के प्रकाशकों के भाग प्रायः सन्दर्भ तथा अन्य - सूची प्रस्तुत करने के अपने - अपने प्रारूप निर्धारित किये जाते हैं एवं अनुसंधानकर्ताओं से उन प्रारूपों का प्रयोग करना अपेक्षित रहता है । इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान तथा विकास के कार्यों में रत अनेक संगठनों जैसे माईन लैंगुएज एसोसियेशन ( MLA ) तथा अमेरिकन साइक्लोजिकल एसोसियेशन ( APA ) आदि ने अनुसंधान स्रोतों की पहचान को इंगित करने के लिए अपने - अपने प्रारूप ( Styles ) भी प्रस्तावित किये हैं । वस्तुतः अनुसंधान लेख तथा प्रतिवेदन लिखने , टॅकित करने तथा मुद्रित कराने के सम्बन्ध में विस्तृत दिशा - निर्देशों को उदाहरणों के साथ इस प्रकार की संस्थाओं के द्वारा हस्तपुस्तिकाओं ( Handbooks ) के रूप में प्रकाशित किया गया है । नव अनुसंधानकर्ता को प्रारम्भ में ही अपने अध्ययन क्षेत्र के इन दिशा - निर्देशों का सम्यक ढंग से अवलोकन , कार के लोगों के लिए लिखी जाने वाली सान्दर्भिक सूचनाएं निम्नवत् हो सकती हैं ।
वेब सामग्री http://www.ncld.org.in . Accessed on 2 October , 2010 . NCLD ( 2005 ) : Information about Learning Disabilities . Available : सन्दर्भित लेख के पृष्ठ संख्या ।
अनुसंधान लेख - लेखक / लेखकों के नाम , वर्ष , लेख का शीर्षक , पत्रिका का नाम व अंक , उदाहरण : Jindal , A. ( 2010 ) : Revisiting Impact of Hawthorne Effect in Experimental Research , American Journal of Medical Sciences . 12 : 5.Pp . 17-28 Rao , P.K. and G.K. Mehta ( 2008 ) : " Enhancing Marketing Skills - Some Tips " . Ashian Journal of Management and Trade.7 : 2.Pp. 15-20 . Bajpai , Sanjna , et al . ( 2005 ) : " Effect of War Fobia on Mental Health of Students - ACase Study of Iraq " . National Journal of Peace Education . 24 : 1. Pp . 19 . गुप्ता , एस ० पी ० ( 2010 ) : अस्तित्व के लिए शिक्षा , एपीयर जर्नल ऑफ एजुकेशन 9 : 1 , पृष्ठ 3.9 . दुआ , राधा तथा अमृता महेश्वरी ( 1992 ) : कुशल एवं अकुशल श्रमिकों के मानसिक स्वास्थ्य का तुलनात्मक अध्ययन , परिशीलन शोध एवं विकास पत्रिका . 2 : 3 . पृष्ठ 27-35 . तिवारी , आर ० के ० , आरजे ० मौर्या तथा सुभाष लामीचन्नी ( 1975 ) : मुक्त विद्यालयी शिक्षा में पुस्तकालयों का योगदान , जर्नल ऑफ रिसर्च एण्ड डिस्टैन्स ऐजूकेशन 412. पृष्ठ 92-97 .
ऑन लाइन अनुसंधान - लेख Edwards , F.D. ( 2009 ) : Association of SES with Chronic Renal Failure in Urban Population . Researches and Studies . 12 : 4 . Pp . 209-218 . 17 Oct. 2010 . < http : /www.unitedjournals.com.in .
अनुसंधान प्रबन्ध - अनुसंधानकर्ता का नाम , प्रबन्ध का शीर्षक , उपाधि व विषय , विश्वविद्यालय का नाम , प्रस्तुति वर्ष , सन्दर्भित पृष्ठ संख्या । उदाहरण : Gupta , A. ( 2009 ) : A Comparative Study of Satisfaction Among Factory Workers . Ph.D. Thesis in Psychology , Shanti Niketan University.P . 104 , अग्रवाल , सरस्वती चन्द्र ( 2005 ) : संस्थागत वातावरण का कर्मचारियों की कार्यक्षमता एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव का एक अध्ययन , प्रबन्धन शास्त्र में पी - एच.डी . उपाधि हेतु प्रस्तुत अनुसन्धान प्रबन्ध , राजस्थानी विश्वविद्यालय , पृष्ठ 115-121 .
अनुसंधानकर्ता को सम्बन्धित साहित्य के सर्वेक्षण का कार्य सदैव ही यथासम्भव नवीनतम उपलब्ध ( Most Recent ) साहित्य से प्रारम्भ करना चाहिए । संक्षिप्त लेख बनाते समय संक्षिप्तीकरण ( Brief ) अवश्य होना चाहिए परन्तु वर्तमान अनुसंधान की दृष्टि से सार्थक तथा महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को कदापि नहीं छोड़ना चाहिए । अनुसंधानकर्ता को अपने अनुसंधान के उद्देश्यों के परिप्रेक्ष्य में यह देखते हुए कि सर्वेक्षणाधीन विभिन्न अनुसंधान कार्य उसके द्वारा किये जा रहे अध्ययन में किस प्रकार सम्बन्धित है अपने नोट्स बनाने चाहिए ।